हास्य-व्यंग्य // मार्किट ददाति मोटिवेशन // अमित शर्मा (CA)

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इस मीन (स्वार्थी) दुनिया में विटामिन की बहुत कमी पाई जाती है जिसके कारण बहुत सी बीमारियां बिना किसी क्लिक और एंटर के स्वतः ही डाऊनलोड हो जाती है। विटामिन सी औऱ विटामिन डी के अलावा विटामिन एम अर्थात मोटिवेशन की कमी भी पिछले काफ़ी समय से सामाजिकता के रैंप पर कैटवॉक कर रही है। देश में विटामिन वैविध्य और उनकी कमी का संतुलन बनाए रखने के लिए सभी विटामिन्स की समान मात्रा में कमी का होना नितांत आवश्यक है ताकि हर तरह की कमी के क्षेत्र में देश का झंडा, हमेशा की तरह बुलंदी पर रहे।

आवश्यकता , आविष्कार की सगी मम्मी अर्थात ज़ननी है , इस रिश्ते की मर्यादा और उसकी पैकिंग सही जगह पर रखने के लिए अनिवार्य था कि मोटिवेशन की कमी को दूर करने के लिए ज़रूरी उपाय और टोटके कर मोटिवेशन की कमी को निरूपाय किया जाए। प्रेरणा के कुपोषण की रोकथाम के लिए, दानदाता की तरह ही समाज में कई प्रेरणादाता छुपे हुए थे, जो मौका और सम्मान मिलते ही, सामने और पीछे से सार्वजनिक हो गए। इन प्रेरणादाताओं को बिना किसी व्याकरण विसंगति के सभ्य भाषा में मोटिवेशनल स्पीकर्स कहाँ जाता है। ये मोटिवेशनल स्पीकर्स, आमजन के लिए अपने प्रेरणा के खजाने से प्रेरणा को मिड-डे मिल की तरह आसानी से उपलब्ध करा देते है क्योंकि ये लोग अपने ख़ज़ाने की सुरक्षा के लिए किसी चौकीदार को नहीं बैठाते हैं।

मोटीवेशनल स्पीकर्स अपने शिकार को बड़ी ही नफासत से हिरासत में लेकर, उन्हें मोटिवेशन के हवाले कर देते हैं। देखकर बताना मुश्किल होता है कि मोटिवेशनल स्पीकर्स द्वारा कहे गए कोट्स में ज्यादा दाग होते हैं या उनके द्वारा अपने बदन पर लपेटे गए कोट्स पर। वैसे यह बात उल्लेखनीय है कि बदन पर मोटिवेशन के बदले कोट लपेट कर ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को मोटिवेशन के लपेटे में लिया जाता है।

मोटिवेशनल स्पीकर्स की सफलता उनके द्वारा मोटिवेट किये गए या हुए लोगों की संख्या से नहीं बल्कि उनके वीडियो पर दागे गए हिट्स की संख्या से मापी जाती है। गाज़र घास की तरह मोटिवेशनल स्पीकर्स उगने के बाद भी, समाज में व्याप्त मोटिवेशन की कमी से हमें चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह ठीक उसी तरह है जैसे डॉक्टर्स और दवाइयों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ मरीज़ों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। दरअसल दवा और मर्ज़ का एक ही अनुपात में बढ़ना दोनों की सेहत के लिए बोर्नविटा की तरह ज़रूरी है क्योंकि दोनों एक दूसरे के ठीक उसी तरह से पूरक हैं जैसे बैंक और बैंक से लोन लेकर विदेश भागने वाले एथलीट।

मोटिवेशनल वक्ता हर बात का हल, कोलाहल से निकालना जानते हैं। उनका चित्त हमेशा वित्त में रमा रहने के बावजूद, वो उसे हाथों का मैल बताकर, मोटीवेशनल सेमिनारों में प्रेरणात्मक नारों से मोटी रकम पर हाथ साफ कर जाते हैं।

मोटिवेशन का बाजार इतना बढ़ चुका है कि अब घर- परिवार या दोस्तों से मुफ्त में मोटिवेशन लपकने में, शरीर के रोमकूपों से छोटापन और शर्म, पसीने की तरह लीक होने लगती है औऱ उसी छोटेपन और शर्म की बूंदों को मोटिवेशनल सेमिनार की एंट्री फीस के फव्वारे की बौछार में बदलने से मोटिवेशनल मार्किट में हमेशा ठंडक बनी रहती है।

बाजार में जिस तरह से मोटिवेशनल स्पीकर की बाढ़ आई हुई है ,उसका हवाई सर्वेक्षण करके उसी अनुपात में राहत कार्य का न चलाया जाना चिंता का विषय है। जीवन में पहले नियमित रूप से उतार-चढ़ाव आते थे लेकिन अब उतार-चढ़ाव के साथ-साथ बोनस के रूप में मोटिवेशनल स्पीकर्स भी बिना बुलाए आते रहते हैं। अतः आवश्यक है कि ज़िंदगी में हर कदम और बोझ संभाल कर उठाया जाए क्योंकि पता नहीं किस मोड़ पर मोटिवेशनल स्पीकर से मुठभेड़ हो जाए। आज के ज़माने में अगर बच्चा पढ़ाई में कमज़ोर या असफल रह जाए तो पेरेंट्स को निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि दरअसल वो मोटीवेशनल स्पीकर बनने की राह पर है।

पहले के ज़माने में मोटिवेशन अर्थात प्रेरणा बरामद होने पर लोग गंगाजल की तरह आदरपूर्वक उसका आचमन ग्रहण करते थे लेकिन अब सब्र के बांध के गेट खुल जाने से इतनी प्रचुर मात्रा में मोटिवेशन बह रही है कि बिना कंजूसी किए आराम से सपरिवार नहाकर, उससे कपड़े और पाप दोनों आराम से धोए जा सकते हैं।

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