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[मारवाड़ी कहानी “मैणत री कमाई” का हिंदी अनुवाद] कहानी – मेहनत की कमाई - लेखक एवं अनुवादक - दिनेश चन्द्र पुरोहित

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टेक्सी चला रहा ड्राइवर, कान के पास मोबाइल रखकर बातें करता ही जा रहा था..इधर गाड़ी  में बैठे चाँद कौरजी की चिंता बढ़ती जा रही थी, के “यह भला आ...

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टेक्सी चला रहा ड्राइवर, कान के पास मोबाइल रखकर बातें करता ही जा रहा था..इधर गाड़ी  में बैठे चाँद कौरजी की चिंता बढ़ती जा रही थी, के “यह भला आदमी कब पहुंचाएगा हवाई अड्डा..? बेचारे चांद कौरजी सोचते ही जा रहे थे, के “अरे भला आदमी कब से मचका रहा है, मोबाइल...? यह करमज़ला तो छोड़ता ही नहीं, इस ठीईकरे को..? कल है होली, इस पर्व के दिन मुझे परिवार के साथ रहना बहुत ज़रूरी! मगर यह करमठोक छोड़ ही नहीं रहा है, मोबाइल ! ना देख रहा है, बखत..और ना देख रहा है, रास्ता..? बस यह गधा तो मोबाइल पर एक ही बात को घिसता जा रहा है, के “मालिक मेरे दिल पर चोट लग गयी..” अब मैं क्या करूं, मेरी मां..? इसकी यह आदत मुझे पहले मालूम होती, तो पहले से ही दूसरी टेक्सी करवा देती। अब बेचारे चांद कौरजीसा, करें क्या..? अब तो फंस गए, इस टेक्सी में आकर। आख़िर वक्त बिताने के लिए, उस ड्राइवर की बातों में रूचि लेने लगे। और सोचने लग गए, के “इसकी यह कही बात ‘इसका दिल टूट गया..?’ कैसे मान  ली जाय..? क्या तो इसकी उम्र है, और कैसी मशीनी ज़िंदगी यह बिता रहा है..? कहाँ मिलता होगा इसको वक्त, किसी लड़की से दिल लगाने का..? क्या इसका दिल कोई कांच का खिलौना है, जो झट टूट जाय..? फिर यह गधा, बार-बार दिल टूटने की बात क्यों कहता जा रहा है...?”


अब चांद कौरजीसा पहले से ज़्यादा, इसकी बातों पर ध्यान देने लग गए। अगली बातें सुनकर उन्हें यह मालूम पड़ा, के “जिस इंसान से वह अभी तक बात करते जा रहा है, वह औरत नहीं है, मर्द है।” अब वह अगले आदमी को अपनी सफ़ाई पेश करता हुआ कहने लगा, के “किस तरह वह अपनी औरत को आख़िर तक यह समझाता रहा है, के “भली औरत शहर में दूध की किल्लत चल रही है, ख़ाली सही वक्त और सही दर पर डेयरी का ही दूध आ रहा है। इस दूध को हासिल करने के लिए, लम्बी-लम्बी कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। अपने पड़ोसी सिरे मलसा, जो बैंक में काम किया करते हैं। इस तरह लम्बी लाइन में खड़े रहकर, दूध लाना..उनके लिए, बहुत तकलीफ-देह है। इस वक्त उनकी पत्नी गर्भवती है, अभी उनको नवमा महीना चल रहा है। इन परिस्थितियों में उनका लम्बी लाइन में खड़ा रहना, बच्चे और मां के लिए अच्छा नहीं है। इस बम्बई शहर में, सारे सरकारी और गैर सरकारी दफ़्तर दूर-दूर आये हुए हैं। इस हालत में सिरे मलसा दुविधा में फंस गए हैं, के तो वे दूध की लम्बी लाइन में खड़े रहकर दूध लाये या अपने दफ़्तर जायें..? दूध तो तुम्हें भी लाना पड़ता है, फिर दो आदमी को क्यों लाइन में खड़ा करें..? तुम ही ला दिया करो, दूध। क्या जाता है, तुम्हारा..?” 

