विज्ञान कथा : द मेडिकल कॉस्पीरेंसी // प्रज्ञा गौतम

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द मेडिकल कॉस्पीरेंसी

प्रज्ञा गौतम

रा ष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर डॉ0 सुदीप की हाइड्रोजन ईंधन चालित कार 150 किमी/घंटे की गति से दौड़ रही थी।

बारां से माँगरोल कस्बे के बीच खेतों में अनेक सुंदर फार्म-हाउस बने हुए थे। सुदीप अपनी पत्नी सुजाता के साथ, अपने मित्र पीयूष विजय के यहाँ सप्ताहांत बिताने जा रहे थे।

सुदीप हृदय रोग विशेषज्ञ थे। अपनी अत्यंत व्यस्त दिनचर्या से किसी तरह उन्होंने ये दो दिन स्वयं के लिए निकाले थे।

रास्ते में उन्होंने ऊँची दीवारों से घिरे एक सुंदर भवन के आगे कार रोक दी - ”तुम्हें पता है सुजाता ‘यह कृषि एवं पशु अनुसंधान केन्द्र है।’ इसे बने हुए अधिक समय नहीं हुआ, शायद 5 या 6 वर्ष।“

”हाँ, पिछली बार जब हम आए थे तब यह निर्माणाधीन था।“

”अभी हमारे पास समय है, हम इसे देख सकते हैं।“

वे दोनों कार से उतर कर अनुसंधान केन्द्र के बड़े से फाटक के अंदर प्रवेश कर गए।

”अदभुत! अति सुंदर।“ सुजाता बोल पड़ी।

फाटक से करीब 250 मीटर दूर इमारत थी और बीच में बहुत सुंदर उद्यान था। हरे रंग की मखमली घास के बीच में लाल, जामुनी और नांरगी रंग की घास से विभिन्न कलाकृतियाँ बनी थीं और गहरे नीले और काले गुलाब!

बगीचे को पार करके वे इमारत में प्रवेश कर गए।

रिसेप्शन पर बैठे युवक के भाव-विहीन चेहरे को देखकर लगता था कि वह एक रोबोट है। पूछने पर उसने बताया कि यहाँ 50 से अधिक फसलों, फलदार वृक्षों और शोभाकर पौधों की आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्में उगायी जाती हैं। यही नहीं, यहाँ के पशुअनुसंधान केन्द्र में अत्यंत पौष्टिक दूध और माँस देने वाले पशुओं की किस्में विकसित की गई हैं।

”सर, यह एक बड़ा क्षेत्र है। यहाँ घूमने के लिए आप कार्ट हायर कर सकते हैं। राइट कॉर्नर पर जो विंडो है, वहाँ इसका टिकट मिल जाएगा। यदि आपके पास समय कम है तो आप हॉल में लगे स्क्रीन पर भी सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।“

”हम घूमना चाहेगें।“ सुजाता ने कहा। वे दोनों विंडो की तरफ बढ़ गए।

”कार्ट नं0 8। आपके साथ विलियम जाएगा।“

विंडो पर बैठी युवती ने अपने सपाट चेहरे पर कृत्रिम मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा।

उद्यान में सौर उर्जा चालित गाड़ियाँ खड़ी थीं। कार्ट नं0 8 का चालक विलियम नामक रोबोट था। विलियम ने बताया कि उद्यान में लगे हुए हेज प्लांट्स सामान्य नहीं हैं, ये रात में प्रतिदीप्ति उत्पन्न करते हैं। उद्यान में कुछ पौधे ऐसे भी हैं जिनकी पत्तियाँ जुगनुओं की तरह प्रकाश उत्पन्न करती हैं।

”देखिए यह रहा जुगनु प्लांट। सूर्यास्त के बाद यह स्वतः प्रकाश उत्पन्न करने लग जाएगा।“

”बहुत सुंदर! मैंने अपनी मित्र के यहाँ ऐसा कीटभक्षी पौधा देखा था जो कीटों को आकर्षित करने के लिए प्रकाश उत्पन्न करता था।“ सुजाता ने कहा।

वे लोग कार्ट में बैठे ही थे कि डा0 सुदीप का फोन बज उठा।

”जी सर, कहिए। अभी घर से बाहर हूँ।“

”डा0 सुदीप एक एमरजेंसी केस है। आप तुरंत चले आइए।“

”डा0 जिंदल, मैं घर से 450 किमी0 दूर हूँ।“

”केस बहुत टिपिकल है। पेशेंट का बचना मुश्किल है। हम एयर टैक्सी भेज देते हैं, आप अपनी लोकेशन बताइए।“

सुदीप कार्ट से उतर गए। ”सुजाता, मेरा जाना जरूरी है, एक एमरजेंसी केस आ गया है।“

सुजाता खीझ उठी थी। सुदीप एक समर्पित डॉक्टर थे, उन्हें रोक पाना मुश्किल था। कई महीनों बाद वे दोनों साथ घूमने आए थे पर......

