संस्मरण // जिंदगी से मेरी पहली मुलाकात // देवी नागरानी

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जीवन को जानना एक तलाश है, और उस प्रयत्न की पगडंडियों पर कदम दर कदम आगे बढ़ कर उसे अपनी भावनाओं में सजीव करना उससे भी बड़ी तलाश. इस तलाश का सकारात्मक हल ढूंढना और पाना इसलिए महत्वपूर्ण है कि समय के साथ उस पहलू का विशिष्ट रचनात्मक हस्तक्षेप हमें उस सत्य में गहरे उतर कर खो जाने को बाध्य करता है. किसी ने खूब कहा है-

वफ़ादार बना रहना आसान है

वफ़ादारी साबित करना मुश्किल है.

आसानियों को हासिल करने में प्रयत्न की पहली सीढ़ी पर सफलता मिल जाती है, पर दुश्वारियों का समाधान मुश्किल तो है पर साहसी प्रयत्नों से चट्टानों से राह बनानी पड़ती है, पर नामुमकिन कुछ भी नहीं.

पाषाण के सीने में भी जल निकलता रहता है

सच्चे मन से बात करो तो हल निकलता रहता है

यही सच जीवन का परिचायक बन जाता है जब आदमी जीवन के भीषण झंझावतों से संघर्ष करने का संकल्प करता है, तब पहाड़ो से झरने फूट पड़ते है, और दूध की नदियां बहने लगती हैं. निश्चय और निष्ठा से प्रवाह गतिशील हो जाता है.

पराजय भी जीवन में उतनी ही प्रेरणा देता है जितनी विजय. विजयी होने का साहस ही असली विजय है

जी रहे हैं/ उम्र के रेगिस्तान में/ लड़ते समय से

यह किसी कविता की पंक्ति नहीं है, सिर्फ अक्षर नहीं, यह धड़कन है मानव मन के जिंदा होने का अहसास है.

जीवन एक बड़ी किताब है. जिंदगानी के सफर में हर दिन, खुद-ब-खुद नियमानुसार रोज एक नया वर्क पलटता है जिसे इंसान को पढ़ना ही पड़ना है, समझना है और अपने तजुर्बों के कोष में जोड़ना है. आये दिन होने वाली घटनाएं, दुर्घटनाएं, चमत्कार करिश्मे सभी अपने समय पर, एक निश्चित स्थान पर होकर गुज़रते हैं, जिसकी हम ख्वाबों में भी कल्पना नहीं कर सकते. किसी का जन्म, किसी का कार दुर्घटना में अचानक मर जाना, किसी के पेशे में तरक्की की खबर, किसी की बेबसी और बेकारी की दुर्दशा की खबर, कभी कोई, कभी कोई अचंभित करती खबर अखबार की सुर्खियों से ज्यादा लाल, हम तक अपनों के माध्यम से पहुंचती है. और वह किसी हद तक इंसान को पाषाण बना देती है.

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ऐसे ही तो हुआ था 1968 में. छोटी बहन की शादी नागपुर में तय हुई थी और एक महीना पहले मैं बड़ी बेटी होने के नाते मैके आ गई अपनी दोनों बेटियों के साथ. बड़ी भाभी का कई तैयारियों में हाथ बंटाते, कुछ बाबा के कीमती सामान की हिफाजत का जिम्मा लेती, कभी दहेज का सामान भाई-भाभी के साथ बैठकर पैक करती, जिस पर पिताजी लेबल लगाते हुए नाम लिखते जाते. इन सब चीज़ों, कपड़े व गहनों के विवरण का एक चिट्ठा बनता जा रहा था.

‘ अरे वह हरी वाली साड़ी है, उसे पैक मत करना. गीता लपेटकर दहेज की पेटी में रख देना बहू.’ मां कहती. ‘और हाँ वह लाल गोटे वाली साड़ी विदाई के वक़्त अपने पिता को देना जो उसका सर ओढ़कर विदा करेंगे.’

मैं ये सारी हिदायतें सुनती रही और समझने कि कोशिश करती रही.

