कहानी // आखिरी मुराद // रामानुज श्रीवास्तव

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आज हॉस्पिटल में एक परिचित को देखने के लिए आया था, उससे मिलकर वार्ड से बाहर आया ही था कि एक अपरिचित ने रास्ता रोककर कहा...

साब जी !! "बइया बहुत बीमार है उतै भरती हबै, आपसे मिलबे खातिर मोही भेजो है।" मैंने सोचा होगा कोई परिचित चलो देख ले ,मैं उसके पीछे पीछे वार्ड में दाखिल हो गया, वार्ड के कोने वाले बेड में एक महिला जिसके शरीर में केवल हड्डियां बची थी तकिया के सहारे पलंग में बैठी थी। वो आदमी मेरे बैठने को स्टूल रख दिया।

"बैठ लो बाबू सा.मैं कचनार हूँ... ...जे झुन्नू है छोटा वाला भाई "

"कच ना र ????

"हाँ बबुआ...तुहरी कचनार"

"लेकिन ये...का हुआ ??

साब !! "आपके तबादले के बाद बइया बहुत उदास रही...फिर धीरे धीरे सब ठीक भयो, इसने शादी नाहीँ करी, मेरे साथ रहित है, गांव केर सरपंच रही, गांव का बहुत काम कराई पै आपन शरीर केर धियान नहीं किहिस, आज छः महीना से बीमार चल रही, चार दिन से इतै भरती हओ...डाक्टर अब कहत हैं... ई अब ठीक नाहीँ होई।"...झुन्नू एक साँस में सब बोल गया।

विआह नहीं किया...पर ये मांग में सिंदूर ?? आश्चर्य से मैं बोला।

हाँ !! बाबू सा...."इआ सेंदुर तोहरे नाम का मोरे मांग मा भरा है...कोऊ नहीं जानय इआ बात का...... आपन आतिमा हम माई के सामने तुमही सौंप चुकेन रहा...इआ देह का भरोसा का करी ...इआ माटी से बनी है...माटिन मा मिल जैहै। माई बड़ी ताकत वाली है...पक्का भरोसा रहा क़ि अंतिम बेरा तुमही दिखिन के बाद मोर साँस छूटी।"

नहीं नहीं !! ऐसा अशुभ मत बोलो...अनायास ही मेरे हाथ उसके सूखे गाल में बह आये आँसुओं को पोंछने के लिए बढ़ गये थे..साथ ही यादों की सभी वो परते बन्द किताब के पन्नों की तरह खुलने लगी थी...जो तीस सालों से मेरे सीने में दफन थी।

***** यह बात उन दिनों की है जब मैं पच्चीस साल का था, दौड़ सकता था और दौड़ा भी सकता था। यह मेरी नौकरी की पहली पोस्टिंग थी, ये इलाका भी कुछ नये मिज़ाज़ का था चारों तरफ जंगलो से घिरा हुआ आदिवासी बाहुल्य गाँव... वहाँ के निवासी भी अलग तरह के, काला मुँह और सफेद दांत...रात में दाँतों की चमक से ही पता लगता था कोई मानव प्राणी है, लेकिन स्वभाव से बहुत सीधे साधे, अपने काम से काम रखने वाले....." न ऊधो का लेना न माधो का देना"....अपने आप में मस्त...चाँदनी रात और घर के आंगन में जब वे कमर में अंगोछी कसकर महुआ की कच्ची दारू पीकर मादल और गुदुम की धुन में दुनिया से बेखबर घर की औरतों के साथ........" रैन छिटकी जोधइया हँसय तरई.........चला संगी नाची जगाय चिरई।"...... के बोल पर पैर में छम्म छम्म घुंघर बांधकर अलमस्त नाचते थे, तो इनका अंग प्रत्यंग नाचता था इनके साथ चाँद सितारे धरती आकाश भी नृत्य करते प्रतीत होते थे।

