जल तू जलाल तू - 2 // प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास // प्रबोधकुमार गोविल

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जल तू जलाल तू

प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास

प्रबोधकुमार गोविल


अध्याय 1 |

दो

नाना के मुँह से सोमालिया के किन्जान की कहानी सुनकर तो सभी दंग रह गए।

किन्जान बहुत छोटी उम्र से ही नायग्रा के पानी को गिरते देख निहारा करता था।

वह उस विशालकाय झरने को उसी तरह देखता रहता था जैसे बच्चे सिनेमा या टी. वी. के परदे को देखकर सुध-बुध खो बैठते हैं। उसे वह गिरते पानी का दैत्याकार परदा चाँदी के भीगे रजतपट के मानिंद लगता था, जो उसे जादू की हद तक लुभाता था। कभी दूर-दराज की अमेरिकी सेना में तैनात किन्जान के पिता की मौत की खबर आने पर भी उसने वहाँ आकर घण्टों बैठना नहीं छोड़ा था। किन्जान की माँ रस्बी चाहती थी कि अब किन्जान भी सेना में भर्ती हो जाए। पन्द्रह साल के किन्जान को बेमन से माँ का कहा करना पड़ा।

किन्तु दूसरों के मन की बात इन्सान मान तो सकता है, पर जिन्दगीभर मानता रह नहीं सकता। किन्जान छिपके सेना से भाग आया। उस पर केवल एक ही धुन सवार थी कि नायग्रा की ऊँचाई से पानी में बहकर नीचे आएगा। उसने दर्जनों काम किए। वह धन जोड़ता और फिर इस जोड़-तोड़ में लग जाता कि कैसे वह नायग्रा फाल्स को पार करने लायक सुरक्षित रक्षाकवच बनाए। उसकी माँ रस्बी इसके सख्त खिलाफ थी। वह उसे हर तरह से समझा चुकी थी कि वह यह पागलपन छोड़ दे। बेटे की जिद ने उसे भी वहशीपन की हद तक जिद्दी बना दिया था। वह दुनिया का हर वह उपाय करने को तैयार थी जो उसके बेटे से ऐसी धुन छुड़ा दे। उसने बेटे को घर में कैद करके रखा, किराए के हिंसक चौकीदारों से उसे नायग्रा के आसपास न फटकने देने का खर्चा उठाया, बेटे को बफलो से दूर ले जाने का प्रयास किया।

पर जैसे-जैसे माँ अपने मन की करती, वैसे-वैसे बेटे का अपने मन की करने का जुनून और बढ़ता...माँ और बेटे के बीच एक साथ रहते हुए भी यह परस्पर दुश्मनी चलती रहती। सेना से ऊबकर वापस चला आया किन्जान उस विशाल झरने को पार करना चाहता था और माँ रस्बी इस खयाल मात्रा से ही बुरी तरह डरी हुई थी। उसने बेटे को फौज में तो भेज दिया था जहाँ पल-पल जान जाने का खतरा रहता है पर इस निराले खेल में तो बेटे की जान जाना तय ही लगता था।

इस विचार मात्रा से ही रस्बी की जान जाती थी कि किन्जान ने दुनिया के सबसे बड़े बहते दरिया से खेलने का जुनून पाल लिया था।

चूहे और बिल्ली के नैसर्गिक खेल-सा तमाशा उस घर में आठों पहर चलता था। रस्बी इस उधेड़बुन में रहती थी कि किन्जान का यह फितूर उतर जाए और वह फिर से फौज में जाकर मोर्चा सम्भाले। उधर किन्जान तरह-तरह के ऐसे उपाय ढूँढता, जिससे पानी की तूफानी धारा में बहते समय उसकी हिफाजत हो सके। वह बचपन से ही कुशल तैराक था। पानी में किसी मछली की ही तरह अठखेलियाँ करना उसके बाएँ हाथ का खेल था। उसके जीवन का अब एक ही सपना था कि वह नायग्रा के बवंडर-भरे पानी में छलाँग लगाए, और बहता हुआ आसमानी ऊँचाई से नीचे आकर इस दिव्य प्रपात पर अपने प्रताप का परचम लहराए। झरने से वर्लपूल तक किसी जल-देवता की भाँति आना अब उसका एक, केवल एक सपना रह गया था। इस सपने के लिए वह अपनी माँ से लड़ रहा था, अपनी जीविका से लड़ रहा था, और अपनी जिन्दगी से लड़ रहा था।

वह उन लोगों के बारे में भी सुन-जान चुका था जिन्होंने पहले कभी ऐसे प्रयास किए थे और वे असफल होकर इतिहास के शामियाने में सदा के लिए सो गए थे। ऐसे लोगों की दास्ताँ उसे डराती नहीं थी, बल्कि चौकन्ना बनाती थी, कि वह उनके द्वारा की गयी गलतियों को न दोहराए। उसे न तो नाम कमाने, प्रसिद्धि पाने का विचार था और न ही इस कारनामे से धन-दौलत पाने का। उसकी होड़ तो बस बहते पानी से थी, कि कैसे चाँदी की उस ठण्डी धारा के वेग पर सवार होकर वह लहरों की आँधियों के झंझावात पर शिकंजा कसे। फुहारों के करेंट-भरे अभिषेक के लिए उसका जवान मस्तक तड़पता था।

सत्राह से भी कम उम्र में ऐसा तूफानी सपना कुदरत किसी शीशे के बदन में भला कैसे भर सकती है, इस पर वह कद्दावर महिला, रस्बी हैरान थी, जिसने पति को सैनिक के रूप में खो देने के बावजूद बेटे के लिए भी सेना का वही पथरीला रास्ता चुना था। बेटे के उसकी बात अनसुनी कर देने के बाद वह किसी भी सीमा तक जाकर बेटे को रोकना चाहती थी। उसे न मृत्यु से डर लगता था, न जिन्दगी से प्रेम था, वह तो केवल बेटे के भविष्य को ‘खेल’ में गँवाने के खिलाफ थी। देश को सिपाही की जरूरत होती है, जुनूनी की नहीं, यह उसकी सोच थी।

अपनी सनक-भरी खोजों के दौरान किन्जान ने जान लिया था कि वेग-भरी धारा में लकड़ी का सहारा बहुत निरापद नहीं रहेगा, क्योंकि लकड़ी से बनी कई कश्तियाँ अब असफल जाँबाजों की बीती कहानियों का हिस्सा थीं। प्लास्टिक के उपयोग का युग आ गया था। विमानों से पैराशूट अब सफलता से काम में लिए जा चुके थे। केवल यह उपाय महँगे थे। और किन्जान की जुनूनी उमंग का कोई प्रायोजक नहीं था। सफलता के बाद तो सिर-आँखों पर बैठाने के लिए दुनिया दौड़ती है, सफलता का सपना लिए दौड़ते युवक के साथ भला कौन आता? वह भी तब, जब जन्म देनेवाली माँ खुद लट्ठ लेकर सपने के यायावर के पीछे पड़ी हो।

किन्जान के दोस्तों ने पहले तो उसके मंसूबों को हवा में उछाला, लेकिन धीरे-धीरे दोस्ती के दालान में संजीदगी की नर्म घास उगने लगी। वे तरह-तरह से उसकी मदद को आगे आने लगे। धन की कमी के बादल छिन्न-भिन्न होने लगे।

जिस पवन वेग से उड़नेवाले घोड़े पर उनका दोस्त सवार हो, उसे ललकारकर हरी झण्डी दिखाने का भी तो अपना एक रोमांच है। किन्जान को ‘अपने दिन’ नजदीक आते दिखने लगे... रस्बी के पास धन न था, लेकिन फिर भी वह मेहनती थी। किफायत और करीने से चलती थी। उसने किन्जान को कभी किसी बात की कमी न होने दी थी।

जो कुछ उसका जमा-जोड़ा धन था वह सब किन्जान के लिए ही था। मगर फिर भी जब अपना इरादा पूरा करने की तैयारी में किन्जान कोई खर्चा करना चाहता, तो रस्बी को ऐसा लगता था मानो बेटा उसके जिगर की बोटियाँ करके धूप में चील-कौवों को खिलाने के लिए फैला रहा है। वह तरह-तरह के पैंतरे रचकर उसे उसके मिशन से रोकने के जतन करती। कभी खर्च के लिए, तो कभी वक्त के लिए उस पर तरह-तरह के लांछन लगाती।

किन्जान अपनी धुन का पक्का था, उसे न खाने को चाहिए होता और न पहनने को। वह तो अपने तांबई कसरती बदन पर नाममात्र का कपड़ा लपेटे, मछली खाकर सो रहने को भी तैयार रहता। उसका खर्चा तो केवल एक काम पर होता, बस अपनी यात्रा की किसी तरह कामयाबी! रस्बी उसकी देखभाल में कोर-कसर न छोड़ती। उसके लिए तरह-तरह की चीजें पकाती और मन-ही-मन मनाती, कि उसका मन अपने इरादे से हट जाए।

रस्बी ने किसी से सुना था कि लड़कों को किसी तरह अपने मरने का खौफनाक दृश्य दिखा दो तो वे डर जाते हैं। रस्बी ने यह नुस्खा भी अपनाया।

...एक रात, जब किन्जान आराम से अपने कमरे में सो रहा था, उसकी माँ रस्बी चुपचाप अपने बिस्तर से उठी और किसी चोर की भाँति किन्जान के कमरे की ओर देखती हुई अपनी अलमारी की ओर बढ़ी। उसने कपड़ों के बीच रखी कोई छोटी काली-सी वस्तु झटपट निकालकर अपनी जेब में छिपाई, और सिर पर अपना पुराना बड़ा हैट लगाकर घर से बाहर निकल गई। वह रात के लगभग तीन घण्टे बिताकर लौटी। आने के बाद, अपने कमरे में ऐसे सो गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

