दक्षिणी अफ्रीका की लोक कथाएँ // 4 - माँ जो धूल में बदल गयी // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — दक्षिणी अफ्रीका की लोक कथाएँ

अंगोला, बोट्सवाना, लिसोठो, मलावी, मोरेशस, मौज़ाम्बीक, नामिबिया, स्वाज़ीलैंड, जाम्बिया, ज़िम्बाब्वे

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संकलनकर्ता

सुषमा गुप्ता

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4 माँ जो धूल में बदल गयी[1]

यह लोक कथा दक्षिणी अफ्रीका के मलावी देश में कही सुनी जाती है। एक बार की बात है कि भगवान सूरज की एक बेटी थी। अपने पिता की तरह से वह भी एक चमकता हुई तारा थी। बल्कि वह अपने पिता सूरज से भी ज़्यादा चमकदार थी।

वह तारों की सीपियों के बने जूते पहनती थी और अपनी उँगलियों पर, पैरों में, कलाइयों में और कमर में गिरते हुए तारों की चमक पहनती थी।

इन सबको पहन कर वह बहुत चमक जाती और सूरज से भी ज़्यादा दूर तक अपनी रोशनी फैलाती। वह वहाँ बड़ी अक्लमन्दी और प्रेम के साथ राज करती थी।

एक दिन वह अपने राज्य के अनगिनत ग्रहों को देखने के लिये निकली तो उसने दूर एक कोने में एक ग्रह देखा। वह रास्ते से थोड़ा हट कर था – करीब करीब सूरज की उँगलियों के कोने पर। वह हरे और नीले रंग का था।

उसने उसको फिर से देखा और सूरज से बोली — “उस ग्रह पर, वहाँ मुझे अपनी गद्दी चाहिये पिता जी। मैं अपनी ज़िन्दगी उस हरे और नीले रंग की ठंडक में गुजारना चाहती हूँ।

सूरज ने एक आह भरी, फिर उसने और सितारों की तरफ देखा और फिर एक आह भरी। उसकी आँखें आगे के बहुत साल देख सकती थीं।

उसने कहा — “सब कुछ तुम्हारा है बेटी। तुम जहाँ जाना चाहो वहाँ जाओ और जो करना चाहो वह करो। पर इतना जान लो कि अगर तुम वहाँ गयीं तो तुमको अपनी बहुत सारी ताकत यहीं छोड़ कर जानी पड़ेगी।

तुम्हारा साफ रोशनी का यह चमकीला कोट, तारों की सीपी के बने तुम्हारे ये जूते, तुम्हारी पाजेब[2] और ये कंगन और माला जो सुबह और शाम के तारों की चमक से बने हैं – ये सब तुम वहाँ नहीं ले जा सकोगी।

उस ग्रह का हरा रंग बहुत ही नाजुक है वह तुम्हारी चमक की गरमी को सहन नहीं कर सकता और नीला रंग तो बिल्कुल ही सूख जायेगा।

हाँ तुम अपनी इस चमकीली पोशाक के बदले में तीन वरदान[3] लेना चाहो तो ले सकती हो जो तुरन्त ही बिना किसी शर्त के पूरे किये जा सकते हैं।

वह बोली — “ठीक है तो मुझे सोचने दीजिये पिता जी। ”

सो वह बरसों तक सोचती रही कि वह क्या करे। क्योंकि इस दुनिया में तो तारों और सूरज का यही तरीका है कि किसी भी काम को होने में बरसों लगते है हालाँकि उनके लिये वह समय एक पलक झपकने के बराबर का ही होता है।

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सो बरसों सोचने के बाद उसने अपना इरादा बना लिया। उसने सोच लिया कि वह अपना कोट, अपना सुबह का शाल[4], तारों की सीपी से बने अपने जूते, शाम से बनी अपनी सैन्डिल, शाम के बाद की चमक से बने अपने स्लिपर, सब कुछ यहीं छोड़ देगी और उस हरे नीले ग्रह पर जायेगी।