"कचनार" को कर्मा और राई नृत्य पर महारत हासिल थी...वह बीस बाइस साल की मजबूत कद काठी की युवती थी उसके अंग अंग से यौवन छलकता था...यकीनन वह कचनार कली थी, जब वह अपने जोड़ीदार धूमन के साथ सुध बुध खोकर नाचती थी...अंग अंग से बिजली सी फूटती थी............राई नाच में जब वह चढ़ाव भरकर फिरिहरी भरती तब उसकी बलखाती कमर पर हर किसी की आँख ठहर जाती थी। उसकी नाच देखने को पूरा गांव जमा होता था मैं भी चोरी छिपे उसकी नाच कई दफा देख आया था। वैसे वह शादी ब्याह के समय में या उत्सव के दिनों में ही नाचती थी।

मुझे मालूम नहीं क्यूँ मुझे कचनार अच्छी लगने लगी थी, उस समय कोई अगर संसार की सबसे सुन्दर स्त्री का नाम पूछता तो मेरे मुँह से कचनार ही निकलता। उस समय मुझे चाय पीने की लत नहीँ थी....लेकिन कचनार की चाह ने मुझे चाय का आदी बना दिया। सड़क के मोड़ पर सुबह की बस जहाँ सवारी के लिए ठहरती थी, वह बस अड्डा कहा जाता था वहीं पर मात्र एक टपरेनुमा मकान में चाय बनती थी। मैं एक कप चाय पीने में आधा घण्टा लगाता और बीच में उसकी घर की ओर भी देख लेता। वह भी दो चार बार घर से बाहर आकर मेरी और नजरें फेंक देती...नजर से नजर का मिलाप हो जाता ....यह मेरी सुबह की दिनचर्या में अनिवार्य सा हो गया था। एक दिन कचनार बाहर नहीं निकली, मेरी चाय भी खत्म हो गई, दुकानदार ने पूछा....

"दूसरी दूँ साब।"

"नहीं नहीं' !! ....मैं हड़बड़ाकर बोला था, जैसे चोरी पकड़ ली गई हो।

" एक बात बोलूं साब !!

" बोलो..."

वह मेरे कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाकर कहने लगा....." ई ठीक नाहीँ साब !! अपुन जानत हबै आप फिसल रहो है, ऊ ठहरी गोंड़ आदिवासी ऊ का कछू बिगड़ने को नाहीँ।

नाहक आपकी बदनामी होबे, आप साहब लोग हैं, बड़े घरन केर लड़िका आहो।"

नहीँ नहीं सुन्दर !! ऐसी बात नहीं...तुम भी का सोच रहे हो। हाँ कचनार मुझे अच्छी लगती है, अच्छी लगने का मतलब कुछ और तो नहीं, तुम लोग भी उल्टा सीधा अर्थ निकाल लेते हो।"

"माल तो एक नम्मर का साब !!"... सुन्दर दांत निकालते हुये बोला था।

मेरा हाथ उठ गया था...लेकिन अगले पल खुद को संयत कर हाथ वापस खींच लिया था और सुन्दर को ताकीद किया था कि दोबारा इस तरह की बात कचनार के लिए नहीं बोलेगा। समय कितना तेजी से निकल गया...जरा सा आभास नहीं हुआ। दिन बीतते बीतते डेढ़ साल गुजर गये, बिल्कुल मालूम नहीँ पड़ा, कचनार ने अब नाचना कम कर दिया था, बाहर तो यदा कदा ही निकलती थी। एक दिन शाम को मैं स्कूल की तरफ से घूमकर लौट रहा था कि वह रास्ते में मिल गई, मुझे देखकर थोड़ी ठिठकी फिर आगे बढ़ गई। मुझसे रहा नहीं गया मैं बोल उठा......

" कचनार रुको !! तुमसे बात करनी है।

"का फायदा बाबू सा, अब तो देखन को जी तरसे है, आप भी होटल अब नहीं आऊत, तुमने हमही लैके सुन्दर पे हाथ उठाया, ठीक नाहीँ किया"...वह बिना रुके चलते हुए बोली थी।

तुम्हें सब कइसे पता ??

