उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 4 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

भाग 1 भाग 2 भाग 3

मैं बहुत ही कम उम्र में विवाह योग्य हो गई। मेरे शरीर के उभार साफ-साफ दिखाई देने लगे। एक दिन शाम को मैं उनके घर से लौट रही थी, उनके बेटे सोमेंद्र ने मुझे उस नग्न मूर्ति के पास अपनी बाहों में जकड़ लिया। उस समय अंधेरा होने लगा था।

वह कहने लगा, “नीरु! मैं तुमसे प्रेम करता हूं। मैं तुमसे विवाह करूंगा। आज रात मेरे कमरे में आ जाना। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा। ”

उस रात मैं लाज-शर्म से अधमरी-सी हो गई। मन-ही-मन सोच रही थी, ये सारी बातें तो देवदास की बातें हैं। पारुल अपने देवदास के घर जाएगी;घर-संसार, समाज सब पीछे छोडकर। अंधेरी रात में प्रेम निवेदन करेगी। मेरी आंखों के आगे सारे दृश्य साफ-साफ दिखाई देने लगे।

आधी रात को मैं चुपके से अपने कमरे से बाहर निकली। मां सोई हुई थी। धीरे-धीरे मैंने दरवाजा खोला। मैंने देखा रास्ते में एक पुलिस वाला खड़ा था। भय से मैं दौड़कर अंदर चली आई। पुलिस वाले को शक हुआ कि शायद कोई चोर घुसा है? उसने दरवाजा खटखटाया। मां उठी। मां ने देखा कि मैं कहीं बाहर जाने के लिए सजी-धजी खड़ी हूं। रोते-रोते सारी बात मुझे मां को बतानी पड़ी।

अगले दिन मां ने उनकी पत्नी के सामने मेरे शादी का प्रस्ताव रखा। हंसते-हंसते वह लोटपोट हो गई। मैंने खुद जाकर सोमेन से पूछा तो वह भी हंसने लगा और कहने लगा, ‘ऐसी बातें तो कॉलेज में लड़कियां रोज ही करती है। कई लड़कियां मेरे घर आया करती है। सबसे अगर मैं विवाह करने लगा तो किसी राजा-महाराजा की तरह घर पर एक विशाल हरम खोलना पड़ेगा।

वह मजाक और क्रूर हंसी की आवाज आज भी कभी-कभी मेरे कानों में गूंज उठती है। उसके बाद हमने उस घर और बस्ती को छोड़ दिया।

कहानी और रोचक हो गई। उस रात सोमेन भी डिनर पर आया था। उसके साथ में एक महिला थी। शायद उसकी पत्नी। मैंने तुरंत उस प्रौढ़ आदमी के पास जाकर कहा, ’अगर कोई मेरे बारे में पूछे तो आप कह देना मैं आपके साथ दिल्ली से आई हूँ। ”

उन्होंने मेरी बात को बहुत अच्छे ढंग से संभाल लिया। मैं उनकी पर्सनल सेक्रेटरी बनी। उनके मित्रों को रिसीव करना ही मेरा काम था।

सोमेन ने पूछा, “लगता है, आपको मैंने कहीं देखा है?”

मैंने होठ भींच कर उत्तर दिया, “शायद पिछले जन्म में हो सकता है, मैं कोलकाता में जिंदगी में पहली बार आ रही हूँ। ”

इस उत्तर का मैंने अंग्रेजी में पहले से ही अच्छी तरह से रिहर्सल कर रखा था। मैंने देखा कि वह लगातार मेरी तरफ देखता ही जा रहा था। उसकी बातों में कोई रुचि नहीं थी। डिनर के समय वह जान-बूझकर मेरे बगल में बैठा। बीच-बीच में अपने पैरों से मेरे पैरों को स्पर्श कर देता था। मैं पास में बैठी महिला को यह बात बता देती थी। जिसके लिए वह बार-बार क्षमा मांगता था।

जब-जब मैं बाथरुम की तरफ जाती तो कोई न कोई बहाना बनाकर वह मेरे पीछे चला आता और जान-बूझकर मेरे शरीर से टकरा जाता। नहीं तो, इधर-उधर की बातें छेड़ देता।

