लघुकथा - डॉ. श्याम गुप्त

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

लघुकथा –

अरे आप तो तमाम ग्रंथों कथा-कहानियों, काव्य-महाकाव्यों आदि के प्रणेता और हिन्दी साहित्य विभूषण, मार्तंड आदि जाने क्या क्या, अब ये फेसबुक पर लघुकथा आदि कहना-लिखना व लम्बे-लम्बे टिप्पणी, बहस, तर्क आदि का नया शौक क्या है | लोग आपको उलटा-सीधा भी खूब बोल देते हैं | शीला जी मोबाइल देखते हुए कहने लगीं |

जी, उलटा सीधा तो राम व कृष्ण, शिव, देवताओं, शास्त्रों, धर्म को भी लोग बोलते रहते हैं, इससे क्या | आप जानती हैं कि मैं कोई कार्य बिना किसी उद्देश्य के नहीं करता |

तो, क्या ?

इस बहाने बच्चों को, नए साहित्यकारों के लिए भी कुछ शास्त्र, धर्म, पौराणिक कथाएं, अपनी सन्स्कृति, विविध विषयक पूरा व शास्त्रीय तत्वज्ञान का निरूपण-वर्णन हो जाता है, बहस-तर्क, विवेचना व बातों बातों में, यूँ तो कोई सुनने को तैयार ही नहीं होता | नयी पीढी के विचार भी मिल जाते हैं |

लघुकथा भी कुछ है, यूं ही बस केवल प्रस्तुत-प्रचलित बातें लिख दी जाती हैं, बिना समाधान प्रस्तुति के कहानी, कथा, साहित्य क्या |

हाँ, फिर भी ये कथाएं एक सोच तो छोड़ती ही हैं, जनमानस में समाधान सोचने हेतु |

लगे रहिये, मैं चलती हूँ, कालोनी के बच्चे छत पर इकट्ठे हो गये होंगें, खेल खेल में, हमारे झूले पर झूलते समय, हम भी कुछ काम की शिक्षा-संस्कृति की बातें उन्हें समझा देते हैं |

--

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघुकथा - डॉ. श्याम गुप्त"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.