       
इतनी बात करने के बाद, मोबाइल बंद करके वह उसे जेब में रख दिया और बाद में गाड़ी का होर्न बजाने लगा। चोराए पर कई गाड़ियां रास्ता ब्लोक हो जाने से, आगे खड़ी थी। अब वह गाड़ी को, आगे कैसे ले जाए..? इधर ट्रेफिक पुलिस वाला लगातार विसल बजा-बजा कर, यातायात को नियंत्रित कर रहा था। यह हाल देखकर, ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी, फिर चांद कौरजीसा से बोला “बहनजीसा, ट्रेफिक ज़ाम हो गया है। पांच मिनट तक, यह रास्ता खुलेगा नहीं। कहीं आपको, देरी तो नहीं हो रही है..?” उसकी बात सुनकर, चांद कौरजीसा अपने लबों पर मुस्कान लाकर कहने लगी “तू काहे फ़िक्र करता है रे..? घंटे भर पहले निकली थी, हवाई अड्डा जाने के लिए। पहुँच जायेंगे, एक्यूरेट टाइम पर...बस तू तो यह बता, के तेरे घर दूध पहुँच जाएगा...फिर, काहे फ़िक्र करता है, रे..?”


भोला मुंह बनाकर, वह कह बैठा “बहनजीसा, फ़िक्र करूं क्यों नहीं..? सिरे मलसा आख़िर मेरे पड़ोसी ठहरे, उनकी पत्नि गर्भवती है। उनको नवमा महीना चल रहा है, इस वक्त लम्बी कतार में खड़े रहना...उनके स्वास्थ्य के लिए, ख़तरा है। कल होली का दिन है जी, कई मेहमान आयेंगे इनके घर फिर...” अचानक ड्राइवर मालुम पड़ा, के ज़ाम  हट गया है। अब आगे कुछ नहीं बोलकर, उसने गाड़ी स्टार्ट कर दी। गाड़ी अब सीधे-सपाट मार्ग पर आ गयी, फिर क्या...? वह हवा से, बातें करने लगी। चांद कौरजीसा ठहरी, जोधपुर शहर की औरत। ऐसी औरतें, कभी बिना बोले नहीं रह सकती। झट कहने लगी “मगर, काहे तू दूसरों के दुःख देखकर दुबला होता जा रहा है..?” बालों को एक तरफ़ झटका देकर, वह कहने लगा “बहनजीसा! आप और हम सभी इंसान हैं, इन जानवरों से ज्यादा विकसित। जहां एक जानवर दूसरे जानवर की मदद करने के लिए तत्पर रहता है, वहां हम इंसान दूसरों की मदद के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ते..? क्या हम इंसानों में, शक्ति ख़त्म हो गयी या हमें ख़ाली स्वार्थ ही दिखायी देता है..? इंसानों को जानवरों से, दो क़दम आगे बढ़कर चलना चाहिए। क्या कहूं, बहनजीसा..हमें तो बिना कहे, एक दूसरे की मदद करते रहना चाहिए। आज मैं सिरे मलसा की मदद करूंगा, तो कल वक्त पड़ने पर सिरे मलसा मेरी मदद करेंगे। यही इस खिलकत का क़ायदा है, इसी कारण इंसान दिन-प्रतिदिन प्रगति करता जा रहा है। मेरा यह कहना है, मदद करना समाजिक प्राणी का धर्म है।” इतना कहकर, वह गाड़ी का होर्न तेज़ी से बजाने लगा। अब सामने, क्या देखता है...?