रात को दो बजे तक वह डिनर पार्टी चलती रही। खाना-पीना हुआ। इस हाल में अंग्रेजी नाच हुआ। सभी पीकर नशे में धुत थे। स्त्रियां नाच में अपना पार्टनर बदल रही थी। मैं किसी के साथ नहीं थी। पहली बात तो मुझे नाचना नहीं आता था। दूसरी बात, मुझे उन सज्जन की इज्जत भी तो रखनी थी क्योंकि उन्होंने मुझे अपना सेक्रेटरी बनाया था। तीसरी बात, यह माहौल मेरे लिए एकदम नया था। मैं खड़ी-खड़ी देख रही थी, अगल-बगल ताक रही थी। हालांकि मन में शरारत पैदा हो गई थी। मैं सोच रही थी, निर्मला की मौत जरूरी है। मैं इन औरतों के बीच मिस नीरा को अनुभव कर रही थी।

कुछ समय बाद सोमेन मुझे कोई बहाना बनाकर दूसरे कमरे में ले गया। मुझे अपनी दोनों बाहों में जकड़ लिया। मैंने जोर से अपने आपको छुड़ा लिया। मेरी आंखों में तैरने लगा वही मजाक, वही व्यंगभरी हंसी। मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा लगाया। सोमेन के चेहरे पर एक हिंस्र और नफरत भरी दृष्टि दिखाई देने लगी। कोई भी स्त्री ऐसे पुरुष की कामना नहीं करेगी। उस संगमरमर वाले घर की इच्छा मेरी जरुर थी, मगर ऐसे मर्द की कभी चाह नहीं रही। यह घटना मैंने उसकी पत्नी को बता दी। मैंने अपना प्रतिशोध लिया।

मेहमान लोग जा चुके थे, मगर मैं कहानी ‘आलिस’ की नायिका की तरह नई दुनिया में आ गई थी। इतनी ऊंची जगह! इतना भोग-विलास! ! इतनी सहजता से मुझे मिल रहा था?टाइपिस्ट की नौकरी, टीचरगिरी, दुकान का काम कितनी तकलीफदेह हुआ करते थे मेरे लिए। फिर भी जीवन जीना दुष्कर था। अब कुछ समय के लिए मैंने अपना रुप बदल लिया है। ऐश्वर्यपूर्ण निवास स्थान, सुंदरतम खाद्य पदार्थ, अमीर, गणमान्य लोगों का सानिध्य-सब कुछ मेरे पास था, थोड़ा-सा मूल्यबोध बदलने की एवज में।

उस दिन मेरा रास्ता बदल गया, मैंने अपना रूप बदला, मैंने अपना नाम बदला। कदम-कदम पर मैं अंधेरे खड्डे में गिरती चली गई। मैं वेश्या बन गई। सोमेन आया। मैंने अपने कमरे का फर्श संगमरमर का बनवाया, उसकी स्त्री के जेवरों से। मेडिकल दुकान के मालिक के यार-दोस्त मेरे आदेश की प्रतीक्षा करने लगे। बीच-बीच में नाचकर मैं उन्हें उच्छृंखल बना लेती हूं। कोई मेरी ओर देखकर कहता, ‘मेरे पास रात में तुम्हारा उपभोग करने के लिए पैसे नहीं है। ’ मैं पतिता हो गई। मगर मुझे मिला ढेर सारा पैसा, संभोग, ऐश्वर्य। कुछ भी बुरा नहीं था। कोई बंधन नहीं था। बल्कि मुझे नारीत्व के उपभोग के सारे सुअवसर मिल रहे थे। ”

“सारे सुअवसर?” काउल ने पूछा।

कुछ क्षण के लिए रुककर नीरा ने कहा, “हां, अनेक अवसर। ”

उसके घर के पते पर गाड़ी पहुंच चुकी थी। काउल ने उसके घर के आगे सीमेंट की बनी नग्न-नारी की मूर्ति देखि। घर में फर्श सफ़ेद-काले संगमरमर से चमक रहा था।

नीरा ने कहा, “जिंदगी की इतनी गोपनीय बातें आपसे कर डाली। मुझसे घृणा करने का अवसर दे रही हूँ। मुझे उसकी चिंता नहीं। मगर घर के अंदर चलने का अनुरोध तो कर सकती हूँ?”

काउल अंदर चले गए। चलते हुए पूछा, “नीरा! तुम्हारे मां-बाप कहां है?”