उसने यह सब सूरज को सौंपा और बोली — “पिता जी, मैने सोच लिया है। अब मैं हरे और नीले ग्रह पर जाऊँगी और उस ग्रह की माँ बनूँगी। ”

सूरज बोला — “तुमको जो चाहिये वह सब तुम ले जाओ पर साथ में यह भी सुनती जाओ कि तुम यहाँ पर बहुत याद की जाओगी। हालाँकि हम तुमको यहाँ से हमेशा और रोज देखते रहेंगे फिर भी यहाँ आने के लिये तुम्हारा हमेशा स्वागत है।

और एक बात और कि हमारी ये किरनें तुम्हारे इस नये शरीर के लिये तुम्हारे उस छोटे से ग्रह पर हमेशा ही अच्छी नहीं रहेंगीं। ”

सो सूरज के चारों तरफ अँगूठियाँ, पाजेबें, कंगन और तारों की मालाओं की कतार लग गयी और सारे आसमान में बिखर गयी जैसे दूध बिखर जाता है।

वे सब इस तरह से सज गये कि सूरज की बेटी उनको अपने नये हरे और नीले ग्रह से देख सके और याद रख सके कि वह कहाँ से आयी थी।

आखिर में वह चली, पहले एक तारे पर चढ़ कर जो समय और दूरी के साथ साथ अपनी एक लाइन बनाता गया। उसके बाद वह दिन की सुबह की कोमलता में रोशनी की एक किरन पर चढ ,कर गयी। पर अभी भी उसको बहुत दूर जाना था।

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उसने अपने साथ एक हल ले लिया था, एक ओखली और एक मूसल ले लिया था, एक अनाज बोने वाली टोकरी ले ली थी और एक पानी का बरतन ले लिया था।

उसने एक पकाने का बरतन, बाँस और लकड़ी की बनी कुछ प्लेटें, एक छोटी सी कुल्हाड़ी, एक चटाई और एक बड़ा सा ढकने का कपड़ा भी ले लिया था।

आखीर में वह रोशनी की पहली किरन पर सवार हो कर हरे नीले ग्रह पर आ गयी।

हरे नीले ग्रह पर आने के बाद उसको पता चला कि आसमान में वह ग्रह दूर से ऐसा हरा नीला क्यों दिखायी दे रहा था। वहाँ जंगल और घास के मैदान इतने सुन्दर थे कि उनको देख कर दिल खुश हो जाता था और उनके लिये पहले से भी ज़्यादा नरम हो जाता था।

उसने वहाँ उगे हुए सब पेड़ पौधों की तरफ बड़े प्यार से देखा और उसकी उस प्यार भरी नजर पा कर वे और ज़्यादा खुशी से बढ़ने लगे। हरी चीज़ें और ज़्यादा हरी हो गयीं।

वहाँ झाड़ियाँ थी, पेड़ थे और उन सबके उस पार थे रोशनी के कई रंगों के फूल जो उसके घर से बहुत दूर से आये थे – पीले, नारंगी, नीले, जामुनी, सफेद, गुलाबी, वसन्ती, हल्के हरे, हल्के नीले और इनके बीच के अनगिनत रंग।

वहाँ आ कर वह बोली — “बच्चे, अब मुझे बच्चे चाहिये, बहुत सारे बच्चे चाहिये। मुझे प्यार करने के लिये बच्चे चाहिये। घास में भागने के लिये बच्चे चाहिये, गाने के लिये बच्चे चाहिये, हँसने के लिये बच्चे चाहिये और पहाड़ों पर गूँजने के लिये आवाजें चाहिये।

पुकारने के लिये और गोद में बिठाने के लिये और जब मैं बूढ़ी हो जाऊँ और मुझे किसी की सहायता की जरूरत हो तब मेरी देखभाल करने के लिये मुझे बच्चे चाहिये।

जब मैं कमजोर हो जाऊँगी और जीते जीते बेहोश होने लगूँगी तब वे बच्चे मेरी ताकत बनेंगे और जब मेरा समय आयेगा तब वे बच्चे मुझे सुला देंगे। ”

