खंजन नयन, में सूरदास की जीवनी : तथ्यों की प्रामाणिकता डॉ चंचल बाला

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'खंजन नयन' जीवनी नहीं, जीवनीपरक उपन्यास है, अत: इसमें सूरदास के जीवन सम्बन्धी तथ्यों को कल्पना के सहारे इस प्रकार रचा गया है कि वे किसी भी जीवनी से बढ्‌कर प्रामाणिक रूप में उजागर होने लगते हैं। वास्तविकता को जानने के लिए उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने सूरदास से सम्बधित अनेक स्थानों की यात्राएं की हैं, साहित्य और इतिहास को पढ़ा है, सूरदास की रचनाओं में गहराई से झांका है, मठों -मंदिरों से जानकारी प्राप्त की है, यहाँ तक कि खंजन नयन' का अधिकांश भाग पारसौली आदि स्थानों पर बैठ कर लिखा है और इस प्रकार तथ्यों को उपन्यास कला के लालित्य में ढालने का सराहनीय प्रयास किया है। इसमें सूरदास के प्रति उनकी श्रद्धा भी शामिल है।

1. जन्म और जन्मस्थान :

अमृतलाल नागर जी ने सूरदास का जन्म विक्रम संवत् 35 वैसाख सुदी 5 बताया है। यह जन्म की तिथि उन्होंने सूरदास के मुंह से कहवाई है। वह तो सूरदास का जन्म इसी तिथि को मानते हैं। लेकिन दूसरे कुछ लोग उनके जन्म का समय कुछ और ही बताते हैं। वह अमृतलाल नागर की तरह नहीं बताते उनके बताने का ढंग कुछ और ही है। जिनमें कुछ तो जन- श्रुतियों के अनुसार बताते हैं कि सूरदास महाप्रभु वल्लभाचार्य से केवल दस दिन छोटे थे अर्थात् उनका जन्म वैशाख शुक्ल 5 सन् 1535 वि. (सन् 1478) को मानते हैं। बाबू राधाकृष्णदास ने सूरदास का जन्म सवंत 154० के लगभग माना है। श्री रामरतन भटनागर और श्री वाचस्पति त्रिपाठी भी सूरदास का जन्म संवत् 154० ई. में ही मानते हैं। डॉ. दीनदयाल गुप्त और डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा इन का जन्म संवत् 1535 में ही मानते हैं। वह अमृतलाल नागर से सहमत है। अमृतलाल नागर जी ने सूरदास का जन्म स्थान गोवर्द्धन के निकट परसौली ग्राम को बताया है। वैसे तो इनको सीही ग्राम का भी मूल निवासी

मानते हैं। खंजन नयन' में सूरदास ने परासौली, सीही और रूनकता ग्राम का भी भ्रमण किया। कुछ लोग नागर जी के इस स्थान को सूरदास की जन्मभूमि न मानकर इनका जन्म स्थान और ही बताते हैं। जिनमें डॉ. पीताम्बर बड़थ्वाल ने गोपाचल' बताया है। रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास' में सूर का जन्म स्थान रूनकता' माना है। रूनकता को सूर का जन्म स्थान मानने की भ्रांति का कारण सम्भवत.: सूरदास जी का गौ - घाट पर रहने के कारण है। गोकुल नाथ जी ने समकालीन प्राणनाथ कवि ने भी ' अष्टसखामृत' में सूर का जन्म स्थान सीही' माना है। लेकिन इतने लोगों के बताने के बावजूद भी अमृतलाल नागर के सीही ग्राम को ज्यादा महत्त्व प्रदान होता है ज्यादातर लोग उनका जन्म स्थान सीही ही मानते हैं। नागर जी ने अपने उपन्यास में सूर को विभिन्न नामों से पुकारा है, ‘जिनमें सूरज, सूरस्वामी सूरश्याम, सूरदास आदि अनेक रूप दिये हैं। सूरदास के पिता उनको सूर्य नाथ और माता सूरज कहती थी। लेकिन ज्यादातर लोग, बाबा, स्वामी और भगत कहते थे। ' सूरदास के पदों में भी यही पाँच नाम आते हैं। आचार्य मुंशीराम शर्मा भी इन सभी नामों को महाकवि सूरदास के नाम बताते हैं। दूसरे लोग सूरदास के वास्तविक नाम को विवादास्पद मानते हैं। कुछ लोग सूरदास का असली नाम सूरदास ही मानते हैं लेकिन कुछ लोग सूर सुजान सूर श्याम आदि मानते हैं। अमृतलाल नागर इन सभी नामों की पूर्ति न करके इनको भगत, बाबा आदि नामों से पुकारते हैं। वह यह जरूरी नहीं मानते कि सूर को इन नामों ते पुकारा जाये। इस प्रकार नागर जी ने सूरदास के जन्म व जन्मस्थान को किंव दतियों में न बताकर बिल्कुल साफ- साफ बताया है उनकी इस स्पष्टता को ही सर्वथा सार्थक माना गया है।