नीरा ने उनका कमरा दिखाया। काउल ने बूढ़ी मां को प्रणाम किया। नीरा के रोगी पिता के पास कुछ समय के लिए बैठे। देखा, किस तरह गरीबी और फिर अमीरी उनके व्यक्तित्व को रुद्ध कर रहा था। अनुभव किया गरीबी का दुख, ऐश्वर्य और लज्जा के क्षत-विक्षत दाग।

बूढ़ी मां ने काउल से कहा, “बेटे! यह अभिशप्त जीवनहै। इससे तो मौत ही अच्छी है। मगर क्या करें, जिंदगी जीने का लोभ! हमें घर से बाहर निकले हुए वर्षों गुजर गए। किसी परिचित या मित्र से हमारा कोई संबंध नहीं है। हम इस वेश्या के मां-बाप जो ठहरे। ”

काउल सोच रहे थे, लेखक और चित्रकारों ने वेश्याओं का इतिहास लिखा हैं। मगर उनके मां बाप- अपमान की आग में पल-पल जलते हैं, जिनका दुख दरअसल और भी मार्मिक होता है। उनके दुख का कोई प्रतिदान नहीं है। कोई प्रत्युत्तर नहीं है।

कमरे में खड़े-खड़े काउल देख रहे हैं-शिकारी के तीर से बिंधे हुए दो मरणासन्न क्षुद्रपक्षी, असहाय। कोई समर्थन नहीं। सारी दुनिया में हीनतम। यंत्रणा से छटपटाती उनकी आत्माएँ।

कुछ ही देर में वह कमरे से बाहर निकले। बाहर पर्दे की आड़ में नीरा खड़ी थी। उसकी आंखें आंसुओं से नम थी। क्षमा मांगने की मुद्रा में मानो वह अनुनय-विनय कर रही हो। काउल ने उसके दोनों हाथ पकड़कर कहा, “नीरा! आंसू भविष्य के पथ को धुंधला कर देते हैं। कदम निर्बल हो जाते हैं। प्रगति रुक जाती है। ”

आंसुओं की दो बूंदें काउल के हाथ पर गिर पड़ी। नीरा अपने आप पर संयम नहीं रख पाई। उसे काउल की गोद में शरण लेनी पड़ी। आंसुओं की धारा बहती जा रही थी। नीरा कह रही थी, “काउल साहब! इस नर्क से मैं मुक्ति चाहती हूं, निजात पाना चाहती हूं। सुख, भोग-विलास के बारे में मैंने जो कहा है, सब झूठ है, छलावा है। जिंदगी मुझे बहुत असह्य लग रही है। यह अपमान, यह घृणा, यह जीवन अब और सहा नहीं जाता। ”

कुछ समय के बाद काउल ने नीरा को अपने से अलग कर दिया। वह कहने लगे, “नीरा, कलंक को तो माफ किया जा सकता है, मगर असहायता का कोई परिपूरक नहीं है। अपने पैरों पर खड़ा होना सीखो। दुनिया से मुकाबला करो। ”

आँसू पोंछकर नीरा इस तरह स्थिर खड़ी हो गई मानो वह यूनान देश की एक पत्थर की मूर्ति हो।

काउल ने वहाँ से विदा ली।

*******

दो साल बाद काउल फिर उस शहर में आए। हावाई जहाज से उतरकर होटल में रुकने के बाद सीधे सबसे पहले नीरा के घर गए। उस समय शाम हो रही थी। फूलों की तरह माला की तरह रोशनी सड़कों को सजा रही थी।

घर में पहुंचते ही नीरा से मुलाक़ात हुई। उन्होंने देखा कि उसमें सौंदर्य की वह मादकता नहीं थी। उसकी निगाहों में वह कशिश नहीं थी। शांत, शुभ्र, रुपहले आंगन में नीरा तुलसी के पौधे की तरह प्रसाधनविहीन दिखाई दे रही थी, वैधव्य के गौरव से उद्भासित। कुछ समय तक दोनों एक दूसरे को देखते रहे।

नीरा ने कहा, “काउल! तुम मनुष्य नहीं महात्मा हो। ”

“नीरा! तुम इसे लिख दो। मैं टेंपलेट बना कर बाटूंगा। पहला परिणाम तो पक्का यह होगा कि तुम पूरी पागल हो गई हो। यह बात साबित हो जाएगी। ”

“माताजी और पिताजी कहां है?” काउल ने पूछा।

“ काली मंदिर गए हैं। ”

नीरा ने कहा, “काउल! जानती हूं धन की आपके पास कोई कमी नहीं है, मगर क्यों गवाया इतना धन? इतना त्याग क्यों?क्यों अपने परिवार को आपने इससे वंचित किया?”