उसकी इच्छा पूरी कर दी गयी और वहाँ बहुत सारे बच्चे हो गये। उसके चारों तरफ बच्चे ही बच्चे, इधर बच्चे उधर बच्चे, सामने बच्चे पीछे बच्चे। वहाँ बेटे थे लम्बे, पतले और इतने ताकतवर कि वे एक पैर पर घंटों खड़े रह सकते थे।

और कुछ वहाँ पर कोमल और दयावान बच्चे भी थे जो अपनी चीज़ें उनसे बाँटते थे जो उतने मजबूत और तेज़ नहीं थे कि वे उतनी देर तक खड़े रह सकें।

वहाँ बेटियाँ थीं जो लम्बी और मजबूत थीं अपने भाइयों की तरह। वे भाग सकतीं थीं और हिरन की तरह से सारा दिन कूद सकती थीं और फिर भी नहीं थकतीं थी।

और वहाँ कुछ ऐसी बेटियाँ थी जो बहुत ही कोमल और प्यारी थीं जैसे फूल, अपनी माँ जितनी प्यारी और अपने भाइयों और पिता जैसी दयावान। वे सूरज की बेटी के चारों तरफ घूमतीं और उसको माँ कह कर पुकारतीं।

और इस तरह वह तारा, सूरज की बेटी जो आसमान पर अपनी चमक से राज करती थी, इन सब बच्चों की माँ बन गयी जो हरे नीलेे ग्रह पर पैदा हुए थे।

वह उन सबको प्यार करती थी और हर एक की अच्छी तरह से देखभाल करती थी – लम्बे और ठिगने बच्चे, मोटे और पतले बच्चे, काले पीले और सुनहरी बच्चे। वह दिन रात सबकी देखभाल करती थी।

उनमें से कुछ बच्चे ऐसे थे जो केवल चलते थे कभी भाग नहीं सकते थे और कुछ ऐसे भी थे जो केवल भाग सकते थे और कभी चल नहीं सकते थे।

उनमें से कुछ बच्चे माइनर[5] थे जिनको सब कुछ अपने लिये ही चाहिये था और कुछ बच्चे नथिंग[6] वाले थे जिनके पास “नथिंग” शब्द के अलावा और कुछ नहीं था।

वहाँ “आई विल बी बैक”[7] वाले बच्चे भी थे जो आये और तुरन्त ही चले गये और कुछ “नौट मी” वाले बच्चे थे जो कभी यह नहीं मानते थे कि उन्होंने कभी कुछ गलत किया है।

उनमें से कुछ “मैं नहीं जानता”[8] वाले बच्चे थे, कुछ “उसने शुरू किया”[9] वाले बच्चे थे। कुछ “उसने कहा”[10] वाले बच्चे थे जो बहुत ही नीच स्वभाव के थे और वे दूसरों का बिल्कुल भी खयाल नहीं रखते थे। और भी बहुत तरह के बच्चे थे।

पर वह सबकी देखभाल करती थी। वह उन सबके लिये बारिश लाती थी। आसमान की हालत देखते हुए वह उनके लिये सूरज और उसकी धूप भी लाती थी।

और जब पौधों के आराम का समय आता तो वह उनके लिये पतझड़ ले कर आती और जब उनको नींद की जरूरत होती तो जाड़ा ले कर आती।

वह अपने बच्चों की देखभाल करती जब वे जगे हुए होते और जब वे सो रहे होते। सुबह वह हर किसी के उठने से पहले उठ जाती और एक बड़ी सी झाड़ू ले कर सारी सफाई करती।

फिर वह अपना हल ले कर अपने बच्चों के लिये अन्न उगाती। उसके बहुत सारे बच्चे बहुत खाते थे फिर भी वह उन सबके खाने के लिये काफी खाना रखती थी।

इस तरह काफी समय निकल गया। हालाँकि यह “सब बच्चों की माँ”[11] बहुत ही ताकतवर थी पर फिर भी क्योंकि अब उसको वहाँ रहते रहते बहुत साल हो गये थे इसलिये वह अब बहुत थक गयी थी। धरती के बच्चे भी अब बदल गये थे।

