लोककथा // ईकटोमी और कायोटी–2 // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी :

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चालाक ईकटोमी


संकलनकर्ता


सुषमा गुप्ता


6 ईकटोमी और कायोटी–2[1]

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एक बार ईकटोमी[2] कहीं जा रहा था। चलते चलते वह बोलता जा रहा था — “हलो हलो, मैं ईकटोमी हूं। तुम सब मुझे जानते हो। मैं कल व्हाइट हाउस[3] में था क्योंकि अमेरिका के प्रेसीडैन्ट को मेरी सलाह चाहिये थी।

यह कल की बात है पर आज मैं स्कूल में बच्चों के लिये पढ़ने के लिये जा रहा हूं। मैं उनके लिये वे किताबें पढ़ूंगा जिनमें मेरे बहादुरी के कारनामे और मेरी दया की कहानियाँ लिखी हुई हैं। हर एक ने उनको पढ़ रखा है क्योंकि मैं बहुत मशहूर हूं।

मैंने अपनी रीति रिवाजों के अनुसार कपड़े पहन रखे हैं। आज मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है। मैं अच्छा दिखायी भी दे रहा हूं।

बच्चे मुझे देख कर मुझसे बहुत प्रभावित होंगे। मुझे मालूम है कि मैं देखने में अच्छा लगता हूं क्योंकि मैं उसी तरह का लग रहा हूं जैसा कि मैं इन किताबों में लगता हूं। ”

“मुझे देख कर बच्चों को लगेगा कि बहुत बहुत बहुत पहले हमारे पुरखे कैसे कपड़े पहना करते थे। हलांकि उनको यह भी कहना पड़ेगा कि मैं अपने पुरखों से ज़्यादा अच्छा लग रहा हूं। ”

“मैं बच्चों को बताऊँगा कि भैंसों के दिनों में हम लोग कैसे रहते थे। अब तो केवल मैं ही एक बड़ा बचा हूं न। ”

तभी ईकटोमी को किसी की हँसी की आवाज और ऊँचे सुर में गाने की आवाज सुनायी पड़ी। वह बोला — “अरे, यह क्या है?”

उसने इधर देखा उधर देखा पर उसे कोई दिखायी नहीं दिया। फिर उसको वह आवाज और गाने की आवाज दोबारा सुनायी दी तो उसने अपने मन में सोचा — “अरे, देखो तो, वे तो घास के मैदानों के कुत्ते[4] हैं।

ओह, ये घास के मैदानों के कुत्ते खाने के लिये तो मुझे अब भूख भी लग आयी है। घास के मैदान के भुने कुत्ते से बढ़ कर स्वादिष्ट खाना तो कहीं है ही नहीं। पर अब मैं उनको पकड़ूं कैसे?”

सो वह धीरे धीरे उनकी तरफ बढ़ा। वे कुत्ते एक खेल खेल रहे थे। एक एक करके वे आग की गरम राख में गरदन तक धंस जाते थे।

वे कोई खास गाना गा रहे थे जिससे वे उस गरम राख में भी जलते नहीं थे। पर जब वे और ज़्यादा नहीं सह पाते थे तो वे अपने साथियों को पुकारते थे और वे उनको उस गरम राख में से खींच लेते थे।

वे सब खूब हंस रहे थे और अपने खेल का खूब आनन्द ले रहे थे। ईकटोमी बोला — “ओ मेरे छोटे भाइयों, तुम क्या ही अच्छा खेल खेल रहे हो – राख में दब जाना और फिर उससे जलना भी नहीं। मैं भी यह खेल खेलना चाहता हूं। मुझे भी राख में गाड़ दो। ”

वे सब चिल्लाये — “ओह नहीं ईकटो। तुम जल जाओगे। पहले तुमको हमारा गीत सीखना पड़ेगा ताकि तुम जल न सको। अब तुम हमको ध्यान से सुनो और फिर हमारा गीत सीखो तब हम तुमको राख में गाड़ देंगे। ”

ईकटोमी बोला — “यह तो ठीक है पर मेरे पास इससे एक और ज़्यादा अच्छा विचार है। क्यों न मैं तुम सबको राख से ढक दूं – सबको एक साथ।

इस तरह से तुम्हारे गीत की आवाज इतनी तेज़ हो जायेगी कि मैं उसे अच्छी तरह से सुन सकूंगा। जब तुम उसमें से निकलना चाहो तो बस चिल्ला देना “बाहर”, और मैं तुमको बाहर निकाल लूंगा। ”