काउल ने कहा, “मैं अपने मां-बाप खो चुका हूं। मैंने सोचा कि इन दोनों की पीड़ा कुछ कम करूंगा। फिर यह जो धन है, वह भी तो कलंक से ही पैदा हुआ है। उस दिन तुम्हारे घर से आने के बाद ऑफिस में काला-बाजारी का काम किया। मेरे हिस्से से मुझे कहीं अधिक पैसा मिला। मैंने सोचा कि इस धन पर तुम्हारे मां-बाप और तुम्हारा अधिकार है। ”

वह शाम काउल को बहुत खराब लग रही थी। उनकी आंखों के सामने तैरने लगे दो रुग्ण, असहाय, वृद्ध शरीर। काउल ने उनमें अपने मां-बाप को याद करने का प्रयास किया। कोई स्मृति याद नहीं हो पाई। वह सोचने लगा, इसी तरह हताशा से उसके मां-बाप विलुप्त हो गए होंगे। काउल में माता-पिता के प्रति ममता जाग उठी। उस शाम अपनी कमाई का एक हिस्सा काउल ने यह लिखकर नीरा के माता-पिता के लिए भेजा।

“काउल का यह उसके माता-पिता के प्रति अर्घ्य, प्रणाम। इस धन से वे अपना आगामी जीवन बिता सकते है। ”

नीरा को दूसरा हिस्सा भेजा था, जिसमें लिखा था, “नीरा! अगर चाहो तो इस धन से तुम अपने पहले की जिंदगी में लौट सकती हो, जिसे तुम शुद्ध और पवित्र मानती हो। अन्यथा इसे अपने अतीत जीवन के वर्णन के लिए पुरस्कार-स्वरूप ग्रहण कर सकती हो। ”

नीरा ने पतित वेश्याओं के बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल बनाई। अपने प्रयास और दूसरों के सहयोग से उसने इस संस्थान का निर्माण किया। धन आने से नीरा को अपना खोया सम्मान फिर से प्राप्त हो गया।

नीरा ने कहा, “आपके यहाँ क्या रीति-रिवाज है, मुझे मालूम नहीं। हमारे यहाँ ललाट पर तिलक लगाकर भाई के चरण-स्पर्श करते हैं, अगर उसे कोई आपत्ति नहीं हो। ” काउल की ललाट पर नीरा ने टीका लगाकर चरण स्पर्श किए। काउल ने नीरा को आशीर्वाद दिया और अपनी बाहों में भर लिया। एक छोटे बच्चे की तरह वह काउल का चेहरा देख रही थी। काउल ने नीरा का बदला हुआ नया रुप देखा, ममतामयी, कोमल, शांत, पवित्र नारीत्व के रूप में।

3.

रात...

प्रिंसेस डिनर के साथ कैबरे में मेक्सिकन नंगा डांस चल रहा था। हृदय को उन्मत्त करने वाले दृश्य। काउल ने कहा, “दास साहब! पाप की करामत जानते हो? अहंकारी कर्ण का उद्धत भार सहन नहीं करने के कारण शायद लक्ष्मी प्रतिदिन उन्हें एक भरी स्वर्ण भेंट कर रही थी। मगर मुझे अजस्र बैंक बैलेंस मिला है। शायद मेरे पाप का भार माँ लक्ष्मी सहन नहीं कर पाई। बीच-बीच में मुझे विदेशी मुद्रा भी प्रदान की। ”

“नर्तकियों के जरिए लक्ष्मी का उपहार तो ससम्मान आ रहा था। आपके लिए कस्टम क्या है?”

