विज्ञान-कथा - अप्रैल-जून 2018 : संपादकीय - योग की वैज्ञानिकता // विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

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योग की वैज्ञानिकता।

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी ।

अतिथि-सम्पादकीय।

क ई बार विषय को परिभाषित करना विषय को जानने से अधिक कठिन होता है। उदाहरण के लिए आप अपनी पत्नी को अच्छी प्रकार जान तो सकते हैं मगर परिभाषित नहीं कर सकते। योग के लिए भी यह बात लागू होती है। योगाभ्यास करने का साधन शरीर है। शरीर एक जीववैज्ञानिक संरचना है अतः योगाभ्यास तथा उसके परिणामों को जीवविज्ञान से अलग नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य को लेकर भारतीय सोच व पश्चिम की सोच में एक मूल अन्तर है। पश्चिम मानता रहा है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है जबकि भारत मानता रहा है कि मस्तिष्क स्वस्थ है तो शरीर स्वतः ही स्वस्थ रहेगा। भारत में व्यक्ति के मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के उपायों पर अधिक जोर रहा। ऐसा ही एक उपाय है योग।

हम शरीर को एक इकाई मानते हैं मगर ऐसा है नहीं। हमारा शरीर असंख्य कोशिकाओं का समूह है जो ऊतक, अंग, तंत्र के समूह में बंध कर शरीर का निर्माण करते हैं।

शरीर में पाचन, श्वसन, उत्सर्जन, ज्ञानेन्द्रियां, अन्तःस्रावी, प्रतिरक्षी आदि अनेक तन्त्र मिल कर कार्य करते हैं। तन्त्रिका तन्त्र इन सब के बीच समन्वय बनाता है। समन्वय बिगड़ने से शरीर रोगी हो जाता है। वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि इस समन्वय को बनाए रखने का प्रयास ही योग है। ज्ञानेन्द्रियां हमारे वातावरण में प्रतिपल होते परिवर्तनों का ज्ञान कराती है।

उस ज्ञान के सन्दर्भ में हमारी प्रतिक्रिया पर ही हमारा स्वास्थ्य निर्भर करता है। इस प्रतिक्रिया को सयंमित बनाए रखना ही योग है। श्री कृष्ण ने गीता में कहा है -।

युक्ताहार बिहारस्य, युक्त चेष्टस्य कर्मसु।

युक्तास्वप्नावबोधस्य, योगो भवतु दुःखहा।।

खाने, पीने, सोने, जागने सभी का नियन्त्रण करना होता है। इसे ही चित्त को निश्चल बनाना कहते हैं। यही योग है। योग को साधने में सफल रहे वही योगी कहलाता है। स्वामी विवेकानंद जी ने बताया कि नाड़ियां तीन प्रकार की होती है।

इड़ा, पिगला व बीच में सुषुम्ना। ये तीनों मेरुदण्ड में स्थित हैं।

इड़ा, पिगला दायीं और बायीं ओर तन्त्रिकाओं के गुच्छ हैं। इड़ा व पिगला का व्यवहार नियमित करना तथा उनको लय में रखना ही प्राणायाम का प्रमुख उद्देश्य है। प्राणायाम करने से श्वास नियन्त्रित हो रक्त साफ करती है यह बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि इस गति से प्राण की गति को विकसित किया जा सकता है। स्वामी जी के अनुसार विश्व में दिखाई देने वाली सभी क्रियाएं प्राण की ही विभिन्न अभिव्यक्तियां हैं।

जीवविज्ञान के अनुसार तन्त्रकीय क्रियाएं दो प्रकार की होती है, एच्छिक तथा एनैच्छिक। एच्छिक क्रियाएं मस्तिष्क से नियंत्रित होती है। एनैच्छिक क्रियाएं दो परस्पर विपरीत दिशा में कार्य करने वाले तन्त्रकीय व्यवस्था से नियंत्रित होती हैं।

प्राचीन धारणा के अनुसार ये ही इड़ा व पिगला हैं। नवीन अनुसंधान बताते हैं कि अन्तस्रावी ग्रन्थियों का एक और तन्त्र भी हारमानों के माध्यम से शरीर के नियन्त्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रतिरक्षीतन्त्र कार्य करता है। वातावरण में उपस्थित हानिकारक सूक्ष्म जीवों का शरीर पर आक्रमण होने पर प्रतिरक्षीतन्त्र उनके विरुद्ध कार्यवाही कर शरीर को स्वस्थ रखने का यत्न करता है।

अनुसंधान बताते हैं कि प्रतिरक्षी तन्त्र शरीर की छठी ज्ञानेन्द्री की तरह भी कार्य करता है। शरीर में संक्रमण होने की सूचना प्रतिरक्षीतन्त्र मस्तिष्क को भेजता है। उसके बाद मस्तिष्क अन्य अंगों को आवश्यकतानुसार सन्देश भेज कर रोग का उपचार करने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए अस्वस्थ होने पर पाचनतन्त्र ठीक तरह कार्य करने की स्थिति में नहीं है तो यह भोजन करने की इच्छा समाप्त कर देगा।