‘ वह बैंगनी सतावड़े की साड़ी बैग में ऊपर रखना, साथ में पेटीकोट और ब्लाउज भी ताकि परसों बिटिया को हमारे यहां पहन कर आने में दिक्कत न हो.’ माँ हमारी ओर देखते देखते फिर ताकीद करती रही.

मेरे लिए यह पहला अवसर था कि अपने ही घर की शादी में कुछ घुल-मिलकर करना, करने से ज्यादा कुछ सीखने का अवसर भी था. यह चमक दमक,  ये गोटेदार चुनरियां, दुपट्टे, यह सीप लगी साड़ियां, धागों से कढ़ाई की हुई चादरें, यह मखमल के तकिए, गलीचा और तकिए के गिलाफ़, एक बिस्तर की मानिंद होल्डाल में पैक करते देखा बड़े भाई को.

‘ अरी देविकी, वो गुरु की चादरें जो तुम्हें गोटेदार बॉर्डर लगाकर तैयार की, वे कहां हैं?’ पिता ने आवाज़ दी.

‘वे तो मैंने अपनी पेटी में रख ली हैं. परसों सुबह गुरुद्वारे साथ ले चलूंगी और गुरु-ग्रंथ साहब पर चढ़ा देंगे.’ कहते हुए मैंने पिताजी को तसल्ली दी कि उनकी ताकीद अनुसार सब ज़रुरत का सामान, दहेज की ज़रूरियात, पूजा-पाठ,  शगुन तिलक व् खाने पीने का सामान बड़े कनस्तरों में बंद हुआ जा रहा है और उन्हें लिस्ट में दर्ज कर दिया गया है.

उस दिन शुक्रवार का दिन था दूसरे,दिन 5:00 बजे सुबह 35 लोगों का कारवां सिकंदराबाद स्टेशन पर जमा हुए और ट्रेन के आते ही सब अपने-अपने रिजर्व कंपार्टमेंट में कुलियों की मदद से डिब्बों में चढ़ जायेंगे, ऐसा तय हुआ. बड़े भाई ने लोगों की गिनती करते हुए 34 लोगों के होने का ऐलान किया, तो सभी उस ‘एक’ के कम होने पर आश्चर्य करते हुए यहां वहां देखकर एक दूजे को पूछते रहे.

‘ भाई हमारे परिवार से तो सभी 10 सदस्य यहां है’ बड़े काका ने कहा.

‘ हमारे भी 9 लोग यहीं हैं.’ ताऊ ने सुर मिलाया.

आखिर ताऊ ने 19 लोगों के बाद और सभी के सिरों पर हाथ रखते हुए गिनती पूरी करते हुए कहा 16. 19 और 16 हुए 35. तब जाना कि भाई खुद को गिनना भूल गए थे. यह थे मेरे बड़े भाई मुझ से 4 साल बड़े, तब 31साल के थे और मैं 27 साल की. दो बच्चों की मैं, पीहर की बड़ी बेटी और ससुराल की छोटी बहू!

खुशी का सफ़र था मौज मस्ती में गुज़रा और धुन में हंसते चहकते हमने गाड़ी से उतरकर नागपुर की सर ज़ मीन पर पांव रखा तो हमारे होने वाले बहनोई जी, उनके बड़े भाई, और १५ लोग हमें लेने आये थे, वहीँ पर हमारा स्वागत करते हुए, मुंहमीठा करवाया.

जैसा मैंने कहा, मेरी शादी के बाद मेरे लिए यह पहला अवसर था घर की शादी में भागीदारी लेने का. मेरे पति भी मुंबई से हैदराबाद मेरे पीहर में 4 दिन पहले ही पहुंच गए. इस-हुल्लड़-गुलड़ में गाजे-बाजे के साथ सब रस्में अता होती रहीं, शायद नियती के सुर-ताल बजते हुए ढोल के साथ.