सुबह जब किन्जान ने आँखें खोलीं, तो वह चांक गया। उसके चारों ओर चार अस्थि-पिंजर रखे थे, और इन नर कंकालों के ऊपर, चेहरे की जगह उसकी माँ रस्बी के चेहरे के चित्रा चस्पाँ थे। इतना ही नहीं, मेज पर रखे टेप पर मातमी धुन बज रही थी। किन्जान बुरी तरह उदास हो गया। लेकिन उसने धैर्य न खोया, वह चुपचाप अपने दैनिक कामों में लगा रहा। उस दिन उसने दोपहर को खाना नहीं खाया। न ही रस्बी को उसने भोजन करते देखा। रस्बी ने पुराने कैमरे से अपनी तस्वीर निकलवाकर अस्थि-पिंजर पर लगवा दी थी।

वह रात जिस तरह आई, उसी तरह बीत भी गई। किन्जान का न दिल पसीजा, और न इरादा। वह उसी तरह अपनी तैयारी में लगा रहा। यद्यपि माँ के मरने के दृश्य ने उसे भीतर से हिला दिया था।

फिर एक दिन उसने अपनी माँ को अपने सामान की पैकिंग करते भी देखा।

वह अच्छी तरह जानता था कि उसकी माँ के पास घर छोड़कर जाने के लिए कोई और दूसरी जगह नहीं है। एक बार के लिए उसका जिगर जरा-सा हिला, क्योंकि उसने कभी भी अपनी माँ के लिए ‘होम लैस’ होकर घूमने की कल्पना नहीं की थी। उसके पिता, क्योंकि उसकी छोटी-सी उम्र से ही सेना की नौकरी के कारण घर से बाहर रहे थे, उसे पिता के बारे में कोई कल्पना नहीं थी, किन्तु माँ को उसने किचन में भोजन बनाते, कमरे में सफाई करते, मार्केट से राशन लाते, उसके कपड़े और बिस्तर सँवारते, और उसकी बेचैनी में दवाओं से तीमारदारी करते बचपन से देखा था, अतः वह सोच न पाया कि ऐसे शख्स का गृह-विहीन होकर घूमना क्या होता है। वह उदासीन न रह सका, उसने चुपचाप जाकर माँ का वह बैग खोलकर पलट दिया, जिसमें उसने अपने कपड़े रखे थे। फिर चुपचाप आकर अपने काम में लग गया। माँ एक बार जोर से खीजी, लेकिन फिर सामान को उसी तरह पड़ा छोड़कर घर के दूसरे कामों में लग गई।

किन्जान के कमरे में बीचों-बीच लोहे के तारों का वह ढाँचा फैला पड़ा था, जिस पर रंगीन प्लास्टिक को मजबूती से मढ़ा जाना था। इस तरह तैयार हो रही थी वह जानलेवा बॉल, जिससे रस्बी की जिन्दगी को हार जाने का खतरा था और किन्जान की जिन्दगी को जीत जाने की उम्मीद। वक्त तमाशबीन था।

रस्बी को चार साल पहले की वह घटना अकस्मात् याद आई, जब एक दिन उसके घर पर न होने पर किन्जान अपने साथ स्कूल में पढ़नेवाली एक लड़की को घर ले आया था। तेरह साल के नासमझ किशोर की समझ से उस दिन रस्बी बुरी तरह डर गई थी...डरने का कारण भी था। उस बालिका को देखकर रस्बी को अपना बचपन याद आ गया। उसे कैदखाने में बीते अपने बचपन की काली छायाएँ अब तक याद थीं। जेल के उस अहाते के आसपास उसे जो भी आदमी दिखता था, वह उसके देखते-देखते कोई सूखा पेड़ बन जाता था। और फिर उस सूखे पेड़ के इर्द-गिर्द लिपटे साँप, बिच्छू, गिरगिट और गोहरे उसके बदन को छलनी करने चारों ओर से दौड़ पड़ते थे। रस्बी को चीखने-चिल्लाने तक का समय न मिलता।

आज जब घर लौटकर उसने दरवाजे में चाबी घुमाकर कमरे में प्रवेश किया तो वह भीतर तक दहल गई। उसका तेरह साल का बेटा सूखा पेड़ बन गया था।

रस्बी ने पेड़ की जड़ से निकलकर किसी जंगली पाटागोहरे को उस मासूम लड़की की तरफ भागते देखा तो रस्बी के होश उड़ गए। वह होश-हवास खो बैठी।

...कहते हैं कि जिस तरह काँटा काँटे को निकालता है, उसी तरह डर भी डर का इलाज करता है। कभी जिस ग्यारह साल की लड़की को अपने तेरह साल के बेटे के साथ सूने घर में देखकर रस्बी डर गई थी, आज अचानक उसका खयाल रस्बी को आ गया। वह अच्छी तरह जानती थी कि वह लड़की, उसके बेटे पर नाराज होने के बावजूद पिछले चार साल से किन्जान की गर्ल-फ्रेंड है। किन्जान उससे लगातार मिलता है। रस्बी ने उस लड़की की मदद लेने की बात भी मन में सोच डाली। अगर वह कहेगी, तो शायद किन्जान अपनी अजीबो-गरीब जिद छोड़ देगा, उसे ऐसा विश्वास हो गया, और कुछ दिन गंगा उलटी बही। जिस लड़की के साए से भी रस्बी किन्जान को बचाती थी, अब उसी के बारे में किन्जान से पूछ-ताछ कर उसे घर लाने की बात कहने लगी।

सत्राह साल का किन्जान इसके आगे और कुछ नहीं सोच पाता था, कि जब उसके घर में उसकी मित्र को बुलाया जा रहा है, तो उसे लाना ही चाहिए। हाँ, इतना सतर्क वह जरूर रहता था कि कहीं माँ के सामने उससे अन्तरंगता उसकी मित्र को किसी मुसीबत में न फँसा दे। वह माँ को भरसक यह जताने की कोशिश करता कि वह केवल माँ के कहने से उसे ले आया है, उसका किन्जान की किसी बात से लेना-देना नहीं है।

लेकिन हर माँ जब यह जानती है कि उसके बच्चे को कौन-सी चॉकलेट पसन्द है, तो भला यह उससे कैसे छिप सकता है कि उसके बेटे को दुनिया का कौन-सा इन्सानी-बुत पसन्द है। माँ ने अपना खेल खेला। उसने सोचा, वह उस लड़की से विनती करेगी कि वह किन्जान को रोके।

लेकिन इस खेल में भी माँ हार गई। किन्जान की गर्ल-फ्रेंड ने साफ कह दिया कि वह अपने मित्र की खुशी को सँवारने के लिए उसकी मित्र है, उसके सपने को कुचलने के लिए नहीं। रस्बी ने अपने को एक बार फिर हताश देखा।

अपमानित भी।

उस आसमान से गिरते मायावी दरिया ने किन्जान की दुनिया बस चुल्लू-भर की कर छोड़ी, जिसे किन्जान तो पी जाना चाहता था, पर रस्बी को उसमें जिन्दगी के डूब जाने का अंदेशा था। अब रस्बी क्या करे? क्या जवान बेटे के लिए ताबूत बनाकर उसकी मौत का इन्तजार करे, या फिर ऐसी घड़ी आने से पहले कुछ खाकर सो रहे? तीसरा कुछ उसे दूर-दूर तक कहीं सपने में भी नहीं दीखता था। उसने क्या बेटे की ममी को किसी म्यूजियम में रखने के लिए उसे पैदा किया था? और बेटा जिस तुफैल में जी रहा था उसमें तो ताबूत में रखने या म्यूजियम में सजाने के लिए उसका मुर्दा भी हाथ आने की कोई गारण्टी नहीं थी।

रस्बी शायद नहीं जानती थी कि औलाद को जन्म देने का मतलब उसे अपने सपनों का वारिस बनाना नहीं है। एक बार जिसे जिन्दगी मिल गई, फिर उसके इस्तेमाल का हक भी उसे ही है। फिर रस्बी किन्जान को सेना में भेजकर भी कहाँ महफूज कर रही थी? ...सुबह किचन से कोई चीज उठाने के लिए किन्जान ने जब भीतर झाँका, तो उसने देखा, तरकारी ऐसे ही पड़ी है, और माँ ने चाकू के ताबड़तोड़ वार अपनी कलाई पर कर लिए हैं...रस्बी की कलाई से खून बह रहा था, जमीन बुरी तरह लहूलुहान थी।

...किन्जान के जो दोस्त रोज सवेरे अपने दोस्त के जाँबाज हौसले को संबल देने आते थे, उन्हीं को बदहवासी में रस्बी को क्लीनिक ले जाना पड़ा। समीप की फार्मेसी से सहायता लेकर जब किन्जान की प्रेमिका पहुँची, रस्बी की ड्रेसिंग हो चुकी थी, और वह गुमसुम-सी बेड पर लेटी थी। किन्जान ने एक मैकेनिक को कुछ काम के लिए बुला रखा था, इस कारण वह अपने काम को समझकर दो घंटे बाद पहुँचा। घर में एक्स टर्मिनेटर की उपस्थिति भी उसी दिन की बाट जोह रही थी, किन्जान को निकलने में इससे भी देर हुई।

डॉक्टर ने शाम तक रस्बी को वहीं रहने को कहा। किन्जान के साथी कुछ देर बाद चले गए, प्रेमिका भी। उसके बाद ही रस्बी का मौन टूटा।

”तुम्हें पता है, जब तुम तीन साल के थे, कैलिफोर्निया के बीच पर अपने पिता के साथ तुम पानी से कितना डर गए थे?“ रस्बी ने छत की ओर देखते हुए कहा।

”मुझे ये भी पता है कि पिता ने पानी में मुझे ले जाकर मेरा डर निकालने की कोशिश ही की होगी।“ किन्जान ने भी ऐसे स्वर में जवाब दिया, मानो बर्फ के घर में से कोई बच्चा बोल रहा हो।

