डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथा - अपन तुपन

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सुन्दर की माँ छत पर खुली रसोई में सुन्दर का प्रिय व्यंजन ‘आलू का परांठा’ बना रही थी क्योंकि अंदर गरमी थी और घरों में पंखे नहीं थे | सुन्दर परांठे को यूँही लपेट कर बिना सब्जी के खारहा था और माँ उसे थाली में रखकर अच्छे बच्चों की तरह सब्जी से खाने को कह रही थी, सरोज हांफते हुए दौड़ कर आई, बोली, ‘चलो सुन्दर अपन-तुपन खेलेंगे|’

‘ चलो जाओ उन्हीं के साथ खेलो, सुन्दर तेजी से बोला,’ तुमने कुट्टी क्यों की, जाओ मैं तुमसे नहीं बोलता, तुम बड़ी खराब हो |’

सरोज आँखों में आंसू भर कर चुपचाप खड़ी रही |

‘क्या बात है सरू ?’ सुन्दर की माँ पूछने लगी, ’अरे तुम रो क्यों रही हो ?’ माँ ने कहा |

‘ये मेरे साथ खेलने नहीं जा रहा है |’

‘इसने मुझसे कुट्टी क्यों की|’ सुन्दर बोला |

बुरी बात है, सुन्दर की माँ हंसकर बोली, एक दूसरे से मत लड़ा करो, अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते |

देखा, शांती! ‘सुन्दर की माँ अपनी समीप बैठी पड़ोसन से कहने लगी; जो लगभग पंद्रहवीं बार अपने सबसे छोटे बच्चे, जिसने अभी-अभी चलना व बोलना सीखा था, के लडखडाकर चलने, तुतला कर बोलने जैसे कृत्यों का हर्षपूर्ण वर्णन कर रही थी जो उसकी सातवीं संतान थी; कैसे सुनहरी की बहू कल लड़ रही थी बिना मतलब के | अरे ये बच्चे कभी आपस में एक दूसरे के साथ खेलने से रह सकते हैं | बच्चों की तरफदारी लेकर बड़ों का लडना-झगडना बेमानी है |’

सरू, लो इसे खाओ और दोस्त बन जाओ | सुन्दर की माँ सरोज को आलू का परांठा देती हुई बोली | सरोज ने अपनी फ्राक की बांह से आंसुओं को पौंछा और सुन्दर को जीभ दिखाती हुई परांठा खाने लगी |

‘चलो अब पुच्ची करो और दोस्ती करलो’, सुन्दर की माँ बोली |

दोनों ने अपने-अपने दायें हाथ की हथेली को चूमते हुए दो बार पुच्ची-पुच्ची कहा और एक दूसरे की गर्दन में बाहें डाले खेलने चल दिए |

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