रविवार का इन्तजार (दो लघु कथाएं) // सुशील शर्मा

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*1 धन्यवाद टुन्नू*

बाहर नगर पालिका की कचरे समेटने वाली गाड़ी में स्पीकर से गाना रहा था "गाड़ीवाला आया बहिन कचरा निकाल "

मेरी  पांच साल की बेटी टुन्नू बोली "पापा ये गाड़ीवाला इस कचरे का क्या करता है ?"

"कुछ नहीं बेटा एक जगह पर जाकर इकठ्ठा फेंक देते हैं "मैंने पेपर पढ़ते हुए कहा।

पापा मम्मी और बाजु वाली आंटी बाहर सड़क पर कचरे को क्यों फेंकते हैं इससे गंदगी होती है "टुन्नू की बात सुनकर मेरी श्रीमती गुस्से में बोली "अच्छा तू ही मोदी जी की स्वच्छता की दूत है।

वो सही तो कह रही है सड़क पर कचरा फेंकने से हमारा घर तो स्वच्छ हो जाता है किन्तु पर्यावरण नष्ट और प्रदूषित  होता है "मुझे मानो श्रीमती जी पर आक्रमण का मौका मिल गया था।

"अच्छा ज्यादा बातें मत करो कभी हाथ में झाड़ू पकड़ी है जो इतना प्रवचन दे रहे हो "एक गिलास पानी खुद लेकर पी नहीं सकते बड़े आये सफाई पर प्रवचन देने वाले "श्रीमती आक्रामक मुद्रा में आ गई थी।

अरे नहीं मैं तो सामान्य बात कर रहा था मैंने बचाव की मुद्रा में कहा।

"पापा कल रविवार है क्यों न हम कल अपने बगीचे और घर की सफाई कर पूरे कूड़े को उस कचरा गाड़ी में डालें "टुन्नू ने बहुत उत्साहित होकर कहा।

"अरे नहीं बेटा कल बहुत काम है मुझे मगसम के लिए आर्टिकल कवितायेँ लिखना हैं "मैंने पतली गली से भागने की कोशिश की।

"तुमने अपना कमरा और कम्प्यूटर देखा है कितनी धूल छा रही है टुन्नू सही कह रही है कल आप पूरे कमरे के जाले और बगीचे की सफाई करेंगे। मैं मगसम पटल पर सभी से कह दूंगी की आज शर्मा जी मोदी  सफाई दूत हैं कृपया इनको क्षमा कर दें "मेरी पत्नी की मुस्कराहट बता रही थी कि मैं फंस चुका था।

आज सुबह से ही मैं और मेरी बेटी घर की सफाई में व्यस्त हैं सर पर कपड़ा बांधे हाथ में लम्बा झाड़ू बंधा डंडा पकड़े सफाई में व्यस्त हूँ मेरी बेटी टुन्नू मेरी सहायता कर रही है। बाहर मोदी जी का सफाई दूत स्पीकर में चिल्ला रहा है "गाड़ी वाला आया बहिन कचरा निकाल "

मन को अच्छा भी लग रहा है कि आज रविवार को मैं अपनी पत्नी के कामों में हाथ बटा रहा हूँ। साथ में उस पुरुष अभिमान का भी क्षरण हो रहा है जो ये समझता है की ये सफाई वगैरा के काम सिर्फ स्त्रियों के लिए हैं।