“ मेरे लिए नर्तकियां सदा उर्वशी और मेनका नहीं थी। कभी-कभी अलीबाबा की सायोनारा भी थी। एक हाथ में सुरा का प्याला और दूसरे हाथ में चाकू। कभी-कभी फूल-माला के बदले लोहे की हथकड़ी भी पहुंचती थी। मगर उस पाप के भरोसे जिंदगी के कितने साहारा-मरुस्थल पार किए, उसका कोई हिसाब नहीं। कोई छोटी-मोटी भेंट या वितरण, कई बार मामूली जुर्माना अदाकर रिहा हुआ हूँ। ”

थोड़ी-सांस लेकर फिर से कहने लगे, “लगता है पुण्य काफी झूलने वाला सुपारफिशियल है। जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मगर पाप की जड़ सदा भरोसेमंद, सुदृश और गहरी होती है। बच्चे को देखो, उसकी कितनी हिंसा, कितना लोभ, एक खिलौने के लिए, एक पोशाक के लिए होता है। बिना सोचे समझे जरा-सी चीज के लिए औरों से युद्ध कर बैठता है। मगर त्याग, सत्य, सेवा के लिए बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, गांधी सिर पीट-पीटकर थक गए। पोथी पर पोथी खत्म हो गई। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर से ऊंचे स्वर में आवाज लगाई गई। मगर परिणाम स्वरूप स्वार्थ को छोड़कर सेवा, त्याग, सत्य आदि का कोई मूल्य नहीं रह गया। पाप आदिम है, पाप मौलिक है। पुण्य शौकिया है, पुण्य क्षण-स्थायी है।

फिर जरा चुप रहकर काउल ने कहना शुरू किया, “मानव-इतिहास में व्याप्त इस प्रगल्भ दर्शन को हम और हमारे जैसे व्यापारी शायद अच्छी तरह से समझ सकते हैं। ”

“ काउल! तुम आकाश में घटाघोप बादल, उच्छृंखल बिजली और कर्कश वज्रपात देखते हो। मगर छोटे-छोटे तारे जो शांति से इनका मुकाबला करते हैं, आखिरकार उनकी विजय होती हैं। चाहे रात्रि का अंतिम प्रहर हो, मगर विजय उन्हें मिलती है! दूर से देखने पर खाली नजर आते हैं, रूपहीन, संज्ञाहीन, असुराकार द्रुमों की तरह। मगर इधर जो सूक्ष्म-फूल किसी लता के सारे खिलता है, वह औरों को शांति और कोमल भाव देता है, उसके अस्तित्व का तुम्हारे पास कोई मूल्य नहीं है?”

“ दास साहब! मुझे तो लगता है सत्य, शांति, कोमलता, तारा, फूल आदि को गूँथकर कविता तो बन सकती है, मगर जिंदगी नहीं चल सकती है। मार्बल फ्लोर, ड्राई चेरी, चाइनीज डिनर, रूपवती स्त्रियां, किताबों के ढेर के पीछे अंधेरा, गरीबी, बहुत अपव्यय है? मन मुरझा जाएगा, शरीर टूट जाएगा और सारे विचार ढह जाएंगे। ”

“ काउल! इन दोनों परिणामों के बीच एक गोल्डन मीन भी है। बीच का एक रास्ता है। ”

“ दास साहब! उसे एक एक्सीडेंट समझ ले। किसी दिशा में चलते समय रास्ते में पड़ने वाली एक छोटी-सी धर्मशाला की तरह। दोनों परिणामों के बीच एक का होना जरूरी है, चाहे जागृत अवस्था में हो या अवचेतन अवस्था में, रात में हम जहां विश्राम लेते हैं वह यात्रा का अंतिम स्थान नहीं होता है। ”

“ नदी के किनारे जो बालू दिखाई देती हैं, वह जन्म से ऐसी नहीं होती। शायद उद्गम के समय पर कभी रहे होंगे विराट शिलाखंड। तूफान, वर्षा, तुषार आए और उन्हें तोड़-मरोड़ कर नदी के वक्ष स्थल में बहा दिया। जहां उन्हें आश्रय मिला। कितने जंगल, पहाड़ पारकर टूटे-फूटे अंगों में क्षुद्र से क्षुद्रतर होते चले गए और अंत में बालू में परिणित हो गए। ”