अचानक गाड़ी के रास्ते में एक कुत्ता आ गया था...वह बेचारा जान बचाकर, किलियाता हुआ तेज़ी से भगा। उसे किलियाते हुए देखकर, पास खड़ा कुत्तों का झुण्ड भौंकता हुआ गाड़ी के पीछे दौड़ा। मगर गाड़ी की रफ़्तार अधिक होने के कारण, वे गाड़ी को पकड़ नहीं सके। आख़िर थक कर सारे कुत्ते रुक गए, मगर चुप नहीं हुए, पीछे से भौंकते रहे। इस वाकये को देखकर ड्राइवर बोला “बहनजीसा, अपने साथी को आफ़त में जानकर ये सारे कुत्ते किस तरह गाड़ी का पीछा किया..? देख लिया, आपने..? जब ये जानवर एक दूसरे की मदद करना नहीं भूलते, तो फिर हम इंसान सामाजिक प्राणी होकर क्यों भूल जाते हैं...इंसानियत को..? समाज में रहने के क़ायदे, हम कैसे भूलते जा रहे हैं..?” इतना कहकर, ड्राइवर चुप हो गया। उसकी कही बातें, अब चांद कौरजीसा को बहुत अख़रने लगी। जहां वे ख़ुद एक एन.जी.ओ. के कर्मठ कार्यकर्ता है, वहां यह अदना सा ड्राइवर उन्हें इंसानियत का पाठ पढ़ता ही जा रहा है..? अब वे सोचने लगी, के इस ड्राइवर का मुफ़ाखिरत कैसे तोड़ा जाय..? यह सोचकर, चांद कौरजीसा आख़िर में कहने लगी “भाई रे, आज़कल ज़माना अच्छा नहीं है। हम लोगों को, अपने हाल में ही मस्त रहना चाहिए। पड़ोसी क्या करता है, क्या नहीं करता है..इसका हमें ध्यान नहीं रखना चाहिए। अब देख, शास्त्री नगर कोलोनी में मेरा बंगला है, मेरी पड़ोसन है बहुत पैसे वाली। घर का सभी काम नौकर करते हैं, उसके पास कोई काम नहीं...ख़ाली मटर गश्ती करना, और बोलकोनी में बैठकर बाहर के नज़ारे लेना..बस, यही काम वह किया रहती। एक दिन की ऐसा हुआ, वह बोलकोनी में बैठी हुई सड़क पर गुज़रने वाले राहिगीरों को देखती जा रही थी। अचानक उसे एक गुंडा नज़र आया, उसने वहां गुज़रते सेठ को चाकू से गोद-गोद कर मार डाला। उसने इस पूरे मंजर को, उसने अच्छी तरह से देखा। संध्या के वक्त पुलिस तहकीकात करने आयी, यह गेलसफ़ी बिना बुलाये पुलिस के पास जा पहुंची। और बिना पूछे, गुंडे की ओलाखाण पुलिस को बता दी। उस ओलाखाण के तहत वह गुंडा पकड़ा गया! मगर, कुछ समय बाद वह ज़मानत पर छूट गया। अब इसके बाद, उस गुंडे ने इन महारानीजी का जीना दूभर कर दिया। कभी तो वह गुंडा उस महारानी के पति को मारने की धमकी दे जाता, तो कभी बीच रास्ते उसकी जवान छोरी को छेड़ने लगा! और कभी, उस महारानी को, बेटी के अपहरण की धमकी दे जाता। इस तरह, उस औरत का जीवन नरक बना दिया। अब बोल, इस औरत के लिए भलाई करनी क्या काम आई..? अगर चुप-चाप बैठी रहती, तो यह समस्या नहीं आती।” इतना कहकर चांद कौरजीसा लम्बी-लम्बी साँसे लेते हुए चुप हो गए। अब उनकी साँसे धौंकनी की तरह चलने लगी, बस उनसे इतना ही आगे बोल गया के “भाई रे, मुझे सांस लेने में कठिनाई आ....” इसके आगे वे बोल नहीं सके, ड्राइवर ने झट ए.सी. बंद करके कार की सारी बारियाँ खोल दी! फिर शान्ति से चांद कौरजीसा को कहने लगा “बहनजीसा, मुझे लगता है, आपको अस्थमा की बीमारी है। आप पम्प लाये हो तो, जल्दी से बाहर निकालो।” मगर चांद कौरजीसा से बोल नहीं गया, बस उन्होंने अंगुली के इशारे से बताया के “वे पम्प लेकर नहीं आये हैं।”      


