पखवाड़े की कविताएँ

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दोहे रमेश के मातृ दिवस पर


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माँ के दिल को पढ़ लिया,जिसने भी इंसान !
नहीं जरूरी बाँचना,…..गीता और कुरान !!
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गुस्से में भी जब नहीं,मुझको कहा खराब !
माँ की ममता का तुम्हें,क्या दूँ और हिसाब !!
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मेरे अपने आप ही,. बन जाते हैं काम !
माँ के आशीर्वाद का, देख लिये परिणाम !!
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माँ से बढ़कर कब हुआ, कोई और मुकाम !
चाहे आवें साथ में, मिल कर देव तमाम !!
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पोंछा था जिनसे कभी,.बचपन में मुंह गाल !
माँ की पेटी से मिले, ..सारे वही रुमाल !!
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ख़त्म रसोई में हुआ , खाना जितनी बार !
माँ ने फांका कर लिया, झूठी मार डकार !!
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इसे करिश्मा ही समझ ,कुदरत का इंसान !
माँ को बच्चा गंध से, . .लेता है पहचान !!
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भले बुरे के बीच का, ऐसे समझें फर्क !
जैसे बच्चों के लिए, माता दिखे सतर्क !!
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उठे दुआओं के लिए,माँ का हरदम हाथ !
रखा नहीं औलाद ने,. उसे भले ही साथ !!
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वो चूल्हे की रोटियाँ,...वो अरहर की दाल !
जीवन में इनका पड़ा,माँ के बिना अकाल ! !
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होता है इस भाँति कुछ,माँ का आशीर्वाद !
जैसे माली पेड़ को,....देता है जल खाद !!
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देवेन्द्र कश्यप

         सामाजिक चिंतन -- जन्मदात्री माँ
  त्याग , समर्पण , सेवा की है जो निशानी ,
  ऐसी पालनहारी , प्यार-दुलार की न है कोई सानी l
  जन्मदात्री जननी का जो आदर कर न सके है अहमक ,
   दुनिया दिखाई जिस मैय्या ने वह है बड़ी सयानी ll

  पीड़ा सहन करने वाली बनी पीड़िता मैय्या तू ,
दु:ख जंजालों में फंसकर बनी है संकट मोचक तू l
सहनशील और कर्मशील का है तेरा रूप विराट ,
पूजन योग्य है तू माँ महिमा की है खान तू ll

पहली गुरु कहलाने वाली गुरु शिरोमणि है माँ,
शिक्षा देकर बच्चों को नेक राह दिखाती है माँl
दुनिया में गुरु श्रेष्ठ है उसमें भी माता है सर्वश्रेष्ठ ,
गुरु दक्षिणा का श्रेष्ठ दक्षिणा चुकाना हमको भी है शेष ll

अपना जीवन गारद कर माँ देती है सबको नवजीवन ,
अतुलनीय अनुपम जीवन से सुधरे दुनिया का जन जीवन l
ममतामयी बनाती माँजो है ममता का सागर ,
सही दिशा मिले जीवन को ऐसा दे दो संजीवन ll

उस मैय्या के चरणों को है नमन-वन्दन अभिनन्दन,
न भूलेंगे उपकार तेरे तूने तो हम खातिर खूब किये है क्रन्दन l
आदर और समादर है जीवनदायिनी स्रोत को मेरा ,
तेरा नाम करे अमिट-अमर हम कहलाये अच्छे तेरे नन्दन ll
            ----सामाजिक चिंतक देवेन्द्र कश्यप सीतापुर

रचनाकार परिचय - सामाजिक चिंतक देवेन्द्र कश्यप
ग्राम - अल्लीपुर
पत्रालय - कुर्सी
तहसील सिधौली
जनपद - सीतापुर
( उत्तर प्रदेश )
PIN Code - 261303

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आशुतोष मिश्र

विरासती रिश्ता
रिश्ते कुछ मिलते विरासत में
जिनको   हम  भूल  जाते  हैं।
भूल  प्रेम  सौहार्द  आपस में
हम अपने पैसों पर इतराते हैं।।


रिश्ते विरासती हैं हुआ करते
हृदय मन  के अति नजदीक।
थोड़ा अकड़पन होता  उनमें
परन्तु साबित  होवे वह ठीक।।


