कहानी : यादों के साये // अर्चना अग्रवाल

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बहू की नजर उतार कर नमिता ने नींबू घर के पिछवाड़े फेंक दिया मोती की खूबसूरत नथ से सजी बहू कुंदन का टीका लगाएं गुड़िया सी लग रही थी । बहू का सलोना रूप देखकर नमिता की आंखें जुड़ाने लगीं  I


  सारे काम निपटा कर जब अपने कमरे में जा लेटी तो मानो उम्र भर की थकान आज पोर-पोर  में उतर आई   याद आया 25 साल पहले वह भी इसी ड्योढ़ी  पर इसी तरह लाल जोड़े में आ खड़ी हुई थी मानस से गठजोड़ बांधकर   ।दुनिया की नजर में गठजोड़ आज बंधा था पर नमिता तो इसे 13 साल की उम्र में ही बाँध  चुकी थी ।  मानस दूर की रिश्तेदारी में से था । एक कॉमन शादी समारोह में दोनों की मुलाकात हुई थी शुरुआत थोड़ी नोकझोंक से और छेड़खानी से हुई जो धीरे-धीरे गहरे लगाव  में बदलती चली गई  । कहते हैं ना कच्ची उम्र में मन भी गीली  मिट्टी सा होता है जिस पर किसी की भी आकृति सहज ही बन जाती है बस ऐसा ही कुछ हुआ था नमिता के साथ  । साल-दर-साल उम्र बढ़ती गई और मानस के साथ उसके मन का जुड़ाव भी    ।उस दिन के बाद नमिता ने जब भी तीज - त्यौहार पर हाथ में मेहंदी लगाई तो कहीं छोटा सा एम ज़रूर  छुपा कर लिख दिया मेहंदी में मानो हाथ की लकीरों में ही बांध लिया था उसे ।


   प्यार क्या है ? कैसे हो जाता है ? यह सब तो नहीं पता था उसे पर  मानस का साथ अच्छा लगता था । उस से बातें करना  ,कभी-कभी यूं ही खामोश साथ बैठे रहना कहीं गहरे तक ठंडक दे जाते थे कलेजे को  I
  समय पंख लगाकर उड़ता गया अब प्यार ज़िद का रूप ले चुका था
  दोनों परिवारों के लोग कुछ खास खुश नहीं थे इस रिश्ते से खासकर मानस की मां के व्यवहार के कारण दो  साल तक रस्साकशी चलती रही पर ना नमिता मानी ना मानस  ।

दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी अंतर था । नमिता  निम्न मध्यम वर्ग से थी जबकि मानस का परिवार अच्छे खाते पीते परिवारों में शुमार किया जाता था ।
दहेज के नाम पर कुछ खास मिलने की उम्मीद नहीं थी इसलिए मानस की माताजी शुष्क व्यवहार दिखा रहीं थीं । आखिर कुल का चिराग था इकलौता मानस । ऐसी हुंडी को भला वो कैसे कैश कराए बिना माने ।
आखिर नमिता के मामा ने बिचौलिए का रोल निभा शादी पक्की करा ही दी । ये अलग बात है कि मानस की माताजी का मुंह सूजा ही रहा नेग त्यौहार पर ।

और नमिता उसे तो दोनो जहाँ मिल चुके थे Iमानस का साथ बादलों का घर था जैसे । ज़िंदगी खूबसूरत रूप ले चुकी थी Iइस दुनिया से दूर दोनों एक दूजे में खोए थे जहाँ किसी तीसरे के लिए कोई रिक्त स्थान ना था ।
शादी के एक साल में ही नन्हा विशु भी गोदी में खेलने लगा ।

मानस दुकान पर तो नमिता घर पर बिज़ी रहने लगे पर फिर भी प्यार के पल छिन दोनों चुरा ही लेते थे ज़िंदगी से ।

