ललित-निबंध : आम – जो ख़ास भी है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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आम की आमद शुरू हो गई है। कल मैंने कच्चे आम की चटनी खाई। वाह! मज़ा आ गया ! लगभग एक वर्ष बाद ज़बान को आम का स्वाद मिला। पके आम के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पडेगा। जब से आम के पेड़ में मंजरियाँ आती हैं, कोयल कुहकने लगती है। आम-आस्वाद के लिए जिह्वा आतुर होने लगती है। सच आम चीज़ ही ऐसी है। बहुत ख़ास – बहुत आम। ख़ास इसलिए कि आम का कोई मुकाबला नहीं है। उसके सामने सारे फल ‘फींके’ पड़ जाते हैं। यही वजह है कि भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस में यह राष्ट्रीय फल माना जाता है। बांग्ला देश में इसके पेड़ को राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त है। पूरी दुनिया मुरीद है इसकी। सुगंध, स्वाद और सेहत का भण्डार फलों का राजा है आम। इसकी बादशाहत पर न तो किसी को शक है और न ही आश्चर्य। पर यह जितना ख़ास है उतना ही आम है। हर-दिल अज़ीज़। कोई बिरला ही होगा जिसे आम ना-पसंद हो और जिसने आम का स्वाद न लिया हो। आम आदमी की पहुँच से आम कभी बाहर रहा ही नहीं। वह कितना ही क्यों न इतरा ले, ऐसा कभी हो भी नहीं सकता।

बादशाहों के दरबार लगते थे। ‘दरबारे ख़ास’ में बादशाह के खास-म-ख़ास लोग बैठते थे। जबकि ‘आम-दरबार’ वह खुला दरबार होता था जिसमें आम-लोग भी सम्मिलित हो सकते थे। लेकिन इतिहास बताता है कि इन दरबारों में फलों के राजा, आम, ने कभी शिरकत नहीं की। यूं तो हिन्दुस्तान में हम लोग आम के बारे में वैदिक युग से ही परिचित हैं; आम के वृक्ष, पत्तियां और फलों का धार्मिक उल्लेख हमें सबसे पहले वही मिलता है। आम की पत्तियों से बंदनवार सजा, उसकी लकड़ी यज्ञ की समिधाएँ बनी। पर भारत में आम के प्रचार और विकास में मुग़ल बादशाहों का भी बड़ा योगदान रहा है।

आम कितना ही ख़ास क्यों न हो कभी दरबारी नहीं हुआ। वह हमेशा आम-जन के साथ ही रहा। ज़ाहिर है इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पडा है। राजा और राजनीतिज्ञों ने उसका खूब मनचाहा उपयोग किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार आज प्रजातंत्र में आम-आदमी का इस्तेमाल किया जाता है। एक बार चुनाव ख़त्म हुआ नहीं कि बस उसे दबाया, चूसा और फेंक दिया।

नाम में भला क्या रखा है ? आम को किसी नाम से पुकारो वह आम ही रहेगा। फिर भी किसिम किसिम के आम हैं और उनकी किसिम किसिम के नाम हैं। कुछ सार्थक, कुछ असार्थक। आमों में हुस्न परी और हुस्न आरा हैं। प्रिंस और छोटा जहांगीर भी हैं। गुलाब जामुन और मोहन भोग हैं। नीलम हैं, सिदूरी हैं, सफेदा हैं। दशहरी और अल्फांजो जैसे हर जगह दौड़ लगाने वाले आम हैं, तो एक लंगडा आम भी है जो उनसे मुकाबले के किए हमेशा तैयार है। पर समान रूप से हैं तो सभी आम। भले ही इन्हें आम्र कहें, अमवा कहें, अंबा कहें, रसाल कहें या फिर मलयाली भाषा में ‘मंगो’ और उसी की देखा-देखी अंग्रेज़ी में “मैंगो” ही क्यों न कहें।

आम है -तो आम-रस है, अमावट है। आम पापड हैं, आम की चटनी है; मुरब्बा है आम का। आम का अचार है। आम है तो आम के आम और गुठलियों के दाम हैं।...... लेकिन आम नहीं होता तो भी आम-आदमी तो होता ही, न जाने कितनी चीजें आम-फहम भी होतीं, आम-जलसा होता, आम-जनता होती, आम-दरबार लगता और कोई भी बात अंतत: आम-राय से ही बनती। किस्सा कोताह, बावजूद अपनी खसूसियात के, आम को इतराने की कोई ज़रूरत नहीं है।

न जाने कितने फल हैं जिन्हें भारत आयात करता है। लेकिन आम का आयात भारत में कभी नहीं हुआ। आम की पैदावार भारत में सबसे अधिक होती है और वह इसका निर्यात योरोप, इंग्लॅण्ड और अरब देशों को मिलाकर लगभग ८० देशों में करता है। फिर भी मांग बनी रहती है और उत्पादकों को शिकायत रहती है कि उन्हें निर्यात के लिए सरकार द्वारा बेहतर सहूलियतें नहीं मिलतीं। लेकिन भारत एक उत्सव-प्रधान देश है। आम-उत्सव मनाने में भी वह चूकता नहीं। आम के मौसम में देश-विदेश में मैंगो-फेस्टिवल लगते हैं। यूरोप और अमेरिका तक में हमारी सरकार का निर्यात मंत्रालय आमों की नुमाइश लगाता है। प्रतिवर्ष जुलाई में दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम, नई-दिल्ली, भव्य “मेंगो फेस्टिवल” आयोजित करता है। इसमें लगभग ५५० किस्म के लोकप्रिय और कम-लोकप्रिय आमों को सम्मिलित किया जाता है। उत्सव को मनोरंजक बनाने के लिए आम से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम, व्यंजन प्रतियोगिताएं आदि भी की जाती हैं।

फागुन के महीने में आम के पेड़ों में मंजर्रियाँ आने लगती हैं जिनकी मीठी गंध, आम के आगमन की सूचना देने लगती है। कच्ची केरियां आते ही आम की चटनी बनने लगती है। आम पकते ही उसे चूसकर, काटकर खाना आरम्भ हो जाता है। आप चाहें तो उसका रस निकालकर पीलें, चाहें ‘मेंगो-शेक’ बनाएं –आप की मर्जी। मैंने आम की चटनी कल खाई थी। आम पकने अब देर नहीं है। मेरी ही तरह हर आम और ख़ास को, पके- आमों का इंतज़ार है।

डा. सुरेन्द्र वर्मा

  १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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