धन्यवाद टुन्नू।

*2 जाने कहाँ गए वो दिन*

नदी का रास्ता कच्चा था । दोनों तरफ पेड़ों की भरमार थी । गाय, भैंसों के झुंड चरते नजर आने लगे थे। बच्चे तालाब के पानी में छपाके मार-मार के खेलने लगे थे। वह अपने नंगे पैर कोमल रेत पर घुल उड़ाते दौड़ते सबके मन को मोह रहे थे। मानों प्रकृति बच्‍चों के इस क्रिया कलापों से गाँव में नये जीवन का संचार भरने की कोशिश कर रही थी। मेरे माँ बाबूजी भी इसी गांव में अभी भी रहते  मैंने बहुत कोशिश की कि वो मेरे साथ शहर में रहें लेकिन वो उस कातिल शहर और उसके रिश्तों से तालमेल नहीं बिठा पाए और में अपने पैतृक गांव  रहना पसंद किया गांव का कोई भी परिवार पूर्ण नहीं बचा था। किसी परिवार में कोई पुरूष बचा, किसी में कोई बच्चा, किसी में कोई भी नहीं। गाँव सिकुड़ कर छोटा और कई-कई परिवारों का एक परिवार बन गया था, दु:ख और पीड़ की इस घड़ी में हमें एक दूसरे के कितने नजदीक आ जाते है। क्‍या ये मनुष्‍य का स्‍वभाव है। आज हम एक दूसरे से जितना दूर जा रहे इस कारण कही हमारे सुख वैभव में तो नहीं छिपा। गांव उजड़ा टूटा जरूर पर अब सब मिल-जुल रिसते नातों की चार दीवारी को तोड़ एक हो गये थे। कुछ दूर जाने पर रास्ता बलुआही मिटटी से बहुत मुलायम और गुदगुदी करने वाला हो जाता था । मुझे अपना बचपन याद आ रहा था जब मैं नहाने के लिए नदी जाता था नदी का किनारा पूरा बालुमय था जो धीरे-धीरे नदी के पानी में खो जाता था । औरते-बहुँये सर के बोझ को भूल विमुग्ध सी, मुंह मैं पल्लू दबाए सर पर घड़ा साधे मस्तानी चाल चलती थी। गायें-भैंसे ऐसे मूर्तिवत अवाक खड़ी हो जाती कि मुंह की घास को चबाना ही भूल जाती, पक्षियों का चहकना, बहते पानी का कलरव, या हवा की गति कुछ देर के लिए विषमय, विमुग्ध हो ठहर जाती थी। चारों तरफ़ एक नीरव शान्ति गहरा जाती, जिससे फूल-पत्ते भी कुछ देर के लिए अपनी अठखेलियाँ  करना भूल जाते थे बरसात को छोड़कर, नदी का निर्मल पानी बहुत दूर तक बस घुटने भर ही रहता था । रविवार की दोपहर आम के बगीचे में या नदी में मस्ती करते गुजरती थी । पहले तो नदी तक नौकर भी आता था नजर रखने के लिए पर अब पूरी आज़ादी थी । कई बार ऐसा भ्रम होता पर्वत की सुंदरता उसकी विशाल ऊंची चोटियों के कारण थी, या उसपर बिखरी धवलता के कारण गर्वित हो रही थी। कभी आप उसे खेतों में हल चलाते हुए, मंदलय से आगे चलते बैल, पीछे चलती बगुलों की कतार, जैसे बादलों को कोई धरा पर संग साथ लिए चल रहा हो। और कभी रोज  की छाँव मैं होठों पर लगी मुरली से छिटकती तानें सारे वातावरण को मदहोश कर रही होती। क्‍या पक्षी, क्‍या पशु, क्‍या मनुष्‍य और दूर क्षितिज पर चमकते चाँद तारे हो या सूर्य। सब  जीवन सफ़र पर्यंत सुबह से शाम अपनी यात्रा में व्यस्त हैं। ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त गांव में बचपन बीता और अब मैं शहर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में मार्केटिंग एग्जेक्युटिव हूँ ।अक्सर मां पिता जी से मिलने हम रविवार को गांव आ जाते है ।गांव आते ही हम सब उन प्राकृतिक सुंदरता में खो जाते है जिनसे शहर कोसों दूर है। जब शहर पहुंचते हैं तो वो इन्तजार करता माँ का चेहरा और बाबूजी की सलाह देतीं बातें बहुत याद आती हैं।

शहर में हर इंसान चलता फिरता नज़र आता है,नहीं चल सकता है तो चलने की कोशिश में है और भी आसान रास्ता वाहनों की सवारी,नयी नयी तकनीक से बनी नयी नवेली कारें रोज सड़कों पर अपना कब्जा जमाती हुयी, इंसान के रहने के लिए जमीन नहीं इन कारों के लिए बाकायदा एक अच्छा खासा कमरा चाहिए,सप्ताह के छह  दिन बड़ी ही मसरूफियत से कटते है और एक दिन रविवार का जिसे मैं अपना मानता हूं मुझे जीवित होने का अहसास कराता है मुझे अपने बचपन मे ले जाता है मुझे अपने माँ बाप की गोद में ले जाता है मुझे अपने गांव की सोंधी माटी से मिलवाता है जो मेरे रग रग में बसी है। मुझे यह रविवार संदेश देता है कि आज मुझे अपनी तरह का जी लो ,..बाकी तो सब आना जाना है आने जाने  से याद आया ईश्वर ने ये प्रक्रिया बडे ही मनोवेग से इंसान को सिखाई है, इस आने जाने के क्रम को जीवन से हटा ले तो फिर कोई शायद किसी से नहीं डरेगा, और दुनिया एक ही होगी शायद, लोगों के आने जाने पर पाबंदी नहीं होगी..जब मरने का भय नहीं,नौकरी छूटने का भय नहीं, दूसरे देश मैं घुसने का भय नहीं मतलब सब अमृत पिए हुए हों.....फिर क्या होता इस

विश्व का स्वरुप...बड़ा ही वृहत्त विषय  बन जाएगा आज की भागदौड़ की ज़िंदगी में वो बचपन के खेल कहीं गुम से हो गए हैं, आज सुबह के बाद वो सुकून वाली शाम नहीं आती बल्कि सीधा रात हो जाती है, शायद अब जो बच्चे हैं वो इन खेलों के सिर्फ नाम ही सुन पाएंगे। वो गिल्ली डंडा वो वो कांच के अंटे वो अंडा डावरी वो लंगड़ी वो नदी की छिर से नदी में कूदना वो पिठ्ठू और न जाने कितने अनगिनत बचपन के खेल अगर हमने उन्हे इन खेलों की इन सुनहरी दुनिया से रूबरू नहीं करवाया तो वो कभी ये खूबसूरत यादें नहीं सहेज पाएंगे। कल रविवार को मुझे गांव जाना है मेरी माँ बाबूजी के पास क्योंकि आज से ही उनका इंतजार शुरू हो गया होगा।

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