सुजाता भी कार्ट से उतर गई थी।

”तुम वहाँ के पौध-विक्रय केन्द्र से अपने मनपसंद पौधे खरीद लो। पीयूष का घर यहाँ से 10 किमी0 है बस। तुम वहाँ पहुँचो। मैं कल लौट आउंगा।“

किसी निकटस्थ स्टेशन से मात्र 5 मिनट में एयर टैक्सी आ गई थी। सुदीप को विदा कर सुजाता पौध-विक्रय केन्द्र की तरफ बढ़ गई।

नर्सरी में आकर्षक एवं विचित्र दिखायी देने वाले पौधों की अनेक किस्में थीं। रंग और सुगंध के अदभुत संयोजन वाले पुष्प थे। लाल रंग की घास में गुलाब की तेज सुगंध थी।

”मैडम, यह लाल घास, जितने क्षेत्र में इसके बीज आप डालेंगी, उतना ही फैलेगी। यह दो वर्ष तक इतनी ही सुंदर और ताजा बनी रहेगी। पर इसमें बीज नहीं आएंगे, न यह उखाड़ कर अन्यत्र लगायी जा सकेगी।“

”जानती हूँ। आपकी दिल्ली स्थित पुरानी ब्रांच से मैंने कुछ पौधे लिए हुए हैं।“

पौधों का मूल्य बहुत अधिक होने के बावजूद सुजाता ने घास और नीले गुलाब खरीद लिए।

एक घंटे में सुदीप, कीर्ति हॉस्पिटल पहुँच गए थे। यह शहर का सबसे बड़ा हार्ट-हास्पिटल था। फिर वैसा ही केस था।

पिछले तीन माह में ऐसे पाँच रोगी आ चुके थे। रोगी जीवन-रक्षक उपकरणों पर था। उसके हृदय की पेशियां सख्त हो चुकी थीं, हृदय बहुत कम काम कर रहा था और हृदय के वाल्व खराब हो चुके थे। तुरंत ऑपरेशन करना जरूरी था।

हृदय की पेशियों को पुनः लचीला और सक्रिय बनाने के लिए केवल एक ही दवा बाज़ार में थी और वह काफी मँहगी थी। रोगी को यह दवा काफी लम्बे समय तक लेनी होती थी।

यह बीमारी दुर्लभ थी, केवल अमेरिका में 2-3 इस तरह के देखे गए थे। भारत में तो इसका नाम भी नहीं था और इतनी जल्दी इस बीमारी के पाँच केस आ गए थे। सुदीप के माथे पर अब चिंता की लकीरें खिंच गई थीं। रोगी भी 16-17 वर्ष से 40 वर्ष तक के युवा थे।

उस दिन डेमन फार्मा से आए रिप्रेंजेटेटिव से उन्होंने दवा के मँहगे होने की शिकायत भी की थी।

शनिवार दोपहर वे वापस पीयूष के फार्म हाउस पर आ गए थे पर उनके दिमाग में ढ़ेरों विचार आ रहे थे।

रात्रि के 10 बजे थे। डा0 सुदीप की नजरें कम्प्यूटर के स्क्रीन पर गड़ी थीं। वे इंटरनेट पर मेडिकल न्यूज देख रहे थे। देश के विभिन्न भागों से इसी बीमारी के कई केस सामने आ रहे थे। कई रोगियों की मृत्यु हो गई थी क्योंकि रोगी 4-6 माह दवा लेकर छोड़ देते थे।

पुराने समय में असाध्य समझी जाने वाली बीमारियों पर नियंत्रण पाया जा चुका था तो इस नई बीमारी ने देश भर में पैर पसार लिए थे। अगले सप्ताह दिल्ली में मेडिकल कांफ्रेस थी। देश भर से हृदय रोग विशेषज्ञ कांफ्रेस में आमंत्रित थे।