यह जानकर, ड्राइवर ने झट गाड़ी  की रफ़्तार बढ़ाई, और रास्ता बदलकर झट गाड़ी को एक गली में डाली। फिर वहां एक नर्सिंग होम के बाहर, गाड़ी ले जाकर रोक दी। इमरजेंसी रूम में इतला होते ही, वार्ड बोय स्ट्रेचर ले आया और उस पर चांद कौरजीसा को लिटा कर इमरजेंसी रूम में ले गया। डाक्टर साहब ने झट तत्कालिक उपचार दिया, उपचार देते ही उनकी साँसे सामान्य होने लगी। अब वे आँखें खोलकर, डाक्टर साहब को देखने लगी। इस वक्त डाक्टर साहब ड्राइवर को कह रहे थे, के “भाया, शुक्र हो। सही वक्त पर मरीज़ को यहाँ लेकर आ गए, आप। और, अस्थमा के अटेक से इनको बचा दिया।” इसके बाद, केपसूल और दमे का पम्प देकर चांद कौरजीसा को डिसचार्ज किया। डिस्चार्ज होने के बाद, चांद कौरजीसा जा पहुंचे रिसेपनिस्ट के पास! और, उसे कहा “भाई, तू मेरे इलाज़ और दवाइयों के पैसे ले ले।” वह हंसकर, कहने लगा के “क्यों मज़ाक करती हैं, आप...? आपके भाई साहब ने यहाँ आकर, बिल के पैसे जमा कर दिए हैं। आप निश्चिंत होकर जाइये।” इतना कहकर, उसने गाड़ी के पास खड़े ड्राइवर की ओर इशारा कर के कह दिया के “उन्हीं भाई साहब ने यहाँ आकर, पैसे जमा करवा दिए हैं।” अब अहसान से दबे हुए, चांद कौरजीसा गाड़ी के पास आकर उस ड्राइवर का मुंह ताकने लगे। ऐसा लग रहा था, के उनकी ज़बान तालू पर चिपक गयी हो...? उनसे कुछ बोल नहीं गया, बस ख़ाली प्रेम के आंसू नयनों से बाहर आ गए। गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर, वह ड्राइवर कहने लगा के “बहनजीसा, अब आप गाड़ी में बिराज़ो!” मगर चांद कौरजीसा, कहां गाड़ी में बैठने वाले...? वे तो हक्के-बक्के होकर, वहीँ खड़ी रह गयी और शीरी ज़बान से कहने लगी के “भाई रे, तूने जो दवाई वगैरा के पैसे दिए..मुझसे वापस ले ले। बोल, कितने रुपये हुए..?” इतना सुनते ही, ड्राइवर अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरता हुआ कहने लगा के “क्या बेफुजूल की बातें कर रही हो, बहनजीसा..? एक तरफ़ तो आप मुझे भाई कहती जा रही हैं, दूसरी तरफ़ आप पैसे लेन-देन की बातें करती जा रही हैं..आख़िर, यह दोहरा व्यवहार क्यों कर रही हैं, आप..? आप मेरी गाड़ी में बैठे थे, और मैं इस गाड़ी को अपने घर का दर्ज़ा दिया करता हूँ! घर आये मेहमान की अगर तबीयत ख़राब हो जाय, तो क्या उनसे इलाज़ के पैसे मांगे जाते हैं क्या..? चलिए, अब गाड़ी में बिराज़ जाइये...वक्त हो रहा है, प्लेन उड़ने का। मेरी कसम आपको, आगे से ऐसी लेन-देन की बातें की तो..मेरा मरा मुंह देखेंगी आप।” इतना कहकर जबरदस्ती उन्हें गाड़ी में बिठाकर, गाड़ी स्टार्ट की। थोड़ी देर में ही गाड़ी हवा से बातें करने लगी।
अब गाड़ी गली से बाहर निकलकर, मुख्य सड़क पर आ गयी। रास्ते में यह बातूनी ड्राइवर, चांद कौरजीसा से कहने लगा के “कई सालों पहले मेरे बड़े बेनसा, आपकी शास्त्री नगर कोलोनी में रहते थी। उनका नाम आइचुकाजी और मेरे बहनोईसा का नाम माई दासजी, क्या आप उन्हें जानती हैं या नहीं..वे दूध बेचा करते थे, उनके एक बड़ा गायें-भैंस्यो का तबेला था। और उसके पास ही, उनकी झोपड़ी थी।”                     
अपने दिमाग़ पर ज़ोर देकर, चांद कौरजीसा सोचने लगी के “ये दोनों कौन हो सकते हैं..? माई दासजी का नाम, कुछ उन्हें जाना-पहचाना लगा! जैसे ही दूध की बातें उन्हें याद आयी, याद आते ही उनके मानस-पटल में बीती हुई यादें चल-चित्र की तरह उभरने लगी।