काउल की जिंदगी का इतिहास प्रकृति के इस भौगोलिक विवर्तन की तरह था। काउल के परिवार की आर्थिक स्थिति आइसबर्ग की तरह थी। जमीदारी की आय उनके लोक-दिखावे की आमदनी का एक मामूली हिस्सा था। हिसाब रखना नीचता का परिचय मानकर उनके पूर्वज सोने के संग्रह और धन का हिसाब नहीं रखते थे। लक्ष्मी पर उनका अटूट और असीम भरोसा था। युगों-युगों के लिए अपने भविष्य को सोने की ढाल में सुरक्षित समझकर हमारे मिस्टर काउल के दादा बीसवी सदी के हरिश्चंद्र बने थे। जब कोई कहता कि आपकी पोशाक कितनी सुंदर दिखाई देती है तो वे तुरंत इस तरह की पोशाकें मंगवाकर उस कलाप्रेमी गोष्ठी में बांट देते थे। जब कोई कहता आपका शहर से दूर रहना हमारे लिए बड़ा कष्टप्रद है क्योंकि हजूर के रोजाना दर्शन उन्हें नहीं मिल पाते हैं तो इस हेतु तुरंत वहाँ मकान खड़ा हो जाता था, नहीं तो जुए के खेल में असुविधा हो जाती थी।

एक बार किसी विलायती कंपनी के बड़े रिप्रजेंटेटिव क्रोकरी बेचने के लिए आए थे। उन्होंने उनकी इज्जत रखने के लिए दो सौ शैफील्ड चाकू, अढ़ाई सौ ग्लासगों प्लेटें खरीदने का आर्डर दिया। उनके दरवाजे से कोई खाली हाथ नहीं जाता, दस कोस के भीतर उनका सुनाम था। काउल महाराष्ट्र के गौरव थे। उनके बारे में कई किवदंतियां आज भी गांव-गाँव में प्रचलित है।

दोस्तों ने कहा, काउलजी विश्व-भ्रमण पर जाएंगे। भारत, बर्मा, श्रीलंका आदि में दोस्तों के साथ वर्षों तक घूमते रहें। उन्होंने लौटकर देखा, उनकी अधिकांश जमींदारी नीलाम हो चुकी थी। परिवार के परिजनों की दया से उन्होंने मुकदमेबाजी शुरू की।

उसके बाद उनके बेटे को मिले अदालतों के असंख्य सर्टिफिकेट और जुए का नशा। घर की धन-दौलत, जमीन, जायदाद बेचकर उन्होंने आजीवन इन दोनों को जीवित रखा। हमारे काउल के पिता ने अतीत के गौरव और पूंजी के बल पर किसी तरह जिंदगी काटी। हमारे काउलजी के धरती पर अवतरित होने के समय तक काउल-परिवार का सारा गौरव ऐतिहासिक वस्तु बन कर रह गया था। जब काउल तीन बरस के थे, उनके पिता स्वर्ग सिधार गए थे और उनकी पाँच वर्ष की उम्र में मां भी छोड़कर चली गई थी। परिवारहीन, संपतिहीन काउल इस दुनिया में जीवन-संग्राम करने के लिए अकेले अपने पाँवों पर खड़े हो गए। उनके पास भविष्य के लिए न कोई पथ था, न कोई पाथेय। कहा जाता है कि उनके गांव में दूर के रिश्तेदारों ने काउल परिवार की बची हुई संपत्ति को पाने के लोभ में उनकी हत्या करने की कोशिश की थी। मगर रिश्ते में लगने वाले मामा ने उनको किसी तरह से बचाकर मुंबई भेज दिया। उन्होंने सोचा, हत्या का अभियोग लगे बिना ही उनका उद्देश्य पूरा हो जाएगा। मुंबई में वह खुद ही किसी ट्राम या बस के नीचे आकर मर जाएगा। इस तरह काउल मुंबई पहुंचे।

काउल परिवार के विशाल शिलाखंड की धूल समय के थपेड़ों के साथ हमारे काउल के जीवन में आई।

“ दास साहब! हर जन्म के उत्स में युद्ध का इतिहास रहता है। हर आदमी एक एक महायुग का उपसंहार है। पुरुष के वीर्य से करोड़ों-करोड़ों सुई की नोक से भी सूक्ष्म स्पर्म निकलते हैं। वे नारी के निर्गत अंडों के पास जाते है। एक अंडे के लिए असंख्य स्पर्म युद्ध करते हैं। अनेक लड़ते-लड़ते विलुप्त हो जाते हैं। अंत में जीतता वही है, जो सर्वोपरि ताकतवर होता है। जो सबसे तेज होता है। इन दोनों के मिलने से एक कोशिका बनती है। वही कोशिका मां के गर्भ में बढ़कर शिशु के रूप में जन्म लेती है। जन्म के बाद उसकी मां-बाप देखभाल करते है। इस तरह संघर्ष का अंत हो जाता है। ”