2. जाति एवं वंश :

अमृतलाल नागर जी ने सूरदास की जाति एवं वंश के बारे इतना नहीं बताया। उसके पिता के नाम से पता चलता है कि वह सारस्वत ब्राह्मण थे। खंजन नयन' में सूरदास की जाति ब्राह्मण बताई है इसका पता हमें तब चलता है जब कालूराम कहता है कि स्वामी जी आप भी तो ब्राह्मण है तब वह कहते हैं कि मैं तो भिखारी हूँ अब मेरी कोई जाति नहीं। जिसके घर से मिलता है वही से खा लेता हूँ अब मेरी कोई जाति नहीं है। 'खंजन नयन' में सूरदास का विशेष वंश जाति नहीं बताई गई है कुछ अन्य लोगों ने सूर की जाति और वंश को विवादग्रस्त माना है। सूर की जाति व वंश के लिए एक किंवदंती प्रचलित है जिसमें सूर का वंश वृक्ष तथा तत्कालीन इतिहास ग्रंथ इस विषय को और भी उलझा देते हैं। इस वंश वृक्ष की पुष्टि महामहोपाध्याय श्री हरि प्रसाद शास्त्री द्वारा भी की गई थी। उन्होंने अपने-राजपुताने की यात्रा में चदं के वंश वृक्ष का पता लगाया था, जो चन्द के वंशधरों की नगौरी शाखा के वर्तमान प्रतिनिधि नानूराम से प्राप्त हुआ था। इस वंश वृक्ष में सूरदास के पिता का नाम रामचन्द्र दिया हुआ है शास्त्री जी की खोज से इस किवंदंती को मानने वालों को और भी बल मिला और उन्होंने सूर की वंशावली निर्धारित कर डाली। आचार्य मुंशीराम जी ने यहाँ तक लिख डाला कि इस वंशावली के आधार पर हर प्रसाद शास्त्री ने सूर के पिता का नाम रामचन्द्र लिखा है, जो वैष्णव भक्ति के अनुसार रामदास बन जाता है। आर्य जाति के लिए सच्ची वीरता के आदर्श मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र ही है। सूरदास की जाति का निर्णय भी इसी पद के अनुसार करते हैं कि चन्दवरदाई भाट थे और उन्हीं के वंशज होने के कारण सूर को भाट माना गया है। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने उन्हें बाहमणेतर सिद्ध करने के लिए अन्त: साक्ष्य का सहारा लिया है वह भी सूर को ब्राह्मण मानते। आचार्य मुंशीराम शर्मा भी चन्दवरदाई को भट्ट ब्राह्मण बताने के लिये सूर को भट्‌ट ब्राह्मण ही मानते हैं। वास्तव में सूरदास न तो भरट ब्राह्मण थे और न ढाठी या जगा जाति के थे। सूर को सारस्वत ब्राह्मण ही मानना चाहिए इसकी पुष्टि इस बात से और भी हो जाती है कि दिल्ली के आसपास सारस्वत ब्राह्मण ही रहते थे कुछ लोगों ने तो इसकी जाति का प्रश्न ही नहीं उठाया क्यों कि अमृतलाल नागर जी ने भी उनकी जाति और वंश के बारे ज्यादा नहीं बताया। बस यह कह कर ही पुष्टि कर दी है कि सूर ब्राह्मण थे। यहाँ तक उनके गहस्थ जीवन का प्रश्न है इन्होंने बस उनके प्यार के बारे बताया है कि उनका प्रेम एक कुरूप और देहाती लड़की कंत्तो से हो जाता है जो बाद में उनको मझदार में ही छोड्‌कर स्वर्गवासी हो जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सूरदास न तो गृहस्थी थे और न उनका कोई किसी से सम्बन्ध था। लेकिन कुछ दूसरे लोग सूरदास को गृहस्थी मानते हैं। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा इनके गृहस्थ होने की कल्पना करते हैं। नागर जी ने यह तथ्य बिलकुल वास्तविक और सत्य ही बताया है इसमें जरा सी भी कल्पना नहीं हैं।

