कहानी : "ढलती साँझ की धुँध" // माधव राठौड़

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"तुम चले जाओगे तो सोचेंगे ,हमने क्या खोया क्या पाया" हॉस्पिटल के वेटिंग रूम में लगे टी.वी पर जगजीत की इस गजल को रिटायर्ड जज नासिर खान सुन रहे थे।

साठ बसंत देख चुके खान के स्मृति पटल पर जीवन के वो दिन हल्के से उभर आये और स्कूल, कॉलेज,नौकरी और सेवानिवृति का घटनाक्रम चलने ही लगा था कि नर्स की आवाज आई - 'मि. खान!'

अपनी कमजोर होती हुई आँखों को दिखाने शहर के इस फेमस आई हॉस्पिटल आये थे। जैसे ही डॉ के रूम का गेट खोल अंदर दाखिल हुए तो सामने बैठी लेडी डॉ को देख ठहर से गये,न चलते बना न सोचते। नर्स ने फिर से आवाज दी 'बैठ जाइये सर प्लीज' लेडी डॉ अंजली ने नर्स को बाहर जाने को कहा। "आप!" अचानक खान के मुंह से निकल पड़ा।

"मैंने पिछले माह यहाँ ज्वाइन किया है बाई-द -वे आपको क्या प्रॉब्लम रहती है?"

मि. खान भूल गये कि वो यहाँ अपनी आँखे चेक करवाने आये हैं।अपने को सहज करते हुए बोले"पढ़ने में थोड़ी दिक्कत रहती है दर्द भी रहता है।"

डॉ ने मशीन से चेक कर रिपोर्ट को एनालिसिस करदवाई लिखी और चश्मे के नंबर चेंज करने का बोल दिया।

"येस,नर्स नेक्स्ट " खान को स्लिप थमाते हुए कहा। नर्स ने अगले पेशेंट को आवाज लगाई और खान को बाहर जाने का निवेदन किया। हाथ में पर्ची लिए अनमने से बाहर चल दिए। साथ में आया भतीजा बोला " लाइए पर्ची दो, मैं दवाई लाता हूँ आप तब तक यहाँ बैठिये।

"हम जिसे गुनगुना न सके वक्त ने ऐसा गीत क्यों गाया" खान साहब के दिमाग गज़ल की अंतिम लाइनें बार बार गूंज रही थी। भावशून्य से बैठे खान के दिमाग में कभी हजारों सवाल और विचार कौंध रहे थे तो कभी आज का घटनाक्रम। विचारों को लयबद्धता नहीं मिल रही थी। विचारों के जाल को तोड़ने के लिए दिमाग को झटक कर गाड़ी की ओर चल दिए। घर आकर दोपहर की झपकी लेने का प्रयास किया ,मगर दिमाग अभी भी विचारों की अंधी दौड़ में अपने घोड़े दौड़ा रहा था।

उसे आज भी याद है जब वो जयपुर से जैसलमेर जा रहे थे तो बस में आगे वाली सीट पर वो बैठी थी। पुष्कर में सीट खाली हुई तो युवा नासिर उसके पास बैठ गया।बात शुरू करने के लिए खान ने पूछा" कहाँ जायेंगे आप? "जैसलमेर" जितनी दिखने में सुंदर थी उतनी ही सुंदर थी उसकी आवाज।

खान का दिल आश्वस्त हुआ चलो सफ़र तो इस मोहतरमा के साथ खूबसूरती से कटेगा। "और आप" उसने भी पूछा

"मैं भी जैसलमेर"। खान ने बहुत जल्दी से जवाब दिया कि कहीं देर नहीं हो जाये।

ओह! तो आप प्रॉपर जैसलमेर के हो?

"जी, मैं जैसलमेर से ही हूँ और जयपुर में पढाई करता हूँ और आप?

"मैं भिलाई से हूँ,पापा जैसलमेर में एयर बेस मेंट्रान्सफर होकर आये है इसलिए यहाँ पढ़ती हूँ।"

"आपने जैसलमेर देखा?"

"नहीं, कौन दिखाये, अभी तो कोई दोस्त भी नहीं है।" खान के दिल में अरमान की उम्मीद नजर आई। काफ़ी देर तक बातें होती रही, नागौर के बाद दोनों सो गये। जैसलमेर पहुंचने पर फिर मिलने के वादे के साथ अलविदा हुए।

इस तरह शुरू हुई दो युवा मन की प्रेम कहानी...

