श्याम स्मृतियाँ // डॉ. श्याम गुप्त

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श्याम स्मृति-.यह भारत देश है मेरा ..

यह भारतीय धरती वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य,  बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी, सदा खड़े-खड़े, भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने-रहने वाले अँगरेज़, महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |

यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता, इसकी संस्कृति, में रचा-बसा है, इसके जल में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है |  प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस है और यहाँ की हर श्वांस प्रेम है |

यह पुरुरवा का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और ताजमहल का देश है | जहां विश्व में मानव-सृष्टि के सर्वप्रथम काव्य में संदेषित है ---

"मा विदिष्वावहै"...किसी से भी विद्वेष न करें…

..एवं

"समानी अकूती समानि हृदयानि वा
समामस्तु वो मनो यथा वै सुसहामती|" ........हम सबके मन, ह्रदय व कृतित्व सहमति व समानता से परिपूर्ण हों|

श्याम स्मृति-२.मानव मन, धर्म समाज ...

जिस प्रकार मानव मन विभिन्न मानसिक ग्रंथियों का पुंज है, समाज भी व्यक्तियों का संगठन है| मन बड़ा ही अस्थिर है,चलायमान है, वायवीय तत्व है | इस पर नियमन आवश्यक है |

कानून मनुष्य ने बनाए हैं, उनमें छिद्र अवश्यम्भावी हैं, धर्म शाश्वत है, वही मन को स्थिरता दे सकता है| धर्महीन मानव, धर्महीन समाज, धर्महीन देश, स्थिरता तो क्या एक क्षण खडा भी नहीं रह सकता अपने पैरों पर | आज विश्व की अस्थिरता का कारण है धर्महीन समाज | धर्म का अर्थ सम्प्रदाय नहीं है | आज के चर्चित "रिलीज़न" वास्तव में सम्प्रदाय ही हैं | धर्म और रिलीज़न दो भिन्न संस्थाएं हैं| आज चर्चित भिन्न-भिन्न मत-मतान्तर, धार्मिक नियम, धर्म नहीं हैं | धर्म तो एक ही है और वह शाश्वत है | धर्म का अर्थ है, कर्तव्य का पालन, और धर्म का केवल एक ही सिद्धांत है, "कभी दूसरों को दुःख मत दो |"

"सर्वेन सुखिना सन्तु,सर्वे सन्तु निरामया |

सर्वे पश्यन्तु भद्राणि, मा कश्चिद दुखभाग्भवेत ||"

श्याम स्मृति-३.खाली पेट नहीं रहा होगा ....

मैं यह नहीं कहूँगा कि हमारे पुरखों ने वायुयान बना लिए थे, वे भी ऊपर के लोकों को जा चुके थे, आज के नवीन अस्त्र-शस्त्र भी उनके समय में थे | परन्तु पुष्पक विमान से उड़ने की कल्पना कर सकने वाला समाज निश्चय ही खाली पेट नहीं रहा होगा, रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या हल कर चुका होगा |

श्याम स्मृति-४.आज का युवा युग परिवर्तन....

मैं यह स्पष्ट अनुभव कर रहा हूँ कि युग परिवर्तन होने वाला है, परिवर्तन होकर रहेगा| आज का सामान्य युवक प्रायः बुराई से, अन्याय से, असत्य से, भ्रष्टाचार से लडने की असफल, दिशाहीन कोशिश कर रहा है परन्तु कल का युवक, जो आज किशोर है, टीनेजर है, निश्चय ही बुराई से घृणा करता है | आज की नारी, स्त्री स्वतंत्रता की पक्षपाती तो है परन्तु उसके अंतर में अभी स्वयं प्रश्न वाचक चिन्ह है पर कल की नारी को निश्चय ही घर से बाहर सेवा, सर्विस व नग्नता से एवं नारी की पुरुष से श्रेष्ठता के गान से घृणा होगी| यह होने वाला है, यदि कल नहीं तो परसों| यद्यपि जिस प्रकार अन्धकार शाश्वत है उसी प्रकार असत्य व अनय भी सम्पूर्ण विनष्ट नहीं होते कालचक्र की नियति तो वही जानता है|

श्याम स्मृति-५. वही जीता है ....

"जो अतीत की सुहानी गलियों की स्मृतियों के परमानंद, भविष्य की आशापूर्ण कल्पना की सुगंधि के आनंद एवं वर्तमान के सुख-दुःख-द्वंद्वों से जूझने के सुखानंद की साथ जीता है...वही जीता है |"

श्याम स्मृति-६.गुण और दोष .......

प्रायः यह कहा जाता है कि वस्तु, व्यक्ति व तथ्य के गुणों को देखना चाहिए, अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए| इसे पोजिटिव थिंकिंग (सकारात्मक सोच) भी कहा जाता है |
परन्तु मेरे विचार में गुणों को देखकर, सुनकर, जानकर उन पर मुग्ध होने से पहले उसके दोषों पर पूर्ण रूप से दृष्टि डालना अत्यावश्यक है कि वह कहीं 'सुवर्ण से भरा हुआ कलश' तो नहीं है | यही तथ्य सकारात्मक सोच-नकारात्मक सोच के लिए भी सत्य है| सोच सकारात्मक नहीं गुणात्मक होनी चाहिए, अर्थात नकारात्मकता से अभिरंजित सकारात्मक | क्योंकि.".सुबरन कलश सुरा भरा साधू निंदा सोय |

श्याम स्मृति-७.असत्य की उत्पत्ति एवं हास्य ...