एक बार उसने सूरज से शिकायत की थी — “वे सब बहुत बदल गये हैं। अब मैं उनके लिये कुछ भी नहीं रह गयी हूँ। मुझे तो शक है कि वे मुझे देखते भी हैं या नहीं। ”

सूरज बोला — “याद रखो बेटी, वे सब तुम्हारे बच्चे हैं। उन्होंने तुमसे अपने आपको दुनियाँ में लाने के लिये नहीं कहा था तुम खुद उनको दुनियाँ में ले कर आयी थीं।

उनके साथ मिल कर काम करो तो तुमको खजाना वहाँ मिलेगा जहाँ तुम उसको सबसे कम उम्मीद करती होगी और उस समय मिलेगा जब तुम उसको सबसे कम उम्मीद करती होगी। ”

उसने अपने पिता की बात मानी और वैसा ही किया। उसने अपने उन बच्चों की सेवा करनी शुरू की जिन्होंने लड़ना शुरू कर दिया था। वे न तो अपने लिये कुछ करते थे और न ही एक दूसरे की सहायता करते थे बस हर समय एक दूसरे की शिकायत करते रहते थे।

“मुझे भूख लगी है। ”, “मुझे प्यास लगी है। ”, मुझे यह चाहिये। ”, “मुझे वह चाहिये। ”, “मुझे उठा कर ले चलो। ”, “मुझे अपनी गोद में बिठा लो। ”, “तुम तो माँ हो, तुम ही तो मुझे इस दुनियाँ में ले कर आयी हो। तुम ही मेरी देखभाल करो। ”

और “सब बच्चों की माँ” ने सब दुखी लोगों का इलाज किया, भूखों को खाना दिया, प्यासों को पानी दिया और उनको आदमी और औरत बनाया। फिर वे दूर जगहों में घूमते रहे। वे कभी कभी तो वापस आ जाते थे या फिर कभी वापस नहीं भी आते थे।

अब तक वे सब इतने नीच और जंगली हो गये थे कि वे एक दूसरे को जान से मार देते थे।

माँ का दिल दुखने लगा। जहाँ वह पहले सिर ऊँचा करके शान से रहती थी वहाँ अब उसका सिर दर्द और शरम से नीचे झुका जाता था क्योंकि उसके बच्चे हर चीज़ के लिये उसी को जिम्मेदार ठहराते थे।

उनके पास अपनी माँ के लिये कोई अच्छा शब्द नहीं था और यह दुख उसके दुखी दिल को टुकड़े टुकड़े करके तोड़ रहा था।

यही बात हवा में भी थी। वह ज़ोर से चलने लगी थी और पेड़ों को गिराने लगी थी।

सूरज की बेटी अब जब अपना काम करती थी तो वह केवल अपने लिये ही गाती थी। वह अब जब सुबह होती तो ठंडी हवा के रूप में गाती और सोयी हुई चिड़ियों को जगाती।

जब बारिश बहुत तेज़ पड़ती और वह खुली जमीन को छीलती हुई उसको समुद्र की तरफ ले जाती तब वह उस बारिश की ज़ोर की आवाज में गाती।

वह उस शान्त टप टप में भी गाती जो दुनियाँ के पहाड़ों के ऊपर पंखों की तरह पड़ती। और उन ठंडी जगहों में भी गाती जहाँ बारिश बरफ में बदल जाती थी। और उन जगहों में भी गाती जहाँ बारिश ओलों के रूप में पड़ती।

वह सारे दिन गाती हुई सारे आसमान में घूमती रहती जैसे वहाँ कोई था जो उसकी सहायता करता था। फिर वह नीचे अपने काम को देखती और फिर और गाती।

कभी वह जब जंगल में आग जलाने के लिये लकड़ी इकठ्ठा कर रही होती और या फिर ऐसे मैदानों मे होती जहाँ लकड़ी बहुत होती तो वह ऐसे जंगल के बारे में गाती जिनमें से कुछ को उसके घूमते हुए बच्चे काट देते।