उस रेगिस्तान में जहाँ बूंद बूंद पानी के लिए कई किलोमीटर चलना पड़ता है उस रेगिस्तानी शहर की झील में लंगर डाले खड़े सोने के जहाज की छाया को अगर देखना हो तो एक प्रेमी की नजर से देखना और यूरोप के शहरों की छोटी गलियों की याद दिलाती सँकरी गलियाँ और खुबसुरत चौराहों को देख युवा प्रेम का रंग और गहराता जा रहा था।जब प्यार थोड़ा और बढ़ा तो दोनों प्रेमियों ने शहर के पास प्रेमियों के यादगार स्थल "मूमल की मेड़ी" को देखने गये,जहाँ का पत्थर-पत्थर लोद्र्वा की राजकुमारी मूमल और महेन्द्रा की अमर प्रेम कहानी सुना रहा था।लोकल गाइड से कहानी सुनते घड़ीभर के लिए दोनों मूमल-महेंद्रा बन गये।छोटे शहर में प्रेमियों का मिलना कठिन था,मगर प्रेमियों को भला कोई कभी रोक पाया है।

अचानक डॉ की स्लिप पर लिखे नंबरों पर नजरपड़ी। फतेहसागर की पाल से शाम की वॉकिंग खत्म कर जल्दी घर पहुंचे और मोबाइल से नंबर कई बार डायल किये और काट दिए।

हिम्मत नहीं हो रही थी बात करने की। मस्तिष्क में बार बार शब्द गूंज रहे थे “नेक्स्ट प्लीज”।आखिरकार बात करने का निर्णय दिमाग ने दिल को दे दिया। उधर से आवाज आई 'हेल्लो! हू इज दिस?'

'मैं खान, नासिर खान बोल रहा हूँ।' कुछ क्षण के लिए निस्तब्धता छाई रही दोनों और

"कैसी हो?" खान ने अपना गला खरासते हुए कहा।

"उम्र के इस पड़ाव पर ये सवाल निरर्थक सा है,जिन्दगी चल रही है,ठीक हूँ " उधर से जवाब आया।

"परिवार,बाल बच्चे कैसे हैं?" खान ने बात को आगे बढ़ाने के लिए पूछा। "जिसके साथ परिवार बसाने की सोची थी, उसने मना कर दिया और जिसने बसाया था उसने बीच में ही छोड़ दिया। आज लगता है वक्त ने इस अध्याय को यूँ ही अधूरा लिख छोड़ दिया।" उसकी आवाज में तल्ख भारीपन और उलाहना सा था।

खान को वो दिन याद आ गया जब जैसलमेर में गड़ीसर के किनारे किसी ने कहा था "मैं आखिर बार पूछ रही हूँ विल यू मेरी मी ?"

उस समय एक ही जवाब था " ये हो नहीं सकता,तुम हिन्दू और मैं मुस्लिम,लोग हमें जीने नहीं देंगे,प्यार की बात तो ठीक मगर शादी?"

"बोलते क्यों नहीं,चुप क्यों हो? आपका परिवार,बच्चे और तुम कैसे हो? उधर से आवाज आई। खान की आँखों में बरसों का दर्द छलक पड़ा, सालों बाद किसी ने पूछा "तुम कैसे हो?

" तुम्हारा उस दिन गड़ीसर से उठके चले जाना फिर रात को तुम्हारा गोलियाँ खाकर कहना मैं मर जाऊँगी। मैंने उसे हल्के में लिया मगर सुबह तुम हॉस्पिटल के बेड पर थी ,एक बार भी नजरें उठा के नहीं देखा। कुछ समय बाद तुम्हारें पापा का एयरफोर्स स्टेशन से ट्रान्सफर हो गया, तुम चली गयी मेरा शहर छोड़ कर। तुमने नंबर भी बदल दिए मगर मैंने तुम्हारे फोन का कई सालों तक इंतजार किया, मगर अफ़सोस...

"खैर छोडो! पुराने घावों को मत कुरेदो, ये बताओ कि तुमने शादी की या नहीं?" डॉ अंजली ने सीधा सवाल पूछा। खान ने अपने आँसुओ और यादों पर जमी जर्द को पोंछते हुए बताना शुरू किया " अम्मी ने शादी के लिए खूब दबाव दिया उसके बाद आर.जे.एस. में सलेक्शन होने पर कई प्रस्ताव आये मगर मेरी इच्छा कभी नहीं रही हर बार टालता रहा। जज बनने के बाद एक लडकी जीवन में आई थी मगर अफ़सोस कि वो शादीशुदा थी, काफी दिन तक प्यार चलता रहा बाद में 'लोग क्या कहेंगे' की दुहाई दे दूरियाँ बना ली और जीवन में फिर अकेला पड़ गया और तुम्हारी ?

