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दार भात चुर गे - लोक भूमि को उर्वरित करती कथाएँ // डॉ. मृणालिका ओझा

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आदिकाल से अनेक मनीषियों ने ब्रम्‍ह को समझने का प्राण-प्रण से प्रयास किया हैं। संभवतः धर्मों की स्‍थापना ही उस अदृश्‍य, अपरिमेय श्रृष्‍टा को...

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आदिकाल से अनेक मनीषियों ने ब्रम्‍ह को समझने का प्राण-प्रण से प्रयास किया हैं। संभवतः धर्मों की स्‍थापना ही उस अदृश्‍य, अपरिमेय श्रृष्‍टा को जानने, प्राप्‍त करने, प्रसन्‍न करने और अभिव्‍यक्‍त करने के उपक्रमों में हुइर् हो। इस ब्रम्‍ह को पाया किसने ? इसका उत्तर आज भी अपना विकल्‍प तलाश रहा है। किसी ने कहा ‘अक्षर' ब्रम्‍ह है, तो किसी ने कहा ‘स्‍वर‘ ब्रम्‍ह है, तो किसी ने ‘अन्‍न‘ को भी ब्रम्‍ह कहा। विज्ञान ने ऊर्जा के अविनाशत्‍व के सिद्धांतो द्वारा एक दृष्‍टि से ‘ऊर्जा‘ को ही ब्रम्‍हरूप में प्रतिपादित कर दिया है। भौतिक जगत का सत्‍य हमें जीव और जगत के बीच हवा, पानी और भोजन की उपस्‍थिति का महत्‍व समझाता है। शायद इसीलिए कइर् संतो ने इस यथार्थ को स्‍वीकार कर लिया और ‘लोक‘ ने तो कह ही दिया-‘‘भूख्‍ो भजन न होंहि गोपाला।'' बात भी सही है कि इर्श्‍वर या परमतत्‍व का चिंतन करने के लिए, चिंतन करने वाले की विद्यमानता अर्थात्‌ 'जीवित रहना' पहली शर्त है। जीवित रहने के लिए जरूरी है भूख और उसकी आपूर्ति।

छत्‍तीसगढ़ी लोककथा-संसार में जिन ढेरों लोककथाओं से सामना होता है उनमें से एक बेहद रोचक लोककथा है -''कथा कहय कंथली, जरय पेट के अंतली।'' इस लोककथा में, कथा सुनाने वाले कंथली (कथक्‍कड़) ने अंततः अपनी पीड़ा कह ही दी कि, वह कथा सुना रहा है किन्‍तु उसके पेट की अंतड़ियाँ भूख की लपटों में जल रही हैं। यह सुनते ही कथा सुनने वालों ने कथक्‍कड़ के लिए यथासाध्‍य भोजन का प्रबंध किया। इस तरह लोककथाओं में भी 'भूख' और 'भोजन' ही सृष्‍टि का ब्रम्‍ह सत्‍य है। सूक्ष्‍मतम से लेकर विशालतम सभी जीवों को चाहे वह वनस्‍पति ही क्‍यों न हों, भोजन की जरूरत होती ही है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन जुटाना और उसे पकाना आज भी उतना आसान नहीं है जितना शहरी क्षेत्रों में। यही कारण है कि दिन भर खेल-कूद के बाद घर लौटे वयस्‍क, श्रम-परिहार के लिए किसी न किसी प्रकार का मनोरंजन पसंद करते हैं। ऐसे समय में आपसी संवाद और अपने सांस्‍कृतिक, सामाजिक ज्ञान के संप्रेषण का सबसे लोकप्रिय, सरल और सुसाध्‍य तरीका ‘लोककथा-कथन-श्रवण' ही है। बहुत खास बात ये है कि यह तब तक चलता है जब तक चौके (रसोई) में भोजन पक नहीं जाता। इस तरह ये कथाएँ थोड़ी देर के लिए भूख-जन्‍य पीड़ा और तकलीफ को सहने की ताकत के साथ मनोरंजन और आनंद का सुख भी देती है। कथा के अंत में जब कथक घोषित कर देता है कि-‘दार-भात चुरगे। मोर कहिनी पूर गे'। 'दार-भात चुर गे‘ से जो खुशी होती है उसके साथ ही ‘‘किस्‍सा कहिनी पूर गे‘‘ का आनंद भी सम्‍मिश्रित हो जाता है। यही दो चीजें जीवन को नई ऊर्जा और गति भी देती हैं। यहाँ मैं ‘गति‘ शब्‍द का प्रयोग सामाजिक-सांस्‍कृतिक मूल्‍यों की सार्थकता और स्‍वीकार्यता के संदर्भ में कर रही हूँ, जो निश्‍चित रूप से शहरों की अपेक्षा गांवों में अधिक है।