संग वसीयत के मिलते रिश्ते
रिश्ते न  हमसे  सम्भलते  हैं।
पश्चात् मृत्यु  पूर्वजों के  मात्र
हम औपचारिक ही करते  हैं।।


है रिश्ता एक  ऐसा भी होता
बाबा तक रहता जो गुलजार।
पापा  निभाते औपचारिकता
हैं देते  पोते  पूर्णतया  नकार।।


नाम बड़ा  सुनहरा  रिश्ते का
प्रेम से परिपूर्ण प्यारी बुआ है।
कभी-कभी आती वह मायके
रहती देती भतीजे हेतु दुआ है।।


हम सब क्यों मिले  विरासती
रिश्तों को रहते सदा भुलाते हैं।
मिली वसीयत जो पुरखों द्वारा
आशु उसे अपने नाम कराते हैं।।


आशुतोष मिश्र
तीरथ सकतपुर
कापीराइट एक्ट के अंतर्गत

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सुशील यादव

122 122 122 122 122

कहाँ आपकी हैसियत किस दर्जा गुमां है
सलामत ज़मी है तिरी ठीक ही आसमाँ है

जमी हैं यहाँ धूल-परतें, मिजाजों के ऊपर
बुला देख लो जानकारी,कमी अब कहाँ है

सियासत के नखरे अजब जान लो आप ऐसे
है नजदीकियां आज, कल बहुत ही दूरियां है

बगावत के तेवर दिखाते हमें  खूब वो भी
हैं इल्जाम जिनपे अदालत पड़ी अर्जियां है

सबब जानता हूँ बेतरतीब तेरा  बिखरना
कहीं खून में  जोश बाकी'सुशील'गर्मियां है
--
मेरा 'पर' मत नोचना,बाकी बहुत उड़ान
रहते हुए जमीन पर , नभ की चाह समान

कैदी आशाराम की ,हिचकोले में नाव
दुर्गति की अब जाल से,कैसे करें बचाव

निर्मल बाबा ये बता,कहाँ कृपा में रोक
शक्ति -भक्ति दो नाम की ,चिपक गई है जोंक

कैदी आशाराम को ,मिला न तारनहार
हर गुनाह ले डूबता,हिचकोले पतवार

एक सबक ये दे गया, कैदी आशाराम
कोई बाबा दे नहीं,याचक को आराम

अतुलित बल या ज्ञान का ,मिला जहाँ अतिरेक
समझो आशाराम सा ,निष्ठुर बना विवेक

अगर छलकता ज्ञान हो ,रखो उसे सम्हाल
दुर्गति के आरंभ में ,करें जांच -पड़ताल


मेरे हिस्से में नहीं ,कोई राख-भभूत
इसी बहाने जानता ,पाखण्डी करतूत

कैसे बेचें सीख लो , बात-बात में राम
मंदी में मिलने लगे,गुठली के भी दाम

बार-बार गलती वही ,दुहराते हो मित्र
शायद दुविधा के कहीं ,उल्टे पकड़े चित्र

महुआ खिला पड़ौस में ,मादक हुआ पलाश
किस वियोग में तू बना ,चलती फिरती लाश

मायावी जड़ खोदना,चढ़ना सीख पहाड़
वज्र सरीखे काम हैं ,जान दधीची हाड़

आओ मिल कर बाँट लें, वहमों का भूगोल
कहीं रखूं नमकीन मैं ,कुछ चीनी तू घोल

काशी मथुरा घूम के ,घूम हरी के द्वार
कोस दूर कानून से , यूपी और बिहार
 
करें प्रेम की याचना ,मिल जाए तो ठीक
वरना दुखी जहान है ,आहिस्ता से छींक

इस रावण को मारकर ,करते हो कुहराम |
भीतर तुम भी झाँक लो,साबुत कितना राम ||
#
रावण हरदम सोचता,सीढ़ी स्वर्ग दूं तान |
पर ज्ञानी का गिर गया ,गर्व भरा अभिमान ||
#
रावण करता कल्पना ,सोना भरे सुगन्ध |
पर कोई सत कर्म सा,किया न एक प्रबन्ध ||
#
सीढ़ी स्वर्ग पहुंचा सके ,रावण किया विचार |
आड़ मगर आता गया ,खुद का ही व्यभिचार ||`
#
रावण बाहर ये खड़ा ,भीतर बैठा एक|
किस-किस को अब मारिये, सह-सह के अतिरेक||