ये दोनों पति-पत्नि बहुत लिहाज़ी, और सीधे-सादे इंसान थे। दूसरे लोगों की मदद के लिए, हर वक्त वे आगे रहते। उनको लोगों की मदद करने में, बहुत आनंद आता था। इन दोनों का सेवाभावी होना, इन अमीरों को अच्छा नहीं लगता था। जहां इनकी झोंपड़ी इनके आँखों में खटकती थी, वहां ये सच्चे इंसान उनके लिए रेशमी कपड़े में लगे पैबंद के बराबर थे। इन अमीरों की आलीशान बिल्डिंगों के पास, इनकी झोंपड़ी और यह तबेला होना...इन अमीरों को बहुत खटकता था, क्योंकि ये दोनों ठांव इनकी बिल्डिंगों की कीमत गिरा रहे थे। यहाँ तो ये कोलोनी वाले यह चाहते थे, के “ये दोनों पति-पत्नी ये दोनों ठांव बेचकर, अपने गाँव चले जाय...ताकि उनकी बिल्डिंगों के दाम, आसमान को छू जाय।”    


ये दोनों पति-पत्नि अपने बच्चों को, पढ़ाना-लिखाना चाहते थे। इसलिए कोलोनी वालों के बच्चों के पारित होने के बाद, उनकी पिछली किताबें मांगा करते थे, मगर ये बेरहम लोग...उनके मुंह पर ही, उनको देने से साफ़ मना कर देते थे। फिर उनकी आँखों के सामने ही, उन किताबों को वे रद्दी वालों को बेच देते। फिर उन्हीं किताबों को, वे दोनों पति-पत्नि उन रद्दी वालों से खरीद कर ले आते और अपने बच्चों को पढने के लिए दे देते। इन कोलोनी वालों का इतना कटु व्यवहार देखकर भी ये दोनों पति-पत्नि अपने दिल में उनके प्रति कोई  मैल नहीं रखते। भले माई दासजी कितने ही ईमानदार बने रहो उनके लिए, मगर इन कोलोनी वालों की कटुता ख़त्म होने का कोई सवाल ही नहीं। चाहे वे गाय-भैंस के थनों से सीधा दूध निकालकर उनकी बरनी में दाल देते, फिर भी ये कोलोनी वाले यही कहते के “माई दास का बच्चा, साला पानी मिलाकर दूध बेचता है।” कई बार ऐसे भी होता था, ये लोग फ़ूड इन्सपेक्टर को भड़का कर दूध का सेम्पल दिलवा देते। फिर बाद में ये ही लोग मुंह की खाते थे, क्योंकि सेम्पल में मिलावटी दूध नहीं मिलता। इतनी तकलीफें देने के बाद भी, इन कोलोनी वालों का दिल नहीं भरता...वे तो दूध का बिल चुकाने के वक्त, दूध का दाम देने में आनाकानी करते रहते। 


एक दिन सबह-सबह दरवाज़े पर दस्तक हुई, चांद कौरजीसा ने उठकर दरवाज़ा खोला। सामने उन्हें घबराया हुआ, बैंक का चपरासी दिखायी दिया। उनको देखकर, चपरासी बोल उठा के “भाबीसा अभी-अभी माई दासजी की बहू को, प्रसव पीड़ा चालू हुई है। उनके घर में, उनके सिवा कोई ओर औरत मौजूद नहीं है! मेहरबानी करके आप उनके घर चलिए, ऐसे वक्त एक औरत ही औरत के काम आती है। मर्दों से यह काम, होगा नहीं।” चपरासी की घबराई हुई आवाज़ सुनकर, चांद कौरजीसा के पति उठ गए और लिहाफ़ से मुंह बाहर निकालकर गुस्से में बकने लगे “क्यूं आया रे, कम्बख्त..? मेरी औरत को डायन समझ रहा है, क्या..? जो आ गया, जापा करवाने। जाऽऽ भाग यहां से। लेजा तेरी पत्नी को, सुबह-सुबह आ गया माता का दीना...मेरी नींद ख़राब करने।” उनकी बात सुनकर, बेचारा चपरासी घबरा उठा। फ़िक्र की रेखाएं, उसकी जब्हा पर दिखायी देने लगी। वह बेचारा लाचारगी से चांद कौरजीसा की ओर देखने लगा, के शायद चांद कौरजीसा के दिल में दया पैदा हो जाय...? उसको उनकी तरफ़ ताकते देखकर उनके शौहर बिगड़े सांड की तरह ज़ोर से चिल्लाते हुए कहने लगे के “बावली पूंछ, उनको क्यों देख रहा है..? मेरी औरत को दया-वया आने वाली नहीं, अब चला जा..वापस आने में देरी हो जाय, तो बैंक में अर्जी देकर जाना। समझ गया, या नहीं...?” इतना कहकर, वे लिहाफ़ ओढ़कर वापस सो गए। मैनेजर साहब की ऐसी तल्ख़ आवाज़ सुनकर, बेचारा चपरासी सहम गया। डरे भी क्यों नहीं, आख़िर यह चपरासी जिस बैंक में काम करता है, ये चांद कौरजीसा के साहब भी उसी बैंक में मैनेजर है। जाने के पहले एक बार और उस चपरासी ने चांद कौरजीसा से चलने का निवेदन किया, शायद उन्हें एक औरत होने के नाते दया आ जय...? मगर, चांद कौरजीसा उसके साथ कैसे जाएँ...? यहाँ तो दूसरे लोगों का हितेषी बनना, घर में बैठे-बिठाए मुसीबत मोल लेने के बराबर है। इन पति देव को ऐसा रखना पड़ता है, जैसे हथेली के छाले को रखा जाता है। आख़िर मज़बूर होकर चांद कौरजीसा ने हाथ के इशारे से जतला दिया, के “वे उसके साथ नहीं चलेगी।” बेचारा चपरासी मुंह उतार कर, वापस चला गया! 

