समीक्षा // स्त्री संघर्ष को स्वर देती आकांक्षा यादव की पुस्तक : 'आधी आबादी के सरोकार'

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स्त्री, विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है। सभी धर्मों में स्त्री के मातृस्वरूप को वंदनीय बताया गया है। हमारे देश के संविधान में भी स्त्रियों को समान अधिकार मिले हुए हैं। इसके बावजूद, समाज का एक बड़ा तबका स्त्रियों को दोयम दर्जे का समझता है। नारियों के प्रति बढ़ते अपराधों के आँकड़े किसी भी संवेदनशील प्राणी को विचलित कर देते हैं। शास्त्रों से लेकर संविधान तक में स्त्रियों के प्रति अन्याय को अशोभनीय माना गया है। इसके बावजूद देश की आधी आबादी कही जाने वाली स्त्रियाँ विभिन्न प्रताड़नाओं-वर्जनाओं से मुक्ति पाने को छटपटा रही हैं।

आधी आबादी के सरोकारों पर कई लेखिकाओं ने अपनी कलम चलाई है। इसी क्रम में एक नाम आकांक्षा यादव जी का भी है, जिन्होंने लम्बे समय से स्त्री विमर्श से सम्बंधित मुद्दों पर अपनी  सशक्त लेखनी से वास्तविक स्थितियों का बेबाक आकलन किया है। समीक्ष्य कृति “आधी आबादी के सरोकार” में आकांक्षा यादव जी ने दस अध्याय रूपी फूलों को बड़ी सहजता से सम्प्रेषणीयता की डोर से गूँथा है।

समीक्ष्य कृति का पहला अध्याय “समकालीन परिवेश में नारी विमर्श” में आकांक्षा जी ने पश्चिमी जगत में नारीवाद के उदय, उसके पीछे छिपे कारणों और विभिन्न देशों में नारी आंदोलनों के वैश्विक स्तर पर पड़े प्रभाव को रेखांकित किया है। आकांक्षा जी के अनुसार, प्राचीन काल में विदुषी गार्गी, द्रोपदी, शकुन्तला ने भी अपने स्त्री होने को अभिशाप न मानकर, अपनी अस्मिता की सार्थकता को सिद्ध किया था। सिलसिलेवार ढंग से अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मनाये जाने के कारकों को वर्षवार प्रस्तुत करके आकांक्षा जी ने इस लेख को स्थाई महत्व का बना दिया है।

अध्याय दो “आजादी के आंदोलन में भी अग्रणी रही नारी” में लेखिका आकांक्षा यादव जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विस्मृत होते जा रहे सुनहरे पन्नों को बड़ी तल्लीनता के साथ सहेजा है। स्वतंत्रता की यज्ञवेदी में अपने प्राणों की आहुति लगा देने वाली वीरांगनाओं की लोहमर्षक समरगाथा को, एक शोधार्थी की तरह आकांक्षा जी ने शोध सामग्री एकतित्र की। इसके बाद उन्होंने प्रचलित कई पूर्व धारणाओं, भ्रामक तथ्यों व मुहावरों का बखूबी खण्डन किया है। इसी अध्याय में उन्होंने कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा का अंग्रेजों को भारत से मार भगाने से लेकर 1946 तक भारत को आजाद कराने वाली जगप्रसिद्ध से लेकर अल्पज्ञात क्रांतिकारिणियों की वीरता को कलमबद्ध किया है। इस अध्याय में उन्होंने सभी धर्मों की व सभी आयुवर्ग की क्रांतिकारिणियों के स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान को इतने सजीव व ओजस्वी ढंग से प्रस्तुत किया है कि कोई भी पाठक इस अध्याय को पूरा पढ़े बिना नहीं रह सकता।

पुस्तक का तीसरा अध्याय “शिक्षा और साहित्य के विकास में नारी की भागीदारी” में आकांक्षा यादव जी ने विश्वगुरू माने जाने वाले भारत में नारी शिक्षा के इतिहास, इसकी आवश्यकता और वर्तमान समय में नारी शिक्षा के बढ़ते चरणों की चर्चा की है। उनके द्वारा प्राचीन काल में कन्या शिक्षा की रोचक जानकारी पढ़कर पाठक गौरवान्वित हो उठता है कि उसने ऐसे देश में जन्म लिया है, जहाँ प्राचीनकाल में ही बालिका शिक्षा को महत्व दिया गया था। जब विकसित समझे जाने देश के मूल निवासी अज्ञान के अंधेरे में भटक रहे थे, तब हमारे देश की स्त्रियाँ यज्ञों में भाग लेती थीं और वेदमंत्र रचती थीं। बौद्ध काल की विदुषी नारियों का भी इस अध्याय में उल्लेख करके लेखिका ने बौद्ध भिक्षुणियों के साहित्य सृजन की चर्चा की है। मध्यकाल में तुर्कों, पठानों, मुगलों के आक्रमण के फलस्वरूप नारी की स्थिति दयनीय होती चली गई। जिससे उनका शिक्षित और सामाजिक कार्यों में भागीदारी होना रूक गया। उन्हें पर्दे में रखा जाने लगा। विभिन्न सामाजिक कुरीतियों जैसे दहेज प्रथा, सतीप्रथा, बालविवाह, कन्यावध समाज को खोखला करने लगे। इसी संदर्भ में लेखिका आकांक्षा यादव मानती हैं कि मुगलकाल की समाप्ति एवं अंग्रेजों के आगमन से भारत में धीरे-धीरे प्रगतिशील दृष्टिकोण पनप चुका था। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी नारी शिक्षा को लेकर संजीदगी दिखाई देने लगी थी। इस लेख के उतरार्द्ध में लेखिका ने साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाली स्त्रियों का जिक्र किया है। अगर यह सूची सिलेसिलेवार दी जाती तो, लेख में चार चाँद लग जाते। मसलन शिवानी और कुर्रतुल हैदर के मध्य श्रीमती चंद्रकाता, रमणिका गुप्ता और मालती जोशी के मध्य अलका सरावगी का नाम, इनकी रचनाकाल से मेल नहीं खाता ।