इस प्रकार हम देखते है कि ‘दार-भात चुर गे‘ यही जीवन का ब्रम्‍हानंद सहोदर उद्‌घोष है। यही जीवन का अनिवार्य मंत्र है। जिस घर में चूल्‍हा ठंडा होता है, भूख से अंतड़ियां कुलबुलाती हैं, उनकी तकलीफ और पीड़ा को समझना एक ब्रम्‍ह सत्‍य अर्थात बड़े ज्ञान को प्राप्‍त करने जैसा ही है। किसी की इस पीड़ा को दूर कर पाना ही जीव-जगत में धर्म का प्रथम सोपान है।

अब आप समझ ही चुके होंगे कि ‘दार भात चुरगे‘ इस मंत्र वाक्‍य को शीर्षक बना कर जिस पुस्‍तक का प्रणयन हुआ है, उसके आंतरिक पृष्‍ठ कितने मूल्‍यवान होंगे। डॉ. रमाकांत सोनी जी की अस्‍सी पृष्‍ठों में 23 लोककथाओं को समेटने वाली यह पुस्‍तक खूबसूरत मुखपृष्‍ठ के साथ न केवल आपको आकर्षित करेगी, बल्‍कि मुग्‍ध भी कर लेगी ।

पुस्‍तकाकार में जिन लोक कथाओं को संग्रहीत किया गया है, मैं उनकी संक्षिप्‍त चर्चा करने से खुद को रोक नहीं पा रही हूँ। 'राजकुमारी फुलझरी' विपत्तियों के अवांछित पर्वत को विवेक की अग्‍नि से भस्‍मसात करने वाली अदम्‍य साहस की कथा है। 'चंदन और सुखमत' सुआ जीवन को अनुप्राणित करने वाली कथा है। इस कहानी की मनोवैज्ञानिकता इन दो वाक्‍यों से ही सिद्ध हो जाती है-'अब मोर अवरदा बाढ़ गे। अब मोला जि सउंख होगे', 'खाहँू लीटिया मटकाहूँ चोच' कौवें के अथक श्रम और मैना की सूझ की कथा है। यह गद्य-पद्यमय कथा बड़ी रोचक है। 'कौंसिल्‍ला कथा', 'टोनही' जैसे अंधविश्‍वास के बाद भी ग्रामीण निश्‍छलता और सरलता को प्रतिपादित करती है। 'अपन-अपन भाग' भाग्‍य प्रधान लोककथा है। 'मनबोध लिमवान' और 'कोलिहा अऊ बेंदरा' में प्राकृतिक सौंदर्य चित्रण पाठक को मुग्‍ध कर देता है। 'चांटा गड़िस कांटा' एक पुरूषत्‍वहीन पुरूष पर कही गइर् व्‍यंग्‍य कथा है। जिसकी पत्‍नी लगातार अपमान और कष्‍टों से त्रस्‍त होकर पति को छोड़ देना बेहतर समझती है। पुरूष, जो औरत को मनुष्‍य नहीं बल्‍कि उपयोग और उपभोग की वस्‍तु समझता है। पत्‍नी ने ऐसे पुरूष के बदले चींटा को अपना जीवन-साथी बनाना बेहतर समझा। 'फुलबसनी' जीव-जगत के साथ मानवीय रिश्‍तों की कहानी है। 'चाउरमति तिलमति' छत्तीसगढ़ी की बेहद लोकप्रिय लोककथा है। इसी तरह 'सिवचरण के हंड़िया', 'नकटा ठाकुर', 'लेढ़वा गइर्स ससुराल' आदि में विशुद्ध ग्रामीण परिवेश का जीवंत चित्रण है। देशकाल, वातावरण और सांस्‍कृतिक सौंदर्य के साथ ही हल्‍के हास्‍य-व्‍यंग्‍य की ये सुंदर कथाएँ है। 'राजकुमारी कनकलता अउ सरूप सिंग' में उपमेय-उपमानों का सौंदर्य आश्‍चर्य में डालता है। यह निश्‍छल आतिथ्‍यभाव की कथा है। 'परेमा अउ लालभाजी' संभवतः किसी समय के आदिम संस्‍कृति को उकेरती हुई कथा है। छत्तीसगढ़ में बाल विवाह प्रथा और संभावित संत्रास की कथा है - 'लेढ़वा गइर्स ससुरार।' 'लबरा कोलिहा'-दुष्‍ट चरित्र-नायक का परिचय कराती कथा है।