वे उन पेड़ों के सारे के सारे तने ले जाते जो इतना बड़ा होने के लिये सालों लेते और धरती बेचारी अधमरी सी पड़ी रह जाती।

“सब बच्चों की माँ” जानती थी कि उसके बच्चे अब धरती की कोई परवाह नहीं करते थे। वे उसको वेशकीमती धातु को ढूँढने के लिये खोदते रहते पर फिर उसके उन घावों को ऐसे ही छोड़ देते।

जब वह धरती पर घूमती तो वह यह गीत गाती कभी धीरे से तो कभी ज़ोर से , , ,

तुम मुझे अपने दिल की इच्छा के पूरा होने तक जोतो और अन्न काटो

जब तक तुम मुझे नंगा नहीं कर देते घायल नहीं कर देते

सूखे को सजा देते हुए मुझे बंजर नहीं कर देते

भारी बारिश मेरे माँस को तकलीफ देती है

सो जो भी यहाँ से गुजरता है मुझ पर थूकता है

और मैं सब सहती हूँ, मैं जो माँ हूँ और देने के लिये पैदा हुई हूँ

मैं अपने लिये कुछ भी नहीं बचाती

मैं दुनियाँ को खिलाती हूँ और मेरे बच्चे देखते हैं

जब मैं उनके द्वारा जहर दे कर लिटा दी जाती हूँ

क्योंकि बच्चों के कान धरती के गीत को सुनने के आदी नहीं थे इसलिये उसने क्या गाया वे उसकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं देते।

केवल कभी कभी जब वह शाम को गाती, वह भी कभी कभी, तो उसको सुन कर उन बच्चों के दिल जो कभी बहुत नम्र और एक दूसरे के लिये दया से भरे हुए हुआ करते थे भारी हो जाते।

जैसे जैसे बच्चे और दूर तक बिखरते चले गये वे और और और ज़्यादा जगह माँगते गये। वे रोज सुबह उठ कर पेड़ों के ऊपर लड़ते। वे चमकते हुए पत्थरों पर लड़ते। वे जमीन के छोटे छोटे टुकड़ों पर लड़ते।

“यह पेड़ मेरा है। ”, “नहीं, यह पेड़ मेरा है। ” हर जगह यही सुनायी पड़ता है “मेरा मेरा मेरा। ”

उन्होंने जंगलों से चिड़ियाँ इकठ्ठी करके पिंजरों में बन्द कर ली हैं जहाँ उनके लिये उड़ने की जगह ही नहीं है। उन्होंने समुद्र से मछलियाँ निकाल कर डिब्बों में बन्द कर ली हैं जहाँ उनको तैरने की जगह नहीं है।

वे लोग जानवरों को केवल अपने आनन्द के लिये मार देते हैं और उनके सिर और खाल इकठ्ठा कर लेते हैं। कभी कभी वे जंगलों से भी जानवरों को पकड़ लाते हैं और उनको कैद कर लेते हैं। वे पेड़ काट कर जंगलों को नंगा कर देते हैं।

सो जब धरती थक गयी और “सब बच्चों की माँ” बूढ़ी हो गयी, तो वह बीमार हो गयी और मर गयी। बच्चों को यह पता ही नहीं था कि उनको किसी की परवाह करनी थी।

उसके मरने के बाद उसकी दूसरी इच्छा पूरी की गयी – कि उसकी देह को काले कपड़े पहना कर जितना भी उससे हो सकता था उसके बच्चों की सेवा करने दिया जाये।

इस तरह मरने के बाद भी वह काम करती रही हर दिन और हर रात, काले कपड़े पहन कर। बल्कि अब वह और ज़्यादा काम करती थी क्योंकि अब उसको सोने की भी ज़रूरत नहीं थी।

पर बच्चों ने अभी भी उसकी परवाह नहीं की। वे अभी भी उससे यही कहते रहे – हमको दो, हमको दो। और वह उनकी लगातार सेवा करती रही।

