लघुकथा // गोद // राकेश सुमन

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गोद

सूखे पत्तों की चरमराहट से कभी-कभी उस निर्जन का शांत टूटता। कभी-कभी किसी पक्षी के अचानक बोल उठने से निर्जन की नीरवता भंग हो जाती थी। " पापा औड़ कितना दूड़ है।" बालक चलते-चलते थक गया था। " बस थोड़ा सा और। " पिता ने कहा। पिता और पाँच वर्षीय बालक सुनसान वन में चले जा रहे थे। वन की वह पगडंडी सुरम्य तो थी किंतु उसकी निर्जनता तनिक भयप्रद भी थी। ऊँचे-ऊँचे बरगद, आम, कटहल के वृक्षों के बीच से निकलती हुयी वह पगडंडी ऐसी कि वृक्षों के अतिरिक्त कुछ न दिखे। कहीं-कहीं मोहक फूलों से लदा कोई जंगली वृक्ष ध्यान खींचता तो कहीं मयूर, तोते और गिलहरिया दिखते और विलुप्त हो जाते। शहर तक जाने वाली सड़क तक पंहुचने के लिये यह छोटा रास्ता था। कदाचित अब अपने निर्णय पर पिता को पश्चाताप हो रहा था। पगडंडी पर चलने से सूखे पत्त्तों की खड़खड़ाहट उस नीरवता में अजब सी भयावहता भर देती। " देखो तोता " पिता ने पुत्र का ध्यान पास के वृक्ष की तरफ खींचने का प्रयास किया। उस नीरवता को काटने का संभवतः यह एक प्रयास था। वन के दृश्यों में उलझे बालक ने तोतों के समूह की ओर देखा और एक मुस्कुराहट उसके मुख पर बिखर गयी थी। “ पापा , यहाँ तो बहुत से जानवड़ होंगे ना ?” “ हाँ बेटा ”। “ शेड़ भी “। बालक की उत्सुकता ने पिता की उदिग्नवता को बढ़ा दिया था। “ नहीं बेटा , यहाँ नहीं हैं “। कुछ विचार मग्न हुआ बालक फिर उस मनोरम वनस्थली के सौंदर्य में खो गया।

अचानक सशंकित पिता के पाँव रुक गए थे। पिता के हाथ में दी गयी अपनी कलाई पर जोर पड़ने से बालक भी रुक गया था। पिता ने सारा बल अपनी श्रवण शक्ति पर केन्द्रित करते हुए इधर उधर देखा। सूखे पत्तों पर किसी के चलने के आभास ने पिता को जड़वत कर दिया । उसका रक्त मानो ज़मने लगा था। पिता ने ध्यान से देखने का प्रयास किया। आगे की ओर कुछ दूर पर उसे लगा जैसे पगडण्डी पर पड़े पत्ते अपने आप हिल रहे हैं। किसी संकट की आशंका में बालक पिता के पैरो से सट गया था। उनसे बारह कदम आगे जहाँ पत्ते अपने आप हिल रहे थे , एक गेहुंअन रेंगता हुआ पत्तों से बाहर आ गया था। पगडण्डी पार करता वह घने वन की ओर मुड़ रहा था। पिता का कंठ सूखने लगा था। दोनों बिना हिले खड़े थे। गेहुँअन उनकी उपस्थिति से अनभिज्ञ सरसराता हुआ दूर चला जा रहा था। कुछ ही पलों में वह लुप्त हो गया था। भय से पिता के पाँव कांप गए थे और बालक पिता की गोद में चढ़ गया था।

स्वयं पर नियंत्रण पा कर पिता ने पुनः पाँव बढ़ाया। बालक पिता की गोद में बैठा रहा। पिता पहले से अधिक सतर्क हो चल रहा था , किन्तु बालक पहले से अधिक आश्वस्त था। आश्वस्त इसलिए क्योंकि अब वह सबसे सुरक्षित स्थान पर बैठा था।

------ राकेश सुमन

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