वे सब एक साथ बोले — “ईकटो तुम कितना अच्छा सोचते हो। ”

सो वे सब घास के मैदान के कुत्ते जल्दी से उसी तरह से एक साथ लेट गये, एक के बाद एक, जैसे मटर की फली में मटर के दाने लगे रहते हैं।

ईकटोमी को उनको गरम राख से ढकने के लिये काफी काम करना पड़ा। जब तक वह उन कुत्तों को गरम राख से ढकता रहा वे कुत्ते अपनी सबसे तेज़ आवाज में अपना गीत गाते रहे।

ईकटोमी उनको राख से ढकता जा रहा था और मन ही मन हँसता हुआ उनसे कहता जा रहा था — “जब तुम्हें बाहर निकलना हो तो बस “बाहर” चिल्ला देना। ”

थोड़ी देर बाद कुत्तों ने बाहर निकालने के लिये चिल्लाना शुरू किया पर ईकटोमी ने उनके चिल्लाने पर कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि वह तो उन पर और जल्दी जल्दी गरम राख डालने लगा।

घास के मैदान वाले कुत्तों ने उससे उनको बाहर निकालने के लिये बहुत प्रार्थना की। एक ने तो उससे दया की भीख भी मांगी क्योंकि वह जल्दी ही अपने बच्चों को जन्म देने वाली थी।

ईकटोमी बोला — “ठीक है। ” और उसने आ कर उसको बाहर निकाल दिया। फिर वह उससे बोला — “जाओ और आराम से रहो तो और ज़्यादा घास के मैदान वाले कुत्ते होंगे। ”

फिर ईकटोमी ने अपना दिल थोड़ा कड़ा कर लिया। उसने उन कुत्तों की चिल्लाहटों के लिये अपने कान बन्द कर लिये। और वे घास के मैदान के कुत्ते तब तक उस राख में भुनते रहे जब तक वे मर नहीं गये। उफ़, क्या यह भयानक नहीं है?[5]

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जब ईकटोमी को लगा कि वे अब अच्छी तरह से भुन गये हैं तो उसने उनको राख में से निकाल लिया और एक विलो के पेड़[6] की डंडियों पर ठंडा होने के लिये रख दिया और खुद एक पत्थर पर बैठ गया।


उन भुने हुए कुत्तों को देख कर उसके मुंह में पानी आ रहा था। जैसे ही वह अपना पहला कौर काटने जारहा था कि उसने देखा कि कायोटी[7] तो उसी की तरफ चला आ रहा था।

वह सोच रहा था कि “मैं कितनी भी कोशिश क्यों न करूं पर मैं कायोटी को पसन्द नहीं कर सकता। ”

कायोटी तो सचमुच में ही बहुत दुखी, बीमार और भूखा दिखायी दे रहा था। उसके शरीर पर कई पट्टियॉ बॅधी हुई थीं और वह बड़े दर्द के साथ लंगड़ाता हुआ तीन टांगों पर चल रहा था।

कायोटी बोला — “ओह ईकटो, मेरे बड़े भाई, मुझे बहुत ही कमजोरी महसूस हो रही है। मेहरबानी करके मुझे खाने के लिये थोड़ा सा मांस दे दो। मैंने बहुत समय से कुछ खाया नहीं है। ”

ईकटोमी बड़े कड़े दिल से जवाब दिया — “कभी नहीं। एक कौर भी नहीं। यह खाना मेरा है और यह सारा का सारा खाना मेरा है। चले जाओ यहाँ से। ” पर फिर ईकटोमी का इरादा बदल गया।

वह बोला — “ठीक है, मैं बहुत ही न्याय प्रिय आदमी हूं। मैं तुमको एक मौका देता हूं। हम लोग एक जुआ खेलते हैं। हम दोनों उस पहाड़ी के चारों तरफ दौड़ते हैं जो कोई भी जीत जायेगा वह इस सारे मांस को ले लेगा। ”

कायोटी बोला — “ठीक है मेरे छोटे भाई। ”

ईकटोमी फिर बोला — “तुम्हारी तबीयत तो मुझे कुछ ठीक नहीं लगती सो न्याय से भरी दौड़ दौड़ने के लिये मैं यह पत्थर जिस पर मैं बैठा हुआ हूं उठा कर दौड़ूंगा और तुम ऐसे ही दौड़ना। ”

सो उसने वह पत्थर अपने एक कम्बल में लपेट लिया और अपने कन्धे पर लटका लिया। फिर वह एकाएक बोला — “एक, दो, तीन , , , ,। ”