”तुम्हारे पिता जब साल्मोन फिशिंग के लिए लेक पर जाते थे, तुम्हें कितना दूर बैठा देते थे। जब तुम पास भी आना चाहते, तो वे तुम्हें आने नहीं देते थे, बल्कि मछली की बास्केट तुम्हें दिखाने के लिए तुम्हारे पास, धूप में चलकर जाते थे।“ ”पिता को यह भी मालूम होगा कि वे मुझे मछली दिखाने के लिए सारी उम्र मेरे साथ नहीं रह सकेंगे, और उन्हें बूढ़ा भी होना होगा।“ ”चुप...बकवास मत करो।“ ”...“ ”तुम तो अपने मामा की गोद में खेले हो। वह कितना अच्छा तैराक था? कोलंबिया में पानी के खेलों में उसका कितना नाम हुआ। वह आज व्हील-चेयर पर है।“ अब रस्बी की आँखों में पानी था।

”मामा का पानी ने कुछ नहीं बिगाड़ा, पानी में घुली एल्कोहल ने बिगाड़ा।“ ”बहस मत करो।“ ”...“ ”मृत्यु से हर आदमी को डरना चाहिए।“ कुछ देर चुप रहकर रस्बी किसी दार्शनिक की तरह बोली।

”डर मृत्यु में नहीं है, डेथ तो बहुत शान्तिपूर्ण है, डर तो केवल मृत्यु से डरने में है।“ किन्जान ने भी उसी स्वर में जवाब दिया।

”सेना को भी बहादुर चाहिएँ, वहाँ क्यों नहीं जा सकते तुम?“ रस्बी चीखी।

”पिता और मामा की जिन्दगी मेरी जिन्दगी का फैसला लेने के लिए मिसाल क्यों बनती हैं? हम दूसरों की गति से सीखें, तो अपनी उम्र का क्या करें?“ किन्जान ने भोला-सा सवाल माँ के सामने फैला दिया।

रस्बी की समझ में नहीं आया कि किन्जान को कैसे समझाए। इससे भी बड़ी उलझन तो यह थी कि रस्बी खुद अपने को कैसे समझाए।

दुनिया के सबसे बड़े झरने का हाहाकार करता पानी उसके इकलौते बेटे को लीलने बढ़ रहा हो और वह मूक दर्शक बनी रहे? अजीब है पानी की सिफत! सफीने इसी में तैरते हैं, इसी में डूबते हैं।

किसी दार्शनिक की तरह पगलाई रस्बी प्यार से उसे समझाती।

”अपनी जिन्दगी जी...खूब बुढ़ापे तक रह।“ रस्बी मुस्कराते हुए, किसी आशीर्वाद देते सन्त की तरह बोली।

”ये अपने हाथ में है?“ किन्जान ने भी थोड़ा मुस्कराकर कहा।

”बेटा, बुढ़ापा बहुत अच्छा होता है। जीवन के ढेर सारे अनुभव शरीर के पोर-पोर में रच-बस जाते हैं। जेहन में बहुत सारे ऐसे लोगों का मजमा जुड़ जाता है, जिनसे हम कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं मिले होते हैं। चमड़ी की कनात पर हमारी शरारतों के निशान बन जाते हैं।“ ”क्या कह रही हो माँ, थोड़ी देर चुपचाप सो जाओ।“ ”बोलने दे रे, जिस तरह आटे और मक्खन को ज्यादा फेंटने से केक मुलायम और स्पंजी बनता है, वैसे ही बुढ़ापे में हड्डियाँ जीवन की बहारों को खूब झेलकर फोकी और खसखसी हो जाती हैं। इनकी सब हेकड़ी चली जाती है।“ ”माँ, तुम्हें आराम चाहिए...“ ”बहुत आराम मिलता है बेटा, आँखों में उन मेलों की झाइयाँ होती हैं, जिनमें हम मँडराते रहे। दाँतों पर उन तमाम स्वादों के काले-पीले अक्स आ जाते हैं, जो हमने लिए। चेहरे के पेड़ पर खट्टी-मीठी यादों के शहतूत झुर्रियाँ बनकर चिपके होते हैं। कदमों में हर रास्ते पर चल चुकने की थकान लड़खड़ाहट बनकर गुँथी होती है...बेटा, तू ये सुख छोड़ना मत, बूढ़ा जरूर होना।“ ”अभी तो तुम भी बूढ़ी नहीं हो माँ, मैं तुमसे काफी छोटा हूँ।“ ”हाँ, अभी तू बहुत छोटा है। तू सोच, कि तू रहेगा। बोल रहेगा न? जिन्दा रहेगा?“ किन्जान हँसा। पागलों जैसी लगातार हँसी, किन्जान देर तक हँसता ही रहा।

रस्बी को इंजेक्शन लगाने आई एक नर्स किन्जान को देखकर एक पल ठिठकी, मानो सोच रही हो, कि किसे लगाना है? तीसरे दिन रस्बी किन्जान के साथ घर आ गई। घर ने उसके आते ही कई छोटे-मोटे काम अपने आप उसके हाथों में पकड़ाने शुरू कर दिए, जैसे मकड़ी के आते ही दीवार उसे जाला बुनने का काम दे देती है।

किन्जान की बन्द नौका एक रंग-बिरंगी बॉल की शक्ल में सुन्दर आकार लेने लगी थी...अगले दिन वह उसे नदी पर एक ट्रायल के लिए ले जाना चाहता था। उसने अपने मित्र अर्नेस्ट को समझा दिया था कि अभी सब लोगों को नहीं ले जाना चाहिए। ज्यादा मित्रों के जाने से काम कम होगा और पिकनिक का माहौल ज्यादा बनेगा।

अर्नेस्ट खुश हो गया। वह जानता था कि नदी पर वही इमली की शेपवाली नारंगी रंग की छोटी मछली मिलेगी, जो अपने शरीर से धुआँ छोड़कर साफ पानी को मटमैला बना देती है। इससे गहरा पानी भी उथला दिखाई देता है, और धोखे से छोटे-मोटे कीट-मकोड़े गहरे पानी की तेज धारा में आ जाते हैं...अर्नेस्ट को उस सुनहरी मछली की दुनियादारी अचंभित करती थी। अर्नेस्ट का मन कई बार चाहा था कि वह सुनहरी केसरिया मछली को पकड़कर कभी खा ले। लेकिन वह मछली सामने आते ही इस तरह छटपटाती थी मानो उसकी जान खतरे में है। करुणावश वह मछली को पकड़ने का खयाल छोड़ देता, पर तभी छटपटाती हुई मछली अपने शरीर से धुआँ छोड़ती और देखते-देखते साफ पानी गँदला-मटमैला हो जाता।

समुद्री दुनिया में फरेब रचती मछली आगे बढ़ जाती।

दुनिया का यही कपट-भरा दस्तूर सबका पेट भर रहा है। गहरे पानी में आए कीट फिर लाचार होकर दूसरे जीवों का निवाला बनते हैं।

किन्जान को किसी ने बताया था कि न्यूयॉर्क में कोई ऐसा कीमियागर है जो प्लास्टिक की बॉल के भीतरी भाग में कोई ऐसा लेप लगाता है, जिससे मजबूती तो आ जाती है, पर बॉल का वजन नहीं बढ़ता। किन्जान एक बार वहाँ जाना चाहता था। उसे मैन-हट्टन की उस दुकान का पता भी मिल गया था।

किन्तु वहाँ जाना आसान न था। साथ में बॉल को भी इतनी दूर ले जाने में खर्चा भी था और झंझट भी। पहले बफलो में ही एक ट्रायल के लिए अगली सुबह किन्जान अपने मित्र के साथ नायग्रा झरने से लगभग सात किलोमीटर पहले नदी किनारे पहुँचने की तैयारी करने लगा। सुबह-सुबह वहाँ तक जाने के लिए एक पिक-अप का बन्दोबस्त भी उसने कर लिया।

अगली सुबह अँधेरे ही दोनों मित्र जब ट्रायल के लिए निकले, तो जितनी स्पीड पिक-अप वैन की थी, उससे कहीं ज्यादा रस्बी के ब्लड-प्रेशर की थी। उस सुबह रस्बी ने किन्जान के दिवंगत पिता को भी बहुत याद किया।

जंगल के बीच एक गहरे पानी के साफ से किनारे के नजदीक जब वैन रुकी तो एक बार उतरकर किन्जान ने मुआयना किया। झटपट उसने कपड़े उतार डाले।

इसे किन्जान के सन्तुष्ट हो जाने का संकेत समझ उसके मित्र ने वैन से बॉल उतारने में अपना दिमाग लगा दिया।

किन्जान एक ऊँची छलाँग भरकर पानी में कूद पड़ा। उसने ऊँची लहरों के उद्दाम वेग में गोता लगाकर चारों ओर चक्कर लगाया, चट्टानों और झाड़ियों का जायजा लिया, और फिर अपने दोस्त अर्नेस्ट को दूर से ही हाथ हिलाकर इशारा किया।

अगले पल अर्नेस्ट बॉल के भीतर था। वैन के ड्राइवर ने भी उसे सहारा दिया। पानी की लहरों पर बॉल हिचकोले खाती आगे बढ़ने लगी। वाटर-स्पोर्ट के किसी खिलाड़ी की-सी चुस्ती से किन्जान बॉल के इर्द-गिर्द चपलता से तैरता हुआ बढ़ने लगा। कभी बॉल किसी चट्टान से टकराकर ऊँची उछलती तो भीतर बैठे अर्नेस्ट का जिगर नीचे डूबता। किन्जान की आँखों में किसी निष्पक्ष निर्णायक जैसी तत्परता आ जाती।