एक रात विशु के सो जाने के बाद रात को बारिश शुरु हो गई । नमिता को जाने क्या सूझा मानस के साथ चुपके से बाईक पर घूमने निकल पड़ी । ऊपर से बूँदों की रिमझिम , तेजी से दौड़ती बाईक और नमिता का उड़ता धानी पल्लू - उफ़्फ़ ज़न्नत यही तो है
मानस के साथ सटकर बैठी नमिता बारिश की सौंधी खुशबू से पागल हुई जा रही थी
जी चाहता था ये समय यहीं रूक जाए , थम जाए हमेशा - हमेशा के लिए ।

एक घंटे की मस्ती के बाद दोनों जब घर में घुसे तो पाया नन्हे विशु ने रो - रोकर सारा घर सिर पर उठा लिया है और सासु माँ तो आग की अंगार बनी बैठी हैं ।

सिटपिटा सी गई नमिता , चुपचाप गीले कपड़े बदल विशु को चुप कराया उस दिन के बाद सासुमाँ की वक्र दृष्टि और भी तीक्ष्ण हो गई , अनुशासन कड़ा हो गया ।

अब नमिता का बाहर निकल पाना मुश्किल हो गया मानस भी माँ  का लिहाज कर चुप से रहने लगे

देखते ही देखते 10 साल बीत गए
विशु भी बड़ा हो रहा था , कि अचानक एक वज्रपात हुआ , मानस  लगातार सिर में दर्द महसूस करने लगे पहले सोचा यूँ ही साधारण सी बात है पर जब पीड़ा असहनीय होने लगी तो डॉक्टर ने स्पेशल टैस्ट कराए ।

नमिता रिर्पोट लेने गई तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई , मानस को ब्रेन ट्यूमर था ।

कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसा कुछ घटित होता है कि ईश्वर पर से भी विश्वास उठने लगता है संपूर्ण आस्था , विश्वास डगमगाने लगते हैं ।
अब .. क्या करती नमिता सामने पहाड़ सी उम्र और ऐसा दारुण दुख ..
मानस का हर संभव इलाज करा नमिता ने दिन रात एक कर दिया , आँखों के नीचे काले घेरे गवाही देते थे उसकी व्यथा की ।
तिल - तिलकर जलना और ऊपर से मानस को हर समय प्यार , विश्वास , सामीप्य देना उसके लिए कितना मुश्किल था ये बस नमिता ही जानती थी ।

रात को चुपचाप अकेले में ढेर सा रोकर पल्लू से आँखें पोंछ  अगले जीवन समर के लिए तैयार हो जाती थी वो ।

हृदय तड़प कर कहता मानस का हर दुख , पीड़ा , रोग अपने पर ले लूँ पर हाय भाग्य की निर्ममता वो कुछ नहीं कर पाई

मानस चले गए , सात जन्म की कसमें खाने वाला इस एक पूरे जन्म भी साथ ना निभा सके ।

विशु को छाती से चिपटाए नमिता संज्ञा शून्य सी पड़ी रहती पर कब तक ऐसे चलता ?
दुकान , घर खर्च , बच्चे की पढ़ाई सब तो सिर पर खड़े थे सुरसा की तरह मुँह बाए ।

माँ जी का असहयोग आंदोलन तो और भी तीव्र हो गया था इन दुर्दिनों में I

दुकान का कामकाज देखने के लिए मामा जी ने एक युवक नीरज को भेजा जो गाँव में अति विपन्न परिवार से था बस आश्रय और खाना ही उसकी परम आवश्यकताएँ थीं

छ्त वाले कमरे में नीरज ने अपना पुराना संदूक रख घर के सब  काम सहज ही अपना लिए ।
बिजली का बिल भरना हो या विशु को स्कूल छोड़कर आना , दुकान का गल्ला संभालना हो या माँ जी की दवाई सब उसी के जिम्मे थे ।

कुछ ही महीनों में घर का सदस्य बन गया आत्मीयता से ।
नमिता को भी साँस मिली इस चक्रव्यूह से , आजकल के ज़माने में ऐसे ईमानदार लोग मिलते ही कहाँ हैं ?