सुन्दर ने दउआ (पिता) से बताउत.....दउआ खीब गुस्सा हुआ, मुझे पहले मारा फिर समझाइस "देख कच्चू !! अपुन गोड़ आदिवासी हयेन अउर ऊ ठहरे बड़के मन्नुख..... हमार उनखर कछू मेल नाहीँ बेटबा.......ऊ तोही नहीं चाहय......तोर देह चाहत है... कबौ तोही घरवाली का दर्जा न देई.... बात का समझ।"

"तुम का सोचती हो ??" ...मैं भीतर तक आहत होकर बोला।

"हम का शोचबे...अपुन का सोचन केर हक नहीँ आय बाबू सा"

मुझसे कुछ बोला नहीं गया ....मैं उसके पीछे पीछे चुपचाप बराबर का फासला बनाये रास्ता चल रहा था, शाम का धुंधलका बढ़ गया था, गाँव के घर और दरख़्त धीरे धीरे अँधेरे में विलीन होने लगे थे, इधर दोनों दिलों में विचारों का सैलाब आया था, लेकिन नदी के किनारों की तरह एक दूसरे से अलग थलग थे....भीतर तूफान और बाहर सन्नाटा.....अचानक कचनार पलटी और मुझसे कसकर लिपट गई...उसके आँखों से हो रही आँसुओ की बरसात से मेरे कपड़े गीले होने लगे थे, इस अप्रत्याशित घटना से मैं घबरा गया...मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे...केवल ओंठ काँप रहे थे।

कचनार मुझसे अलग हो गई थी.....रास्ता चलते हुए मुझसे बोली...."बबुआ !! कबौ कबौ मोही दिख जइहौ....इहै बहुत होई...."

उस दिन के बाद मेरे कार्य व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ गया...मैं अंतर्मुखी होने लगा, काम में बहुत गल्तियां करने लगा...हमारे बॉस बहुत अच्छे थे, वे हमें डाँटते थे फिर समझाते भी थे... "देखो प्रकाश तुम मेरे छोटे भाई की तरह हो, तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है.. मैं समझ सकता हूँ। लेकिन ऐसे रहने से कोई फायदा नहीं....मुझसे सच सच बताओ मैं तुम्हारे साथ हूँ... कुछ भी गलत नहीं होने दूँगा.... बोलो !!"

"दादा !! ये सही है कचनार मुझे बहुत अच्छी लगती है...उसे नाचते हुए जब पहली बार देखा था तभी से .....लेकिन मुझे इस बात का कभी इल्म नहीं हुआ कि वह भी हमें चाहती है। बस इतनी सी बात को लेकर गाँव में कितनी तरह की बात फैली है वह आप जानते है।" हिम्मत बटोर कर मैंने उस दिन शाम को जो कुछ हुआ था, वो भी उनको बता दिया।

"क्या चाहते हो ??" ....उन्होंने सीधा सवाल किया।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा दादा क्या करूँ क्या न करूं....मुझे रास्ता दिखाइये प्लीज !!

घबराओ नहीं कल पंचायत बैठेगी...जो दिल में हो ख़ुल कर बोलना....कचनार भी अपनी बात कहेगी.....फिर पंचायत अपना फैसला देगी। मैं भी रहूँगा....गाँव के और कई समझदार लोग होंगे स्कूल के प्रिंसिपल साहब भी होंगे...सब बुद्धिजीवी है....कुछ भी गलत नहीं हो सकता। अगले दिन गाँव से थोड़ा हटकर चार इमली के पेड़ों की छाया में पंचायत बैठी। यह कचनार के पिता की शिकायत पर बैठी थी...जिसमे मैं उसकी बेटी को बरगलाने और प्रेम पाश में फंसाने का आरोपी था। इसके पहले भी कई बार पंचायत बैठ चुकी है, इस गांव की ये अच्छी परंपरा और सोच रही है, कि गाँव के छोटे मोटे फसादों को पंचायत के माध्यम से निपटाया जाये, लोगों को कोर्ट कचहरी के चक्कर से बचाया जाये। पंचायत की करवाई देखने हर उम्र के लोग आ जुटे थे। ग्राम प्रधान राजुल सिंह, हाई स्कूल के प्रिंसिपल भटनागर साहब, मेरे बॉस वर्मा जी पूर्व सांसद जुगराज देव और ग्राम पुरोहित पंडित दीनानाथ को सुनने और निर्णय देने को पंचायत की तरफ से अधिकृत किया गया था।

