लोककथा // ईकटोमी और कायोटी–1 // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी :

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चालाक ईकटोमी


संकलनकर्ता


सुषमा गुप्ता


5 ईकटोमी और कायोटी–1[1]


मैदान में ऊपर सूरज बहुत ज़ोर से चमक रहा था। नीचे हरी घास पर बेकार की लम्बी लम्बी बेलें फैलीं पड़ीं थीं। ईकटोमी[2] अपनी हिरन की खाल में चमकीले नंगे सिर धूप में उस घास के मैदान में अकेला घूम रहा था।

वह घास में बिना किसी साफ सुथरी पगडंडी के ही चला जा रहा था। चारों तरफ वह बेकार वाली घास में धीरे धीरे पॉव रखता चला जा रहा था कि वह बेकार वाली घास के एक बड़े से गुच्छे के आने से पहले ही रुक गया।

उसने अपने सिर को इस कन्धे से उस कन्धे तक घुमाया। थोड़ा और आगे बढ़ कर वह पहले एक तरफ घूमा, फिर दूसरी तरफ घूमा, औैर फिर यह देखने के लिये थोड़ा और आगे जा कर रुक गया कि आखिर उस घास के पीछे छिपे फ़र के कोट के नीचे क्या था।

वह था एक पतला सा छोटा सा भेड़िया। उसकी नुकीली काली नाक उसके चारों पैरों के बीच में घुसी हुई थी। उसकी सुन्दर घनी पूंछ उसकी नाक और पैरों के चारों ओर लिपटी हुई थी। एक कायोटी[3] उस घनी घास में छॉह में गहरी नींद सो रहा था। ऐसा ईकटोमी ने देखा।

बिना आवाज किये उसने पहले एक कदम उठाया, फिर दूसरा और फिर धीरे धीरे चलता हुआ उस फ़र की गेंद के पास आ गया जो वहाँ सो रही थी। अब ईकटोमी कायोटी के बिल्कुल पीछे खड़ा था और उसकी बन्द पलकों की तरफ देख रहा था जो जरा सी भी नहीं हिल रहीं थीं।

ईकटोमी ने पहले अपने होंठ दबाये, फिर धीरे से सिर हिलाया और उसके बाद उस भेड़िये की तरफ देखा। फिर वह अपना कान उसकी नाक के पास ले गया तो उसको तो कायोटी की सॉस भी महसूस नहीं हुई।

आखिर वह बोला — “यह तो लगता है कि मर गया। मर तो गया पर लगता है कि इसे मरे बहुत देर नहीं हुई है क्योंकि इसके पंजे में तो अभी भी ताज़ा पंख लगा हुआ है। यह तो अच्छा मोटा मॉस है। ”

कहते हुए और उसका वह पंजा पकड़ते हुए जिसमें उसने पंख पकड़ रखा था वह बोला — “अरे इसका तो पंजा भी अभी गरम है। मैं इसको अपने घर ले जाता हूं और शाम को इसको भून कर खाऊॅगा। हा हा हा। ” कह कर वह हॅस दिया।

उसने कायोटी को उसके आगे वाले दोनों पंजों से पकड़ लिया और उसके दोनों पिछले पंजों को अपने कन्धे पर डाल लिया। वह भेड़िया बहुत बड़ा था और इकटोमी का घर वहाँ से काफी दूर था।

ईकटोमी धीरे धीरे अपना बोझ ले कर और कायोटी के मॉस के स्वाद का आनन्द लेता हुआ चला। वह अपनी आंखें मिचकाता जा रहा था ताकि उसकी आंखों का नमकीन पानी उसके चेहरे पर न आये।

इस पूरे समय में कायोटी अपनी आंखें खोले खुले आसमान की तरफ देखता रहा और अपने चमकीले दॉत निकाल कर हॅसता रहा।

वह अपने मन में कह रहा था — “अपने पैरों पर चलना तो थका देने वाला होता है पर अगर कोई किसी के कन्धे पर चढ़ कर जाता है जैसे कि लड़ाई का कोई लड़ने वाला जीत कर जाता है तो वह तो कितना अच्छा है। ”

