व्यंग्य : गेंद से छेड़छाड़ // डॉ.सुरेन्द्र वर्मा

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फुल-गेंदवा न मारो, न मारो लगत करेजवा पे चोट

साउथ अफ्रीका के खिलाफ केपटाउन मैच में आस्ट्रेलियाई टीम के खिलाड़ियों द्वारा गेंद से छेड़छाड़ का मामला दिन ब दिन तूल पकड़ता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि क्रिकेट के इतिहास में यह गेंद से छेड़छाड़ का कोई पहला मामला है। इससे पहले भी न जाने कितनी बार ऐसी घटनाएं घटती रहीं हैं और कई संज्ञान में भी आ चुकी हैं। लेकिन इस बार गेंद के साथ जिस तरह बाकायदा योजना बनाकर सामूहिक रूप से छेड़छाड़ हुई है, वह आश्चर्यजनक है। कानपुर में कुछ मनचले लडके तो यह मानों मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं। वे मज़ाक-मज़ाक में पूछते हैं, क्या सचमुच कोई गेंद जैसी चीज़ से भी छेड़छाड़ कर सकता है? जिससे छेड़छाड़ हुई है कहीं वह “बौल” नाम की कोई लड़की तो नहीं थी?

नहीं, छेड़छाड़ तो खैर गेंद से ही हुई है और इसकी योजना बनाने वाले आस्ट्रियाई टीम के आरंभिक बल्लेबाज़ डेविड वार्नर थे, यह भी अब स्पष्ट हो चुका है। लेकिन इस पूरी कहानी में एक लड़की की ही महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। यह लड़की और कोई नहीं खुद वार्नर की पत्नी कैण्डीज़ ही थीं। कैण्डीज़ वार्नर गज़ब की खूबसूरत हैं और वे आस्ट्रेलिया में काफी पॉपुलर भी हैं। दर्शक-दीर्घा में उन्हें देखकर अफ्रीकी दर्शक उन्हें घूरने लगे, गाना गाने लगे। उनके किसी पुराने प्रेमी का मुखौटा लगाए टिप्पणियाँ कसने लगे। कैंडीज़ ने बताया कि अपनी पत्नी पर इस प्रकार के निजी हमलों से वार्नर स्वयं को नियंत्रण में नहीं रख पाए और भड़क गए। इसी बीच वे विकेट-कीपर से भी उलझ गए और उन्होंने अफ्रीकी टीम के खिलाफ गेंद से छेड़छाड़ करने का यह अप्रत्याशित कदम उठा लिया। वस्तुत: अपनी पत्नी से दर्शकों द्वारा “छेड़छाड़” का यह वाकया ही गेंद से छेड़छाड़ की योजना का प्रेरक बना। फ़ुटबाल के लिए कहा जाता है की वह सज्जनों का खेल नहीं है, लेकिन क्रिकेक को तो ‘जेंटलमैन’स गेम’ माना है। कहा जा रहा है कि वार्नर ने गेंद से छेड़खानी करा कर क्रिकेट को बदनाम कर दिया, उसे कलंकित कर दिया। पर ऐसा सोचना मुझे ठीक नहीं लगता।

गेंद से तो हम सब हमेशा से ही छेड़छाड़ करते आए हैं। क्या नहीं करते हम गेंद से साथ ? हम गेंद पकड़ते हैं, लपक लेते हैं। उससे खेलते हैं, लुढ़का देते हैं; उसे टप्पा खिलाते हैं। उसे मारते हैं, फेंक देते हैं। यह सब गेंद से छेड़-छाड़ नहीं तो और क्या है ? फिर आखिर इतना, “हंगामा है क्यों बरपा” ! गेंद है तो गेंदबाज़ हैं और गेंदबाज़ ‘गेंदबाजी’ नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे ?

बचपन में हमने न जाने कितने ऐसे खेल खेलें हैं जिनमें गेंद की ज़रूरत ही नहीं होती। आँख-मिचौली, अटकन-बटकन, कोड़ा जमालशाही, गिल्ली डंडा, खो खो, छुक-छुक गाढ़ी, डंडा-डोली, कबड्डी इत्यादि। इन खेलों में गेंद-बाज़ी हो ही नहीं सकती। फिर भी जब हम गेंद की बात करते हैं तो हमें खेलों की ही याद भला क्यों आती है? क्या करें, जितने भी बचे-खुचे खेल हैं गेंद के बिना होते ही नहीं। यह बात अलग है कि हर खेल की गेंद अलग अलग तरह की होती है। फ़ुटबाल की गेंद, क्रिकेट की गेंद, टेनिस की गेंद, बिलियर्ड्स की गेंद, हाकी की गेंद – सबकी अलग अलग गेंदें हैं। कोई समानता नहीं है सिवा इसके की सभी गोल होती हैं। कपडे, रबर, काठ, कार्क आदि, से बना कोई भी गोल पिंड ‘गेंद’ कहलाता है। कहते हैं गेंद और गुड़िया – ये दो चीजें ऐसी हैं जो शुरू से ही बच्चों को खेलने के लिए दी जाती हैं, लड़कों को गेंद और लड़कियों को गुड़िया। भेद-भाव की मानसिकता ने पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा है।

आख़िरी बात। छेड़-छाड़ गेंद से ही नहीं होती। गेंदें भी छेड़छाड़ करने से कहाँ चूकती हैं। हलकी-फुलकी गेंदें तक अक्सर ऐसी छेड़छाड़ कर बैठती हैं कि चोट सीधी दिल पर लग जाए।

फुल-गेंदवा न मारो, न मारो लगत करेजवा पे चोट

- डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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