बहते जल के प्रकृति में जितने रूप हो सकते हैं, वे सभी उस प्रपात की पूर्व-पीठिका में दर्ज थे। किन्जान हाथ के हलके स्पर्श से बॉल को इधर-उधर धकेलता, जैसे वॉली-बॉल का कोई खिलाड़ी दुश्मन खिलाड़ी से बॉल को बचाने की कोशिश कर रहा हो।

किन्जान अपनी तैयारी से सन्तुष्ट तो नजर आया, मगर उसके मन में एक बार न्यूयॉर्क पहुँचने की इच्छा भी बलवती हो गई। शायद सर्वाधिक जोड़ी आँखों में किन्जान की छवि बसाने के लिए हडसन नदी उसे वहाँ से पुकार रही थी... रस्बी किन्जान के इस अभियान से कितना डरी हुई और नाराज है, यह किन्जान का दोस्त अर्नेस्ट नहीं जानता था। उसने तो किन्जान को सहयोग देकर अपनी दोस्ती का रिश्ता ही निभाया, पर जब घर जाकर उसने रस्बी, किन्जान की माँ के तेवर देखे तो उसे असलियत का आभास हुआ।

दोपहर बाद घर लौटकर किन्जान के दोस्त अर्नेस्ट ने ट्रायल के परिणाम रस्बी आंटी को बताने चाहे तो माहौल बिलकुल ऐसा था, मानो कोई मीट-मर्चेंट बकरे को प्रफुल्लित होकर बता रहा हो, कि वह कौन-सी बोटी किस तरह हलाल करेगा। निश्चय ही यह सब अगर अर्नेस्ट की जगह किन्जान बता रहा होता तो रस्बी या तो एक थप्पड़ उसे रसीद करती या फिर पास की दीवार से अपना सिर जरूर टकरा देती। लेकिन अर्नेस्ट की बात उसे ऐसे सुननी पड़ी, जैसे किसी डॉक्टर के हाथों कोई नन्ही मासूम बच्ची कड़वा सिरप आँख बन्द करके पी रही हो।

उधर भोला अर्नेस्ट इस इन्तजार में था, कि अब आंटी उन्हें कुछ खाने-पीने को देंगी, और किन्जान कनखियों से माँ के सपाट चेहरे पर आते-जाते रंगों की मशाल की तपन महसूस कर रहा था। उसे हैरानी होती थी कि माँ उसके कुछ नया करने के जज्बे को समझती क्यों नहीं? लेकिन उसी शाम अपनी धुन के पक्के किन्जान ने न्यूयॉर्क जाने की तैयारी शुरू कर दी। एक कोरियर कम्पनी से अपनी नौका को भेजने का प्रयास खर्चीला, मगर सम्भव जान पड़ा। उधर किन्जान और अर्नेस्ट ने अपनी रेल यात्रा की तैयारी कर डाली।

न्यूयॉर्क केवल उनकी सुविधा की मंजिल नहीं था, बल्कि महादेश का यह महानगर महान् सपनों का रंगमंच भी था, यह किन्जान को दूसरे दिन से ही आभास होने लगा। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि न्यूयॉर्क के एक अखबार के रिपोर्टर ने पिछले दिनों बफलो में उनके ट्रायल के दौरान उफनती नदी के हहराते प्रवाह में लहरों के करेण्ट से पंजा लड़ाते किन्जान का फोटो भी खींच लिया। रंगीन बॉलनुमा नौका अखबार के पन्ने पर तैरकर न्यूयॉर्क के घर-घर में समा गई, और किन्जान को एक सम्भावित जाँबाज खिलाड़ी के रूप में शहर पहले ही जान गया।

और अगले दिन रॉकफेलर विश्वविद्यालय के समीप हडसन की लहरों की ताल पर बिजली की गति से एक ग्लोबनुमा नौका के पीछे पानी पर फिसलते किन्जान को देखने जगह-जगह भीड़ जमा हो गई। कोई हाथ हिलाकर उसका अभिवादन कर रहा था तो कोई उसके किनारे पर आने का इन्तजार कर रहा था।

नदी किनारे पार्कां में टहलते एक से एक उम्दा नस्लों के कुत्ते तक कौतुक से रेलिंग पर पाँव टिकाए किन्जान की नौका को पानी के गगनचुम्बी छींटे उड़ाते देखने रुक गए। जिस राह से सुबह से शाम तक तरह-तरह के जहाज और नौकाएँ दोनों ओर की अट्टालिकाओं की ऊँचाइयों से ईर्ष्या करते पानी का सीना चीरते गुजरते थे, वहाँ से एक दिन नायग्रा फाल्स का मान-मर्दन करने का हैरत-भरा मंसूबा लिए एक किशोर को गुजरते हुए भी हजारों लोगों ने देखा। लोगों की भावनाएँ और शुभकामनाएँ दोनों ओर से बरसीं।

अगले दिन किन्जान को मीडिया का एक तोहफा और मिला... न्यूयॉर्क के अखबारों में किन्जान की तस्वीर छप गई। समाचार भी था।

अमरीका के बफलो नगर में जब भी कोई देशी-विदेशी पर्यटक नायग्रा फाल्स देखने जाता था तो वह उस संग्रहालय को जरूर देखता था, जिसमें नायग्रा फाल्स को पार करने का खौफनाक प्रयास करनेवाले जाँबाजों के फोटो लगे थे। कितने ही लोग इस दुस्साहसी अभियान में अपने प्राण गँवा चुके थे और अब इतिहास में एक जड़ इबारत की तरह दर्ज थे। लेकिन जब लोगों ने एक किशोर को इस खतरनाक अभियान पर निकलते देखा तो उन्होंने दाँतों तले अँगुली दबा ली। वह हडसन नदी के किनारे पर उसे शुभकामनाएँ देने के लिए भी भारी तादाद में जमा हुए।

अखबारों में किन्जान के प्रयासों का जिक्र होने में उस कीमियागर का हाथ भी रहा, जिसने उसकी नौका में प्लास्टिक पर लेप लगाया था। उसने शाम को अपनी कम्पनी के बैनर के साथ ‘टाइम स्क्वायर’ पर किन्जान के लिए अभूतपूर्व मजमा जुटाया। नायग्रा की विशाल तस्वीर के साथ किन्जान की खिलखिलाती तस्वीर के सामने स्वयं किन्जान का खड़ा होना आकर्षण बन गया। छोटे स्कूली बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्गां तक ने न केवल किन्जान से हाथ मिलाया, बल्कि उसके साथ तस्वीर खिंचवानेवालों की कतार लग गई। दुनिया के कोने-कोने से आनेवालों ने अपने देश, अपने नगर, अपने समुदाय, अपने परिवार और खुद अपनी तरफ से उसके अभियान के लिए दुआएँ दीं।

वहाँ लगाए गए सफेद बोर्ड पर हस्ताक्षर करनेवालों की कोई सीमा न रही. स्टेफेन वन, अमोस एअतों, एबेनेजेर एम्मोंस, असा फित्च, दौग्लास हौघ्तों, जमेस हॉल, ठोदोरे जुदः, एडविन ब्रयंत एवं होर्स्फार्ड, बेंजामिन ग्रीन, विल्लिं कोग्स्वेल्ल, फ्रेदेरिच्क ग्रिन्नेल, हिरम मिल्स, एमिली रोएब्लिंग, वाशिन्ग्तों रोएब्लिंग, अलेक्सान्दर कास्सत्त, जॉन फ्लैक विनस्लो, विल्लिं विले, लेफ्फेर्ट बुक्क, मोर्देकाई एन्दिकोत्त, हेनरी रोव्लंद, विल्लिं पित्त मासों, पल्मेर रिच्केट्स, जॉन अलेक्सान्दर, फ्रांक ओस्बोर्न, गार्नेट बल्तिमोरे, गेओर्ग फेर्रिस, जों लोच्खार्ट, गेओर्गे होर्तां, वाल्टर इरविंग, संफोर्ड क्लुएत्त, मार्गरेट सगे, एमिल प्रेगेर, रोबेर्ट हंट, एरिक जोंस्सों, मिल्टन ब्रुमेर, चले पत्रिच्क बेडफोर्ड, अल्लें टू मोंट, लिंकों हव्किंस, चौनसे स्टारर, राल्फ पेचक, कित मिल्लिस, रोबेर्ट विद्मेर, होवार्ड इसेर्मन्न, लोइस ग्राहम, जोसेफ गेर्बेर, रोबेर्ट लोएव्य, अलन वूरहीस, गेओर्गे लो, शेल्दों रोबर्ट्स, ननकी देलोये फित्जरॉय, मत्ठेव हंटर, च्रिस्तोफेर जफ्फे, हेर्मां हॉउस, दोन अन्देरसों, मर्चियन होफ्फ, राय्मोंद तोम्लिंसों, म्य्लेस ब्रांड, इवर गिएवर, जों स्विगेर्ट, रोबेर्ट रेस्निच्क, रोलैंड स्च्मित्त, मार्क एमेर अन्देरसों, अदम पत्रिच्क बीके, मौरिसियो सस्पेदेस मोया, निचोलास गेर्मान कूपर, रोहन दयाल, जों थोमस दुरस्त, ज्होऊ फंग, स्कॉट गोर्डन घिओसल, वैभवराज, मयंक गुप्ता, रमण चक्रधर झंध्याला, ज्होंग्दा ली, श्रुती मुरलीधरन, हर्ष नाइक, करणार तसिमी, स्टेफनी तोमसुलो, जेनिफेर मारी तुर्नेर, ज्हेंग क्सु, शुन यो, दिन्ग्यौ जहाँग, जोशुआ, ब्रयाँ, कयले, मिके, स्टेफेन, एरिक, रिचर्ड, एरिन, जेनिफेर, मिचेल्ले, दानिएल, त्राविस, अदम, जोनाथों, ब्रित्तान्य, जॉन, थोमस, जोसेफ, नोर्मन, श्याना, जोसेफ, मत्ठेव, कैत्लिन, रिचर्ड, कार्ल, जाकोब, मत्ठेव, थोमस, बेंजामिन, पत्रिच्क, तोड्द, अन्थोनी, टिमोथी, रंजित, अक्षय, अनुज, अंकेश, गौरव...यह सूची खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एम्पायर स्टेट बिल्डिंग के सामने जब किन्जान पहुँचा, तो उसे दिल में पलनेवाले सपने की ऊँचाई का अंदाज हुआ। टाइम एक्वायर से आनेवाले भीड़ के रेले ने किन्जान की मुहिम को जीवन्त प्रतिसाद दिया। जो भी देखता, हाथ हिलाकर उसकी हौसला अफजाई करता। दुनिया के हर देश से आनेवाले वाशिंदे वहाँ मौजूद थे। किन्जान ने तराजू के एक पलड़े में इस हुजूम का उत्साह रख दिया और दूसरे में अपनी माँ रस्बी की हताशा। उसके सपने को यहाँ आकर एक नई ज्वाला मिली।