प्रीत-प्यार इजहार में,थे कितने व्यवधान
वेलेंटाइन ने किया , राह यही आसान

आये हैं अब लौट कर . हम अपने घर द्वार
दुविधा सांकल खोल दो ,प्रभु केवल इस बार

टूटे मन के मोहरे ,चार तरफ से तंज
कैसे दुखी बिसात पर ,खेले हम शतरंज

खुद को शायद तौलने,मिला तराजू एक
समझबूझ की हद रहें , खोये नहीं विवेक

भीतर कोई खलबली ,बाहर कोई रोग
लक्षण सभी हैं बोलते ,हुआ बसन्त वियोग

संभव सा दिखता नहीं,हो जाए आसान
शुद्र-पशु,ढोंगी-ढोर में ,व्यापक बटना ज्ञान
#
सक्षम वही ये लोग हैं,क्षमा किये सब भूल
शंका हमको खा रही ,बिसरा सके न मूल
#
संयम की मिलती नहीं,हमको कहीं जमीन
लुटी-लुटी सी आस्था ,है अधमरा यकीन
#
इतने सीधे लोग भी ,बनते हैं लाचार
कुंठा मजहब पालते ,कुत्सित रखें विचार
#
कुछ दिन का तुमसे हुआ ,विरहा,विषम,वियोग
हम जाने कहते किसे,जीवन भर के रोग
#
दिन में गिनते तारे हम ,आँखों कटती रात
यही बुढ़ापे की मिली ,बच्चों से सौगात

कहाँ-कहाँ पर ढूंढता ,जीवन का तू सार
दुश्मनी के अम्ल सहज ,डाल दोस्ती क्षार

उजड़े -उखड़े लोग हम ,केवल होते भीड़
सत्तर सालों बाद भी ,सहमा-सहमा नीड़

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस

बीते साल यही कसक ,हुए रहे भयभीत।
कोसों दूर हमसे रहे,सपने औ मनमीत।।

सुख के पत्तल चाट के,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे,बदला रहा निकाल

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर नहीं ,एकलव्य से द्रोण

मन की बस्ती में लगी ,फिर नफरत की आग
जिसको देना था दिया ,हमको गलत सुराग

मंदिर बनना राम का ,तय करते तारीख
चतुरे-ज्ञानी लोग क्यों,जड़ से खायें ईख

खोया क्या हमने यहॉं ,पाया सब भरपूर
तब भी हमको यूँ लगे ,दिल्ली है अति दूर

जागी उसकी अस्मिता,उठा आदमी आम
कीमत-उछले दौर में ,बढ़ा हुआ है दाम

अपनी दुकान खोल के,कर दे सबकी बन्द
राजनीति के पैंतरे ,स्वाद भरे मकरन्द
--

सुशील यादव,
न्यू आदर्श नगर जोन 1 स्ट्रीट 3 ,दुर्ग
susyadav7@gmail.com

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पुष्प सैनी


मैं भूल बैठी दुनिया सनम को निहार के |
वो जा चुका है मुझको घड़ी भर पुकार के ||

सौग़ात में दिये हैं नगीने ये अश्क़ क्यों |
बस तौहफ़े सँभाले हैं यही मैंने प्यार के ||

तुम गुनगुना रहे हो वो मेरी ग़ज़ल ही है |
अशआर आ पड़े हैं मिलन की बहार के ||

मिट्टी से ज़िस्म वाले लो पत्थर से हो गए |
पल-छिन हो भला कैसे अब तो दुलार के ||

चंदा की चाँदनी में भी जलता है ये बदन |
मुश्किल सनम हुए हैं ये दिन इंतजार के ||

ख़ामोश सा फ़साना दिलों के हैं दरमियाँ |
धड़कन मुखर बजी यूँ जैसे सुर सितार के ||

कुछ वादियों में खुशबू कहीं फैली हैं चुभन |
कुछ ज़ीस्त 'पुष्प' जैसी तभी लम्हें ख़ार के ||

पुष्प सैनी
न्यू दिल्ली
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  देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम'

लफ़्फ़ाजी की होडा-होड़ी,                             

देखें भौचक धनिया-होरी.                             

