आलेखः जलियां वाला बाग लेखकः हरदेव कृष्ण


पंजाब की ऐतिहासिक नगरी अमृतसर। इस के हॉल बाजार में एक इमारत नजर आती है जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- जलियाँ वाला बाग। इसके भीतर प्रवेश करके , एक छोटी और पतली सी गली पार करने के बाद लाल रंग का तिकोना समारक दिखाई देता है। इस पर लिखी इबारत पढ़कर आप की रुह काँपने लगती है। तो यह है वो स्थान जहां पर खड़े होकर क्रूर जनरल डायर ने निहत्थे 20,000 लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। लोग न कोई षड़यंत्र रच रहे थे, न हथियार उठा रहे थे। वो तो बस अंग्रेज सरकार के रालेट एक्ट और दूसरी नीतियों का विरोध दर्ज करने के लिए इक्ठ्ठा हुए थे। महात्मा गाँधी व आजादी की लड़ाई में शामिल कुछ अन्य महत्वपूर्ण लोगों की गिरफ्तारी का विरोध भी किया जा रहा था। तब पंजाब प्रांत के गर्वनर माइकल ऑडवायर को यह सहन नहीं हुआ कि उसके इलाके में ऐसे संघर्ष प्रवान चढ़ें। इसके लिए उसने फौज की मदद लेने की ठानी।

अमृतसर में, श्री स्वर्णमंदिर साहिब के निकट, 13 अप्रैल 1919 का , वैशाखी का दिन यहां ठहर चुका है। अनुसरण करता वह मनहूस कालखंड भी यहीं ठिठकने के लिए विवश है। जब भी आप यहां आएंगें, आपको अंग्रेज फौज के जूतों की आवाज, मशीनगन से निकलती गोलियां और चीखते-चिल्लाते बुजुर्ग, बच्चे, जवान आपको सुनाई देंगे। चारों ओर से बंद जलियां वाला बाग बेकसूर लोगों का वधस्थल बन कर आप के हृदय को बेधता रहेगा। डायर का अट्टाहास आपका खून खौला देगा। यह भी आपको अवश्य याद आ जाएगा कि डायर को इस बात का जरा भी मलाल नहीं था कि उसने निहत्थे और निर्दोष लोगों को पलक झपकते ही मौत के घाट उतार दिया। बल्कि उसे झुंझलाहट यह थी कि उसका गोली-बारुद कम क्यों पड़ गया? वह इस खूनी खेल को और लंबा खींचना चाहता था। और इस तरह एक भीषण नरसंहार हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में स्थापित हो गया।

तिकोने स्मारक से जब आप भरे मन से आगे बढ़ेंगे तो दायीं ओर शहीदों की याद में निरंतर जल रही ज्योति नजर आएगी।। और जब थोड़ा बायीं ओर जाते हैं तो चित्रदीर्घा है। इसकी सामने वाली दीवार पर एक विशाल पेटिंग है जिसमें इस भयानक नरसंहार का सजीव चित्रण किया गया है। इसी कक्ष में शहीद ऊधम सिंह, महाशय रत्नचंद, डॉक्टर किचलू व डॉक्टर सत्यपाल की तस्वीरें भी हैं। यहां पर रविन्द्रनाथ टैगोर का चित्र उस पत्र के साथ टंगा है जो ‘ सर ’ की उपाधि लौटाते समय ब्रितानिया सरकार को लिखा था। जलियाँ वाला बाग हत्याकांड से टैगोर बहुत आहत हुए थे।

चित्रदीर्घा के निकट वह कुआं है, जिसमें लोगों ने इसलिए छलांग लगा दी थी कि शायद गोलियों से बच जाएं। गोलियों के निशान आज भी उस क्रूर काल की गवाही देते नजर आते हैं। अब इसे “ शहीदी कुंआं ” के नाम से जाना जाता है। लोग श्रद्धावश इसके आगे सिर नवाते हैं। कुछ लोग पैसे भी चढ़ा देते हैं। इसी बाग के परिसर में एक पुरानी समाधि है। इस पर भी गोलियों के निशान साफ नजर आते हैं।

जलियाँ वाला बाग में एक म्युजियम भी है। इसमें ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं, महत्वपूर्ण फोटोग्राफ, आलेख और कुछ अखबारों की कतरनें भी रखी हुई हैं। इनमें उस वक्त के अंग्रेज सरकार के जुल्म दर्शाए गए हैं। यहीं पर शहीद ऊधम सिंह का अस्थिकलश भी रखा हुआ है। ऊधम सिंह के अवशेष ब्रिटेन ने सन् 1974 में भारत को सौंप दिए थे।

शहीद ऊधम सिंह की शहादत जलियां वाला बाग हत्याकाँड से ही जुड़ी है। ऊधम सिंह का जन्म 1899 में हुआ था। अप्रैल 1919 में यह नरसंहार घटित हुआ। जवान ऊधम सिंह ने उसी वक्त प्रण कर लिया था कि इसका बदला वह जरुर लेगा। इसके लिए उसने पंजाब प्रांत के गर्वनर ‘माइकल ऑडवायर’ को जिम्मेवार माना। उसी के आदेश पर आततायी जनरल हैरी डायर ने 90 फौजियों को लेकर मशीनगन से गोलियां चलवाई थीं। ऑडवायर को समाप्त करना ही ऊधम सिंह का मिशन बन गया। इसके लिए उसने अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। लंबा इंतजार किया। 1934 में वह लंदन पहुंचा। पर बदला लेने का अवसर 1940 में मिला। रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी लंदन के काक्सटन हॉल में माइकल ऑडवायर भी वक्ता के रुप में बैठा था। ऊधम सिंह के ने एक मोटी किताब के पन्नों को इस तरह काट लिया था कि एक रिवाल्वर इसमें आसानी से छुपाया जा सके। भीतर जाकर ऊधम सिंह ने पोजीशन संभाली और मौका पाकर ऑडवायर का काम तमाम कर दिया। ऐसा करने के बाद ऊधम सिंह भागा नहीं। उसे गिरफ्तार कर लिया गया और 31 जुलाई,1940 को फाँसी दे दी गई।

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हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक - मल्लाह-134102(हरियाणा)

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