शरीर में ऊर्जा उत्पादन ठीक से नहीं हो रहा तो चलने फिरने इच्छा समाप्त हो जाएगी।

विज्ञान यह मानता रहा है कि तन्त्रिका तन्त्र तथा अन्तःस्रावी तन्त्र पर संवेदनाओं का असर होता है। मगर अब सिद्ध हो गया है कि प्रतिरक्षीतन्त्र स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है। जेम्स मेकेंजी द्वारा जब यह प्रदर्शित किया गया कि गुलाब के फूलों से एलर्जी रखने वाला व्यक्ति, गुलाब के फूलों का चित्र देख कर भी बीमार हो सकता है। स्पष्ट है कि भावनाएं त्वचा के माध्यम से प्रतिरक्षीतन्त्र को प्रभावित कर सकती है। पेरिस के पाश्चर संस्थान में हुए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि रुसी वैज्ञानिक पावलोव के कुत्ते पर किए अनुकूलन के प्रयोगों को प्रतिरक्षी तन्त्र पर भी दोहराया जासकता है। इन प्रयोगों में पाया गया कि अप्रत्यक्ष उद्दीपनों से खरगोश के प्रतिरक्षी तन्त्र को सक्रिय किया जा सकता है। केवल सेकरीन का घोल पिला कर चूहों के प्रतिरक्षी तन्त्र को कुछ समय के लिए निष्क्रिय किया जा सकता है। प्रतिरक्षी तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र व मानव व्यवहार के आपसी सम्बन्धों को अब मनोतंत्रीप्रतिरक्षी विज्ञान (साइकोन्यूरोइम्यूनोलोजी) के अन्तर्गत अध्ययन किया जाने लगा है। यह माना जाने लगा है कि रोग के मुकाबला करने में मानसिक अवस्था महत्वपूर्ण स्थान रखती है। रोगों से लड़ने वाले रसायन जैसे एण्डोमोरफिन, इंटरफेरान आदि सभी हमारे शरीर में बनते हैं। आवश्यकता उनके उचित स्रवण के लिए सकारात्मक सोच बनाए रखने की है। यहीं योग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

कुछ लोग आसन को ही योग मानते हैं। आसन से शरीर रूपी मशीन के प्रत्येक भाग को चुस्त-दुरुस्त रखा जाता है। योग में आसनों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ होता है।

योग के आठ अंग माने जाते हैं।

1. यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्यचर्य व अपरिग्रह)

2. नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान)

3. आसन,

4. प्रणायाम,

5. प्रत्याहार,

6. धारणा,

7. ध्यान व

8. समाधि माने जाते हैं। इन सबका सामूहिक प्रभाव व्यक्ति की सकारात्मकता को बढ़ाता है। गीता में वर्णित स्थितिप्रज्ञता को सकारात्मक की चरम अवस्था माना जा सकता है। आज विज्ञान जिन बातों को अनुसंधान द्वारा खोज रहा है वे बातें प्राचीनकाल में अनुभवों व चिन्तन के माध्यम से खोजी गई। दोनों में कही विरोधाभास नहीं है। गीता में कहा गया है कि।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानायोः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सग्ङविवर्जितः।।

भगवान ने उस व्यक्ति को अपना परम भक्त माना है जो शत्रु व मित्र तथा मान अपमान को, सर्दी गर्मी सुखः दुखः आदि की स्थिति में भी समान रहे और आसक्ति से सदा दूर रहे। योग इस स्थिति तक पहुँचने का मार्ग है। कीटों, पशु, पक्षियों आदि को प्रकृति ने विवेक नहीं देकर उनकी जैविक क्रियाओं पर अपना नियत्रंण बनाए रखा है। प्रकृति ने मानव को विवेक दिया और उस पर से नियन्त्रण हटा लिए। मानव को सही जीवन जीने के लिए विवेक का उपयोग कर प्रकृति से सामन्जस्य बना कर चलना अनिवार्य है। योग उसी विवेक को बनाए रखता है। योग किसी को अमर नहीं बना सकता है।

योग बुढ़ापे की गति को कम करके मानव के 100 वर्ष के स्वाभाविक जीवन को सुखमय बना सकता है। योग किसी एक धर्म से नहीं जुड़ा है अपितु हर धर्म में उपस्थित है क्योंकि यह शाश्वत जीवन मूल्यों के रूप में मानव जाति की एक साझा उपलब्धि है। निष्कर्ष रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है ‘योगः कर्मसु कौशलम्’, योग से कर्मों में कुशलता आती हैं।

(विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी)

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❒ ई मेल : vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

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