शाम को शादी की तैयारी शुरू हुई. दुल्हन के पीछे सब तैयार होकर हाल में पहुंचते गए जहां शादी की और रस्में फेरों के साथ संपूर्ण करनी थीं. दूल्हे वाले आए, बधाईयां अदला बदली हुईं, गले में बाहों के हार और मधुर मिलन का नज़ारा, सामने कैमरे वाले, तस्वीरें खींचते हुए मंडप की ओर बढ़े. ब्राह्मण महाराज भी उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे. विधि से शादी के मूल मंत्र शुरू होकर संपन्न हुए. मेरी माँ बहन की सास के गले लगी, पिताजी बहन के ससुर से गले मिले, वही तस्वीरें आज मेरे हाथ में हैं जिन्हें देखकर बरबस याद आ रही है पिताजी की जो तब थे और दो घंटे के बाद नहीं रहे.

शादमाना पूरी तरह 11:30 12:00 बजे तक चला और अब विदाई के लिए मैं भाभी, बड़े-भाई अम्मा-बाबा, धेरे धीरे दूल्हा दुल्हन के साथ फूलों से सजी कार के पास आए और दोनों को उस में विदा किया. मुझे अच्छी तरह याद है पिताजी ने मेरी बहन को आशीर्वाद देते हुए वह लाल गोटे वाली साड़ी उसके सर पर डाली और सर पर हाथ फिराते हुए कहा-’ खुश रहो, आबाद रहो! कल सुबह तुम्हें तुम्हारी दीदी व जीजा लेने आएंगे.’

और रास्ते में मुझे फिर से हिदायत देते हुए कहा-‘देवकी, कल तुम्हें और दामाद जी को सुबह 9-10 बजे जाकर उसे लिवा लाना है, ताकि हम सब दोपहर को भोजन साथ करें और फिर शाम की गाड़ी से हमें जाना भी है.’

पर वह सुबह आई ही नहीं, भोर के पहले ही सब कुछ समाप्त हो गया, सारा का सारा वायुमंडल शोक से भर गया. वातावरण आंसुओं से भीग गया.

हम अपने अस्थाई निवास पर पहुंच ही रहे थे कि पिताजी को हार्ट अटैक हुआ. सभी ने उन्हें घेर लिया. लिटाने के बाद कोई उन्हें छाती के पास सहला रहा था, तो कोई हाथ में ब्रांडी लिए उन के तलवों पर मालिश करने लगा. माँ उनके सिरहाने बैठ सूती रुमाल से उनके चेहरे से पसीना पोंछती रही. भाई डॉक्टर को फ़ोन पर जल्दी आने की ताकीद करते रहे.

बावजूद इसके, हर प्रयास निराशाजनक स्थिति में असफल हुआ. इधर दरवाज़े पर एंबुलेंस आई, उधर पिताजी के तन से प्राण पखेरु उड़ गए. लगा जैसे हर सपना चकनाचूर हो गया, हर ख्वाब बिखरा हुआ. बस बाकी बची थी उन धराशयी सपनों की स्मृतियाँ, जो कर्चियाँ बनकर आज भी यादों में खलिश भर देती हैं.

शुक्रवार वहां से रवाना हुए थे, शनिवार शाम को शादमाना रहा और रात को मातम. दिन में शादी की शहनाइयां बजी थीं, और अब इस रात के सन्नाटे में इन सुरों से जैसे मातम की गूंज तरंगित हो रही थी. किसी की दबी दबी सिसकियां, किसी की रूदाद, तो किसी की सिसकती खामोशी. समां भी तो रात का था. बस सुबह का इंतज़ार था.

सामने आई भीष्म परिस्थिति. बहन को विदा तो किया अब उसे यह संदेश पहुंचाना था, पिता के अंतिम दर्शन करने के लिए, कैसे समझ में नहीं आ रहा था.

मैं अपनी सोच की कैद में कुछ सवालों जवाबों के समंदर में धंसती रही. पीहर में इस मौके पर खुशियां जिस तेज़ी से आईं, उसी तेज़ी से ग़मों के लिए दरवाज़े खोलते हुए बाहर निकल गईं.

आखिर मेरे पति ने हिम्मत करके समधी जी के घर फोन लगाया. समधी साहब ने ‘हेल्लो’ करते हुए परिचय पाते ही अपने बेटे को फोन पर बुलाया. अब मेरे पति और जीजा के बीच समाचार का समाधान निकालना बाकी था.