3. अंधत्व :

अमृतलाल नागर ने सूरदास को जन्मान्ध ही माना है वे मानते हैं कि सूर जन्म से ही अन्धे थे। इस उपन्यास में सूरदास से शुरू में ही जब गौड़ ब्राह्मण पूछता है तुम शकुन विधा ते परिचित हो तो तब सूर कहते है कि ‘मैं तो जन्मान्ध निपट गँवार हूँ महाराज। एक सन्यासी गुरू जी की कृपा से कुछ मीन मेख विचार लेता है। 'अन्धे होने के कारण ही उनके घर में माँ के सिवाय कोई प्यार नहीं करता था इसलिए उन्होंने बचपन में ही घर को त्याग दिया था। इस प्रसंग से भी साफ जाहिर हो जाता है कि सूरदास जन्म से ही अन्धे थे। लेकिन कुछ लोग सूर को जन्मान्ध नहीं मानते और कुछ लोग इनको वृद्धावस्था में अन्धा मानते हैं जिसमें गोस्वामी हरिराय जी कहते हैं कि सूरदास सिलपट्‌ट अन्धे थे उनकी भौंहें अवश्य थी पर आँखों के ‘गढ़्ली इ नाथ हते'। नये पंडितगण कहते हैं कि अति सूक्ष्म चितेरे महाकवि ने किसी न किसी आयु सीमा तक यह दुनिया अपनी आँखों से अवश्य देखी होगी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी भी इसी मत को मानते हैं इन्होंने अपने इस मत की पुष्टि के लिये एक श्रुति बताई है कि हैलेन केलर बेचारी तो अंधी होने के साथ साथ जन्म में बहरी भी थी। इस प्रकार नागर जी ने सूरदास की जन्म को आधरौं माना है उनकी इस बात की पुष्टि से उनके जन्म से अन्धे होने का प्रश्न नहीं उठता। कुछ लोग यहाँ तक कहते हैं कि इन्होंने श्री गोकुल और श्रीनाथ जी के दर्शन किये थे यदि इस हिसाब से देखा जाये तो इस समय तक सूरदास का दृष्टिहीन होना न माना जाएगा। सूरदास के संबंध में और भी जितनी साक्षियाँ हैं उनमें उनके अन्धे होने के सम्बंध में कई चमत्कारपूर्ण बातों का कथन है। किसी में उनके अन्धे होने के सम्बंध में कई चमत्कारपूर्ण बातों का कथन है। किसी में उनके अन्धे होने की परिस्थिति का वर्णन है, तो किसी में उनकी दिव्यदृष्टि की साक्षी दी गई है, जनश्रुतियों का विवेचन करते हुए हमने इस कथनों के मूलभाव को समझने का प्रयत्न किया है।

सूरदास ने अपनी रचनाओं में 'खंजन नयन' में अन्धे निपट अन्धे होने का तो कई स्थलों पर उल्लेख किया है परन्तु यह नहीं कहा कि वे जन्मांध थे अथवा अमुक अवस्था में अंधे हुए थे यह कोई महत्त्व की बात नहीं कि वह जन्मांध थे या बाद में अंधे हुए। इतना सबको मान्य है कि वह अन्धे थे। इस प्रकार अमृतलाल नागर का यह कथन बिल्कुल सत्य है कि सूरदास अन्धे थे।

4. शिक्षा-दीक्षा :