क्योंकि वह तो अब भूत[12] थी इसलिये उसने कुछ नहीं कहा। अब वह केवल रात को और सुबह पौ फटे[13] गाती थी क्योंकि हवा ने उन गीतों को केवल घाटियों में और पहाड़ों में ही पाया जहाँ वह तभी भी गूँजते रहते थे।

माँ ने अपनी एक बच्ची की खास परवाह की थी जो बहुत पहले पैदा हुई थी पर जो बात नहीं कर सकती थी। उस बच्ची की आँखें बहुत सुन्दर थीं और उसके काले बाल चोटी बन कर उसके सिर के पीछे लटके हुए थे। वह बच्ची बहुत ताकतवर भी थी।

जैसे जैसे उसके बाल बढ़ते गये उसका दिल भी बड़ा होता गया और उसके हाथ पाँव भी मजबूत होते गये और वह एक सुन्दर स्त्री बन गयी।

एक दिन जब वह अपना काम कर रही थी कि वह अचानक रुक गयी और उसने ऊपर माँ की तरफ देखा। उस समय वह पहली बार बोली — “माँ मैं तुम्हारी सहायता करूँगी। तुम बैठ जाओ और आराम करो। ”

उसकी आवाज में बहुत दया भरी हुई थी और उसके यह कहने के बाद एक शान्ति सी फैल गयी। दया ने तो यह ग्रह बहुत दिन पहले ही छोड़ दिया था और अब तो यह भी लगने लगा कि सब कुछ रुक सा गया है, हालाँकि केवल एक पल के लिये ही।

माँ ने एक उसाँस भरी और बोली — “धन्यवाद मेरी बच्ची। ”

केवल इस एक दया भरे काम से माँ आज़ाद हो गयी। वह जमीन पर एक ढेर के रूप में गिर पड़ी और धूल में बदल गयी।

तभी वहाँ एक बहुत बड़ी हवा आयी और उसको उड़ा कर आसमान की तरफ फेंक दिया जहाँ वह चाँद बन गयी जिसको हम आज वहाँ आते जाते देखते हैं।

उसकी तीसरी इच्छा थी कि एक बहुत ही कोमल सी रोशनी उस के ऊपर चमके ताकि वह अपने बच्चों और हरे नीले ग्रह को साल के हर महीने देख सके। वह भी पूरी की गयी।

और आज तक चाँद हर महीने अपने बच्चों को लड़ते झगड़ते देखती है। वह अपनी बेटियों को देखती है कि वे सबकी सेवा कर रही हैं जैसे पहले वह खुद करती थी।

पर चाँद की बेटियों के बच्चे अभी भी लड़ते हैं और अभी भी शिकायत करते हैं।

यह सब देख कर चाँद को अपना चेहरा छिपाना पड़ता है और रोना पड़ता है और इससे पहले कि वह यह सब देख सके वह एक बहुत ही पतले हँसिये के रूप में दिखायी देती है। उसके बाद वह धीरे धीरे बाहर आती है और आखिर में अपना प्यार से भरा हुआ पूरा चेहरा दिखाती है।

ऐसी ही रात को कुछ लोग उसका प्यार पा लेते हैं और उसे बाँट देते हैं। चाँद की बेटियाँ उनके बारे में गाना गाती हैं जो सेवा करते हैं और उनके लिये एक और इच्छा पूरी करने की इच्छा प्रगट करतीं हैं – कि बच्चे अपनी माँ को एक बार फिर से प्यार करना सीख सकें।


[1] Mother Who Turned in to Dust (Story No 29) – a folktale from Malawi, Southern Africa.

Adapted from the book : “Favorite African Folktales”, edited by Nelson Mandela.

Told by Kasia Malaka. A creation story

[2] Translated for the word “Anklet” – an ornament worn in the feet

[3] Boon

[4] Translated for the word “Cloak”. See its picture above.

[5] Miner – everything is mine

[6] Nothing – who had nothing

[7] I will be back

[8] I don’t know

[9] He started it

[10] She asked for it

[11] Mother of all Children

[12] Ghost

[13] At the daybreak

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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