     
इस वाकये को हुए दो साल व्यतीत हो गए, चुनाव के दिन नज़दीक आने लगे। जिससे कोलोनी में, एक अस्पताल और एक स्कूल बनवाने की मांग ज़ोरों से उठने लगी। एक दिन कोलोनी में, एक जन सभा आयोजित हुई। जन सभा को संबोधित करने के लिए, एक मंत्रीजी को बुलाया गया। उस सभा में मंत्रीजी ने, कोलोनी के अन्दर स्कूल व अस्पताल खोलने की घोषणा तो कर दी, मगर इन दोनों ठावं का निर्माण कहाँ किया जाय..? किस प्लोट पर, क्या कोई दानदाता ज़मीन देने के लिए तैयार है या नहीं...? इन सवालों का ज़वाब ना तो मंत्रीजी के पास था, और ना सभा के आयोजकों के पास। आख़िर में मंत्रीजी ने भरी सभा में घोषणा कर दी, के “स्कूल व अस्पताल तब ही बनेंगे, जब कोई दान दाता दोनों ठांव बनाने के लिए ज़मीन उपलब्ध कराएगा।”  

      
इस तरह उस सभा में मंत्रीजी, कोलोनी के सम्मानित व्यक्तियों से निवेदन करने लगे के “मैं आप सभी लोगों से निवेदन करता हूँ, आप में से कोई सज्जन इन दोनों ठांव बनाने के लिए सही नाप-तौल की ज़मीन दान करें। ताकि, मैं आपको आश्वासन दे सकूं के इस पावन कार्य हेतु, ये दोनों ठांव शीघ्र तैयार कर दिए जाएँगे।” मंत्रीजी की यह बात सुनते ही, वहां बैठे इन अमीर लोगों के चेहरे मलिन हो गए। अब वे सभी लोग, एक-दूसरे का मुंह तांकने लगे। क्या कहें, इन लोगों को...? सभा में बैठे सभी सज्जन, एक प्लोट क्या, वे तो कई कीमती प्लोटों के मालिक ठहरे। अधिकतर प्लोट तो इसी कोलोनी में है, मौजूद..फिर भी इन अमीर लोगों का दिल नहीं मान रहा था, के वे इस पुण्य कार्य के लिए अपनी ज़मीन दान में दी जाय..! इन अमीर लोगों के दिल में एक ही इच्छा रहती है, के “उनके ज़मीनों के प्लोट आसमान को छूती दरों पर बिके।” फिर इन लोगों में, कोई ऐसा पागल तो होगा नहीं...जो प्लोटों के पैसे नहीं बांटकर, उन प्लोटों को पुण्य काम के लिए दान कर दे। ये अमीर लोग, दान की महिमा के बारे में क्या जाने..? जो पैसे को ही, अपने माई-बाप समझते हो..!
आख़िर में बेचारे मंत्रीजी ने लोगों में जोश पैदा करने के लिए, तेज़ आवाज़ में कहने लगे “क्या आप अमीर लोगों की कोलोनी में ऐसा कोई सज्जन नहीं है, जो संत दाधीचि, राजा करण, राजा शिवी, और राजा बली की तरह ज़मीन के दो टुकड़े दान करने की हिम्मत दिखा सके..?”