किन्जान भाव-विभोर हो गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके इरादे को इतनी उम्मीद से लिया जाएगा। केवल एक माँ रस्बी को छोड़कर दुनिया का हर आदमी जैसे उसके सपने के पूरा होने में दिलचस्पी रखता था। उसे तरह-तरह के प्रस्ताव भी मिलने शुरू हो गए थे।

अल्बानी के एक कॉलेज ने उसे आश्वासन दिया था, कि यदि वह अपने मिशन में कामयाब रहता है, तो उसे तैराकी का प्रशिक्षण देने के लिए कोच रखा जाएगा। किन्जान इस प्रस्ताव से अभिभूत हो गया। उसने तो आज तक आजीविका के लिए सेना में भर्ती होने की अपनी माँ की हिदायत के अलावा और कोई रास्ता जाना ही नहीं था।

मैन-हट्टन की सड़सठवीं स्ट्रीट में कपड़ों की धुलाई करनेवाली एक चीनी महिला ने अखबार के माध्यम से किन्जान से अनुरोध किया था कि वह जिन कपड़ों में नायग्रा को पार करेगा, उन्हें लांड्री मालकिन ऊँची कीमत देकर खरीदना चाहेगी।

पिट्सबर्ग के एक भारतीय सज्जन ने घोषणा की थी कि सफल होने के बाद किन्जान के नाम पर भारत में एक स्विमिंगपूल निर्मित करवाएँगे।

रात साढ़े ग्यारह बजे जब किन्जान और अर्नेस्ट कीमियागर के साथ डिनर खा रहे थे, कीमियागर के पास पच्चीसवीं गली से एक महिला की गुजारिश आई कि यदि किन्जान अपने अभियान में उसके ब्राजीलियन नस्ल के छोटे पप्पी को साथ में रख सकता है, तो वह इस मुहिम के लिए दस हजार डॉलर देगी।

किन्जान की आँखों में आँसू आ गए। काश, एक बार, सिर्फ एक बार उसकी माँ भी कह देती कि ”किन्जान अपने मकसद में कामयाब हो, यह मेरा आशीर्वाद है“। लेकिन उसकी माँ का उस पर अहसान था, उसका माँ पर नहीं, क्योंकि माँ ने उसे जन्म दिया था, किन्जान उसे अब तक कुछ न दे पाया था। सिर्फ भय के अलावा।

रात के गहराते-गहराते किन्जान से मिलने दो व्यक्ति आ गए। वे एक नामी-गिरामी कम्पनी से आए थे, जो शहर के बीचों-बीच स्थित थी। कम्पनी हर साल अपने हजारों कर्मचारियों के लिए एक टापू पर स्थित भव्य बगीचे में एक गेट-टुगेदर आयोजित करती थी। उसमें सभी कार्मिक अपने परिवार के साथ उपस्थित होते थे। दिन-भर मनोरंजन और खानपान का दौर चलता था, मेलों की भाँति आयोजन होता था। उनका कहना था कि यदि किन्जान अपनी उस नौका का वहाँ प्रदर्शन करे, जिससे वह नायग्रा को पार करनेवाला है, तो कम्पनी उसके अभियान में खासी मदद करेगी। वहाँ उसकी नौका एक आकर्षण का केंद्र होगी, और उस पर कम्पनी की ओर से इस आशय का बैनर भी प्रदर्शित किया जाएगा... इतना ही नहीं कई कर्मचारियों ने अपनी ओर से किन्जान की मदद की पेशकश भी की। किन्जान को भरोसा हो गया कि लोग उसके अभियान की सफलता में कम-से-कम धन की कमी तो नहीं आने देंगे। उसने अर्नेस्ट से कहा - ”काश, कहीं कोई ऐसा फरिश्ता मिल जाता जो उसकी माँ रस्बी को भी समझा सके।“ उसे यकीन था कि उसकी माँ रस्बी यदि आज उसके साथ यहाँ आई होती तो लोगों का सहयोग और आशीषें देखकर जरूर अभिभूत होती।

किन्जान ने नायग्रा पार करने के लिए जो बॉलनुमा नौका बनाई थी, उसकी तस्वीरें उतारी जाने लगीं। कुछ भारतीय युवकों ने तो बॉल पर लाल रंग से तिलक लगाकर अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त कीं। एक जापानी लड़की ने अपने गले में लपेटा हुआ जामुनी रंग का स्कार्फ उतारकर किन्जान की कलाई पर बाँध दिया।

उसने टूटी-फूटी भाषा में किन्जान से बात की और कहा कि यदि किन्जान अपने मकसद में कामयाब हो जाता है तो वह अपने उस मकान का नाम किन्जान के नाम पर रखेगी जो उसने अभी-अभी फ्लोरिडा में खरीदा है।

किन्जान ऐसे प्रस्तावों पर भावुक हो गया। वह उम्र में कम जरूर था, लेकिन इतना जरूर समझता था कि अभी उसने सफलता का केवल सपना देखा है, वह अभी तक कोई बड़ी कामयाबी का साक्षी नहीं बना है, इसलिए सभी प्रस्तावों को उसने खामोश रहकर ही सुना। वह इन पर कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं करना चाहता था।

दूसरे, आज शाम से ही वह भीतर से कुछ बेचैन-सा भी था। न जाने क्यों उसे अन्दर-ही-अन्दर कोई घुटन-सी भी महसूस हो रही थी। उसे माँ रस्बी का खयाल भी आ रहा था जिसे वह घर पर अकेला छोड़कर आया था।

रात को रस्बी के साथ भी कुछ सुखद नहीं घटा। किन्जान के जाने के बाद वह घर में अकेली थी। उस रात उसने बेमन से अपने लिए भोजन बनाया, किन्तु खाया नहीं। उसे भूख ही नहीं लगी। रात को जिसे वह जल्दी नींद का आना समझ रही थी, दरअसल वह भी उसकी कमजोरी से उपजी तन्द्रा ही थी। देर रात तक वह करवटें बदलती रही। ढलती रात का भारीपन उसे इस तरह जकड़े रहा, मानो वह गहरी नींद में हो। कुछ देर बाद ही उसकी नींदनुमा विश्रांति में उसे न जाने कहाँ-कहाँ के दृश्य दिखाई देने लगे। नींद में उनींदा-सा एक रजतपट आँखों के सामने फैल गया।

रस्बी को लगा, जैसे वह तेजी से कदम जमाए किसी चट्टान पर खड़ी है और उसके पाँव तले से जमीन खिसकती जा रही है। देखते-देखते पाँव के नीचे से गुजरती रेत पानी में तब्दील हो गई और वह तेज बहाव में गिरती-पड़ती लहरों से बचने की कोशिश में लड़खड़ा रही है। पानी का बहता दरिया उसके कदमों से उसका जहाँ छुड़ाए दे रहा है। तेज रफ्तार गाड़ी की खिड़की से भागते दृश्यों की-सी चपलता भागते पानी में भी समा गई है। और एक मुकाम आखिर ऐसा आ ही गया, जब आसमान-सी ऊँचाई से वह मानो नीचे गिर रही है। पानी के एक अदना से कतरे की तरह। रस्बी जीवन की आस छोड़कर जैसे किसी पाताल में आ गिरी हो। गहरे और लहरदार पानी के कई जन्तु किसी महाभोज के लिए उसकी ओर दौड़े। रस्बी ने पूरी ताकत से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। मुट्ठियों का कसाव इतना जबरदस्त था कि उसके अपने ही नाखूनों से उसकी अपनी हथेलियाँ लहूलुहान हो गईं। एक जोर की आवाज हुई। आवाज भी ऐसी जैसे कहीं कोई तारा टूटा हो।

आमतौर पर उल्कापात की कोई आवाज नहीं होती, मगर यह उल्कापात रस्बी के अपने भीतर इतनी शिद्दत से हुआ कि आवाज भी आई और दहशत-भरी गूँज भी।

उसके बाद दोपहर तक रस्बी बेहोशी-भरी नींद में ही रही। जब उसे होश आया, तो उसने अपने को पलंग से नीचे गिरा हुआ पाया। पानी की दरियाई चादर को अपनी मुट्ठी में कैद करने की कोशिश में उसने पलंग की चादर को मुट्ठी में भींचकर समेट दिया था। हथेलियों का खून जमकर सूख चुका था... उसे महसूस हो रहा था कि अभी किन्जान केवल कुछ दिनों के लिए बाहर गया है, तब उसे खयालों का ऐसा झंझावात मथ रहा है। कल अपनी जिद और जुनून की वजह से जब वह इस दुनिया से चला जाएगा, तब क्या होगा? ये कैसी परीक्षा है, वह इसका परिणाम जानती है, फिर भी कुछ कर नहीं सकती।

