बाल कहानी - अंत भला सो भला // हरीश कुमार ‘अमित’

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दरवाज़े की घंटी बार-बार बजाई जा रही थी, पर सुबीर को इसका कुछ पता चल ही नहीं पा रहा था. वह तो बिस्तर पर लेटकर अपने दोनों कानों में इयर प्लग लगाए हुए मोबाइल फोन से फिल्मी गाने सुन रहा था.

तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी. सुबीर ने फोन की स्क्रीन की ओर देखा, तो चौंक पड़ा. उसकी मम्मी का फोन था.

‘मम्मी तो मार्केट तक गईं थी कुछ सामान लेने. फिर मुझे क्यों फोन किया है.’ सोचते हुए उसने फोन पर बात करने का बटन दबाया और ‘हैलो, मम्मी!’ कहा.

तभी दूसरी तरफ़ से मम्मी की आवाज़ आई, ‘‘कितनी देर से घंटी बजा रही हूँ. दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहे?’’

‘‘अभी खोल रहा हूँ, मम्मी.’’ कहते हुए सुबीर झटपट उठा और उसने लपककर घर का दरवाज़ा खोल दिया.

‘‘फोन पर गाने सुनने में मस्त थे न?’’ दरवाज़ा खुलते ही मम्मी ने पूछा.

जवाब में सुबीर ने कुछ नहीं कहा, सिर झुका लिया.

सुबीर की कानों में इयर प्लग लगाकर फिल्मी गीत सुनने की आदत के कारण पहले भी कई बार इसी तरह की घटनाएँ हो चुकी थीं. मम्मी-पापा उसे अक्सर टोका करते कि इस तरह से संगीत सुनने पर कानों की सुनने की शक्ति पर बुरा असर पड़ सकता है. इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि कानों में इयर प्लग लगे होने के कारण उसे कोई और आवाज़ सुनाई न दे और कोई दुर्घटना घट जाए.

मगर सुबीर पर इन बातों का कोई असर न होता और वह उसी तरह कानों में इयर प्लग लगाकर फिल्मी गीत सुनने का अपना शौक पूरा करता रहता.

सुबीर का इस तरह संगीत सुनने का शौक इतना बढ़ चुका था कि वह टूथब्रश करते और खाना खाते हुए भी कानों में इयर प्लग लगाए रखता.

सिर्फ़ स्कूल जाने के लिए स्कूल बस में सवार होने से लेकर दोपहर को स्कूल बस से अपने घर के पास उतरने के बीच के समय में उसके कानों में इयर प्लग नहीं होते थे क्योंकि स्कूल में बच्चों के लिए मोबाइल रखना मना था.

सुबह स्कूल बस के आने तक सुबीर कानों में इयर प्लग लगाए संगीत सुनता रहता. बस आ जाने पर वह अनमने भाव से अपना मोबाइल फोन और इयर प्लग वगैरह अपने पापा को सौंप देता, जो उसे बस स्टॉप तक छोड़ने आते थे. पापा तो कुछ देर बाद ऑफिस चले जाते थे, इसलिए दोपहर को सुबीर की मम्मी उसे स्कूल बस के आने पर लेने आतीं. सुबीर ने ज़िद कर-करके यह नियम-सा बनवा लिया था कि दोपहर को मम्मी उसका मोबाइल फोन वगैरह साथ लेकर ही आएँगी ताकि वह बस से उतरकर कानों में इयर प्लग लगाकर गीत सुनते हुए घर जा सके.

आज सुबह सुबीर हर रोज़ के नियत समय से दस-पन्द्रह मिनट बाद उठा था, इसलिए उसे स्कूल के लिए तैयार होने में देर हो गई. स्कूल बस आने का समय पास आता जा रहा था. पापा के साथ घर से निकलकर बस स्टॉप तक जाने में उसे क़रीब चार मिनट का समय लगता था.

सुबीर जब तक तैयार हुआ, तब स्कूल बस आने में करीब तीन मिनट का समय ही बचा था. घर से निकलने पर पापा तेज़ी से आगे-आगे चलने लगे, ताकि बस को कुछ देर के लिए रूकवाया जा सके. तेज़-तेज़ चलते हुए पापा बीच-बीच में पीछे मुड़कर सुबीर की ओर भी देख लेते थे और उसे जल्दी-जल्दी आने का इशारा भी कर देते थे.

तेज़ी से चलते-चलते पापा बड़ी सड़क तक पहुँच गए थे. उस सड़क को पार करके थोड़ा आगे चलने पर बस मिलती थी.

तभी पापा ने पीछे मुड़कर सुबीर की ओर देखा तो सन्न रह गए. सुबीर तो तेज़ी से चलते हुए उनकी तरफ़ आ रहा था, पर सुबीर के थोड़ा पीछे बड़े-बड़े सींगों वाला एक बैल तेज़ी से सिर हिलाते हुए आगे दौड़ रहा था, क्योंकि उसके पीछे कई कुत्ते लगे थे.

पापा ने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए सुबीर को एक तरफ़ हट जाने को कहा, पर वह सुन पाता तब न. उसके कानों में तो इयर प्लग लगे थे और वह गाने सुनते हुए आगे बढ़ रहा था.

पापा के चिल्ला-चिल्लाकर सुबीर को एक तरफ हट जाने की बात जब वह नहीं सुन पाया, तो वे वापिस सुबीर की ओर भागने लगे.

पापा को लग रहा था कि उनके सुबीर के पास पहुँचने से पहले ही तेज़ी से भागता हुआ बैल सुबीर को रौंद डालेगा.

तभी पापा ने देखा कि एक साइकिल सवार तेजी से सुबीर के पास आकर रूका और उसने सुबीर को एक तरफ़ खींच लिया.

पापा भी एक किनारे हो गए. भागता हुआ बैल उनके पास से निकल गया. उसके पीछे भागते हुए कुत्ते अब चुप होकर वापिस लौट रहे थे. शायद कुत्तों के क्षेत्र की सीमा वहीं तक थी.

पहले तो एकदम से सुबीर कुछ समझ ही नहीं पाया कि हो क्या रहा है. पापा उसके पास पहुँचे और उन्होंने उसके कानों में लगे इयर प्लग खींचकर निकाल दिए. उसके बाद जब सुबीर को सारी बात पता चली तो उसके पसीने छूट गए.

सुबीर ने क्षमा माँगने की-सी मुद्रा में अपना मोबाइल और इयर प्लग पापा को दे दिए और बोला, ‘‘आप सब लोग ठीक ही कहते थे पापा. आज न जाने क्या हो सकता था. अब मैं इस तरह से सड़कों पर संगीत नहीं सुना करूँगा.’’

‘‘चलो, अच्छा है जो इस घटना की वजह से तुम्हें समझ आ गई. अब जल्दी-जल्दी चलो. शायद बस मिल जाए. नहीं तो तुम्हें स्कूल छोड़कर आना पड़ेगा.’’ पापा ने कहा और फिर सुबीर को साथ लिए तेज़ी से चलने लगे.

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परिचय -

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994ए 2001ए 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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