बैंक के बाहर, कुर्सी पर बैठा बैंक का चपरासी माई दासजी से गुफ़्तगू कर रहा था। तभी लाउड स्पीकर पर गूंज़ रही मंत्रीजी की आवाज़ उनके कानोँ में सुनाई देने लगी। माई दासजी  को कुछ-कुछ तो सुनायी दिया, मगर पूरा साफ़-साफ़ सुनायी नहीं दिया। तभी सभा से उठकर एक आदमी आता हुआ दिखायी दिया, उसे रोक कर माई दासजी ने सभा में क्या हुआ..उन्होंने पूरी जानकारी ले ली। फिर जा पहुंचे, सभा में। वहां पहुँचकर मंच पर चढ़ गए। फिर, सीधे मंत्रीजी के पास चले गए। उन्हें हाथ जोड़कर, कहने लगे के “मंत्रीजी यह भला पावन कार्य, मेरे हाथ से करवा दीजिये। बैंक के नज़दीक ही मेरे दो बड़े प्लोट है। हर प्लोट की साइज है, दो सौ बाई दो सौ। ये दोनों प्लोट, मैं अपनी माताजी के नाम से दान करना चाहता हूँ।” इतना सुनकर, मंत्रीजी की आँखें फटी की फटी रह गयी। वे माई दासजी का चेहरा, आश्चर्य से देखते हुए सोचने लगे के “यह आदमी, कितना बड़ा दिल रखता है..?” सोचते-सोचते मंत्रीजी की आँखों से, प्रेम के आंसू गिर पड़े। बस, फिर क्या..? उन्होंने झट मेज़ पर रखा गुलाब के पुष्पों का हार उठाकर, माई दासजी को पहना दिया। फिर अपने सर से साफ़ा उतारकर, उनको पहनाकर उन्हें गले लगा लिया। अब माईक उठाकर, सभा में बैठे सभी अमीरों के सामने माई दासजी की तारीफ़ करने लगे। उनकी तारीफ़ सुनकर, सभा में बैठे सभी अमीर लोगों की आँखें शर्म से झुक गयी। कई मालदार लोगों के दिल पर सांप लौटने लगे।


इस वाकये के गुज़र जाने के बाद, माई दासजी ने अपने दोनों प्लोट ख़ाली करके सरकार को सुपर्द कर दिए। घर-बिक्री का सामkन लिये, अपने गाँव पहुँच गए। वहां जाकर, खेती करने लग गए। जोधपुर के चौधरी होस्टल में, अपने बच्चों को पढ़ाने लगे। फिर एक दिन सरकार से लोन लेकर, गाँव में दूध की डेयरी खोल दी। माई दासजी की मेहनत व ईमानदारी रंग लाई, उनका यह व्यापार दिन दूना और रात चौगुना बढ़ने लगा। आज भी अस्पताल व स्कूल की बनी बिल्डिंगें, माई दासजी व आइचुकी बाई की याद दिलाती है। वहां से गुज़रने वाले राहिगीरों को ये दोनों बिल्डिंगें सीख देती जा रही है के ”धन-दौलत से इंसान धनी नहीं माना जाता  असली धनी वह होता है, जिसके दिल में दया का सागर हो। रुपया-पैसा ज्यादा होना, मालदार इंसान की पहचान नहीं है। :iया-पैसा तो इन पातरियों के पास भी बहुत होता है, मगर वह क्या काम का..? वह मेहनत की कमाई [मैणत री कमाई] नहीं है, जो नेक काम में आती हो। ना इन पाप की कमाई करने वालों की, समाज में कोई इज़्ज़त होती है। इसलिए कमाई वही अच्छी होती है, जो मेहनत [मैणत] करके कमाई जाय। ऐसी मेहनत की कमाई करने वालों का दिल विशाल होना चाहिए।”


