लघुकथा // "लक बाय चान्स" // मंजुल भटनागर

ये उन दिनों की बात है जब में छोटी थी और लड़की होना एक अभिशाप था .आज स्कूल में मेरी विज्ञान की कक्षा में एक नया पाठ पढ़ाया गया  ,मुनिया दिग्भ्रमित सी केन्टीन में बैठी टिफिन खा रही थी .दो बहनों के ६ साल बाद पैदा हुई थी न मुनिया . पर जब भी घर पहुंचती थी एक ही बात नासूर की तरह चुभती थी क्यों नहीं तू बेटा हो कर पैदा हुई दादी कहती.

पर दादी मैं तो बेटी ही बनना चाहती थी . दादी को कितना भी प्यार करो दादी खुश क्यों नहीं होती . उधर माँ भी यह सब सुन सुन शून्य में न जाने क्या देखती रहती है .घर के लिए बेटा शायद बेटा चाहिए ? मालूम नहीं मुनिया सोचती पिता घर आते और उसकी शक्ल देख कर उनका मूड ही खराब हो जाता . वो भी पिता को अपने स्कूल के बारे में बताना चाहती पर पिता के पास उसके लिए समय नहीं था.

कभी परदे के पीछे से देखती न जाने पिता किस दुःख से त्रस्त हैं  ,जान पाती तो कुछ उपाय खोज लेती सोचा करती थी मुनिया .

अक्सर पड़ोसियों को कहते सुना तीन तीन मकान जितना बोझ है आपके ऊपर अग्रवाल जी. पापा कहते कुछ नहीं ,अपने कमरे में आ कर लेट जाते .

यह शर्मा जी क्यों आते हैं कौन से तीन मकान हैं  ?क्या हम मकान हैं ,मैं और मेरी दो बहनें असमंजस में थी मुनिया .

जैसे जैसे वो बड़ी हुई यह सब बातें ज्यादा समझने लगी .पर घर में किसी को क्या .कोई नहीं पूछता उससे कि उसके स्कूल में क्या हुआ, उसे गणित में कितने नंबर मिले .

वो घर आती बस्ता रखती घर के कपड़े पहन कर खाना खाती और पड़ोस की सहेली लता के घर खेलने चली जाती .

लता की माँ तो लता को कितना प्यार देती है और उसे भी प्यार से बिस्कुट देती है, पर मेरे घर में ऐसा क्यों नहीं .शायद उसके घर में एक भाई भी है न इसलिए। मुनिया सोचती   .

पर आज कुछ अलग था , आज जब मुनिया घर लौटी तो जोश से भरी थी खाने की मेज पर बैठते हुए बोली -मुझे आज कक्षा में बताया गया कि मैं कैसे पैदा हुई हूँ .

अब माँ दादी के चेहरे पर तो हवाइयां उड़ने लगी इससे पहले कि पापा कुछ बोले मुनिया बोलती गयी माँ इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं ये तो बस लक बायीं चाँस है.

और टीचर मैडम कहती है वो दरअसल क्या होता है माँ ,  बेटा और बेटी XX और XY क्रोमोसोम का कमाल है .यह प्रकृति ने ऐसे ही रचा है .

सिंपल न माँ .कहते हुए मुनिया हँसने लगी .

दादी बुदबुदाई यह आजकल के स्कूलों में क्या सिखा रहें हैं हमारे ज़माने में तो ------तभी तो मुनिया ऊँची आवाज़ में बोली .यदि तुम्हें यह सब पता होता तो बेटे का राग न अलापती सारा दिन .

पिता का तनाव और माँ की शुष्कता पिघलने लगी थी . मुनिया आज थोड़ी अच्छी लगने लगी थी उन्हें .

0 टिप्पणी "लघुकथा // "लक बाय चान्स" // मंजुल भटनागर"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.