असत्य की उत्पत्ति के चार मूल कारण हैं– क्रोध, लोभ, भय एवं हास्य | वास्तव में तो मानव का अंतःकरण असत्य कथन एवं वाचन नहीं करना चाहता परन्तु इन चारों के आवेग में वायवीय मन बहने लगता है और सत्य छुप जाता है |

क्रोध लोभ तो सर्व-साधारण के लिए भी जाने-माने संज्ञेय और निषेधात्मक अवगुण हैं; भय वस्तु-स्थितिपरक अवगुण है परन्तु हास्य-सर्वसाधारण के संज्ञान में अवगुण नहीं समझा जाता है अतः वह सबसे अधिक असत्य दोष, उत्पत्तिकारक है |

हास्य व व्यंग्य के अत्यधिक प्रस्तुतीकरण से समाज में असत्य की परम्परा का विकास, प्रामाणीकरण एवं प्रभावीकरण होता है जो विकृति उत्पन्न करता है| महत्वपूर्ण विषय भी जन-सामान्य द्वारा ‘अरे, यह तो यूँही मजाक की बात है के भाव में बिना गंभीरता से लिए अमान्य कर दिया जाता है | इसलिए इस कला का साहत्यिक-विधा के रूप में सामान्यतः एवं बहुत अधिक प्रयोग नहीं होना चाहिए | इसीलिये हास्य व व्यंग्य को विदूषकता व मसखरी की कोटि में निम्न कोटि की कला व साहित्य माना जाता है |

श्याम स्मृति-८.नेतृत्व का अनुशासन....

प्रत्येक नेतृत्व का एक स्वयं का भाव-अनुशासन होता है जो उसकी स्वयं-निजता को भी मर्यादित रखता है | परन्तु यदि नेतृत्व समय सीमा में अपना उद्देश्य प्राप्त करने में सफल नहीं होता तो लंबे समय में एक समय ऐसा आता है कि नेतृत्व के पीछे चलने बालों को नेतृत्व एक बोझ लगने लगता है और वे उससे मुक्ति पाने हेतु प्रयत्न करने लगते हैं | विशेषकर जब बाहरी संकट और आवश्यकताएं नहीं रहतीं तो व्यक्तियों की रजोगुण प्रेरित भोग लालसा प्रबल होने लगती है, और नेतृत्व को अनुशीलन करने वालों को संभालना दुष्कर होजाता है और वे बिखरने लगते हैं|

अतः प्रत्येक नेतृत्व को समय समय पर अपने परिवार, अपनी प्रजा, अपने अनुयाइयों की भावनाएं, विचार व सामयिक आवश्यकताएं, अपेक्षाएं व इच्छाओं का ज्ञान प्राप्त करते रहना चाहिए एवं यथाशक्ति उनका मान या दमन एवं यथातथ्य संतुष्टि या पूर्ति करते रहना चाहिए | अन्यथा विद्रोह की संभावना बनी रहती है |

श्याम स्मृति-९. एषणा व माया बंधन...

एषणा है इच्छा को कार्य रूप देने का प्रयास। जहां इच्छा है और इच्छा के अनुसार काम करने की चेष्टा है, उसको कहते हैं एषणा। दुनिया में जो कुछ भी है वह एषणा से ही उत्पन्न है।

परमात्मा की एषणा से दुनिया की उत्पत्ति हुई है। वित्तेषणा--अर्थात धन श्री समृद्धि प्राप्ति की इच्छा लोकेषणा- अर्थात पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान की इच्छा पुत्रेषणा- अर्थात पुत्र, पुत्री, संतान, पत्नी, खानदान आदि समस्त रिश्तों उन पर प्रभाव की इच्छा तीन प्रमुख सांसारिक एषणायें हैं जो व्यक्ति को माया बंधन में लिप्त करती हैं |

श्याम स्मृति-१०.सच का सामना ---

कुछ समय पहले अखबारों, समाचारों, सीरियलों में सच का सामना खूब हो रहा था| अखबार, बकवास–किताबें-पत्रिकाएं बेचने का अच्छा नया नुस्खा ईजाद किया गया था|

पहले तो अनाचर, दुराचार,अतिचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार, असत्य वादन सब करो, मजे लूटो, चुप रहो| जब बात खुले, खुलने लगे, खुलती लगे तो सच का सामना करो, चटपटी ख़बरें-चित्र बेचने के लिए, पुस्तकें प्रकाशित करके बेचने के लिए, मीडिया व मूर्ख जनता में हीरो बनने के लिए | चोरी पकड़ी जाय तो मैं तो बताने वाला ही था, ढीठ बालमन, बालपन के झूठ की भांति |

सच क्या है, सच का सामना क्या व क्यों ? ये क्या होता है ? सच पर तो चलना होता है | जो अमूल्य जीवन तथ्य है, जीवन का व्यवहार है उस पर चलना, उसके अनुसार आचरण करना, सत्याचरण, सत्य है, न कि सामना करना, यदि सत्य पर चलेंगे तो झूठ के खुलासा सत्य का सामना करने की नौबत ही नहीं आयेगी, आनी चाहिए, क्यों आनी चाहिए ?

सत्य तो वह होता है जो कृष्ण के निभाया, जो राम का आचरण है | सीना ठोक कर रास-रचाना, सीना ठोक कर छोडना, सीना ठोक कर जग-जाहिर १६ हज़ार रानियाँ | सीना ठोक कर सीता की अग्नि-परिक्षा, सीना ठोककर त्याग, न झूठ, न कदाचरण न भेद खुलने का डर, न सच का सामना |

क्या इस झूठ के खुलासे से सच के सामना से समाज कोई हित साध पाया, चटखारे लेने वालों किताबें, अखबार बेचने वालो स्वयं सामना करने वालों का अपना स्वार्थ ही अवश्य ही सध पाया होगा, बाजारू स्वार्थ |

              ----डा श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२

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