18 जनवरी की सुबह डा0 सुदीप हॉटेल ताज पहुँच गए थे, जहाँ कांफ्रेस थी। कांफ्रेस हॉल के दरवाजे पर ही डा0 देशमुख मिल गए थे जो कि उनके मित्र थे।

”तुम तो 10 वर्ष युवा नजर आ रहे हो देशमुख! विवाह कर लिया है या तकनीक का कमाल है?“

”कुछ भी समझ लो, तुम से क्या छुपा है।“ देशमुख खिल-खिलाकर हँस पड़े। ”पर तुम क्यों इतने परेशान नजर आ रहे हो? तुमने तो प्रोफेशन को निजी जीवन पर हावी कर लिया है।“

”कभी-कभी हो जाता है।“ और सुदीप हँस पड़े।

शाम की चाय के बाद यह असाध्य बीमारी ही सभी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय रही। इस बीमारी के उपचार हेतु अनेक नई तकनीकें सुझायी गईं पर इस बीमारी का उद्भव और इतनी जल्दी प्रसार डॉक्टर्स की समझ के परे था।

देशभर में 300 केस विभिन्न हॉस्पिटल्स में आ चुके थे जिनमें से 50 रोगियों की मृत्यु हो गई थी। एक विकसित राष्ट्र के लिए, जहाँ उच्च तकनीक की चिकित्सा सेवायें उपलब्ध थीं, मृत्यु के आँकड़े चौंका देने वाले थे।

सुदीप और अन्य डॉक्टर्स की यही राय थी कि यह मामला ’नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हैल्थ’ NIH को सौंप देना चाहिए।

कांफ्रेस के अंतिम दिन डॉक्टर्स का एक दल, सुदीप के नेतृत्व में NIH के अधिकारियों से मिला और बीमारी से संबधित सभी आँकड़े सौंप दिए। NIH ने जाँच-पड़ताल का उत्तरदायित्व देवेन्द्र गिरि नामक मेडिकल इनवेस्टिगेटर को दे दिया।

देवेन्द्र गिरि साँवले से, स्थूलकाय व्यक्ति थे। गोल चेहरा और कंधों तक झूलते बाल। आँखों में शरारत और चेहरे पर एक स्थायी मुस्कुराहट। वे जासूस कम और कॉमेडियन ज्यादा लगते थे पर वास्तव में वे बेहद चतुर और चुस्त जासूस थे।

”सर, अगले सप्ताह मीटिंग रख लेते हैं। मैं तब तक केस स्टडी कर लेता हूँ।“

”जरूर देवेन्द्र, मेरा पूरा सहयोग रहेगा। वैसे मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।“ सुदीप बोले।

अगले दिन देवेन्द्र अपने ऑफिस में अपनी सहायक लीना के साथ रोग से संबधित आँकड़ों का अध्ययन कर रहे थे।

”सर, रोग का प्रसार उत्तरी-पश्चिमी भारत में अधिक है। दक्षिणी-पूर्वी राज्यों में बहुत ही कम।“ लीना से कम्प्यूटर स्क्रीन से नजर हटाते हुए कहा।

”रोगियों में ज्यादातर किशोर और युवा ही हैं जबकि यह बीमारी युवावस्था की है ही नहीं।“

हार्ट स्टिफनेस! हृदय की माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं. रक्त में एमाइलॉइड की मात्रा बढ़ जाती है...

एमाइलॉइड एक प्रोटीन है। हृदय पर इसके जमाव से.... हृदय धीरे-धीरे कम काम करने लगता है.... और फिर हार्ट फेलियर...

देवेन्द्र की नजरें स्क्रीन पर जमी हुई थीं।

”स्पष्ट है कि यह प्रोटीन, किसी खाद्य पदार्थ के माध्यम से युवा ले रहे हैं।“

”सर, आजकल युवा, मसल्स बनाने के लिए, प्रोटीन दूध, प्रोटीन पाउडर आदि बहुत ले रहे हैं।“

”ऐसा नहीं है लीना, यह प्रोटीन इन्फेक्शन से या किसी ऐसे खाद्य पदार्थ से आ सकता है जिसमें बैक्टीरियल जीन डाला गया हो।“

”हमें दिल्ली हार्ट-हॉस्पिटल के कुछ रोगियों से मीटिंग करके उनकी खान-पान की आदतों का ब्यौरा लेना होगा।“