" माँ की इच्छा से शादी की लेकिन विश्वास और समर्पण के अभाव में रिश्तों में दरार आ गई, मेरा जीवन के प्रति उदासीन रवैया देख उसने तलाक ले लिया, एक बच्ची है जो लन्दन में अपने पति के साथ रहती है,कभी कभी मिलने आ जाती है।

इस तरह अक्सर दोनों में बातें होने लगी। दोनों को अच्छा लग रहा था एक दूसरे के अतीत और वर्तमान को जान कर,सबसे बड़ी ख़ुशी थी लम्बे अन्तराल के बाद फिर अचानक इस मोड़ पर यूँ मिल कर। एक बार बात करते हुए कहा " सुनो ! तुम पर आज भी लाल कलर फबता है?"

"मगर मैंने तो इन दिनों लाल रंग की साड़ी कभी नहीं पहनी" डॉ ने आश्चर्य जताते हुए कहा।

"पर हमने तो देखा था।" नासिर का बूढ़ा मन युवा शरारत करने लगा।

" हे भगवान ! इस बुढ़ापे में भी तुम्हारी नजरें कहाँ कहाँ जाती है।" डॉ अंजली को अपने ब्रा के स्ट्रेप्स का कलर याद आ गया।

"क्या मैं तुमसे मिल सकता हूँ ?" खान ने एक दिन धड़कते हुए दिल से पूछा। "जब मिलने के दिन थे तब तुमने मना कर दिया था,आज मरने के दिन आये है और तुम मिलने की बातें कर रहे हो।"उसकी बातों में हर बार टीस झलकती |

"डॉ यह मत भूलो कि इन्सान को जवानी से ज्यादा बुढ़ापे में अपनों की जरूरत महसूस होती है। आज मेरे पास सब कुछ है पद, पैसा ,प्रतिष्ठा मगर ये सब मेरे जीवन में प्रेम की गहरी शून्यता को भर नही सकते।"

"मैं सब समझती हूँ मगर इस पड़ाव पर ये नजदीकियाँ किसी भी मायने में ठीक नहीं है।"

"भाड़ में जाये ये नैतिकता और मायने, मुझे मिलना है" खान की आवाज में कम्पन था ।

"नहीं खान, हम पब्लिकली मिल नहीं सकते है"

"मैं 7 जुलाई रविवार की शाम को फतेह सागर के सामने राज रेस्टोरेंट में इंतजार करूँगा अगर तुम नहीं आई तो फिर कभी फोन नहीं करूंगा।

"सुनो तो सही" वो कुछ उतावली सी होकर बोली। मगर खान ने फोन काट दिया। वो जानती थी नासिर जिद्दी इन्सान है और वो ये भी जानती थी उसके वापसी से उसके जीवन की कोपलें फिर से खिलने लगी थी और अकेलेपन से भरे नीरस जीवन में सरसता दिखाई दे रही थी।

7 तारीख को उसने नासिर की पसंदीदा लाल रंग की साड़ी पहन तैयार हुई। जैसे ही गेट खोल बाहर निकली तो... 'हैप्पी बर्थ डे ममा' कहते हुए बेटी गले लग गई। "आज इतनी सजी सँवरी किधर?" बेटी ने पूछा

"कहीं नहीं,बस यूँ ही, अरे तू आ रही थी न इसलिए" बिखरे हुए झूठ और साड़ी को ठीक करते हुए अंदर घुस गई। उधर दो चार घंटे इंतजार के बाद नासिर खान ढलती साँझ की धुंध में अपने चश्मे को साफ करते हुए घर की ओर चल दिए।

गाड़ी में एफ.एम.पर बज रहा था "तुमसे आया नहीं गया, हमसे बुलाया नहीं गया।"

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नाम - माधव राठौड़

पता- c 73 हाई कोर्ट कॉलोनी

सेनापति भवन रातानाडा जोधपुर

जन्म तिथि- 7-11-1985

मोबाईल/फोन नं. - 9602222444

संप्रति- विधि अधिकारी

ई मेल- msr.skss@gmail.com

सृजन- विधा- कहानी, कविता,आलेख, समीक्षा,डायरी,रिपोर्ताज़

प्रमुख प्रकाशन-प्रसारण –

समाचार पत्र - दैनिक भास्कर, राज.पत्रिका, राज खोज खबर,दैनिक लोकमत

पत्रिका मधुमती,कथादेश, साहित्य अमृत, द कोर, इंदु संचेतना,अक्षर पर्व,साहित्य अमृत

वेब पोर्टल –जानकीपुल,बिजूका ,हस्ताक्षर,डेजर्टटाइम्स, प्रतिलिपि स्टोरी मिरर और आकाशवाणी में नियमित लेख व कहानीप्रकाशित व प्रसारित

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1 टिप्पणी "कहानी : "ढलती साँझ की धुँध" // माधव राठौड़"

  1. बहुत ही बेहतरीन लेख ..... सादर धन्यवाद व आभार। :) :)

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