व्यंग्य // राजघाट पर उपवास // ओम वर्मा

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कुछ लोग सिर्फ खाने में विश्वास रखते हैं और कुछ सिर्फ खिलाने में। एक तीसरा वर्ग भी है जो न तो खाने में विश्वास रखता है और न ही खिलाने में। लेकिन इन दिनों एक चौथा वर्ग भी सक्रिय है जिसने न खाऊँगा, न खाने दूँगा वाले नारे को बिना उसका मर्म समझे कुछ ऐसे आत्मसात कर लिया है कि कोई अगर अपने पैसे से छोले-भटूरे खाए तब भी इनके पेट में ‘हेडेक’ होने लग जाता है।

      जैसा कि मनोवैज्ञानिक लोग फरमा गए है, खाना और सेक्स किसी भी देहधारी जीवात्मा की मूल प्रवृत्ति है। और इनका संयमित उपयोग मानव को महामानव बना सकता है। खाने तक सीमित रहने में कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि ‘खाना’ व ‘ज़रूरत’ अपने मूल भाव में कहीं न कहीं मैच होते दिखाई दे रहे हैं। मगर यही ‘खाना’जब ‘खाते रहने’ में बदल जाता है तो अन्य कई मुसीबतों, परेशानियों व विसंगतियों को भी साथ लेकर आता है। ‘खाते रहने’ वाला कब देखते ही ‘खा जाने’ वाली स्थिति तक पहुँच जाता है, उसे खुद पता नहीं होता। ये खाते रहने वाले इतना खाने लग गए थे कि इनके प्रतिद्वंद्वी के पास इनको डराने के लिए मात्र ‘न खाऊँगा न खाने दूँगा’ का मंत्र बोल देना ही पर्याप्त हो गया है। ऐसे में जब इन्होंने उपवास पर बैठने वालों को पहले छककर माल उड़ाते देखा तो इनके पास उक्त मंत्र को कुंती के द्वारा आजमाए गए ‘सूर्यमंत्र’ की तरह आजमाने का सुनहरा अवसर हाथ लग गया है।

     उपवास करने तो वे चले थे मगर उस महापुरुष की समाधि पर जिसके उपवासों ने चार-चार बार खाने वालों को एक निवाला खाना भी मुश्किल कर दिया था। राजघाट पर किसी का भरे पेट उपवास के लिए बैठना वैसा ही है जैसे कोई कामी व्यक्ति ब्रह्मचर्य व्रत लेने के पहले किसी नगरवधू के कोठे से देहयज्ञ की आहुतियाँ देकर आया हो। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आ रहे हैं जब पिताजी मुझे महाशिवरात्रि व जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ की तर्ज पर उपवास रखने की कठोर सीख देते थे। मैं साबूदाने की खिचड़ी, खीर, आलू की पपड़ियाँ, कुछ फल, कभी सिंघाड़े के आटे के हलवे से तो पेट भरता ही था, बाद में फिर ‘भूख’ लगती तो जिद करके रोटी भी खा लेता था। मेरा कुछ घंटे का उपवास जो राजघाट पर तो नहीं, अपने घर के घाट पर ही होता था, मगर उसमें एक अबोध बालक की क्षुधापूर्ति और सुस्वादु ‘फरियाली’ व्यंजनों के सेवन से ज़्यादा और कोई कामना नहीं रहती थी। बात चाहे उनके समाधिस्थल  पर संपन्न हुए इवेंटफुल व हाइटेक उपवास की हो या उसी समाधि पर चिरनिद्रा में लीन उस नंगे फ़क़ीर की हत्या की ‘अपने’ ढंग से पुनः जाँच की माँग की हो, बापू तो सबके लिए राजनीति के आकाश में इधर उधर डॉल रही वह पतंग है जिसे अपने अपने उपकरणों से सब लूट लेना चाहते हैं। खाए –पीए लोगों का उपवास क्या वाकई इतनी ‘बड़ी’ या ‘नुकसान पहुँचाने’ वाली बात है कि उसके जवाब में पूरी सरकार देश भर में उपवास पर बैठे? इससे तो बेहतर होता कि सरकार एक उपवास मंत्रालय बना दे जिसमें तीनों स्तर पर ऐसे मंत्रियों की नियुक्ति हो जो ऐसे किसी ‘भरपेट’ उपवास के बदले बारी बारी से वास्तविक उपवास पर बैठ सकें।

     अंत में स्व. केदारनाथ सिंह से क्षमायाचना कर कहना चाहूँगा कि –

‘‘मैं खा रहा हूँ – उसने कहा

       खाओ- मैंने उत्तर दिया

       यह जानते हुए कि खाना

       राजनीति में सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है।’’

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