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व्यंग्य // जब बोरियत करने लगे बोर ; एक शास्त्रीय अध्ययन // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

जब बोरियत करने लगे बोर ; एक शास्त्रीय अध्ययन

डा. सुरेन्द्र वर्मा

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जो कभी न कभी बोर न हुआ हो। बोर होना इंसान की फितरत है, पशु-पक्षियों को कभी बोर होते नहीं देखा गया। बोर होने का कौशल केवल मनुष्य तक ही सीमित है। बल्कि कहना चाहिए यह वह प्रतिभा है जो मनुष्य को उसे अन्य प्राणियों से अलग और विशिष्ट बनाती है। बोर सभी होते हैं, बच्चों से लेकर बूढों तक, स्त्रियों से लेकर पुरुष तक, बेरोजगारों से लेकर कामकाजी तक। कुछ लोग काम करते करते बोर हो जाते हैं कुछ आराम करते करते बोर होने लगते हैं। कुछ लोगों में बोरियत एक स्थाई भाव होता है, उनमे कूट कूट कर बोरियत भरी होती है; तो कुछ लोगों की मानसिकता में यह थोड़े अरसे के लिए, अस्थाई रूप से डेरा डालती है। लेकिन यह बोरियत कमबख्त कभी आदमी का पूरी तरह से पीछा नहीं छोड़ती।

बड़े आश्चर्य की बात है कि अपनी इस व्यापक उपस्थिति के बावजूद बोरियत मनोविज्ञान और समाजशास्त्र में सदैव एक उपेक्षित विषय रहा है। लेकिन बोरियत के मनो-दैहिक लक्षण काफी स्पष्ट होते हैं। मानसिक रूप से यह भावनाओं का खालीपन है। यह मन की एक उबाऊ और उदासीन दशा है। दैहिक रूप से बोर स्थिति में हम सक्रिय नहीं रहते। घिसट-घिसट कर चलते हैं। नियमित रूप से जम्हाइयां लेते हैं। इस स्थिति में ऊपरी तौर पर आदमी बेशक शांत दिखाई देता है किन्तु उसका मन अशांत होता है। द्विविधा में रहता है। जो करना चाहता है, कर नहीं पाता, जो करता है वह उसे बोरियत के क्षेत्र में ढकेलनेवाला, अरुचिकर होता है। बोरियत का यही विरोधाभास है। किसी भी भाव की अनुपस्थिति है बोरियत, लेकिन इस भावनात्मक ‘खालीपन का भाव’ उसके ज़हन में अपनी उपस्थिति बरकरार रखता है।

मनुष्य को एक बौद्धिक प्राणी कहा गया है। बोरियत इसी बुद्धि का एक उपोत्पाद, बाई-प्रोडक्ट, है। बोरियत का झंझट सिर्फ बुद्धिमान आदमी ही पालता है। वह अपने कार्य की समीक्षा करता है और उसे अरुचिकर पाता है – बस, अच्छा-भला काम करते-करते, आदमी ऊबने लगता है। बोर होने लगता है। आदमी आराम करता है। आराम करते करते सोचता है - तुझे कोई काम नहीं है क्या – बस बोर होने लगता है। काम से भी बोर आराम से भी बोर। मनुष्य अगर अपनी बुद्धिमानी का उपयोग न करे तो बेशक बोर होने से बच सकता है। जो ‘बिना सोचे-समझे’ बस जुटे रहते हैं, बोर नहीं होते। सच तो यह है कि केवल दो तरह के लोग ही कभी बोर नहीं होते। एक, जो ‘बुद्ध’ हैं, जिन्हें बोध प्राप्त हो गया है – वे कभी बोर नहीं होते। बोर होने का उनके लिए सवाल ही पैदा नहीं होता। लेकिन ऐसे महात्मा बुद्ध सरीखे लोग होते ही कितने हैं? पर ठीक इसके विपरीत, जो ‘बुद्ध’ नहीं, ‘बुद्धू’ हैं, जो अपनी अक्ल का इस्तेमाल ही नहीं करते वे भी कभी बोर नहीं होते। (या, क्या पता वे बोरियत के स्थाई भाव में ही विचरते हों।)

कहते हैं ज़हर ज़हर को मारता है। लेकिन बोरियत के मामले में यह कहावत बेमानी हो जाती है। अपनी अपनी बोरियत सहेजकर जब दो ‘बोर’ बैठते हैं तो बोरियत दीवानगी की हद तक बढ़ जाती है। बोरियत का एक अथक सिलसिला आरम्भ हो जाता है। ऐसे दो बोर घंटों अपनी बोरियत की सुरक्षा करते हुए चुपचाप बैठ कर, बिना किसी औपचारिकता के बिदा हो सकते हैं। बोरियत बड़े यत्न से प्राप्त की गई एक अनमोल वस्तु है| भले ही इसकी कितनी ही लानत-मलामत क्यों न की जाए, इसे कोई खोना नहीं चाहता। हास्य कवि-सम्मेलन में एक ‘बोर’ कवि की गाथा सुनिए –

किसी तरह आमंत्रित हुए हैं जोड़-तोड़ कर

बैठे हैं स्टेज पर मनहूसियत ओढ़कर

पूरी हास्य गोष्ठी के ‘व्यंग्य’ हैं श्री बोरकर।|

कहते हैं, ‘दर्दे इश्क’ की कोई दवा नहीं है। ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता गया। अगर आपने उसे स्वीकार कर ही लिया है तो बोरियत की भी कोई दवा नहीं है। बोरियत से बचने का बस एक ही तरीका है। उसे स्वीकार ही न करें। बोरियत अपने आप ही भाग जाएगी। बल्कि आपके लिए अनेक संभावनाओं के द्वार खोल देगी। रचनात्मकता के रास्ते बताएगी। परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करेगी। बस बोरियत नकारने भर की देर है। सच तो यह है कि हम हिन्दुस्तानियों को तो कभी ‘बोर’ होना ही नहीं चाहिए। बोर तो एक अंग्रेज़ी शब्द है जिसे हमने बेकार ही अपना रखा है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच.आई.जी / १, सर्कुलर रोड, / इलाहाबाद -११०००२

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  1. आपका व्यंग्य आलेख बिना बोर हुए, दिलचस्पी से पढ़ा।कमाल है, बुद्ध बोर नहीं होते, या फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि जो बोर नहीं होते वे बुद्ध होते हैं या हो सकते है। गजब का फलसफा। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. डा आशा चौधरी6:06 pm

    बिलकुल सही लिखा है । साधुवाद । बेहतरीन रचना के लिए । डॉ साहब की रचना वाकई यू हास्य परक होती हैं कि बधाई व साधुवाद के पात्र हैं वे । बहरहालब बोर करने वाले की भी खबर लेने का अनुरोध है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. डा आशा चौधरी8:18 pm

    डॉ साहब की रचनाओ में में हास-परिहास के साथ वेचारिकता भी हो होती है । उन्हें साधुवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आशा चौधरी6:51 pm

    डॉ साहब के व्यंग सरसता व अनोखापन लिए होते है। साधुवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आशा चौधरी8:54 am

    डॉ साहब के व्यंग सरसता व अनोखापन लिए होते है। साधुवाद ।

    उत्तर देंहटाएं

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