इनने अपना सीना ताना,                               

उनने अपनी बाँह सिकोड़ी.                       

बदज़ुबानियों का बद आलम,                        

सबने तय मर्यादा तोड़ी.                               

खून पी चुके, मांस खा गये;                         

बची-खुची हड्डियां चिंचोड़ी.                         

सेहरा बांधे, मूंछ मरोड़ें;   

बाहुबली,लखपती,करोड़ी.                              

इस हमाम में सब नंगे हैं,                           

बाबा-काजी,सन्त-अघोरी.                               

छली गयी 'महरूम' हमेशा,                        

जनमत की हर आश निगोड़ी.                                

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आह सियासत,वाह सियासत;                      

दीन-दुखी हैं अब तक आहत.                       

वही हवाई सपने-वादे;                                

ओस चटा कर देते राहत.                              

तब के,अब के बतलबरे सब;                    

सबको बस सत्ता की चाहत.                          

जंग ज़ुबानी है चौतरफा;                             

भूले सब मरजाद-शराफत.                       

नाउम्मीद न होना 'महरूम';                    

निर्णायक जनमत की ताक़त.              

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  देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम';

1315,साईं पुरम् कॉलोनी,

रोशननगर,कटनी;म.प्र.
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जितेन्द्र आनंद


1.    आ गयी मुझे फिर याद तुम्हारी

देखो आ गयी मुझे फिर याद तुम्हारी
सुन रहा है दिल आवाजें इस पल भी
उठ जाता हूँ मैं गहरी नींद से अक्सर
पास मेरे मिलती हो कुछ कहती हुई
अकेला नहीं रहता एक पल भी कहीं
साये की तरह यादें फैली हुई हैं हर तरफ
मन ही गया है बेकाबू सुनता नहीं
ले जाता है खींच कर तुम्हारी ओर
मन में बस गयी है ये आँखों की उलझन
नाराज हो नहीं सकता दिल बेरुखी से
आ जाती है मुझे याद तुम्हारी बार-बार
मन दे रहा है जवाब तुम्हें 
जो मन में तुम्हारे दिल चाहता है मेरा
तुम कुछ न कह कर भी पास हो
याद करता हूँ हर पल हमेशा|


2.    ठहर गयी है ये शाम भी

ठहर गयी है ये शाम भी
करते हुए वही शिकायत
बेवक्त का तमाशा लौट आया है
ढोल बजाते हुए बिखरी यादों का |

यादें रह गयी हैं परेशान सी
अंधेरे में जैसे एक साये की तरह
भूल जाऊं कैसे तुम्हें इस तरह
खुद को बेमतलब बनाने के लिए |

लौट आता है बचपन फिर एक बार
तिरस्कार और बेचैनी के साथ
चेहरे पर चेहरे लगाए हुए
मिलता हूँ सबसे मुस्कराते हुए |

कह दिया है तुमने फिर दोबारा
न आना कभी दरवाजे पर मेरे
मन फिर भी देता है दस्तक
शायद बुला लोगी एक दिन मुझे |

इंतज़ार है उम्र भर के लिए
मिल जायेगी आज़ादी इस उलझन से
दो बोल कह दोगी बस एक बार
इतनी भी शिकायत नहीं थी तुमसे |
--
  3 - एक बार और सही

वही दर्द वही अपमान एक बार और सही
मैं चाहता रहूँगा तुम्हें हर हाल में उम्र भर
थकते कदमों के साथ चलते हुए खामोशी से
तेरे साथ ये दिन तमाम एक बार और सही ।

कोई जरूरी तो नहीं, जान लेती मन की बात
खामोशी का साथ काफी है जीने के लिए
बिखर गयी है हर शाम उदास होकर जाने क्यों
नींद आने का इंतज़ार रात भर एक बार और सही ।