ऐसा क्या है जो किन्जान के मन में जीने की इच्छा जगाए? क्या है जो उसे बाँधे? क्या वह किन्जान की उस गर्ल-फ्रेंड, क्या नाम है उसका...वह तो उसका नाम तक नहीं जानती, पर क्या रस्बी उसे बुलाकर किन्जान को प्यार से समझाने के लिए कहे। रस्बी को याद आया, उस दिन किन्जान अकेले में उस लड़की के साथ कितना खुश था। रस्बी को शरम आ गई। उसे हैरानी थी, किन्जान कितनी देर तक उस लड़की के साथ खोया रहा। किसने सिखाया किन्जान को यह सब? उसे खुद ही अहसास होने लगा कि माँ होकर वह बेटे के बारे में यह सब क्या सोचने लगी। बेटा अब बच्चा नहीं है। वह दिन चले गए जब वह खुद उसे नहलाने से पहले उसके कपड़े उतारकर उसकी मालिश करती थी। बेटा उसके देखते इतना समझदार हो गया कि इतनी देर पसीना बहाकर उस लड़की पर से हटा। वह साँस रोके खड़ी रही, कैसी माँ थी वह, दरवाजे की सीमा पर खड़ी होकर अपनी आँखों से उसे सब देखना पड़ा। समय से पहले जो वापस घर चली आई थी।

तो क्या रस्बी उस लड़की से किन्जान को बाँध दे? बहुत आशा, उल्लास, उमंग, जोश, उत्साह, जिजीविषा के दिन बिताकर किन्जान और अर्नेस्ट जब बफलो वापस पहुँचे, तो पड़ोसी मित्रों की देख-रेख में लेटी रस्बी को पाया। और साथ ही पाई यह खबर भी, कि रस्बी को जबरदस्त हार्ट अटैक होकर चुका है। उनके आते ही मित्र-हितैषी और अर्नेस्ट भी, सभी चले गए, और किसी अपराधी की भाँति सिर झुकाकर किन्जान ने उन्हें विदा किया।

रस्बी में बेटे के लौटते ही कुछ चेतना आ गई, और वह घर के छोटे-मोटे कामों के लिए उठने लगी। उसके मन में भीतर-ही-भीतर आशा की एक नामालूम-सी लौ भी दिपने लगी कि शायद अब किन्जान कुछ दिन अपने जुनून के साए से निकलकर रह सके।

घर की फिजाँ में उठते-बैठते जैसे कोई आवाज गूँजती थी - ‘मौत को साथी बनाया, चाँद-सूरज जैसे दोस्त, कौन था फिर किससे हम आराम करना सीखते?’ दो दिन जैसे-तैसे बीते, कि घर की दीवारों पर पतझड़ के बाद की कोंपलों की तरह किन्जान के सपने उगने लगे। रस्बी की उम्मीदों पर फिर से बर्फ जमने लगी।

एक दिन दोपहर में किन्जान को बिना बताए रस्बी बाजार गई, और किन्जान के दिवंगत पिता की एक बड़ी-सी तस्वीर बहुत सुन्दर फ्रेम में जड़वाकर लाई। किन्जान से कोई मदद लिए बिना उसने दीवार पर आदर से उसे टाँगा।

किन्जान भी आश्चर्य से उसे देखने लगा, क्योंकि उसने यह तस्वीर पहले कभी देखी नहीं थी। वह एकटक तस्वीर को देखता रहा, उसे कुछ न सूझा कि तस्वीर के बारे में वह माँ से क्या कहे। किन्तु उसके कुछ बोलने से पहले ही खुद रस्बी बोल पड़ी - उन्होंने देश के लिए जान दे दी, कोई तो उन्हें याद रखे।

किन्जान ने तस्वीर की ओर देखकर एक बार अपने सीने और आँखों पर हाथ लगाया। वह इस बात से बिलकुल बेखबर था कि उसकी माँ की बात में कोई व्यंग्य छिपा है। उसे तो माँ की बात से उलटे और जोश आ गया और वह उन्हें अखबार में छपी वह तस्वीरें दिखाने लगा, जो न्यूयॉर्क में छपी थीं। माँ ने उस तस्वीर को ऐसे देखा, जैसे किन्जान ने उन्हें उनकी तबियत बिगड़ने के दौरान खींचा गया एक्स-रे दिखाया हो।

बफलो में भी न्यूयॉर्क के मीडिया में छपी खबर का असर कहीं-कहीं दिखाई दिया, जब किन्जान की नौका को पहचानकर कुछ बच्चे कौतूहल से उसके इर्द-गिर्द जमा हुए।

एक रात बहुत देर से खाना खाने के बाद किन्जान जब घर से निकला तो रस्बी का माथा ठनका। वह जाते हुए किन्जान से कुछ पूछ तो न सकी, मगर उसका जी जोर-जोर से घबराने लगा। उसने एक बड़े-से स्कार्फ से अपने सिर पर पट्टी बाँधी, और फिर काला चश्मा लगा, अपने आँसुओं को पोंछती हुई उसके पीछे-पीछे पैदल ही निकल पड़ी। किन्जान बहुत मन्थर गति से टहलता हुआ जा रहा था। पूरा शहर रंग-बिरंगी लाइटों में नहाया हुआ था। दूर गिरते जल-प्रपात के छींटों का अंधड़ पानी-भरे बादलों के झुरमुट की शक्ल में शहर के आलम को भिगो रहा था... रस्बी को अब यकीन नहीं रहा था। उसके रोकते-टोकते भी किन्जान अपने अभियान की तैयारी करता जा रहा था। अब वह पल कभी भी आ सकता था जब किन्जान अपनी खौफनाक मुहिम पर निकल पड़े। रस्बी यह भी जानती थी कि किन्जान के अभियान के शुरू होते ही उसका अन्त भी तुरन्त आ जाएगा। पूरी दुनिया में सैकड़ों लोगों ने कोशिश करके देख ली थी, जब कोई उस आकाश से गिरते हहराते पानी से जिन्दा बचकर न आ सका तो किन्जान कैसे इस कारनामे को अन्जाम दे सकेगा। किशोर ही तो था, मसें भी भीगी नहीं थीं अभी उसकी।

रस्बी की हैरानी में उदासी के अलावा और कोई दूसरा रंग न घुलता उम्मीद का।

रस्बी ने साहस करके किन्जान का पीछा करने की ठानी। वह एक पल की ढील भी किसी अनहोनी के लिए छोड़ना नहीं चाहती थी। क्या पता कब क्या हो जाए। काश, बेटा रात के अँधेरे में घूमकर, दोस्तों से मिलकर, कहीं भी जाकर, कुछ भी करके आ जाए, पर आ जाए। रस्बी ने किन्जान को अपनी नजरों में बनाए रखने के लिए रफ्तार बढ़ा दी।

धुआँधार गिरते पानी के करीब से गुजरती सड़क से किन्जान धीरे-धीरे जा रहा था, किन्तु उसके बाद नदी की ओर जानेवाली सड़क तक आते-आते उसकी चाल बहुत तेज हो गई। अब उसका पीछा करने के लिए रस्बी को लगभग दौड़ना ही पड़ रहा था। वह थोड़ी ही देर में हाँफने लगी। उसका मन हुआ कि वह कोई टैक्सी ले ले। पर एक तो उसे यह मालूम नहीं था कि किन्जान कहाँ, और कितनी दूर जा रहा है, दूसरे वह इस विचार से भी थोड़ा हिचकिचा रही थी कि टैक्सी ड्रायवर उसे इतनी रात गए इस तरह एक युवक का पीछा करते देख न जाने क्या सोचे? वह भी तब, जब इस खुफिया उपक्रम में उसके आगे जानेवाला लड़का खुद उसका बेटा ही हो।

रस्बी ने टैक्सी का विचार छोड़ा और हिम्मत करके अपनी चाल कुछ और बढ़ा दी। थोड़ी देर बाद रास्ते की गलियों से निकलकर एक और लड़का किन्जान से आ मिला। रस्बी ने गहरे अँधेरे में भी अर्नेस्ट को पहचान लिया। रस्बी को यह जानकर थोड़ी राहत ही मिली कि आनेवाला लड़का किन्जान का दोस्त ही है।

उफनती नदी के किनाने-किनारे जाती सड़क आगे जाकर और सुनसान हो गई। छोटे-छोटे पेड़ों और झाड़ियों से सड़क के किनारे का इलाका किसी बाग और जंगल का मिला-जुला रूप दिखाई दे रहा था।

एक बड़े-से घने फैले पेड़ के नीचे किन्जान और अर्नेस्ट को ठहरते देखकर रस्बी ने राहत की साँस ली। पेड़ के नीचे घास-फूस और सूखे पत्तों के बीच से अर्नेस्ट ने खींचकर एक बड़ा-सा लोहे का पाइप उठाया, तो रस्बी को अनुमान हो गया कि वे दोनों पहले भी यहाँ आ चुके हैं। थोड़ी ही देर में अर्नेस्ट ने जेब से निकालकर एक रंगीन कपड़ा पाइप के सिरे पर बाँधा, और जब तक वह पाइप को सीधा करता, किसी बन्दर की भाँति लपककर किन्जान पेड़ पर चढ़ चुका था।

उसने पाइप के सिरे को पेड़ की एक बहुत ऊँची डाली से बाँधने के लिए ऊपर खींचा। दूर से देखती रस्बी हैरान थी। उसने किन्जान को इस तरह ऊँचे पेड़ पर चढ़ते पहले कभी नहीं देखा था।

देखते-देखते अमेरिका का राष्ट्रीय ध्वज हवा में ऊँचा लहराने लगा। रस्बी ने रूमाल से अँधेरे में ही अपनी आँखों से आँसू पोंछे। अब उससे ज्यादा देर वहाँ खड़ा नहीं रहा गया। वह किसी भी सूरत में किन्जान को यह भी पता नहीं लगने देना चाहती थी, कि उसके पीछे-पीछे चोरों की तरह वह भी चली आई है।