ना चाहते हुए भी नीरज की आँखें नमिता की उदास आँखों से टकरा कुछ पूछ बैठतीं थीं जिसका उत्तर वो कभी नहीं दे पाती थी ।

प्यार तो नहीं पर हालात के कारण दोनों कुछ पास तो आ गए थे।
एक रात विशु के सोने के बाद नमिता उदास खिड़की पर खड़ी थी कि नीरज की भीगी आवाज़ आई

"भाभी , कुछ कहना चाहता हूँ आपसे "
चौक कर नमिता पलटी तो नीरज़ का सर्द चेहरा देख वो भी जड़ शून्य सी हो गई

भाभी , आप कब तक भैया को याद कर रोती रहेगी मुझे आपको इस हाल में देख बहुत दुख होता है

कुछ पल तो नमिता चुप रही फिर कहा , "नीरज , उनकी यादें तो चिता तक साथ जाएँगीं , अब इस दिल में और किसी के लिए कोई जगह नहीं , समझे ?
उसकी कड़ी नज़र देख नीरज चुपचाप पलट कर चला गया I

उस दिन के बाद नमिता ने मामाजी से कह नीरज के लिए लड़की ढुंढ़वा कर जल्दी ही शादी पक्की कर चैन ली ।

छ्त के कमरे में ही उनकी छोटी सी गृहस्थी भी जमा दी
नीरज चुप था , समझ रहा था पर कुछ बोला नहीं
उसकी बीवी गाँव की सीधी सादी कन्या थी जिसे घर गृहस्थी का चौका चूल्हा ठीक से आता था
वक़्त के साथ बहुत कुछ बदलता है , रिश्ते भी , मायने भी , हालात भी ।

दुकान की कमाई ठीक ठाक होने से घर खर्च चल ही जाता था पर माँ जी आज भी मानस की मौत के लिए नमिता के दुर्भाग्य को कोसती थी पर वो तो जैसे दुख सहते - सहते पत्थर की शिला हो गई थी ।
विशु पढ़ाई में अत्यंत मेधावी निकला उसने जल्दी ही बैंक की अच्छी नौकरी कर माँ को आश्चर्यचकित तो किया ही घर की सारी जिम्मेदारी भी उठा ली ।

नीरज का परिवार भी बड़ा हो चुका था , आवश्यकताएँ बढ़ रहीं थीं और खर्च भी ।
आखिर नमिता ने एक बड़ा निर्णय लिया और दुकान नीरज के नाम कर दी आखिर उसके बुरे दिनों में उसी ने तो साथ दिया था ।

बैंक की नौकरी देख विशु के अच्छे रिश्ते आने लगे आखिर ऋचा दोनों माँ बेटे को भा गई । माँ जी ने लाख ताने उलाहने दिए पर नमिता अब कहाँ रुकने वाली थी।
और आज विशु का सेहरा देख तो मानस की आत्मा भी प्रसन्न हो उठी ।
 
अरे भाभी , आप यहाँ सोई पड़ी हो बहू को मंदिर ले जाना है , नीरज की बहू की आवाज़ सुन चौंक उठी नमिता

अरे हाँ चल पूजा की थाली तैयार करते हैं उठते हुए मानस की फोटो से आँखें टकराईं तो जैसे मुस्कुरा दिए मानस और नमिता की आंखें दिए की लौ की भाँति जगमगा उठीं ।

कहीं नहीं गए वो , हमेशा साथ हैं मेरे यादों में , बातों में और हर पल में ।
 
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अर्चना अग्रवाल

शिक्षा - एम.ए. बी.एड

दिल्ली विश्वविद्यालय में दो बार सर्वश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार विजेता

ई बुक प्रकाशित - आँसू और दिल

ई बुक प्रकाशित - मन के धागे @juggernaut.in

ई बुक प्रकाशित - मोरपंख pothi.com

ई बुक प्रकाशित - भीगा मन @juggernaut.in

Twitter id- Archana@archanaaggarwa9 .

हृदय के अनकहे भावों को कलम द्वारा अंकित करने का प्रयास करती हूँ । कहाँ तक सफल होती हूँ इसकी गणना पाठकगण स्वयं करें I

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2 टिप्पणियाँ "कहानी : यादों के साये // अर्चना अग्रवाल"

  1. बहुत ही सुन्दर रचना । दिल खुश हो गया पढ़ कर ।

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