और फिर जितना तेज़ वह दौड़ सकता था दौड़ लिया। वह पत्थर उसकी कमर पर हिलता जा रहा था – ऊपर नीचे, ऊपर नीचे। हर कदम पर वह हिलता हुआ पत्थर उसकी कमर पर लग रहा था।

कायोटी उसके पीछे पीछे चिल्लाया — “रुक जाओ ईकटो, जरा रुको। ” पर ईकटोमी ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

“ईकटो, मेरे दोस्त। मुझे छोड़ कर मत जाओ। ”

जब ईकटोमी ने पहाड़ी के दूसरी तरफ का चक्कर लगाना शुरू किया तो कायोटी उससे बहुत पीछे था। वह बेचारा बड़ी दीन आवाज में चिल्लाया — “जरा मेरा इन्तजार तो करो ईकटो। ”

जब ईकटोमी पहाड़ी के पीछे आंखों से ओझल हो गया तो कायोटी ने अपनी सारी पट्टियाँ खोल दीं और उन घास के मैदान वाले कुत्तों को खाने के लिये दौड़ गया। क्योंकि बीमार होने का तो वह केवल बहाना कर रहा था। वह तो बिल्कुल ठीक था।

कायोटी वे भुने हुए कुत्ते खाता जा रहा था और चिल्ला चिल्ला कर अपने रिश्तेदारों को सुना सुना कर कहता जा रहा था — “खाना खाना खाना। आओ और खाना खा लो। देखो यहाँ कितना सारा खाना है। ”

उसके बहुत सारे रिश्तेदारों ने उसकी आवाज सुनी और भागे चले आये। उसके दूसरे रिश्तेदार जैसे कौआ, गरुड़, मैना आदि भी वहाँ दावत खाने आ गये। जो टुकड़े उन लोगों के खाने से गिर गये थे वे चूहे ने साफ कर दिये।

जब ईकटोमी पहाड़ी के दूसरी तरफ दिखायी दिया तो उसने देखा कि उसको तो धोखा दिया गया है। वह वहीं से चिल्लाया — “थोड़ा सा मॉस मेरे लिये भी छोड़ दो ओ कायोटी, थोड़ा सा मांस मेरे लिये भी छोड़ दो। ”

ईकटोमी हांफता हुआ बोला — “यह नाइन्साफी है। तुमने तो मेरे लिये बिल्कुल भी मांस नहीं छोड़ा। तुमने तो मुझे एक मौका भी नहीं दिया। ”

कायोटी मुस्कुराते हुए और मांस चाटते हुए बोला — “मैंने तो तुमको वैसा ही न्याय से भरा मौका दिया जैसा तुमने घास के मैदान वाले कुत्तों को दिया था। ”

कायोटी को जब लगा कि उसने काफी खा लिया है तो वह वहाँ से भाग लिया।

ईकटोमी चिल्लाया — “जरा तुम रुको तो सही। तुम चोरी करते हो। तुम किसी काम के नहीं हो। मैं तुम्हें देख लूंगा। ”

clip_image008और फिर इकटोमी अपने रास्ते चला गया क्योंकि सारे कुत्ते तो कायोटी और उसके रिशतेदार खा गये थे। अब वहाँ कुछ बचा ही नहीं था।

बच्चों तुम क्या सोचते हो कि बाद में ईकटोमी ने कायोटी का क्या देखा होगा।


[1] Iktomi and the Coyote – a story of Native American Indians, North America.

Adapted from the book : “Iktomi and the Coyote: a plains Indian story”. by Paul Goble. NY, Orchard Books. 26 p.

[This story is similar to the story “Skunk Ne Coyote Ko Pachhada” story given in the book entitled “Chipmunk, Mink Aur Skunk” by Sushma Gupta written in Hindi laguage.]

[2] Iktomi is a spider fairy but can take any form. Pronounced as Ee-k-tomee.

[3] White House is the residence of US President.

[4] Although Iktomi was calling them prairie dogs, but in reality they were not the prairies dogs, they were the ground squirrels.

[5] Since then prairie dogs’ tails have had burned-black tips and they have never again trusted two-legged, or let them get close to them.

[6] Willow tree – if you burn green willow sticks you will notice that they are still soaked with grease.

[7] Coyote is a small deser wolf. He is the hero of many Native American Indian’s folktales. His many stories are given in the book entitled “Chalak Coyote-1”, by Sushma Gupta written in Hindi language.


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,इथियोपिया व इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

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