पंचायत ने पहला सवाल मुझसे किया...."प्रकाश जी आप पर कचनार के पिता ने आरोप लगाया है कि आप उसकी बेटी को बहला फुसलाकर प्रेम जाल में फंसा लिए है, आपकी नीयत साफ नहीं है।

इस सम्बन्ध में अपना पक्ष रखें।"...... मैंने ज्यों का त्यों वो सब यहाँ भी बता दिया जो पूर्व में वर्मा जी से बता चुका था। मेरी बात नोट कर ली गई। फिर पंचायत ने कचनार को बोलने के लिए कहा....

कचनार बोलने को खड़ी हुई...सब लोग देखकर दंग हो गये.... सबने सोचा था कि ये आदिवासी लड़की इतने लोगो के सामने नहीं बोल पायेगी...लेकिन आज वह बड़ा संकल्प लेकर आई थी उसका चेहरा आत्मविश्वास से भरा हुआ था, मुझे आज वह बहुत सुंदर लग रही थी। कचनार ने सर्वप्रथम सभी को हाथ जोड़कर प्रणाम किया फिर धीमी आवाज में बोलना शुरू किया....

"बड़ा मुश्किल लागत है..आप बड़ेन केर बीच मा बोलय मा.. पै का करी न बोलय त एक निर्दोष का दोषी माना जई... बाबू सा जौं कुछ बोले निकबर सही आय..हम उनखे हिम्मत पे दाद देबय कि बिना कुच्छ छिपाये सच बताइन...अब हमार बात... हम बाबू सा का बहुत चाहित थे, परेम करित थे...सच्चे दिल से किरिया उठाय के कहित थे, हम दोनों जने एक दुसरे से परेम करित थे।"

"तो तुम दोनों शादी कर लो, दोनों बालिग हो, अपना निर्णय लो और पंचायत को बताओ" पंडित दीनानाथ ने कचनार को बीच में रोककर कहा।

"पंडित जी हम विआह उहै दिन कई चुके... जब हम एक दूसरे का छुअन....पै हमार बियाह मीरा औ कन्हइया .....राधा अउर मोहन के बीच जइसन भा..उहै तरह है। बाबू सा बहुत बड़े दिल के आदमी है इआ बियाह का कृष्ण भगमान के नै मन्जूर करिहै। आप पंचन के आगे हम सब कहि दिहिन.... अब जौं हुकम होई हम मनबे का तैय्यार हैं।"

"दस मिनट की मन्त्रणा के बात पंचायत ने अपना निर्णय दिया...." प्रकाश जी और कचनार के बीच का प्यार पवित्र है...इनके मन में कोई खोट नहीं पाई गई...प्यार करना मानव स्वभाव है,...प्यार करना कोई जुर्म भी नहीं है और जुर्म करार देना तब तक उचित नहीं है जब तक समाज के लिए नुकसानदायक न हो। दोनों ने जिस निडरता से पंचायत को सच सच बताया है....इस बात का संकेत देता है दोनों के बीच सच्चा प्यार है ....लिहाज़ा पंचों के मन्तव्य जानने के बाद पंचायत प्रकाश जी को दोषमुक्त करती है। कचनार के पिता द्वारा लगाया गया आरोप झूठा साबित होता है, इसलिये वह पंचायत से माफ़ी मांगे। पंचायत बर्खास्त की जाती है।"