गाड़ी चला रहे ड्राइवर के मोबाइल पर घंटी बजने लगी, घंटी की तेज़ आवाज़ सुनकर चांद कौरजीसा के मानस पटल में छाई विचारों की कड़ियां टूट गयी। सचेत होने पर, उन्होंने अपने सामने ड्राइवर को मोबाइल से बात करते हुए पाया। वह मोबाइल पर कह रहा था, “हुजूर, कौन बोल रहे हैं, जनाब..? फ़रमाइए, जनाब...हुक्म कीजिये।” ड्राइवर के इतना कहते ही, मोबाइल से जनानी आवाज़ बाहर आने लगी “राजूड़ा के बापू। यह आपने क्या रट लगा रखी है..”फ़रमाइए फ़रमाइए”..? मैं बोल रही हूँ, आपके राजूड़ा की बाई। बात यह है, जी। के, मैं आपका उतरा हुआ मुंह देख नहीं सकती। अब आप, फ़िक्र मत कीजिये। सिरे मलसा के घर दूध पहुंचा दिया है, मैंने।” इतना सुनते ही, ड्राइवर के चहरे पर मुकान छा गयी। वह मोबाइल पर कहने लगा, “भागवान, अब आप क्या कर रही हो..?” फिर, क्या...? मोबाइल पर, हंसी गूंज़ने लगी। हंसती-हंसती उसकी घरवाली कह बैठी, के “फिर क्या, वापस घर आयी हूँ। राजूड़ा नन्हा था, तब के उसके कपड़ेs लेकर वापस उनके घर जा रही हूँ। वहां जाकर, सिरे मलसा की लुगाई को ले जाऊँगी जनाना अस्पताल। उनके दरद उठने लग गया है। खुश ख़बरी आएगी तो, सबसे पहले आपको इतला करुँगी। सिरे मलसा की लुगाई का पेट देखकर, ऐसk लगता है..ज़रूर, उनके बेटा ही पैदा होगा। अब फ़ोन  रख रही हूँ, बहुत देर हो चुकी है।” इतना कहते ही, चोगे को क्रेडिल पर रखने की आवाज़ सुनाई देती है। अब मोबाइल बंद करके, मुस्कराता हुआ ड्राइवर कह बैठा, के “बहनजीसा। औरतों के दिल की बातें तो मालिक ही जान सकता है।”


हवाई अड्डा अब सामने दिखायी देने लगा, ड्राइवर ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी कर दी। टेक्सी-स्टेण्ड पर गाड़ी ले जाकर, गाड़ी को खड़ी की। फिर गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर, चांद कौरजीसा से कहा के “बहनजीसा, आपको एक्यूरेट वक्त पर हवाई-अड्डे पर पहुंचा दिया। अब आप अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना, आगे से कभी बाहर निकलो तब दमे का पम्प साथ ले जाना भूलियेगा मत। अब जाइये, प्लेन उड़ने ही वाला है।”    
अटेची लिए हुए, चांद कौरजीसा नीचे उतरे। गाड़ी से नीचे उतरकर, उन्होंने ड्राइवर की हथेली पर एक हज़ार रुपये का एक नोट रखा। फिर, कहने लगे के “भाई, तू ये हज़ार रुपये पूरे ही रख ले। वापस देने की. तूझे कोई ज़रूरत नहीं।” इतना कहकर, चांद कौरजीसा ने अपने क़दम बढ़ाने चाहे...मगर वह ड्राइवर उनके आगे आकर, खड़ा हो गया। फिर जेब से छ: सौ रुपये निकालकर, उनकी हथेली पर रखते हुए कह बैठा के “इन शेष छ: सौ रुपयों पर मेरा कोई हक़ नहीं, ख़ाली चार सौ रुपये ही मेरी मेहनत की कमाई [मैणत री कमाई] है! इन शेष छ: सौ रुपयों को आप वापस अपने पर्स में डाल दीजिये। अब चले, जी। बहनजीसा, बाबा रामसा पीर आपका भला करे। जय बाबा की।”


इतना कहकर, वह ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। फिर गाड़ी स्टार्ट करके, खिड़की के बाहर हाथ निकालकर हाथ हिलाने लगा। थोड़ी देर में ही गाड़ी नज़रों से ओझल हो गयी, और चांद कौरजीसा वहां खड़ी-खड़ी पीछे से उड़ते धूल के गुब्बार देखती रही।


लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

[निवास – अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर, राजस्थान.]   
ई  मेल   dineshchandrapurohit2@gmail.com

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रचनाकार: [मारवाड़ी कहानी “मैणत री कमाई” का हिंदी अनुवाद] कहानी – मेहनत की कमाई - लेखक एवं अनुवादक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
[मारवाड़ी कहानी “मैणत री कमाई” का हिंदी अनुवाद] कहानी – मेहनत की कमाई - लेखक एवं अनुवादक - दिनेश चन्द्र पुरोहित
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