'कारण कार्य व प्रभाव गीत'------ कितने इन्द्रधनुष // डॉ. श्याम गुप्त

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           मेरे द्वारा सृजित, गीत की  एक नवीन -रचना-विधा -कृति में ..जिसे मैं ....'कारण कार्य व प्रभाव गीत' कहता हूँ ....इसमें कथ्य -विशेष का विभिन्न भावों से... कारण उस पर कार्य व उसका प्रभाव वर्णित किया जाता है …. इस छः पंक्तियों के प्रत्येक पद या बंद के गीत में प्रथम दो पंक्तियों में मूल विषय-भाव के कार्य या कारण को दिया जाता है तत्पश्चात अन्य चार पंक्तियों में उसके प्रभाव का वर्णन किया जाता है | अंतिम पंक्ति प्रत्येक बंद में वही रहती है गीत की टेक की भांति | गीत के पदों या बन्दों की संख्या का कोई बंधन नहीं होता | प्रायः गीत के उसी मूल-भाव-कथ्य को विभिन्न बन्दों में पृथक-पृथक रस-निष्पत्ति द्वारा वर्णित किया जा सकता है | .....प्रस्तुत है ...एक रचना..... कितने इन्द्रधनुष

 
पत्थर पर सिर पटक पटक कर,
धुंध धुंध जल हो जाता है |

        जब रवि-रश्मि विविध रंगों के,
         ताने बाने बुन देती हैं |
         किसी जलपरी के आँचल सा,
         इन्द्रधनुष शोभा बिखराता ||

पंख लगा उड़ता घन जल बन,
आसमान पर छाजाता है |

      स्वर्ण परी सी रवि की किरणें,
       देह दीप्ति जब बिखराती हैं |
       सप्तवर्ण घूंघट से छनकर,
       इन्द्रधनुष नभ पर छा जाता ||

दीपशिखा सम्मुख प्रेयसि का,
कर्णफूल शोभा पाता है |

      दीप रश्मियाँ झिलमिल झिलमिल,
       कर्णफूल संग नर्तन करतीं |
       विविध रंग के रत्नहार सा,
       इन्द्रधनुष आनन् महकाता ||

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कानों में आकर के प्रियतम,
वह सुमधुर स्वर कह जाता है |
      प्रेम प्रीति औ बिरह अनल सी,
      तन मन में दीपित होजाती |
      नयनों में सुन्दर सपनों का,
      इन्द्रधनुष आकर बस जाता ||

मादक नयनों का आकर्षण,
तन मन बेवश कर जाता है|

      कितने रूप रंग के पंछी,
       मन बगिया में कुंजन करते |
       हर्षित ह्रदय पटल पर, अनुपम,
       मादक इन्द्रधनुष सज जाता ||

भक्ति-प्रीति का नाद अनाहत,
हृद-तंत्री में सज जाता है |

     सकल ज्योति की ज्योतिदीप्ति, वह,
      परमतत्व मन ज्योति जलाता |
      आत्मतत्व में परम सुरभि का,
      इन्द्रधनुष झंकृत होजाता ||

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