देवेन्द्र ने रोगियों से मीटिंग करके उनके खान-पान से सम्बंधित एक विस्तृत विवरण तैयार कर लिया था।

आज डा0 सुदीप से देवेन्द्र की मीटिंग थी।

”और देवेन्द्र जी, कहाँ तक पहुँचे आप?“

”काफी वर्क कर लिया है, सर। पेशेंट्स की फूड हैबिट्स में कुछ चीजें बहुत कॉमन हैं। कुछ खाद्य-पदार्थ संदेह के घेरे में है। मैंने इन्हें अन्डरलाइन कर दिया है। पर जब तक सभी रोगियों का विवरण प्राप्त नहीं होता, मैं निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता।“

”प्रश्नों का एक फॉर्मेट बनाकर मैंने सभी अस्पतालों जिनमें इस तरह के केस हैं, मेल कर दिया है। जब तक सभी पेशेंट्स के विवरण प्राप्त नहीं हो जाते हम आगे नहीं बढ़ सकते।“

”वेलडन देवेन्द्र! जल्दी ही हमें रोग का कारण पता चल जाएगा।“

10-15 दिन में सभी अस्पतालों से विवरण देवेन्द्र के पास आ गए थे। संदिग्ध खाद्य पकड़ में आ गया था।

देवेन्द्र काफी प्रसन्न थे। ये किसी ब्रांड विशेष के सोया प्रोडक्ट्स थे। फ्लेवर्ड मिल्क, प्रोटीन पाउडर इत्यादि।

शाम को सुदीप भी देवेन्द्र के ऑफिस में आ गए थे।

”सर, डेमन फार्मा के सोया उत्पाद संदेह के घेरे में हैं। केस स्टडी से स्पष्ट हो गया है कि रोग का कारण कोई इन्फेक्शन नहीं है।“

”और मजे की बात यह है कि सर, ’सोफ्टामाइलिन’ जो इस रोग की एकमात्र दवा है वह भी डेमन फार्मा ही बनाती है।“

”सीधी बात है देवेन्द्र कंपनी ने दोहरे फायदे के लिए गलत प्रोडक्ट्स बाजार में उतारे। ‘भारत कृषि और पशु अनुसंधान केन्द्र’ की ही सिस्टर फर्म है डेमन फार्मा। यहीं से सोयाबीन डेमन फार्मा को जाता है।“

”पर यह समझ नहीं आता सर, NIH से सर्टिफाइड हुए बिना कैसे कोई प्रोडक्ट बाजार में आ सकता है? यह अवैध है। कंपनी के उत्पादों पर प्रतिबंध लग सकता है, अधिकारियों को सजा हो सकती है।“

”पर ऐसा हुआ है, देवेन्द्र।“

देवेन्द्र ने तहकीकात का सारा ब्योरा NIH को सांप दिया।

NIH के अधिकारियों का एक दल NH 27 पर स्थित ‘भारत एग्रीकल्चर एण्ड एनिमल रिसर्च सेंटर’ पर उतर चुका था।

ऑफिस में लगे स्क्रीन से, सेंटर की हवाई-पट्टिका पर सरकारी विमान को देखकर दो अधिकारी स्वागत के लिए बाहर आ गए।

”यहाँ के मुख्य अधिकारी से तुरंत हमारी मीटिंग कराइए। यहाँ हमें गड़बड़ियों की सूचना मिली है।“

NIH के दो वरिष्ठ अधिकारी, अनेक सुरक्षा युक्तियों को पार करते हुए सीधे मुख्य अधिकारी के कक्ष में पहुँच गए और अन्य सदस्य विभिन्न दिशाओं में फैल जाँच में जुट गए।

”मि. मैथ्यू, जी.एम. उत्पादों को बाजार में लाने से पहले से NIH सर्टिफिकेट लेना होता है, आप यह बात कैसे भूल गए?“

”हमारे सभी उत्पाद सर्टिफाइड हैं, आप जाँच कर सकते हैं।“

मि. मैथ्यू के रिमोट का बटन दबाते ही दीवार पर स्थित बहुत बडे़ स्क्रीन पर कृषि क्षेत्र का विहंगम दृश्य आ गया था।

”हमारे यहाँ जीनी-परिशुद्धता बनाए रखने के लिए परागण भी रोबोटिक मक्खियों द्वारा नियंत्रित स्थितियों में होता है।“

