पुस्तक समीक्षा - पुरानी बीन में नया राग है ‘जीवन है अनमोल’

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‘जीवन है अनमोल’ गीत-नवगीत ग़ज़ल, दोहा, हाइकु, कहानी, लघुकथा, व्यंग्य तथा निबंध आदि विभिन्न विधाओं में कलम चलाने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व के धनी तथा देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित लखनऊ के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा का सद्यः प्रकाशित पद संग्रह है। पद विधा भक्तिकालीन कवियों कबीर, रैदास, सूर, तुलसी, नानक तथा मीरा आदि की प्रिय विधा रही है। कवि ने निवेदन शीर्षक से लिखी अपनी भूमिका में पद का जो छन्द शास्त्र बताया है वह प्रशंसा करने योग्य है। कवि ने यहाँ लक्षण ग्रन्थों की परंपरा का निर्वाह करते हुए यह सही बताया है कि मात्रिक छन्द विधान में रचित पद संरचना की दृष्टि से दो भागों में विभक्त होता है (1) मुखड़ा या टेक (2) पदावलियाँ। कवि ने यह भी सही बताया है कि पद से ही गीत निकला है। गीत की सरंचना इसलिए पद से काफी मिलती जुलती है।

पुस्तक में कवि के 52 पद संग्रहीत किये गये हैं जो पुरानी बीन में नया राग हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि संग्रह के पदों की विधा पुरातन है, किन्तु उसकी भावभूमि नूतन है। इन पदों में कवि ने बेरोजगारी, बेकारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा की दुर्गति, कन्या भ्रुण हत्या, धार्मिक आडंबर, भ्रष्टाचारी संत, रिश्ते नातों की खटास, भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्ट नेता, घोटालेबाज, पूँजीवादी व्यवस्था, झूठ परोसते टीवी चैनल, हिन्दी की दुर्दशा, सत्य का कड़वापन तथा उसकी दुर्गति, फैशन, दिखावा, सिनेमा का कुप्रभाव, क्रिकेट की दीवानगी, पुरस्कारों की राजनीति, दीवाली का दीवाला, होली, आरक्षण, प्रकृति चित्रण, पर्यावरण प्रदूषण के प्रति चिन्ता, भूख, गरीबी, अनमोल जीवन तथा उसकी क्षणभंगुरता पर जमकर कलम चलाई है। पदों की विधा पुरानी है किन्तु उसकी भावभूमि नवगीत की है इसलिए नवगीत की शैली में इन्हें ‘नव पद’ भी कहा जा सकता है।

भ्रष्टाचार, महँगाई, गरीबी व बढ़ती जनसंख्या के कारण देश में बेरोजगारी व बेकारी की समस्या आम हो गयी है। कविवर राजेन्द्र वर्मा ने इस समस्या को अपने पदों में उठाया है, देखें-

साहब! नौकरिया लगवाओ।

एम0बी0ए0 भी किया हुआ है प्लेसमेंट करवाओ।

सरकारी जो नहीं तो कोई, प्राइवेट दिलवाओ।

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साहब! कब तक करें सबूरी?

बेकारी की भेंट चढ़ रही, एक जिन्दगी पूरी।

‘मनरेगा’ देता है केवल, सौ दिन की मजदूरी।

बेकारी की तरह महँगाई भी हमारे देश की एक विकराल समस्या है जो सुरसा की तरह अपना मुँह फैलाये खड़ी है। यह समस्या कवि के पदों में दृष्टव्य है-

बापू! महँगाई मुँहबाये।

आटा-चावल-दालें-सब्जी, हर कोई आँख दिखाये।

ईंधन महँगा, कपड़ा महँगा, खर्च न चले चलाये।

भ्रष्टाचार, भ्रष्ट नेताओं, राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा किये गये घोटालों पर भी कविवर श्री राजेन्द्र वर्मा ने अपनी कलम चलाई है-

बापू! नेता चतुर सुजान।

जब चुनाव की बारी आये, बन जाये नादान।

कुर्सी पाकर बन जाये, जैसे डाकू मलखान।

जनता का सेवक कहलाये, बना हुआ सुल्तान।

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क्या खादी क्या खाकी, दोनों करते खूब कमाई।

संसद में भी बहस चली, लेकिन सब हवा हवाई।।

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बापू! भ्रश्टचार न जाई।

सच्चाई कोने में दुबकी, झूठ लेत अँगड़ाई।

नेता, अफसर, व्यापारी मिलि, सब हमका समझाई।

हम भ्रश्टन के, भ्रश्ट हमारे, यहै लीकि चलि आई।।

भ्रश्ट आचरण से ही सत्ता, मिलती है सुखदाई।

आज स्त्री विमर्श पर खूब लिखा जा रहा है तथा नारी के प्रति सहानुभूति दर्शाई जा रही है। नारी तो सदियों से प्रताडि़त रही है। आज भी बलात्कार, दहेज, कन्या भू्रण हत्या, घरेलू हिंसा, आॅनर किलिंग आदि का दंश वह निरंतर झेल रही है। कन्या भ्रूण हत्या पर कवि ने ठीक ही लिखा है-

मम्मी! मुझको भी जीने दो।।

अभी न दुनिया देखी मैंने, मगर ‘टेस्ट’ होता है।

कश्ट तुम्हें भी होता होगा, यह काँटे बोता है।

पापाजी को समझाओं क्यों चाह रहे बेटा ही।

पढ़ लिखकर मैं भी इकदिन, बन जाऊँगी बेटा सी।

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भेदभाव तज बेटी को भी, दे दो सुविधा सारी।