खंजन-नयन' में सूरदास की शिक्षा-दीक्षा का विस्तृत वर्णन किया गया है। सूरदास जी ने छोटी आयु में घर बाहर छोड़ दिया था घर छोड़ने के बाद उनकी मुलाकात सन्यासी गुरू जी से हुई जिनसे उन्होंने विद्या ग्रहण की। इससे पहले इन्होंने अपने पिता से घर में ही संगीत विद्या ग्रहण की। सन्यासियों से मिलने के बाद उनकी मुलाकात पंडित सीताराम से हुई जिनसे इन्होंने ज्योतिष तंत्र' आदि का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने सूर से कहा 'अंधत्व अपने आप में एक बड़ी साधना है पुत्र विद्या की लाठी ऐसे साधक के साथ में रहनी ही चाहिए। ' सूरज ने बहुत पीछा छुड़ाया परन्तु पंडित सीताराम का स्नेह अपने साथ खींच ही लाया। यात्राकाल में ही अंधे सूरज ने नया ज्ञान प्रकाश पाया था। गुरू अपने शिष्य की बुद्धि प्रखरता से बडे प्रसन्न थे। अन्धे सूरदास को ऐसा अयाचित अगाध स्नेह दान पहले कभी नहीं मिला था। पिता ने संगीत का ज्ञान तो दिया किन्तु मारपीट के साथ। इसके बाद वे स्वामी नाद ब्रहमानंद के सम्पर्क में आये। फिर उनसे भी गायन विद्या सीखी। काव्य और संगीत दोनों में वे साधारण रूप से व्युत्पन्न थे। इसके बाद पंडित सोमेश्वर जी से साहित्य ज्ञान प्राप्त किया और फिर ब्रहमानंद जी के वापिस आने के बाद उनसे शिक्षण ग्रहण किया। इतनी मुश्किलों का सामना करके और भाईयों से लड़कर भी इन्होंने अपना अध्ययन पूरा किया। वह किसी की नहीं सुनते थे अपने मन की करते थे। सूरज ने अपनी दर्द स्मृति में अपनी रचना को स्वर में गाया। मानों कोठरी अपने में ही दर्द से भर उठी हो। फिर इनकी भेंट विट्ठलनाथ से हुई। उन्होंने सूर के राधाकृष्ण प्रसंगों को सुना और बहुत खुश हुए। कुछ दूसरे लोगों ने सूर ही शिक्षा के बारे में लिखा है कि सूर उच्चकोटि के भक्त थे महाप्रभु से भेंट होने के पूर्व ही वे विरागी और संभ्रात भक्त के रूप में भगवद् भजन करते हुए गउघाट पर रहते थे। वे इतने विज्ञ और अनुभवी थे कि उन्होंने तीन चार दिन में ही ' श्री मद्‌भागवतं और सुबोधिनीं का वास्तविक भाव हृदयंगम कर लिया था। उन्हें तत्कालीन दार्शनिक सिद्धांतों का यथार्थ ज्ञान था। अपने सम्प्रदाय की भक्ति भावना का जैसा विशद और व्यावहारिक रूप उनके काव्य में मिलता है वैसा कदाचित् अन्यत्र दुर्लभ है। बल्लभाचार्य भी सूरदास जी के गुरू थे उन्हें वे अपने इष्टदेव कृष्ण के समान पूजते थे। इसके बाद वे बल्लभम्प्रदाय में सम्मिलित हो गये। सूर ने अपना सारा जीवन अपने गुरू से दीक्षा प्राप्त करने के लिए और उनकी सेवा करने में ही बिताया। इस प्रकार अमृतलाल नागर जी ने सूर की शिक्षा के बारे में खंजन नयन' में बहुत विस्तृत से बताया है जो बिल्कुल सत्य है इसमें जरा सी भी कल्पना नहीं भरी हुई है।

5. जीवन के संघर्षमय प्रसंग :