शीशे के टुकड़े दरकते हैं दिल में हज़ार
आँखों में उतर आया है खून बहता हुआ
मजबूरी नहीं बदल पायी नफरत मेरे लिए
हो सुबह सजा की शुरुआत एक बार और सही।

कहाँ आ गयी है जिंदगी मुझे लेकर तेरे साथ
सिवा दर्द के हर कदम अब कोई साथी न रहा
कोई एहसास अब जीने का नहीं न कोई इच्छा 
  हर बार मर जाने का अहसास एक बार और सही ।

4 -  तुम्हें शायद कभी लगा नहीं

तुम्हें शायद कभी लगा नहीं
इतना भी आसान नहीं मुझे
ये रोज रोज की बेरुखी बेवजह
किस्मत मेरे दरवाजे पर ले आई
दर्द की दास्तान हर दिन जीने के लिए
शायद अकेला ही लिखा था
सफर तय करना मंजिल तक
तलाश तेरे साथ की ले आयी
शब्दों की तलवार जख्मी बदन पर
इशारे ही काफी हैं तुम्हारे
जीने की वजह खतम करने के लिये
वक़्त तो गुजर ही जायेगा
चाहकर न छाते हुए
मैं भी हो गया हूँ बेशरम
दबा दी आवाज दिल की
हज़ार तहख़ानों में हमेशा के लिये । 
 
  


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शाइर जसराज जोशी उर्फ़ लतीफ़ नागौरी


​ग़ज़ल –

1

“यूं ख़ता पे ख़ता करके ख़ुद को बेगुनाह किया”                                               

यूं ख़ता पे ख़ता करके ख़ुद को बे बेगुनाह किया,

यूं झूठी ताज़ीम में फंस के ख़ुद को तार-तार किया !

अपना जुल्म दूसरों पे मंढ के ख़ुद को आज़ाद किया,

बेमानी चालबाजी से क़ानून से खिलवाड़ किया !

ज़माना था कौडी में भी थी औकात यारों,

अब बदलती हवा है ऐसी, बेगुनाहगार को गुनाहगार किया !

किसकी नालिश किससे करूं कहाँ अब मैं यारों,

किससे प्यार करना था अब किसको याद किया ! 

घर-घर से आ रहे हैं लोग आबो-रसद के वास्ते,

ज़माने ने देखो इसको बार-बार बेकार किया !      

ए लतीफ़ इन हैवानों बेइमानों के वास्ते,

अब दुआ कर ले, चूंकि अब अब क़ानून के रखवालों ने इसे तार-तार किया !

यूं ख़ता पे ख़ता करके ख़ुद को बे बेगुनाह किया,

यूं झूठी ताज़ीम में फंस के ख़ुद को तार-तार किया !
---

2


फासले ऐसे भी होंगे, कभी ऐसा सोचा भी न था, 
मेरे सामने बैठे हैं वो मेरे नहीं है !
लिल्लाह ये गज़ब है इश्क की मज़बूरियां
अपनी मगरूरी में सबसे कहते हैं, वो मेरे नहीं हैं !
तर्के इश्क का शिकवा गिला किससे करूं मैं,
कोई उनसे पूछे तो हंसकर कहते हैं वो मेरे नहीं है !
पहले तो इश्क किया और बेवफ़ा हो गये
रूठकर यही कहते हैं वो मेरे नहीं है !
आतिशे इश्क में जल-भुन रहा हूँ मैं यारब
बेवजह सभी से कहते हैं वो मेरे नहीं हैं !
बज़्म में आये और अनमने से है यारों
बेखौफ़ सभी से कहते हैं वो मेरे नहीं है !
ए लतीफ़ ग़र यही इश्क उम्दा रस्म है
तो फिर क्यूं कहते हैं वो मेरे नहीं है !