भारतीय महिलाओं के जीवन में इन्टरनेट और सोशल मीडिया के विभिन्न प्रभावों की पड़ताल “सोशल मीडिया और आधी आबादी के सरोकार” एवं ''हिंदी ब्लॉगिंग को समृद्ध करती महिलाएँ'' लेख में सविस्तार की गई है। लेखिका आकांक्षा यादव जी के अनुसार इन्टरनेट और सोशल मीडिया ने नारी स्वातंत्र्य व नारी सशक्तिकरण को नये मुकाम दिये हैं। भारत में करीब 352 करोड़ लोग इन्टरनेट का प्रयोग करते है, जिसमें 30 फीसदी महिलाएँ हैं। इन्टरनेट के माध्यम से स्त्रियाँ न केवल एकजुट हो रही हैं बल्कि अपनी क्षमताओं को बखूबी पहचान रही हैं। इस अध्याय में उन्होंने सोशल मीडिया के नकारात्मक पहलुओं की चर्चा करके पाठकों को सचेत भी किया है।

“घरेलू हिंसा बनाम अस्तित्व की लड़ाई” में स्त्री के प्रति होने वाली हिंसा के प्रकारों और उसके नारी के मनोस्थिति पर पड़ने वाले कुप्रभावों को सूक्ष्मता से उकेरा गया है। एंगेल्स ने कहा भी है कि “मातृसत्ता  से पितृसत्तामक समाज का अवतरण वास्तव में औरत जाति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक हार है।“ जैसा कि सभी जानते हैं कि विजेता, पराजित समूह के कुछ प्रतिनिधियों को थोड़े-बहुत अधिकार देकर, उसे पराजितों के दमनचक्र में शामिल कर लेता है। वैसे ही घर के मुखिया द्वारा घर की बुजुर्ग स्त्री को अन्य युवा सदस्याओं को “खानदान की नाक”, “खानदान की इज्जत” और “पारिवारिक  परम्परा” के नाम पर दबाने का अधिकार दे दिया जाता है। आज भी सामान्य परिवारों से लेकर अभिजात्य उच्च वर्ग के परिवारों में, लड़कियों और स्त्रियों के साथ मारपीट, गालीगलौज या पैत्रिक सम्पति से वंचित करने जैसे कामों को घरेलू विवाद का नाम देकर, दोषी पुरूषों को बरी कर दिया जाता है। घरेलू हिंसा चुपचाप सहना नारी की नियति है या उसका अतिसहनशील स्वभाव? इस मुद्दे पर भी आकांक्षा जी का दृष्टिकोण सराहनीय है।

आर्थिक सशक्तिकरण, आधुनिक स्त्रियों की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आर्थिक रूप से स्वावलम्बी स्त्री की आवाज, परिवार जन सुनते हैं। स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री, बेरोजगार घरेलू महिला से ज्यादा आत्मविश्वासी, निर्णय लेने में सक्षम, और दुनियादारी के मामले में चतुर होती है। आकांक्षा जी के अनुसार, नारी के आर्थिक सशक्तिकरण से न केवल नारी अपितु परिवार, समाज और राष्ट्र भी सशक्त और समृद्ध बनेंगे।

पुस्तक का अंतिम अध्याय “राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत” में लेखिका ने भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की वास्तिविक स्थिति प्रस्तुत की है। भारत में महिला प्रधानमंत्री, महिला राष्ट्रपति, महिला मुख्यमंत्री और महिला राज्यपाल बनने के बावजूद, महिला जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति नगण्य है। आईपीयू की रिपोर्ट के अनुसार भारत इसमें 103 वें नम्बर पर है। दस फीसदी टिकट भी महिलाओं को दिए नहीं जाते। ज्यादातर जिन्हें टिकट मिलता है, वे किसी राजनेता की सगी-सम्बधी होती हैं। ऐसे में संघर्षशील स्त्रियों को राजनीति में स्थान नहीं मिल पाता। इस संदर्भ में आकांक्षा जी का मत है, महिलाओं को अपनी अस्मिता और अस्तित्व बनाये रखने के लिए खुद ही रास्ते तलाशने होंगे तभी उन्हें अपनी मंजिल हासिल होगी।

स्त्रियों को स्वयंसिद्धा होने के लिए प्रेरित करती आकांक्षा यादव जी की यह कृति पाठकों को अपने परिवार, परिवेश और कार्यस्थल में कार्यरत स्त्रियों की समस्याओं से रूबरू कराती है। सहज व सरल भाषा में स्त्री विमर्श को आगे बढ़ाती एवं उनके सरोकारों को चर्चा के केंद्र बिंदु में लाने वाली कृति “आधी आबादी के सरोकार” आज के दौर में एक पठनीय कृति है।

पुस्तक का नाम : आधी आबादी के सरोकार

लेखिका : आकांक्षा यादव, टाइप 5  निदेशक बंगला, पोस्टल ऑफिसर्स कॉलोनी,                                        

जेडीए सर्किल के निकट, जोधपुर, राजस्थान - 342001 

प्रकाशक : हिन्दुस्तानी एकेडेमी, 12 डी कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद

पृष्ठ सं0 : 112

मूल्य        : रू0 110/-

समीक्षक       :      पूर्णिमा मित्रा, ए 59 करणी नगर, बीकानेर, राजस्थान

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