वह झटपट पलटकर लौटने लगी। वैसे भी उसका मकसद पूरा हो गया था।

उसने वह जगह देख ली थी, जहाँ से किन्जान अपनी खौफनाक जुनूनी यात्रा शुरू करनेवाला था।

इस जगह से नदी टेढ़े-मेढ़े रास्ते तय करती हुई लगभग साढ़े पाँच किलोमीटर के फासले के बाद अलौकिक, विशालकाय, अविश्वसनीय ‘नायग्रा फाल्स’ के रूप में गिरती थी। बेहद चौड़े पाट की नदी के उस पार अमेरिका की सीमा थी, और कनाडा का आरम्भ होता था। जगमगाते रोशनी के ब्लॉक्स की शक्ल में इस पार और उस पार के दोनों शहर बेहद खूबसूरत दिखाई देते थे। बीच में था यह बियाबान जंगल।

रस्बी के जाने के बाद दोनों मित्रों ने अपने साथ लाए हुए कुछ पोस्टर्स भी पेड़ों पर यहाँ-वहाँ चिपकाए।

अर्नेस्ट ने जेब से निकालकर छोटी टॉर्च पानी में डाली, शायद उसे इमली के आकारवाली केसरिया रंग की वह मछली फिर कहीं दिखी थी... किन्जान और उसके दोस्त को वहाँ उसके मिशन की तैयारी करता हुआ छोड़कर जब रस्बी वापस घर की ओर लौटने लगी तो वह खीजी हुई थी। वह सोच रही थी कि उसे अपनी जिन्दगी से क्या मिला? उसके मन पर बचपन के उन दिनों की छाप अब तक थी जब एक बाल्टी पानी के लिए हुए झगड़े में उसकी माँ के हाथों एक औरत की हत्या हो गई और इस हादसे ने उसे अपने पिता के साए से भी दूर कर दिया, क्योंकि उसे कैदी माँ के साथ ही जेल की बैरक में ही आकर रहना पड़ा।

रस्बी सोचने लगी, इससे पहले कि किन्जान हमेशा-हमेशा के लिए खो जाए, क्या वह अपना जीवन खतम कर डाले? पानी के किनारे चलते हुए रस्बी को न जाने कैसे-कैसे खयाल आ रहे थे। लेकिन पानी की लहरों की ही भाँति एक खयाल दूसरे खयाल को तिरोहित करता चल रहा था और भारी कदमों से रस्बी घर लौट रही थी।

भागती, दौड़ती, घबराती, और अपनी जिन्दगी पर हैरान होती, रस्बी घर चली आई। वह आकर इस तरह अपने बिस्तर पर लेट गई, जैसे उसे कुछ पता न हो। उसे किन्जान के बारे में भी कुछ पता न चला। वह कब आया, आया कि न आया।

वह एकटक छत की ओर देखती मन-ही-मन गुनगुनाने लगी, ”सोना होगा सबको, आई पारस पत्थर लेकर रात...रात छुएगी जिसको-जिसको, भूल रहेगा दिन को...“ नींद रस्बी की आँखों से कोसों दूर थी। उसकी थकान, उसकी बेचैनी, सब उसका साथ छोड़ गए थे। वह अब डर भी नहीं रही थी। उसे ऐसा लग रहा था, मानो वह उस फाँसी-स्थल को अपनी आँखों से देख आई हो, जहाँ उसके बेटे को नियति फाँसी चढ़ानेवाली हो।

अचानक रस्बी जोर-जोर से रोने लगी। उसे इसी तरह रोते-रोते नींद आ गई।

रस्बी ने वह जल-प्रपात अपने जीवन में दर्जनों बार देखा था। उसे याद नहीं, कि उस अथाह जल-राशि के गिरते तूफान ने उसे कभी भी यह संकेत दिया हो, कि एक दिन वह उससे उसका बेटा माँगेगा। झरने को पार करने के बाद बिजली के जलजले की तरह वर्लपूल तक जाता हुआ पानी एक ओर, और अपने पेट से पैदा किया रुई के फाहे जैसा बेटा, जो अब भी एक युवा होता किशोर ही था, दूसरी ओर।

रस्बी को किन्जान की प्रेमिका मिल गई। उसने कसकर उसे पकड़ लिया।

लड़की एक ओर तेजी से भागने लगी। रस्बी उसके पीछे-पीछे दौड़ी। रस्बी इस बदहवासी से दौड़ रही थी कि राह चलते लोग उसे पागल समझे। लड़की के हाथ में आते ही उसने लड़की को कन्धों से पकड़कर झिंझोड़ डाला, ”बोल, बोल तू करेगी न इतना-सा काम...तू मेरे बेटे से एक झूठ बोल देगी?“ लड़की ने डर और परेशानी से आँखें बन्द कर लीं। वह कोई उत्तर नहीं दे सकी। रस्बी फिर चिल्लाई, ”तू झूठ बोल दे उससे...वह छोटा नहीं है...वह दुनिया जीतने का सपना देख सकता है, तो ऐसा भी कर सकता है...बोल, कहेगी न उससे जाकर...कह कि तेरे पेट में उसका बच्चा है...!“ न जाने क्या हुआ, कि लड़की भी खो गई, और रास्ते के तमाशबीन भी... रस्बी ने उस रात ऐसे न जाने कितने सपने देखे।

सुबह नाश्ता बनाते समय वह अचानक किन्जान से बोली, ”दुनिया में पहले भी कोई ये काम कर चुका है, जिसके लिए तू अपनी हत्या करने जा रहा है?“ इस दो-टूक सवाल से किन्जान एकाएक सकपका गया। सम्भलकर बोला, ”तुम क्या कह रही हो माँ, हर काम दुनिया में कभी-न-कभी हुआ है, और किसी-न-किसी ने किया है।“ ”मैं तुझ पर मेरे बेटे को मारने का केस करूँगी।“ किन्जान हँसा। फिर गम्भीर होकर बोला, ”यदि मैं अपने मकसद में कामयाब हो गया तो? तुम मुकदमा हार जाओगी...कामयाब नहीं हुआ तो...“ ”हाँ...हाँ...बोल आगे...रुक क्यों गया? बोल...आगे बोल...“ और रस्बी ने ओवन से निकली तेज गरम प्लेट झन्नाटेदार तरीके से किन्जान के सिर पर खेंचकर मारी...प्लेट अपने तीखे किनारे से किन्जान के माथे पर लगी। माथे से देखते-ही-देखते खून की लकीर बहने लगी। किन्जान की हल्की-सी चीख निकली पर वह उस वहशी वार को झेल गया। उसने एक हाथ से अपना माथा दबाया और दूसरे से अपने रूमाल की तह खोलकर सिर पर लपेटने लगा। रूमाल भी खून में भीग गया।

किन्जान ने खुद ही जाकर प्लेट को उठाया। वह अब तक गरम थी। वह कनखियों से देख रहा था कि माँ ने उस पर वार कर तो दिया पर अब वह बेचैन थी। उसका ध्यान बार-बार किन्जान के माथे की ओर ही जा रहा था। किन्जान चुप था, वह जानता था कि माँ बदहवासी में अपना खुद का भी कोई नुकसान कर सकती है। इस बात से बाखबर वह कुछ भी बोलने से खुद को रोके हुए था। वह खामोशी से उस भोले कबूतर की तरह उड़ता-सरकता बाहर की ओर निकल गया जो किसी बाज का हमला होने पर भी यह नहीं समझ पाता कि उसका कसूर क्या है।

जिस समय दरवाजे पर घण्टी बजी, रस्बी किन्जान के सिर में पट्टी बाँध रही थी। टेप को एक ओर रखकर रस्बी ने ही दरवाजा खोला। और कोई समय होता तो वह खुशी से उछल पड़ती, किन्तु इस समय उसके मन पर किन्जान की चोट का बोझ हावी था, वह कायदे से हँस भी न सकी। फिर भी उसके चेहरे की बदली रंगत भाँपकर किन्जान भी दरवाजे की ओर देखने लगा। दरवाजे पर एक बेहद ठिगना आदमी खड़ा था जो अपनी लम्बी दाढ़ी की वजह से कोई मुस्लिम मालूम होता था। उसने रस्बी से कुछ कहा, फिर किन्जान की ताजा चोट को गौर से देखता हुआ वापस लौटने लगा। रस्बी ने इशारे से किन्जान को भी दरवाजे पर बुलाया।

दरअसल रस्बी ने पिछले दिनों एक घोड़ा खरीदने के लिए ऑर्डर दिया था, जिसकी जानकारी अभी तक किन्जान को भी नहीं थी। अभी-अभी आया अजनबी घोड़ा लेकर आया था, जो उसने थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे बाँधकर खड़ा किया था। किन्जान हैरानी से उसे देखने लगा। रस्बी को जरा भी हैरानी नहीं थी, क्योंकि वह कुछ दिन पहले उस अजनबी से सवारी का प्रशिक्षण भी ले चुकी थी।

रस्बी ने एक बार नजदीक जाकर घोड़े को पुचकारा तो घोड़ा भी जैसे उसे पहचान गया, वह मुँह नीचे कर रस्बी की हथेली चाटने लगा।

रस्बी चाहती थी कि किन्जान थोड़ी देर आराम करे, लेकिन किन्जान रस्बी से थोड़ी देर में आने की बात कहकर निकल गया। रस्बी उसके जाने से मन में सन्तुष्ट ही हुई, क्योंकि इससे उसे यह आभास हो गया कि किन्जान की चोट बहुत गहरी नहीं है। वह हल्के-फुल्के कदमों से घर में घुसी। अब उसे अपने और किन्जान के साथ-साथ घोड़े के दाने-पानी का प्रबन्ध भी देखना था।