3

तासीरे-इश्क
ग़र भुलाने की लत है, हमें भूल जाओ
तुम्हें भुलाने में बरसों लगेंगे !
[१] तर्के इश्क में रूठना इतराना है ग़लत,

रूठे सनम को मनाने में बरसों लगेंगे
[२] तर्के इश्क में न कुछ कहा न किया,

मैंने बेवजह रूठे को मनाने में बरसों लगेंगे !
[३] बेबाक हुस्ने पैकर से क्यूं फ़िदा हो गए हम,

इश्क की रस्म निभाने में बरसों लगेंगे !
[४] बस ज़रा सी बात पे रूठ के अलविदा कह गए,

रूठे सनम को मनाने में हमें बरसों लगेंगे !
[५] तेरी इश्क की अदाएं मिसाले आशिकी है ज़ालिम,

वसले इश्क को निभाने में हमें बरसों लगेंगे !
[६] ए लतीफ़ इश्क की तासीर को कोई क्या समझेगा,

इस रस्म को निभाने में हमें बरसों लगेंगे !
                 
तारूफ – गुलकार का नाम जस राज जोशी है ! आप लतीफ़ नागौरी के नाम से शेअरोसुखन करते हैं ! शिक्षा विभाग में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में अपनी सेवाए देते रहे ! सन १९९९ में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय माणकलाव में अध्यापक के पद पर रहते हुए सेवानिवृत हुए ! इन्होने शिक्षा विभाग में जिला एवं राज्य स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम में एकल अभिनय एवं विविध कार्यक्रम में सक्रिय रहे हैं ! इनका निवास स्थान “भैरव रतन भवन, लोहरो की गली, वीर-मोहल्ला जोधपुर” है !       

                                  -लतीफ़ नागौरी       
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जितेन्द्र वर्मा


हाइकू
ज़िन्दगी


रात ज़िन्दगी
दिखाती जो सपने
मिथ्या ज़िन्दगी

कहे ज़िन्दगी
हर पल जी मुझे
पल ज़िन्दगी

हमने देखा
ख़ूबसूरत दृश्य
खिली ज़िन्दगी

भागे ज़िन्दगी
मौत से साथ दौड़
हारी ज़िन्दगी

अजूबा लगे
यह कैसी ज़िन्दगी
जादू ज़िन्दगी


चलते हुए
बीत गये हैं युग
थकी जि़न्दगी

ज़िन्दगी खेल
कभी हार तो जीत
खेले ज़िन्दगी

रंग से भरी
रंगीन है ज़िन्दगी
होली ज़िन्दगी

हराती रही
उम्र भर ज़िन्दगी
अन्त में हारी

बात करती
हर वक्त़ ज़िन्दगी
अन्त में चुप

जितेन्द्र वर्मा
ए ४८
फ्री़डम फ़ाइटर ऐन्क्लेव
नयी दिल्ली - ११०६८

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सुशील शर्मा

हेलो जिंदगी 

 
जीवन के उतार-चढ़ाव को ढोती हैं जिंदगी
कभी हंसती तो कभी रोती है जिंदगी
आस्था की अनुभूति समेटे है जिंदगी
संघर्षों से खुद को लपेटे है जिंदगी।
अभिमानों के कटीले रास्तों में
स्वाभिमानों को सहेजे है जिंदगी।
एक रात में आसमान कोई नहीं छूता।
दिन रात कड़ी मेहनत चाहती जिंदगी।
जो धूप में खून सुखा चुका है उम्र भर
उसी के संग दौड़ती लगाती है जिंदगी।
माँ बाप ने पाला है कितना कष्ट उठा कर
उनकी सेवा का धर्म निभाती है जिंदगी।
झुण्ड में चलना फिरना कुत्तों का काम है।
शेरों के तो पैरों पर  तेल लगाती है जिंदगी।
हारने पर ये दुनिया मौका नहीं देती
जीतने पर गले लगाती है जिंदगी।
कुछ देने से पहले कुछ लेती है इस तरह
बराबर का हिसाब बताती है जिंदगी
कभी रूकती नहीं कभी थकती नहीं ये
नदी की धार के मानिंद बहती है जिंदगी
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अविनाश ब्यौहार


1:सांसद हों
या विधायक।
लेकिन हमारा
राजनैतिक तंत्र
है इस लायक॥
कि चतुर्दिक फैले
उसकी 'अरोमा'।
लेकिन शीलभ्रष्ट नेताओं
के कारण लोकतंत्र
को हो गया
है कोमा॥