इन सबके बावजूद भी मेरे भीतर की छटपटाहट कम नहीं हुई, पंचायत भले ही निर्दोष करार दी हो लेकिन मैं अब भी स्वयं को दोष मुक्त नहीँ कर पाया था, इसी बीच मेरा ट्रांसफर भी कर दिया गया.....कार्यालय समय बाद मुझे रिलीव्ह भी कर दिया गया ...सुबह की बस से मुझे जाना था पूरा गांव आया था मुझे बिदा करने.... सबकी आँखों में आंसू थे..ऐसी मुहब्बत मैंने कभी महसूस नहीं की थी....एक कोने में मूर्तिवत खड़ी कचनार शून्य में न जाने क्या ताक रही थी।

मुझसे रहा नहीं गया मैं उसके पास जाकर बोला.....

"तुम मुझे बिदा नहीं करोगी?"

"कइसे बाबू सा...आप तो मेरे हिरदय में हो......माई चाहेगी तो कभी न कभी फिर मिलेगे इस जनम न सही तो उस जनम जरूर मिलना होगा। एक विनती बाबू सा. वह हाथ जोड़कर बोली थी...."तुम शादी करना...माँ बाप की ख़ुशी से और हो सके तो मुझे भूल जइओ।"

इतना कहकर वह घर की तरफ दौड़ गई थी। उस समय मेरे भीतर में उठी पीड़ा को बता पाना सम्भव नहीं है...।

[बस चल पड़ी थी, मुझे कुछ भी दिख नहीं रहा था न सुनाई दे रहा था बस में ठसाठस सवारी थी उन सबसे बीच मैं अकेला अपनी स्थूल काया को बस की सीट से जकड़े चला जा रहा था अपनी आत्मा को कचनार को सौंपकर....समय ने करवट बदला, माँ बाप की इच्छा से शादी हो गई,... बच्चे हो गये, कायर तो था नहीँ की जिंदगी से पलायन करूँ सो चलता रहा कर्तव्य पथ पर... अपनी यादो को कंधों में उठाये हुये....लेकिन इन तीस सालों में कचनार मेरे साथ रही हर समय....परछाई की तरह।

"बोलते काहे नहीं बाबू सा !!" कचनार के इस आवाज ने मुझे वर्तमान में ला दिया। मुझे मालूम नहीँ कब मैं स्टूल से पलंग पर बैठ गया था कचनार का सर मेरी गोद में......शेष शरीर पलंग में मैली चादर ओढ़कर पसरा हुआ....उसके सूखे गालों में बह आये आँसुओं को पोंछते मेरी दोनों हथेलियाँ.... ओह !! ये कब कैसे?? कुछ पता नहीं...पर आज मुझे दुनिया की परवाह नहीं थी। "अब तुम ठीक हो जाओगी।"

"नहीं बाबू सा....अब अउर नहीँ....माई ने मेरी अंतिम मुराद पूरी कर दई।"

वह हँसने की असफल कोशिश करती हुई बोली....मुझे मालूम है इस थोड़ी सी हँसी के लिये उसने कितनी पीड़ा झेली है।

"ऐसा क्यों सोचती हो...मैं आ गया हूँ.....अब कहीँ नहीँ जाने वाला हूँ.... तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।" "कइसी बात करत हो बाबू सा. . तुम पढ़े लिक्खे अदमी हो....मैं तुमरे साथ हर पल रही..तुम हमरे साथ हर पल रहे...और रहब।। अरे !! हमार तुम्हार जनम जनम के नाता है...फेर जनम होई फेर मिलब... इआ चलत रही। अब जांय दे...राम रा........म।"

पंक्षी उड़ गया था....पिंजड़ा खाली पड़ा था.....दो स्थिर आँखें अब भी मुझे निहार रही थीं।

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1 टिप्पणी "कहानी // आखिरी मुराद // रामानुज श्रीवास्तव"

  1. मंत्रमुग्ध हो गया था मैं कहानी पर,,,,,एक पल ऐसा लगा मानो सच्ची घटना हो।

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