वह आज से पहले इस तरह से किसी के कन्धे पर चढ़ कर नहीं गया था इसलिये यह नया अनुभव तो उसको बहुत ही अच्छा लग रहा था।

वह ईकटोमी के कन्धे पर सुस्ती से पड़ा रहा। बस कभी कभी अपनी पलकें झपका लेता था। कायोटी को नींद भी आ रही थी और उसको अपने ऊपर थोड़ा घमंड भी हो रहा था कि वह ईकटोमी के कन्धे पर चढ़ कर जा रहा था।

ईकटोमी अब करीब करीब अपने घर आ पहुंचा था और कायोटी भी अब पूरी तरह से जाग चुका था क्योंकि थोड़ी ही देर में वह इकटोमी के हाथ से फिसल जाने वाला था।

सो उसने फिसलना शुरू किया और वह नीचे इतनी ज़ोर से गिरा कि कुछ देर तक तो उसे सॉस ही नहीं आयी।

वह यह सोचते सोचते कि अब ईकटोमी उसका क्या करेगा चुपचाप वहीं पड़ा रहा जहां गिरा था। कभी कभी वह किसी गाने की धुन गुनगुना लेता था। उधर ईकटोमी एक बहुत बड़ी दावत और नाच के बारे में सोच रहा था।

उसने जा कर सूखी लकड़ियॉ इकठ्ठी कीं और उनको अपने घुटने की सहायता से दो दो टुकड़ों में तोड़ दिया। फिर उसने अपने घर के बाहर एक बहुत बड़ी आग जलायी।

जब उसमें से लाल पीली लपटें उठने लगीं तो वह कायोटी के पास लौटा। कायोटी अपनी पलकों के बालों के बीच में से सब देख रहा था।

ईकटोमी कायोटी को उसके आगे और पीछे वाले पंजों से पकड़ कर झुलाता हुआ आग के पास लाया और उसको आग में फेंक दिया। पर कायोटी फिर बीच में ही गिर गया।

उसके नथुनों में गरम हवा घुसी जा रही थी। उसकी आंखों के सामने आग की लपटें नाच रहीं थी। वह कुछ अंगारों से छू गया तो तुरन्त ही वहाँ से कूद गया। जैसे ही वह कूदा तो कुछ अंगारे उसके पैरों से छू कर ईकटोमी की नंगी बॉहों और कन्धों पर आ कर गिर गये।

ईकटोमी तो कुछ बोल ही नहीं सका। उसको लगा कि कोई आत्मा आग में से निकल कर आ रही थी। उसका तो मुंह खुला का खुला ही रह गया। उसने पाम का एक पत्ता उठा कर कायोटी के चेहरे पर ज़ोर से मारा। वह उसको चिल्लाने से रोकना चाहता था।

कायोटी ने घास में लुढ़क कर और सिर को जमीन पर मल कर अपने बालों में लगी आग बुझायी। ईकटोमी तो यह सब देखता का देखता ही रह गया और अपने जलते हुए कन्धे और बॉहों को फूंक मार मार कर ठंडा करता रहा।

उधर कायोटी आग के दूसरी तरफ ईकटोमी के सामने बैठ कर हंसता रहा फिर बोला — “कोई बात नहीं ईकटोमी, अगली बार सही।

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तुमको आग जलाने से पहले ही यह निश्चय कर लेना चाहिये था कि तुम्हारा दुश्मन मर गया है या नहीं। ” इतना कह कर वह बहुत तेज़ी से वहाँ से भाग गया।


[1] Iktomi and Coyote - a folktale of Native American Indians. Adapted from the Book :

“Old Indian Legends”, by Zitkala-Sa.  Boston, Ginn and Company. 1901. Its 14 stories are on http://www.worldoftales.com/Native_American_folktales/Native_American_Folktale_40.html

[2] Iktomi is a spider fairy, pronounced as “Ee-k-tomee”. See its picture above.

[3] Coyote is a small desert wolf and a hero of many Native Americns’ folktales. See its picture above.


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,इथियोपिया व इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

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