उपवास-हास // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

उपवास, अनशन, भूख-हड़ताल, फ़ाका –ये सारे के सारे एक ही परिवार के चट्टे-बट्टे हैं। सब के सब बस भोजन के पीछे पड़े हुए हैं। ‘भोजन नहीं करना’, इनका एक मात्र यही एक नारा है। कम से कम दिखावा तो इनका आहार-त्याग ही रहता है। काम होना चाहिए; अगर खाना त्यागे बिना ही ‘साम दाम दंड भेद’ इत्यादि मान्य तरीकों से हो जाता है, तो बहुत अच्छा, लेकिन अगर सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तो आख़िरी हथियार ‘उपवास’ का इस्तेमाल करना ही पडेगा। कभी कभी उपवास की धौंस-डपट से भी काम चल जाता है, नही तो उपवास करना ही एक मात्र विकल्प होता है। इस आखिरी हथियार को बहुत सोच-समझ कर, जब सब हथियार फेल हो जाएं, तभी चलाना पड़ता है।

वस्तुत: उपवास या कहें, अनशन, का इतिहास बड़ा खराब है। किसी ज़माने में धार्मिक तिथियों पर, एकादशी आदि पर, इसे किया जाता था। आज भी बहुतेरी महिलाएं उपवास आदि करके अपनी धार्मिकता बचाए रखने की कोशिश करती रहती हैं। अच्छी बात है। कोई भी ऐसे उपवासों के खिलाफ नहीं होता। करते हो तो करो। कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कुछ माताएं अपने बच्चों को सुधारने के लिए आत्म-दंड के रूप में इसका इस्तेमाल करते हुए देखी गईं हैं। वे अपने बच्चों को पहले समझाती हैं। नहीं मानते तो बजाए इसके की वे उन्हें दंड दें अपने को ही दंड देने लग जाती हैं बस गड़बड़ यहीं होती है। अब आप ही बताइये, आज भला किस नेता में एक माँ का ह्रदय होता है ? गांधी जी की बात अलग थी। उनमें था। और वे उसी नैतिक ह्रदय को लेकर उपवास करते थे। आज भला क्या ऐसा संभव है। लेकिन माताओं ने और गांधी जी ने इतिहास में जो उदाहरण पेश किए हैं वे आज नेताओं के उपवास का ‘उपहास’ करते प्रतीत होते हैं। उपवास तो उपवास है। उसे कभी ऐसे मापदंड से दण्डित नहीं करना चाहिए की वह ‘उपहास’ साबित कर दिया जाए ! क्या करें बेचारे नेता लोग ! वे अब साफ़ साफ़ कहने लगे हैं की मज़ाक उड़ाने की ज़रूरत नहीं है। जो उपवास हम करते हैं वह गांधी जी वाला उपवास नहीं है। हमारा उपवास तो उपवास का प्रतीक-भर है ! हमने उपवास के पहले या भले ही उपवास के दौरान ही चोरी छिपे थोड़ा-बहुत कोई खाद्य पदार्थ मुंह में डाल लिया तो उपवास का ऐसा कौन सा बड़ा चीरहरण कर डाला। आखिर उपवास करने वाला भी आदमी ही है, भूख तो उसे भी लगती ही है न।

हिन्दी का यह ‘उप’ उपसर्ग भी बड़ा शरारती है। किसी भी शब्द के पहले आ जाए तो कभी तो उस शब्द का सामर्थ्य बढ़ा देता है (जैसे, उपकार) और कभी उसे छोटा कर देता है (जैसे, उपमंत्री)। इसी सन्दर्भ में हिन्दी के एक वरिष्ठ अध्यापक से बात हो रही थी। उन्होंने उपवास का एक बिलकुल नया, अभी तक अछूता, अर्थ बताया। बोले जब आप अपने घर में वास करते हो तो यह ‘वास’ होता है। घर होते हुए भी, ‘वास’ के लिए कहीं और चले जाते हैं तो यह ‘उपवास’ कहलाता है। उपवास करते समय घर पर नहीं खाया, उपवास स्थल पर खा लिया, तो कौन सा ऐसा आसमान टूट जाएगा ? सो उपवास के बारे में ज्यादह चूँ-चपड़ नहीं करना चाहिए।

भोजन हर प्राणी की एक आवश्यक-आवश्यकता है। भोजन के महत्त्व को वे ही जानते हैं जिन्हें दोनों समय का भोजन मयस्सर नहीं हो पाता। अघाए हुए, पेट भरे लोग जब भूख-हड़ताल पर बैठते हैं तो यह सरासर “उपवास-हास” है। भूखों पर ज़बरदस्त कटाक्ष है। भूखा बेचारा तो अपने पेट में घुटनों घुसा कर सोने की कोशिश करता है। पर ये भूख-हड़ताली अपनी तोंद का प्रदर्शन करने के लिए कैमरे के सामने बैठते हैं।

जिस प्रकार ‘वास’ के अनेक रूप हैं, जैसे ‘वास’, ‘उपवास’, ‘रनिवास’ ‘वनवास’ इत्यादि, उसी तरह हास (हास्य) के भी अनेक रूप हैं। हास, विहास, परिहास, अट्टहास, मंद-हास आदि, आदि। ज़ाहिर है, उपहास भी हास का ही एक रूप है। जो लोग उपहास में ‘हास’ नहीं देखते वे इसे कटाक्ष या तंज भी कहते है। इसी प्रकार जो पुराण-खंडी लोग आज के ‘उपवास’ में तथा-कथित उसके ‘’सच्चे अर्थ में” उपवास नहीं देखते वे उसे उपहास-हास कहने लगे हैं। और तो और यह उपवास-हास हास की ‘टाइपोलोजि’ में प्रवेश के लिए भी अपनी दस्तक देने लगा है। पर कौन ध्यान देता है? लोग कुछ तो कहेंगे ही, लोगों का काम ही है कहना !

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद, -२११००१

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