”जो भी हो आपके सभी कृषि एवं पशु उत्पाद अब जाँच के दायरे में हैं। आपकी कंपनी के सोया उत्पादों से देश-भर में 50 मौतें हो चुकी हैं और अनेक लोग बीमार हो चुके हैं। और यह सब आपने अपनी दवा कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए किया।“

”मि. आनंद, हमारे यहाँ DS– 21 सोयाबीन का उत्पादन होता है। यह किस्म, यहाँ प्रारंभिक परीक्षणों से गुजरने के बाद छप्भ् से परीक्षित एवं प्रमाणित है।“

”हो सकता है परीक्षण के लिए आपने और कोई किस्म भेजी हो।“

मि. मैथ्यू ने DS– 21 सोयाबीन की फाइल और प्रमाण पत्र मेज पर रख दिए।

”मि. मैथ्यू, ये डॉक्यूमेंट्स ऑरिजनल नहीं हैं।

डॉक्यूमेंट्स और सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर नकली हैं।“ आनंद ने पेपर्स देखते हुए कहा। मैथ्यू को चेहरा सफेद पड़ गया था। ए. सी. कक्ष में भी वह पूरा पसीने से नहा गया। कंपनी से सोयाबीन जब्त कर ली गई और कोर्ट ने कंपनी पर एक बड़ी राशि का जुर्माना किया साथ ही पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने का आदेश दिया।“

देवेन्द्र प्रसन्न थे। केस जल्दी सुलझ गया था। एक वर्ष बीत गया था। वे प्रसन्न मूड में कुछ गुनगुनाते हुए मेल चेक कर रहे थे। डा0 सुदीप का मेल था। काफी दिन हो गए थे, सुदीप से संपर्क नहीं हो पाया था।

”मित्र, तुम्हारे लिए कुछ भेज रहा हूँ। कुछ विशेष.. .“ मेल के साथ एक अटैचमेंट था।

देवेन्द्र ने जब अटैचमेंट खोलकर पढ़ा तो कड़ाके की सर्दी में भी उसके माथे पर पसीना आ गया।

वह एक डॉक्यूमेंट था जिसमें DS– 21 को सेहत के लिए अनुपयुक्त बता कर खारिज कर दिया था साथ में ही एक और पेपर था हूबहू वैसा ही, पर आँकड़ों में फेर बदल था।

दोनों पर पाँच वर्ष पहले की दिनांक थी। पर हस्ताक्षर.......

...अलग थे। खारिज होने के बावजूद किस्म को प्रमाणित किसने किया? आँकड़ों में किसने हेर-फेर की? देवेन्द्र को रात भर नींद नहीं आयी। अगली सुबह देवेन्द्र छप्भ् में था।

पुराने सारे आँकड़ें खंगालने पर भी नकली डॉक्यूमेंट नहीं मिले।

जब देवेन्द्र ने पुराने अधिकारियों, कर्मचारियों की सूची देखी तो वह दंग रह गया - डा0 सुजाता सिन्हा! सुदीप की पत्नी?

ऑफिस आकर उसने लीना से कहा कि सुदीप और सुजाता के विषय में पूरी जानकारी एकत्रित करे।

”सर, 6-7 वर्ष पहले सुदीप डेमन फार्मा में ही नौकरी करता था। फिर कुछ दिनों बाद ही कंपनी से उसका विवाद हो गया था। कंपनी ने अपमानित करके निकाला था उसको। उसके बाद से वह कीर्ति हॉस्पिटल में है। NIH में आना-जाना सुदीप का तब से ही है। उस वक्त वहाँ सुजाता कार्यरत थी। सुजाता से मेलजोल बढ़ा कर फिर उसने, उससे शादी कर ली थी।“

”ओह! अब समझा। आँकड़ों में फेर-बदल करवाने के लिए उसने सुजाता से दोस्ती की... डेमन फार्मा से बदला लेने के लिए यह सब किया... ताकि कंपनी बदनाम हो।“

देवेन्द्र ने कई बार सुदीप को फोन लगाया था पर स्विच्ड ऑफ आता था।

देवेन्द्र स्वयं ही कीर्ति हॉस्पिटल पहुँच गया था। वहाँ पता लगा कि कुछ माह पहले ही वह त्याग-पत्र देकर चला गया।

पर कहाँ? किसी को उसको नया पता मालूम नहीं था। शायद देश के बाहर...........।

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❒ ई मेल : pragyamaitrey@gmail.com

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