सूरदास को अपने जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ा। सच कहो तो उनका सारा जीवन ही संघर्ष में बीता। 6 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया था क्योंकि घर में भाईयों के ईर्ष्या के भाव से तंग आ चुके थे। अन्धा होने के कारण नाँव के उल्ट जाने से वह नदी में डूब गया परन्तु भगवान की दया से नाँव वाले कालूराम ने बचा ही लिया। सूर को शिक्षा प्राप्त करने में काफी संघर्ष करना पड़ा जब वे शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंडित सोमेश्वर जी के घर जाने लगे तो भाईयों ने इसका विरोध किया परन्तु सूर प्रात: और सायं दो टाईम सदा चल कर चोरी से जाते थे। जीवन में भी काफी संघर्ष करना पड़ा जब उनकी भेंट कंतो से हुई तब वे दोनों एक पठानों के गांव में गये तो वहाँ के बुदबुदी मौलवी ने सूर को खूब मारा और कंतो को तो जान से खत्म कर दिया और सूर को कोल्हू, पर लगा दिया। इस पर सूर सोचने लगे यह जन्म ही केवल मुझे दुःख भोगने के लिए मिला है। मैं तो अभागा हूँ। पता नहीं आगे क्या-क्या देखना पडेगा। कंतो जो कि सूर का पूरा साथ देती थी उसका साथ छूट जाने के काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सूर ने काफी भ्रमण किया। एक शहर से दूसरे शहर गये अयोध्या से मथुरा और मथुरा से बनारस। इस प्रकार गाँव-गाँव में जा जाकर गाना बजाना करके अपनी रोटी कमा लेते थे। सूर को जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्ष ही करना पड़ा। सूर ने शायद ही कोई पल हो जो सुख से बिताया हो। दूसरे लोगों ने भी बात का स्वीकार किया है कि सूर का जीवन संघर्षमय था।

6. भक्ति और आस्था :

सूरदास एक उच्चकोटि के भक्त थे इन्होंने अपने काव्य में अधिकतर भक्ति के रूप को लिया और राधाकृष्ण की भक्ति के दोहे लिखे हैं। परसौली में सूरदास जी ने राधा गोपियों के विरह के पदों को लिखा। सूरदास जी ने राधाकृष्ण के परिचय के पद विट्‌ठलनाथ जी को सुनाए थे, इस प्रकार है पघेरी तुम कौन हो, कहाँ रहती हो, मैंने पहले तो तुम्हें ब्रज खोरि में कभी नहीं देखा। ...... में भला ब्रज में क्यों आती। हमारे घर में क्या खेलने की जगह नहीं है। इसको सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। राधा और कृष्ण सूर की सिद्धि में नित्य नवोन्मेष भरते रहे। सूर की भक्ति में श्रृंगार वर्णन, वात्सल्य वर्णन भी है। सूरदास जी ने साधारण भक्ति साधना में भक्ति निरूपण और भक्ति के साथ वैराग्य को जरूरी माना। वैराग्य को सूरदास जी भक्ति का साधक मानते हैं उन्होंने स्पष्ट लिखा है-

भक्ति बिना जो कृपा न करते तो ही आसन करती।

साधु सील तड़प पुरूष को अपजस बहु उच्चरती।

औधड- असत कुचीलनि सौ मलि, माया जल में तरतौ।

भक्त वत्सलता का भी निरूपण उनके काव्य में हुआ है। सूर के काव्य में कृष्ण चरित्र के विलासमय चित्र और श्रृंगार रस की मादकता का जैसा संचार हुआ है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमाभक्ति का भी सर्वोच्च स्थान है। इस तरह अमृतलाल नागर जी ने सूर की भक्ति और आस्था का स्पष्ट विवरण किया है उनकी आस्था कृष्ण में ही थी वह उसे अपना इष्टदेव मानते थे वह उनकी सच्ची साधना करते थे। कोई भी काम उसकी भक्ति के बिना नहीं करते थे जब नाव उलट जाती है तो वह उसी श्याम को याद करते हैं वह कहते हैं अगर श्याम ने जिन्दा रखना है तो वह बचा लेगा। जब वह बच जाते हैं तो वह कृष्ण की लीला का ही गुण गान करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सूरदास की आस्था कृष्ण में ही थी। यह नहीं कि वह दूसरे देवी देवताओं को नहीं मानते थे वह शिव पार्वती आदि की भी उपासना करते थे। इस प्रसंग के बारे दूसरे लोगों ने कम ही बताया है। नागर जी का यह कथन बिल्कुल सार्थक एवं सत्य है।

7. महामानवीय रूप :