‘जीजा जी आप और रात को इस समय. सब खैरियत….?’.

‘हाँ सब ठीक है अरविंद, बस मेरी बात ध्यान से सुनो और चुपचाप जो करना है करो. पर किसी तरह मीनाक्षी को यहां ले आओ ताकि वह बाबा का दर्शन कर सके. हमें सुबह अंतिम संस्कार की रस्म संपन्न करके 4:00 बजे की गाड़ी से सिकंदराबाद लौट जाना है. अब दोनों जल्दी से आ जाओ.’- यह मेरे पति थे जो सुलझी हुई सोच के साथ समाधान सामने रखते रहे.

विलम्ब के लिए वक्त भी कहाँ थे. इतवार का दिन सुबह 11:00 से 12:00 बजे तक विधि संपन्न करके, फिर शमशान से लौटते नहाना-धोना, और 4:00 बजे रवाना होना है, इस ठिकाने से उस ठिकाने के लिए.

बस कुछ ही देर में बहन मीनाक्षी के साथ जीजा जी , उनके माता पिता और दो बुजुर्ग व्यक्ति ऑन पहुंचे. आखिर परदेस में आकर इस तरह लुट जाने का सदमा था. उसके बोझ को कम करने के लिए सहानुभूति के कांधों की सख्त ज़रुरत थी.

सुबह हुई. लोगों के आने का तांता बंधा रहा. काम था, ब्राह्मण को बुलाना, अंतिम संस्कार का सामान, पूजा का सामान, श्रद्धा के फूल, और जाने क्या-क्या. पर आज तो इतवार है. दस ग्यारह के पहले दुकान खुलने वाली न थी. सामान आते आते समय होगा, पर समय को दायरे में बांधना था. पिताजी की देह को अग्नि के सपुर्द करना था और साथ ले जानी थी उनकी याद की पोटलियाँ.

अंतिम कार्य क्रियाएं समाप्त होते ही माँ को नहलाया गया, उसके माथे का सिंदूर मिटाया गया, चूड़ियां उतरवाईं गईं. जब माँ सामने आई तो सूनी सी मांग, सूती सफ़ेद साड़ी में उसे देखकर विश्वास ही नहीं होता था कि कल शादी में माँ सिल्क की सुंदर प्रिंटेड साड़ी पहने सबसे घुल मिलकर हंसती मुस्कुराती रही. आज इन सूती कपड़ों में खुद ही सिमटती जा रही थी.

विचित्र संगति-एक शादी करके सुहागन बनी और दूसरी शादी करवाकर विधवा. आखिर जल्दी जल्दी सब कुछ ख़त्म हुआ, कहाँ रोक पाया था कोई उन्हें वहां जाने से जहां जाकर कोई लौटा नहीं? बस हम सभी लौट आये.

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मेरे तजुर्बों में शामिल था यह अवसर, सुहाना सफर और यह मौसम हसीन, जैसा खुशनुमा सफर, एक पल में शहनाइयाँ बजीं, शादी सम्पूर्ण हुई, दुसरे क्षण सब कुछ बदल गया. बस बहन को विदा किया, और अब पिता जी को विदा करने का समय आया, वही किया.

यह है कालचक्र!

पता ही नहीं पड़ता आज, अब, इस पल के बाद क्या होने जा रहा है, क्या होगा. सब कुछ अनिश्चित. सोचती हूँ कि शादी के पहले अगर यह सब कुछ होता तो क्या होता?

बावजूद इसके 4:00 बजे की गाड़ी के लिए भागम भाग मची थी. 35 लोग आए और भाई ने रोते-रोते कहा अब 34 हैं. इस बार मैंने खुद को भी गिन लिया है.’

मुझे लगा मैं अपनी नादानियों की तहों से निकलकर अब बड़ी हो रही हूँ. शायद जिंदगी से यह मेरी पहली मुलाकात थी.

देवी नागरानी

dnangrani@gmail.com

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1 टिप्पणी "संस्मरण // जिंदगी से मेरी पहली मुलाकात // देवी नागरानी"

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