दोपहर ढलने को आ गई, लेकिन किन्जान अब तक नहीं लौटा था। रस्बी ज्यादा चिन्तित इसलिए नहीं थी, क्योंकि अब वह भली-भाँति जानती थी कि वो इस वक्त कहाँ होगा। फिर भी, वह बिना कुछ खाए-पिए गया था, और अब काफी समय हो गया था।

जिस तरह घर में नया स्कूटर आने पर लड़के उसे चलाए बिना नहीं मानते, रस्बी का मन भी घुड़सवारी को ललचाया। मौका भी था, किन्जान को बुला लाने का बहाना भी। हैट लगाकर रस्बी इधर-उधर देखती हुई पेड़ के करीब पहुँची।

रस्बी ने नदी किनारे पहुँचकर दूर से ही देखा, जिस पेड़ पर किन्जान और उसके दोस्त ने झण्डा बाँधा था, वह बहुत दूर से ही दिखाई दे रहा था। पीले और केसरिया रंग की बॉलनुमा नाव भी वहाँ मौजूद थी। किन्जान के तीन-चार मित्र अर्नेस्ट के साथ वहाँ पहले से ही मौजूद थे। रस्बी दूर ही उतरकर खड़ी हो गई, और छिपकर सारा नजारा देखने लगी।

थोड़ी ही देर में दो महिलाएँ एक कार से वहाँ पहुँचीं, और उतरकर नाव के समीप बढ़ीं। उनमें से एक के हाथों में प्यारा-सा ब्राजीलियन नस्ल का छोटा-सा कुत्ता था। कुत्ते की आँखों पर काला चश्मा था और उसके गले में रेशमी स्कार्फ बाँधा हुआ था। उस महिला ने किन्जान का हाथ अपने हाथ में लेकर चूमा...रस्बी को कुछ मालूम न था। न वह उन महिलाओं को जानती थी और न ही उनके आने का कारण। रस्बी ने बुरा-सा मुँह बनाकर उस तरफ देखा। इतना तो निश्चित ही था कि महिलाएँ किन्जान को रोकने नहीं आई थीं। बल्कि जिस तरह वह बात-बात में किन्जान का हाथ अपने हाथ में लेकर चूमती थीं उससे रस्बी को यह शुबहा होने लगा कि कहीं किन्जान की यात्रा शुरू होने का समय तो नहीं आ गया। किन्जान ने अपनी बॉलनुमा नौका को पूरी तरह तैयार करके वहाँ पहले ही रख छोड़ा था।

उसके दोस्त उसके साथ वहाँ मौजूद थे ही। महिलाएँ गर्मजोशी से किन्जान का हौसला बढ़ा रही थीं।

कहीं ऐसा तो नहीं, कि किन्जान यात्रा पर रवाना हो रहा हो। रस्बी को करेण्ट-सा लगा। उसे ध्यान आया कि अभी तो किन्जान ने दोपहर का खाना भी नहीं खाया है। तो क्या अपनी आखिरी यात्रा पर किन्जान भूखा ही जाएगा? एक माँ होकर भी रस्बी किन्जान को ऐसे ही विदा कर देगी? क्या किन्जान अपने आखिरी वक्त में भी माँ से मिलने नहीं आएगा? रस्बी के मन में हाहाकार-सा मच गया। फिर भी उसकी हिम्मत नहीं हुई कि इतने अजनबियों के सामने आकर किसी भी तरीके से किन्जान को रोक-टोक करके जलील कर सके। वह जबरन अपने आँसू रोककर पेड़ के पीछे छिपकर खड़ी हो गई और एकटक सारा तमाशा देखने लगी। एक बार उसके दिल में यह भी आया कि ईश्वर उसे यदि कुछ देना ही चाहेगा तो शायद किन्जान को उसके मिशन में कामयाबी ही दे दे। लेकिन यह खयाल जैसे आया, वैसे ही तितर-बितर भी हो गया, क्योकि तभी उसकी आँखों के सामने आकाश से गिरता पानी का वह दैत्याकार झरना किसी भीगे रजतपट की तरह फैल गया।

ये क्या? रस्बी की दुनिया लुट गई।

हाथों में रंगीन रूमाल लिए दोस्तों और उन महिलाओं ने किन्जान को रवाना किया...उसकी पीली-सुनहरी-केसरिया नौका विशालकाय बॉल की तरह किनारे के उथले पानी में हिचकोले खाने लगी।

एक तीखे चीत्कार के साथ रस्बी पलटी और अपने घोड़े पर सवार होकर विपरीत दिशा में बेतहाशा दौड़ने लगी। बहते पानी की गर्जना में तमाम आवाजें जज्ब हो गईं, रस्बी की तमाम उम्मीदों की तरह।

पानी की रफ्तार किनारों पर कम, किन्तु मझधार में बेहद तीव्र थी। रस्बी के मानस में सब गड्ड-मड्ड हो गया। वह दिशाहीन-सी, सैकड़ों तूफानों के मुकाबले तांडव करते शिव की तरह कायनात से लड़ रही थी। किसी को कुछ पता नहीं था, किसी सूरज से टूटकर कोई उल्का-सी गिरी थी, जिसके भीषण दोलन से नए ध्रुवीकरण जन्मने थे, क्या बचना था, क्या बीतना था, सब समय के गर्भ में था।

अथाह पानी किसी अभिशप्त वीतरागी चिर-संन्यासी-सा अपनी धुन में गिर रहा था। मानो विधाता की बनाई सृष्टि को धो डालने का पावन कार्य उसी को मिला हो।

आसमान में चहचहाते परिन्दे भी एक नजर उस अलौकिक नौका पर डालने से खुद को रोक नहीं पा रहे थे। जहाँ से नौका अभियान शुरू हुआ था, वहाँ आसपास के पेड़ों पर पोस्टरों की शक्ल में लिखी इबारतें, प्रार्थनाएँ और कामनाएँ कसौटी पर थीं। किन्जान के चित्र के साथ ”जब हम दुनिया से लौटकर जाएँगे, तो आकाश में अगवानी करता खुदा उन साँसों को नहीं गिनेगा, जो हमने यहाँ लीं, बल्कि उस इबारत को पढ़ने की कोशिश करेगा जो हम अपने कदमों के निशानों से धरती के सीने पर लिख जाएँगे“ लिखी हुई पंक्तियोंवाला कागज किसी कटी पतंग की तरह हरे-भरे जंगल में मँडरा रहा था। कुछ कागजों पर किन्जान के हाथ से लिखी अपनी स्कूल-प्रार्थना की पंक्तियाँ भी थीं।

आसमान नहीं चाहता था कि सूरज उस खौफनाक लम्हे की तस्वीर उतारे, इसलिए उसने दो मुट्ठी बादल सूरज पर बिखेरकर उसे धुँधला कर दिया था। थोड़ी देर के लिए सारा आकाश साँस रोके स्तब्ध-सा रुक गया था। दुनिया की किसी दाई ने किसी प्रसूता माँ के गर्भ से जुड़ी उसके शिशु की नाल अब तक इस तरह कभी न काटी थी।

रस्बी घोड़े पर सवार होकर बदहवास-सी इधर-उधर दौड़ती-भागती रही। वह कोई सिद्ध-हस्त घुड़सवार नहीं थी। रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे। सड़कों पर सन्नाटा था। पर शायद वह अरबी घोड़ी जानती थी कि उसकी सद्य-क्रेता मालकिन जीवन-मरण के किसी गहरे संकट में है। वह भी पूरी ताकत से उस रंग-बिरंगी गेंदनुमा नाव के साथ उसी दिशा में भागी जा रही थी जिधर पानी की लहरों पर थपेड़े खाती डूबती-उतराती वह नौका जा रही थी।

रस्बी को न रास का ध्यान था और न जीन का। वह तो सामने देख भी नहीं रही थी। तूफानी गति से भागती घोड़ी पर हवा की तरह सवार रस्बी एकटक नौका की दिशा में ही नजरें गड़ाए थी। कुछ दूर जाकर ही गेंदनुमा उस विशाल नौका को तूफानी गति से गर्त में गिरते उस मायावी निर्झर के साथ-साथ पाताल में गिरते पानी में गिरना था। और उद्दाम वेगवती लहरों के जलजले में उफनते हुए बहना था। यह कुदरत की परीक्षा की घड़ी थी। किन्जान को अपने दुस्साहस और ब्राजीलियन पप्पी के साथ इसी नौका में सवार होता रस्बी ने आखिरी बार देखा था।

गिरते पानी में किसी मचलती तितली की भाँति उस नौका को गिरते रस्बी ने देखा। और पथराई आँखों से देखा दृश्य रस्बी के भीतर से न जाने क्या ले गया।

उस शाम कई लोगों को इमली के आकारवाली छोटी केसरिया मछली दिखाई दी, जो अपने शरीर से धुआँ छोड़कर साफ पानी को मटमैला बनाती है, और आँखों के लिए उथले पानी और गहरे पानी के बीच भ्रम पैदा करती है।

लेकिन जल-प्रपात के बाद कुछ दूर पर बने वर्लपूल की उद्दाम लहरों के बीच जब रस्बी को भी उस मछली की झलक दिखाई दी तो उसकी आँखें पथरा गईं।

वह कई घण्टों से किसी पागल की तरह वहाँ अकेली बैठी उस नहरनुमा जलाशय में नजरें गड़ाए थी। उसे पीले-केसरिया रंग की तार-तार हुई चादर जब पानी के वेग में थपेड़े खाती दिखी तो वह किसी ध्यानमग्न साधु की भाँति तन्द्रावश चलती हुई किनारे पर आई और उसने पानी में छलाँग लगा दी।

रस्बी ने जल-समाधि ले ली।

वह गहरे पानी के जल-जन्तुओं के भोज के लिए नियति द्वारा परोस दी गई।

अगले दिन स्थानीय अखबारों में किन्जान के असफल अभियान की एक छोटी-सी खबर छपी।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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