धूप कुंदन // शारदा पाण्डेय

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डॉ. सुरेन्द्र वर्मा का दार्शनिक (धूप कुंदन में)

डॉ. श्रीमती शारदा पण्डे

[डॉ. सुरेन्द्र वर्मा की किताब  - "धुप कुंदन" (हाइकु संग्रह) की समीक्षा ]

अभिव्यक्ति के लिए छटपटाता रचनाकार का मानस कहीं विराम पाता नहीं। विभिन्न प्रयोग, विभिन्न प्रतीक-भाव उसके मानस में चौगान खेलते हैं और अंत में एक कृति के रूप में प्रत्यक्ष हो उठते हैं। इसके लिए शिल्पकार यदि विभिन्न कोणीय रूपा-कृति को देखता-सजाता है तो साहित्यकार अपने साहित्य-संस्कृति से ही नहीं अन्य देश-भाषीय विधाओं को भी उनकी भंगिमा सहित अपनी भाषा-कृति में उतारता है और अपनी नित-नवीन प्रयोगधर्मिता के कारण उसमें अनायास कुछ नवीनता अपनी सांस्कृतिक उपलब्धियों के साथ समावेशित भी कर देता है। यही स्थिति डा. सुरेन्द्र वर्मा की काव्य-कृतियों में प्राय: लक्षित होती है। दर्शन की सघन-जटिल वैचारिक वीथियों में विचरण करता मन कैसे जापानी छंद ‘हाइकु’ की ओर खिंच गया इसे कवि ने “धूप- कुंदन” में स्वयं रेखांकित किया है। लघु कलेवरी हाइकु अपनी रचनात्मक व्याकरण में भाषा और भावाधिकार की स्पष्ट मांग रखता है जिसमें अर्थाभिव्यक्ति हो और भाषिक ढांचा व्यवस्थित हो। पांच-सात-पांच की वर्णीय परिध में भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति, पूर्ण स्वातंत्र्य हिन्दी दोहे के समान ही स्वीकृत है यद्यपि कि वर्ण संख्या लगभग एक बटा तीन है। यह एक विशेष सुरुचि साधना का आकांक्षी है।

डा. वर्मा ने इस विद्या को बड़ी सहजता से न केवल साधा है वरन अभिव्यक्ति कुशलता का मापदंड स्थापित किया है। दर्शन के अध्येता हैं अत: दर्शन को इसमें ऐसा साधा है कि वह जन सामान्य के लिए सहज बोधगम्य हो गया है -

दिया न बाती /

निविड़ अन्धकार /

मन एकाकी शांत था मन /

एक स्मृति कंकरी /

उसमें गिरी संस्कार बिन /

तिनके सा बहता /

नर जीवन स्वप्न तरल /

टिकें तो टिकें कैसे /

चलनी मन प्रात का तारा /

बस इतना भर /

मेरा जीवन बर्फ पिघला /

होकर पानी पुन: /

मिला जल में

उदास अकेला मन प्रकाश ढूँढ़ता है। घना अन्धकार व्यथित करता है। स्मृति की बीते समय की कोई घटना शांत मन को अशांत बना जाती है। यदि स्वप्न में यथार्थ को जानने समझाने की शक्ति-भावना-लालसा न हो तो विभिन्न कामनाओं को पाले मन से ये स्वप्न तरलता के कारण फिसल जावेंगे। मन को संस्कार न मिले तो मनुष्यता कहाँ ठहरेगी ? संस्कार ही तो नर को पशुता से ऊपर ले जाता है, मनुषत्व देता है। अंतिम दो छंद तो भारतीय दर्शन का सारतत्व हैं।

कबीर ने भी यही कहा है -

पाणी ही ते हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाय जो कुछ था सोई भया अब कुछ कहा न जाय

‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ यही तो है। यही हमारा दर्शन है; और जीवन कितना ? – कुछ पल का। बाद में प्रभात के तारे-सा कुछ भी नहीं रहता। कबीर ने भी कहा था “देखत ही छिप जायगा, ज्यों तारा परभात।’ लेकिन यहाँ एक अंतर है। कबीर ने सब के लिए कहा। यहाँ कवि ‘मेरा जीवन’ कहकर कहता है कि जाऊँगा लेकिन प्रकाश देकर, अपना ‘स्व’ दिखा कर; यह व्यष्टि भावना है। यही भाव और स्पष्ट होकर आता है जब कवि कहता है, “हम चले तो / पगडंडियां बनी / और भी आए”, यह मान्य सत्य है।

“तारा’ कवि का प्रिय उपमान है और प्रेरणा स्रोत भी। कवि कहता है, “एक अकेला / अन्धकार का अहं / तोडता तारा” – ऐसी अनेक हाइकु उक्तियाँ हैं। इसके अतिरिक्त कवि का दार्शनिक एक और सत्य विशेष अर्थ के सोपान के रूप में प्रस्तुत करता है जिसकी व्याख्या गहरी हो सकती है।

भूत पाताल / भविष्य आसमान / भू वर्त्तमान

कवि केवल दार्शनिक ही नहीं, प्रकृति प्रेमी, रसिक प्राण और समाज दृष्टा भी है। कुछ उदाहरण –

अमलतास /

सौन्दर्य जिजीविषा / न

व उच्छ्वास वासंती हवा /

दिन कमल और /

रात बेला सी लुभाए मन /

जाड़े की सर्दी में /

धूप कुंदन खिलखिलाती /

सद्य स्नाता प्रकृति /

बाद बारिश तुम आईं तो /

धूप खिली आँगन /

ऋतु बदली डाल कदम्ब /

कोई तो झूला डाले /

प्रतीक्षा रत ली अंगडाई /

फिर तन मन ने /

कोयल बोली

लेकिन एक उपमा विचित्र लगी – “तुम्हारी हंसी / भीगे हुए चनों में / फूटे हैं किल्ले”।

समाज दृष्टा देख रहा है –व्यंग्य जाग्रत है –

खड़े हुए हैं /

नंगे सब के सब /

टोपी पहने खुले घूमते /

हैं अपराधी, मार्ग /

महात्मा गांधी दल कितने /

पर हर दल के /

नेता अद्वैत

प्रयोग धर्मी कवि सुखन हाइकु, पहेलियाँ आदि, पाठकों को अधिकार से परोसता है –

घर घुसती / घूम फिर कर वो / आती बाहर (चाभी) सूना सिंदूर / माल था, बिका नहीं / मांग न थी (सुखन हाइकु) ताकते रहे / निर्वासित न आया / बीता बसंत (हाइकु, जापानी गूँज)

इस प्रकार, न जाने कितने हाइकु हैं जो जीवन के यथार्थ से पाठक को सम्मुखीन करते हैं। रचना और भाव-भंगिमा का लोक रच जाते है। लेकिन कवि यह कहकर मानो अपनी हाइकु रचनाओं की गंभीरता को टरकाता सा लगता है, कि

खाली दिमाग / जब कुछ न करे / हाइकु लिखे

इस प्रकार के उसके कथन कभी कभी विरोधाभासी भी लगते है। पर वर्मा जी एक संवेदनशील और कुशल हाइकुकार हैं – यह निर्विवाद है। उनकी भाषा सरल, सरस और बोधगम्य है।

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--डा. शारदा पाण्डेय (मो. ९९३६९६८३९४)

१४२, बाघम्बरी गृह योजना, प्रयाग -२११००६

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