महंगा पानी - सस्ती जान जानी // यशवंत कोठारी

सरकार ने पानी के दाम बढा दिए हैं. बिजली के दाम बढे तो समझ में आता है क्योंकि बिजली सरकार पैदा करती है मगर पानी तो भगवान की देन है, इधर लोगों की आँखों का पानी भी मर गया है, सुनिए एक सच्ची दास्तान.

आप वर्माजी को नहीं जानते होंगे, मैं भी नहीं जानता था मगर जब नल में पानी आना बिलकुल बंद हो गया, घर व मोहल्ले वाले त्राहि त्राहि करने लगे तो हम लोग वर्माजी के पास गए. हम लोगों ने गर्मी का हवाला दिया पानी का प्रेशर बढाने की बात की वर्माजी ने बहुत सधा हुआ जवाब दिया, पहले लाइन में जो मोटरें लगा रखी है उनको बंद करो सबके पानी आ जायगा . एक कनेक्शन एक छोटे परिवार के लिए हैं, जिसमें पति, पत्नी व२ बच्चे होते हैं, आप लोग एक टोंटी से पचास लोग पानी भरते हो, कहाँ से आ येगा पानी. हमने मीडिया की धमकी दी वर्माजी ने साफ कहा मेरी तो ठेके की नौकरी है, शाम को खुद एक अख़बार में का लम लिखता हूँ, मुझे मीडिया गिरी मत समझाओ. बाद में पता लगा कि वर्माजी कालम के अलावा थियेटर में भी है कभी बिल्ली के भाग से छींका टूटा तो फिल्मों में निकल जायेंगे. इस नल वाले महकमे की ऐसी की तैसी.

हमारी समस्या का एक ही हल था गर्मी में अपने पैसे से पानी का टेंकर डलवाए. लेकिन वर्माजी जैसे महान लोग ऐसे आड़े समय में ही काम आते हैं, उन्होंने तुरंत एक निशुल्क टेंकर के आदेश हमें थमा दिए और बोले आधा इंच से पानी नहीं आता तो एक इंच का फर्जी कनेक्शन ले लो. वे यह ज्ञान बाँट कर लंच को चले गए.. गली मोहल्ले के लोग टेंकर से पानी लेने के लिये एक दूसरे का सर फोड़ने में व्यस्त हो गए.

मेरा खाली दिमाग वर्माजी की जन्म कुंडली में व्यस्त हो गया. वर्माजी को अनुकम्पा के आधार पर यह संविदा नौकरी मिली थी, जिसके स्थायी होने के चांसेज थे. वर्माजी दफ्तर में काम इसलिए नहीं करते थे की अख़बार हाथ में है, कालम लिखते हैं, और अख़बार में मेहनत इसलिए नहीं करते कि मैं तो थियेटर आर्टिस्ट हूँ कभी मुंबई निकल जाउंगा. ये बात अलग थी आज तक किसी सीरियल में क्लेप बॉय का काम भी नहीं मिला.

वर्माजी बड़े चलते पुर्जे जीव थे. कला संस्कृति विभाग में अख़बार का रौब दिखा थियेटर के लिए ग्रांट मार लेते. पानी के महकमे का काम छोड़ कर नाटक की ग्रांट को ठिकाने लगाने में लग जाते. अख़बार का काम सम्पादक को काला कुत्ता दे क़र कर सेट कर लेते. सम्पादक कोई आये काले कुत्ते का कमाल चलता रहता. वर्माजी थियेटर के वर्क शॉप लगाते, नए लड़के लड़कियों को हीरो हीरोइन बनने के सपने दिखाते, एक दो बार पिटते पिटते बचे या बचते बचते पिट गए. शायद नल के महकमे की नौकरी के कारण बच गए. वर्माजी को पता लगा कि नाटक प्रकाशन योजना आई है, वर्माजी ने पनघट पर एक नाटक लिख मारा ग्रांट हड़प ली. बाद में नाटक का असली लेखक भी प्रकट भया. खैर.

हमारी कोलोनी में पानी का संकट जारी है. वर्माजी नाटकों के टिकट बेचने में व्यस्त हैं, कुछ टिकट हमने भी लिए हैं ताकि नल में पानी पूरे प्रेशर से आये. सरकार ने पानी के दाम और बढ़ा दिए हैं. वर्माजी के तो और भी मज़े हो गये. सरकार बिजली पानी भी नहीं दे सकती है आम आदमी क्या करे? देश को वर्माजी से बचाने सख्त जरूरत है. वैसे हर शाख पर वर्माजी बैठे हैं.

महंगा पानी सस्ती जान है जानी.

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यशवंत कोठारी, ८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर -३०२००२

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