कुछ समय विचार-शून्य मन से वह चुप-चाप दूर देखते रहे। फिर कहना जारी रखा, “मगर मेरे जन्म के बाद जीवन-संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। बहुत दुख पाया मैंने। शरीर लहूलुहान हो गया। आत्मा क्षत-विक्षत। पता नहीं, कैसे जिंदगी के सात-आठ वर्ष कट गए। जीवन्त पर्दे पर उनकी कोई छाप नहीं पड़ सकी। केवल एक अस्वस्तिकर-भाव भी आज भी ताजा है- कभी- कभी याद आ जाते हैं हमारे घुड़साल और राजमहल के खंडहर। अब वहां सियार और सांप डेरा डाले हुए हैं। आज तक कभी उधर जाने की इच्छा नहीं हुई। वह परिसर भयंकर लगता है। ”

आठ-नौ साल की उम्र में काउल मुंबई पहुंचे थे। उन्हें ठीक से याद नहीं, वे कैसे पहुंचे वहाँ। शायद मामा की कृपा से अचानक एक दिन उन्होंने अपने आपको मुंबई की सड़क पर खड़े पाया। ट्राम, लोगों की भीड़-भाड़ का शोरगुल उनके कानों में पड़ रहा था। किसी दुकान पर नौकर बने। दुकानदार के लिए चाय, पान लाते।

जरूरत पड़ने पर उनके साथ बाजार में गेहूं, चावल, दाल, सिगरेट, अगरबत्ती, साबुन खरीदने जाते। धीरे-धीरे उनको मुंबई रास आने लगी। चारों तरफ बेशुमार भागदौड़। हर तरफ आदमी, उनकी तीव्र गति।

सुबह-सुबह दुकान सजा देते। दोपहर में बिक्री-खरीददारी। रात में दुकानदार के बेटे-बेटी पंडित के पास पढ़ने जाते। खाली स्लेट लेकर काउल भी वहाँ बैठ जाते। अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाई जाती।

काम में कुछ भूल होने पर या कभी बाजार में नाश्ते कर लेने पर सही हिसाब नहीं दे पाने पर मालिक काउल को बीच-बीच में पीट देता। मारने के बाद में वह उसे नैतिकता, सत्यवादिता, कर्मठता की सीख देता। मार का दर्द भूल जाने के बाद फिर से उसी काम की पुनरावृत्ति होती।

बल्कि और ज्यादा चोरी करना शुरू कर उसने। काम में देरी भी। दुकानदार और बर्दाश्त नहीं कर पाया। खूब मारपीट करने के बाद आखिर उन्हें वहां से निकाल दिया। तब तक काउल की जेब में चोरी के कुछ रुपए बचे हुए थे।

चारों तरफ इधर-उधर भटकने लगे वह। एक दिन एक होटल के फुटपाथ पर सोये हुए थे। पता नहीं, कब रात बीत गई। किसी ने आकर उन्हें लात मारकर उठाया। “साले! यही सोने की जगह मिली है, इतने बड़े मुंबई शहर में?”

काउल की नींद टूट गई। उसने देखा कि कोई हृष्ट-पुष्ट, काला-कलूटा निष्ठुर आदमी सामने खड़ा था। एक ठेले में विभिन्न प्रकार के अखबार लेकर वहाँ पहुंचा। उस मोटे आदमी ने ऊंची आवाज में कहा, “अबे, हटो यहां से! ” काउल थोड़ा सरककर दूर बैठ गया। आज का दिन कैसे कटेगा, इसी चिंता में खोया हुआ था वह।

अखबार, पत्रिकाओं के ठेलेवाले को घेरकर कई लोग खड़े थे। उस फुटपाथ के आगे सारी ट्राम और बसें रुकती थी। काउल वहाँ बैठे-बैठे अखबारों की खरीद-बिक्री देखते रहे। ट्राम, बस आते ही लोग उन्हें पकड़ने के लिए भागते थे। फुटपाथ के चारों तरफ एक लंबी कतार लग जाती थी। बीच-बीच में भीड़ खाली हो जाती थी।

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "उपन्यास - अमावस्या का चांद - भाग 4 // बैरिस्टर गोविंद दास // अनुवाद - दिनेश माली"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.