2:नीतिभ्रष्ट नेताओं
की देश के
प्रति निष्ठा।
त्याज्य वस्तु है।
जैसे विष्ठा॥

3: वे उपदा
बड़े चाव से
खा रहे हैं।
देश के खर्चों में
पलेथन लगा
रहे हैं॥

4:देशभक्ति और जनसेवा
छोड़कर यदि पुलिस
नीतिविरूध्द हो जाये
तो यकीनन देश पर
जुल्म ढा रही है।
मतलब बाड़ खेत
को खा रही है॥

5:शीलभ्रष्ट नेताओं की
हो गई है ऐसी कुर्सी।
उसके आगे लगा
हुजूम मानो कर
रहा हो मातमपुर्सी॥

6: नेता जी जब वोट
मांगने आते हैं
तब वायदों का
पिटारा खोलते हैं
जनता को बोलते
हैं जनार्दन।
बाद में उसी का
करते हैं मान मर्दन॥
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हाकिम

नए नए हाकिम की
नई नई बात।
मातहत की
खुशी से
भरी हो हयात।।
चुनांचे दोनो के
बीच बनी
रहे पाती।
अन्यथा
करनी पड़ेगी
ठकुर सोहाती।।
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मेरे सामने
खड़ी थी
गरीबी की रेखा!
मैनें दीन हीन
असहाय ब्यक्ति
को देखा!!
प्यार से
उसका कंधा
थपथपाया!
तो वह
मुझे देखकर
मुस्कुराया!!
मैंने बातों
में मिठास घोला!
बड़ी शाइस्तगी
से बोला!!
कि तुम्हारी
इस दशा
पर मुझे
सोग है!
जवाब में
वह अपने ऊपर
हंसते हुये बोला-
जबकि मेरी
कुंडली में
गजकेसरी
योग है!!
--

कोर्ट

कोर्ट सर्वोपरि है
इसलिये उसके आगे
निहुरना पड़ता है।
जबकि लोग कहते हैं
यह अज्ञानता, मूर्खता,
जड़ता है।।
क्योंकि न्यायालय
में पेश होने
वाले दावे बहुधा
होते हैं फेंक।
इसीलिये अदालत
से गुम हुआ
नीर-क्षीर-विवेक।।

घोटाले

लोकतंत्र पर कीचड़
उछाल रहे हैं
नित नये घोटाले।
क्या हमने
आस्तीन में
सांप पाले।।

गबन

गबन और घोटाले
देश की जर्जर गाड़ी
खींच रहे हैं।
यानि हम वृक्ष
काटकर पल्लव
सींच रहे हैं।।

प्रदूषण

राजनैतिक प्रदूषण
से लोकतंत्र का
सिर शर्म से
झुका हुआ है।
इसीलिये देश में
विकास का रथ
रूका हुआ है।।

लाइन

वे बेरोजगारी की
लाइन में खड़े हैं।
नोकरी पाने के
लिये अड़े हैं।।
उच्च पद पर
आसीन है जो
फेल है।
सब टके का
खेल है।।


अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट
माढ़ोताल कटंगी रोड
जबलपुर।


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देवेन्द्र सोनी


जरा हटके - नई कविता

ग्रीष्म का ये भीषण रूप
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ग्रीष्म का ये रूप भीषण
लोग हुए हैं सब व्याकुल
सूरज की तो अपनी तपन
जल बिन हैं कंठ -कंठ आकुल
मचा है -
चहुँ ओर हाहाकार
जल बिन है सब बेकार।

ताप रवि का सहने को
फिर भी सक्षम हैं सारे
किन्तु गिरते भू जल स्तर से
फिर रहे मारे-मारे ।

आज यदि ये हाल हैं
तो सोचो,
कल क्या होगा ...?