पढ़ी लिखी बेटी होगी, तो होंगे सभी सुखारी।

भ्रष्टचारी संतों और धार्मिक आडंबर पर भी कवि ने कलम चलाई हैं कतिपय उदाहरण दृष्टव्य हैं-

अरे यह कैसी है संतई।

बड़े-बड़े आश्रम में फैली, बड़ी-बड़ी चंटई।

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सन्त प्रवर ने बुलबाई जब, कन्या एक नई।

मोक्ष दिलाना धरा रह गया, खुल ही गयी कलई।

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बापू! धर्म हुआ व्यापार।

पंडित-मुल्ला ने मजहब को, बना दिया व्यापार।

मंदिर में है स्वर्ण खजाना, मस्जिद में हथियार।।

हिन्दुस्तान में हिन्दी की जो दुर्दशा है उससे कोई अनजान नहीं है। कविवर राजेन्द्र वर्मा ने भी हिन्दी की दुर्दशा पर कलम चलाई है-

बापू! अँगरेजी का राज।

सत्तर वर्शों से इंग्लिष के, सिर पर साजे साज।

बड़े षान से हिन्दी पर ही, गिरा रही है गाज।।

संसद-न्यायालय को आती, है हिन्दी में लाज।

आज चारों तरफ झूठ का बोलवाला है इसलिए सत्य को कई नहीं पँूछता। सत्य कड़वा होता है जो बैर भाव भी बढ़ा देता है। कविवर राजेन्द्र वर्मा के शब्दों में सत्य की दुर्गति दृष्टव्य है-

यारों! सच को सच न कहो।

जीना दूभर हो जायेगा, सच से बचे रहो।।

सच से कहना है तो पहले, झूठे का हाथ गहो।

वरना सत्य कहो तो, दुनिया-भर से वैर सहो।

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जहाँ देखिये झूठ केन्द्र में, सत्य पड़ा कोने में।

झूठ बिके ऊँचे दामों में, सच औने-पौने में।

त्यौहार हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजे रहते हैं। होली और दीवाली दो बड़े त्यौहार हमारे यहाँ मनाये जाते हैं। महँगाई के कारण दीवाली पर आम आदमी का दीवाला निकल जाता है, देखे-

यारो दीवाली है आयी।

महँगाई के मारे दीपक, पड़े हुए है सूने।

व्यापारी की पौ बारह है, दाम हो गये दूने।

होली हर्षोल्लास एवं बैर भाव भुलाने का त्यौहार है। कविवर श्री राजेन्द्र वर्मा ने होली का सजीव चित्रण किया है-

यारो! चलो मनायें होली।

प्रेम-रंग का लेन-देन कर लें, भर-भर झोली।

जिसको देखो, उसके अन्तस, प्रिय की रंगोली।

कानों में मिसरी घुल जाये, वह मीठी बोली।

आँखों ही आँखों में भंग की, घुली हुई गोली।।

बसन्त के माध्यम से कविवर राजेन्द्र वर्मा ने बहुत अच्छा प्रकृति चित्रण किया है-

यारो! फिर बसन्त आया।

कितना ही मन को बाँधा है, किन्तु न बँध पाया।

षीतल-मन्द-सुगन्ध हवा ने आँचल लहराया।

दिषि-दिषि मादक हुई, सुरभि को किसने बिखराया।

सरसों फूली, टेसू दहका, महुआ ललसाया।

पोर-पोर अंकुर है फूटा नवल हर्श छाया।

इक्यावनवाँ पद ‘यारो जीवन है अनमोल’ पुस्तक का शीर्षक पद है। इस पद में कवि ने ‘बड़े भाग मानुस तन पावा’ की भावभूमि को प्रस्तुत करते हुए कहा है-

यारो जीवन है अनमोल।

देखो, व्यर्थ न जाने पाये, मिले नहीं यह मोल।

दुनिया को देखो पर देखो, मन की आँखें खोल।

सच बोलो लेकिन जब बोलो, बोलो मिसरी घोल।

कृति के कलापक्ष पर दृष्टिपात करें तो हम पाते है कि कृति में संग्रहीत समस्त पदों में आम बोल चाल की खड़ी बोली का प्रयोग किया है जिसमें अवधी व अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। किसी-किसी पद में इतने अधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हुआ है कि वहाँ भाषा हिंग्लिश हो गयी है। उपमा, रूपक, यमक, पुनरुक्ति प्रकाश, विरोधाभास, मानवीकरण, अनुप्रास, पदमैत्री, ध्वनि, उदाहरण आदि अलंकार सहजता में ही आ गये हैं। प्राचीन छन्द पद का प्रयोग कवि ने किया है।

अंत में निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि कविवर श्री राजेन्द्र वर्मा की कृति ‘जीवन है अनमोल’ हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनायेगी ऐसा मेरा विश्वास है। कवि को मेरी शुभकामनाएँ।


समीक्ष्य कृति- जीवन है अनमोल (पद़ संग्रह)

रचयिता - राजेन्द्र वर्मा

प्रकाशन- उत्तरायण प्रकाशन, के-397, आशियाना काॅलोनी, लखनऊ-226012

संस्करण- प्रथम 2018

मूल्य- 100 रुपये

पृष्ठ- 64


समीक्षक-

डॉ॰ हरिष्चन्द्र षाक्य, डी0लिट्0

शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चैक

क्लब घर, मैनपुरी-205001 (उ.प्र.) भारत

स्थाई पता- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर

जिला मैनपुरी-205261(उ.प्र.) भारत

ईमेल- harishchandrashakya11@gmail.com

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