'नीलकंठ अउ फूलसुंदरी' लोक के 'टोटको' (टोटम) से परिचय कराती है। प्रायः तालाबों के संदर्भ में 'लोक' इस तरह की कथाएँ उद्‌घृत करता है। 'बनगहिन' में गांवों की दुर्दशा, ग्रामीण रोजगार और व्‍यवसाय के साथ घरेलू उपचार की भी जानकारी है। 'सतवंतिन' एक सद्‌गृहिणी की कथा है, तो 'बावहन चिरई' सतत कर्म और सहयोग का संदेश देती हुइर् कथा है। इस तरह यह खूबसूरत कथाओं का मूल्‍यवान संकलन है।

डॉ. रमाकांत सोनी जी की यह कृति अनेक अर्थों में अपना वैश्‍विक महत्‍व भी रखती है। आदिम संस्‍कृति और समाज को संदर्शित करती हुइर् यह छत्तीसगढ़ी के मूलस्‍वरूप को प्रस्‍तुत करती है। उल्‍लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ी के अंतर्गत अनेक बोलियाँ आती हैं। इसके पश्‍चात्‌ अब हम यदि विलुप्‍तप्राय वाचिक परंपरा और लोकभाषा या बोली की बात करें तो सचमुच ये चिंता का विषय है। भाषा संबंधी वैश्‍विक चिंता के संबंध में 'दार भात चुर गे' अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकने वाली कृति है। इस दृष्‍टि से डॉ. रमाकांत सोनी जी की इस पुस्‍तक को पूर्णतः संग्रहणीय मानती हूँ। वाचिक परंपरा के संरक्षण से जनजातीय संस्‍कृति के अंतर्गत उनके स्‍थापन-विस्‍थापन एवं आर्थिक कृषिक, आयुर्वेदिक, श्रृंगारिक आदि अनेक उपादानों से संबंधित सैंकड़ों शब्‍द मिलते हैं, जिनकी उत्‍पत्ति व प्रयोग पर विचार आवश्‍यक है। केवल कुछ शब्‍दों का उल्‍लेख मैं बतौर उदाहरण रखती हूँ जैसे - अजाहे, अबेर, ओरमना, आंेदरना, सिंघौटी, धोनकी पवेली, मढुलिया, खोखमाफूल, तितिम्‍मा, कुड़ेरी। छत्तीसगढ़ी भाषी युवा पीढ़ी ने ऐसे अनेक शब्‍दों को या तो तिरोहित कर दिया है या फिर हिन्‍दी शब्‍दों को अपना लिया है। यद्यपि किसी भाषा के हृास या विकास को रोक पाना सहज संभाव्‍य नहीं, तथापि उसके शब्‍द कोष को संरक्षित किया जा सकता है।

तो 'दार भात चुर गे' के बहाने ढेर सारी बातें हो गइर् पाठकों से। अंत में यह तो कहना ही होगा कि जिस प्रकार बगीचे के भीतर विचरण किए बगैर उसकी सच्‍चाई और सौंदर्य का साक्षी नहीं बना जा सकता, उसी तरह पुस्‍तक पढ़े बिना आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती।

आकर्षक मुखपृष्‍ठ और अस्‍सी अंतः पृष्‍ठों वाली यह पुस्‍तक आपको अवश्‍य आनंदित करेगी और छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के लोक तत्‍वों से परिचित कराते हुए आपके पुस्‍तक संग्रह की श्री वृद्धि भी करेगी।

डॉ. मृणालिका ओझा

पहाड़ी तालाब के सामने

बंजारी मंदिर के पास,

कुशालपुर, रायपुर (छ.ग.), 492001

E-mail – mrinalika.ojha@gmail.com

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रचनाकार: दार भात चुर गे - लोक भूमि को उर्वरित करती कथाएँ // डॉ. मृणालिका ओझा
दार भात चुर गे - लोक भूमि को उर्वरित करती कथाएँ // डॉ. मृणालिका ओझा
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