अमृतलाल नागर जी ने सूरदास को एक महान् आत्मा बताया है। अन्धे होने के बावजूद भी इन्होंने इतनी ख्याति अर्जित की और रचनाओं की सृजना की। इतनी प्रशंसा शायद कोई ठीक व्यक्ति भी प्राप्त न कर सकता हो लेकिन सूर तो सूर थे, भगवान का सान्निध्य प्राप्त कर चुके थे। सूरदास जी बहुत नर्मदिल के थे। जब गोस्वामी जी कहते है, ‘कि तुम मुझे श्री राधाकृष्ण मिलन और केलि प्रसंगों के पद सुनाने की कृपा करो' तो कहते हैं कि ऐसा मत कहें मैं आप से छोटा हूं, आपकी इच्छा मेरे लिए आदेश है। सूर ने जिस-जिस का साथ प्राप्त किया उसका उसी के साथ प्रेम हो गया। वह किसी को भी छोटा बड़ा नहीं मानते और जाति-पांति का भेद भाव भी नहीं रखते थे। उनका रूप वर्णन और उनकी भक्ति और उनकी रचनायें स्वयं उनका इतिहास बताती है कि सूरदास एक सच्चे भक्त थे वह किसी से भी इच्छा द्वेष नहीं रखते थे। दूसरे लोगों ने भी सूरदास के इस रूप की प्रशंसा की है। इसलिए नागर जी का यह कथन बिल्कुल सार्थक है कि सूरदास का मानव के रूप में भक्त के रूप में बहुत महान स्थान था।

8. देहावसान :

अमृतलाल नागर जी ने अपने उपन्यास 'खंजन नयन' सूरदास का वेदावसान परासौली में बताया है इन्होंने उनकी मृत्यु की कोई तिथि नहीं बताई। लेकिन यह बिल्कुल ठीक है कि उनका देहान्त परासौली में ही हुआ था। जब उनकी मृत्यु का समय आया तो वह अपने आखिर तक गाते रहे और यही गाया-

खंजन नैन रूप रस मातें

सूर में बंसी राधा के नेत्रों की वृत्ति खंजन पक्षी की नेत्रों के समान ही चंचल हो रही थी। गायक का त्वर खंजन के चंचल नेत्रों की तूलिका सा चित्रित कर रहा था। सूर ने मरते समय सबको हाथ जोड़े जो जो उनके पास थे गोपाल, चतुर्भुजदास, कुंदनदास। और मुख से अंतिम शब्द यही निकले। ' श्री कृष्ण शरण मम। ' इससे पता चलता है कि उनकी ज्यादा आस्था कृष्ण में थी। कुछ दूसरे लोग सूरदास के देहान्त के बारे में भी विवादग्रस्त हैं क्योंकि नागर जी ने तो उनके देहान्त का समय ही नहीं बताया सिर्फ स्थान ही बताया है। मिश्रबंधुओं ने सूर का निधन संवत् 1620 माना है। आचार्य शुक्ल के इनका देहान्त संवत् 162० ही माना है। इसलिए सूरदास जी का देहावसान परासौली' में सं. 184० के

लगभग ही मानना चाहिए। नागर जी ने ही सिर्फ स्थान बताया है लेकिन दूसरे लोगों ने इनकी मृत्यु का स्थान नहीं बताया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नागर जी का यह कथन बिल्कुल सत्य है कि उनका देहावसान परासौली' में ही हुआ था।

सहायक ग्रंथ

1. हरवंश लाल शर्मा, सूर और उनका साहित्य अलीगढ : भारत प्रकाशन, 2०15, पू. 15.

2. अमृतलाल नागर, खंजन नयन दिल्ली : राजपाल एंड सज, 1981, पू. 14०.

3. हरवंश लाल शर्मा, सूर और उनका साहित्य अलीगढ : भारत प्रकाशन, 2०15, पू. 25.

4. अमृतलाल नागर, खंजन नयन दिल्ली : राजपाल एंड संज, 1981, पू. 14०.

5. वही, पू. 16.

6. वही, पू. 2, 14०.

7. वही, पू. 223.

8. डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, सूरसागर, वाराणसी : जन्म मण्डल लिमिटेड, 1988.

9. डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, दृष्टि एवं विमर्श, इलाहाबाद : हिन्दोस्तानी अकैडमी, 2०1०.

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डॉ चंचल बाला

सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

खालसा कॉलेज फॉर विमेन, अमृतसर, पंजाब।

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