स्वार्थ भरे मन से हमने
प्रकृति से खिलवाड़ किया
गगनचुम्बी अट्टालिकाओं और
कंक्रीट के जाल से
वसुधा को अपनी पाट दिया ।

सुविधा के लिए अपनी
काट रहे हैं हम नित्य ही वन
बदले में इसके करके
रस्म अदाई पौधारोपण ।

नहीं बचेगा , इससे कुछ भी
खो देंगे हम चैन - अमन ।

तपन से गर्मी की तो
फिर भी बच लेंगे हम
मगर सूखती धरती को
देना होगा जीवन ।

आने वाले संकटों का
नहीं खींचता मैं कोई खाका
जानता हूँ सिर्फ इतना
जल का है जीवन से नाता ।

कोई न कोई जतन कर
सह लेंगे हम हर अभाव।

सह लेंगे ग्रीष्म का ताप
और ठंड की ठिठुरन भी
मगर कम होती वर्षा का
करना होगा कोई उपाय।

नहीं किया यदि हमने
अंबर के जल का संचय
बूंद-बूंद के लिए तरस कर
खोना पड़ेगा प्राण अपने ।

वक्त अभी भी है
सम्हलने का हम सबके पास
प्रकृति को बचाने
पौधा लगायें और पालें
उसे अपने आस-पास ।

नहीं करेगी फिर व्याकुल
तपन ग्रीष्म की हमको
और न ही होगा उसका
फिर यह भीषण रूप
पर जरूरी है
इसके लिये बदलें हम
प्रकृति का बिगड़ा स्वरूप ।

तो आइए हम सब
मिलकर यह ठानें
जुट जायेंगे
जंगल और जल बचाने।
---.

जरा हटके - नई कविता

परीक्षा

आती है जब भी कोई
परीक्षा की घड़ी
जीवन में हमारे -
हो जाते हैं हम बेचैन।

घिर जाते हैं अवसाद से
और कभी कभी तो
ले लेते हैं ऐसा कोई निर्णय
जो होता है आत्मघाती ।

डाल देता है संकट में
हमारे साथ परिवार को भी ।

मिला है जीवन तो -
आएँगी ही परीक्षाएं भी
करना ही होगा -
सामना भी इनसे ।

स्वीकारना होगा -
जीवन के इस सत्य को ।

जिस दिन समझ लेंगे इसे -
सहज होंगी फिर
सारी परीक्षाएं
और मिलेंगे
अनुकूल परिणाम भी ।

कसौटी पर खरा उतरता है
जब कनक ( स्वर्ण )
होता है तभी -
कुंदन भी वह ।
--

हिंदी कविता
मजदूर दिवस पर विशेष

आज फिर हो रही है
शहर में ही नहीं
पूरे देश में
मात्र औपचारिकता
जी हाँ
मजदूर दिवस की
औपचारिकता ।

यही तो होता है
हर दिवस पर
टेंट लगाकर ली जाती हैं सभाएं
पहनाई जाती है फूल -मालाएं
और किया जाता है गुणगान
बताया जाता है उन्हें महान ।

खत्म होते ही  दिन
देर रात तक फिर
भुला दिया जाता है उन्हें
जिन्हें याद किया था सुबह ही ।

अब नियति और औपचारिकता
ही बन गया है यह सब
फूल कर कुप्पा हो जाते हैं
एक दिन का सम्मान पाकर
और
उस दिन तो कम से कम
भूल ही जाते हैं वे सभी
अपना दुख दर्द।

आयोजक भी हो लेते हैं खुश
इस आभासी दुनिया में
देकर उन्हें आभासी सुख ।

गरीब को गरीब
और
मजदूर को तो बने रहना ही है
मजदूर सदा
इसी में भला है उनका भी
और नियंताओं का भी ।

भले ही लेते रहें वह
कितनी ही सुविधा
बदले में देने के लिए
अपना मत - अभिमत ।।

         - देवेंन्द्र सोनी,
          प्रधान सम्पादक
          युवा प्रवर्तक, इटारसी।
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अशोक बाबू माहौर

हाइकु

बिकता नहीं
मोल भाव बाजार
पीड़ा अपनी ।

आपका घर
माँ बाप  बूढ़े हुए
औलाद अंधी ।

सबेरा हुआ
भाग गयी अँधेरी
खिला बगीचा ।

सोता नसीब
आलस्य मन भरा
शरीर दुखी ।

एड़ियां फटीं
तलबे कोमल हैं
पीड़ा कहाँ ।

        परिचय
अशोक बाबू माहौर
साहित्य लेखन :हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संलग्न।
प्रकाशित साहित्य :हिंदी साहित्य की विभिन्न पत्र पत्रिकाएं जैसे स्वर्गविभा, अनहदक्रति, साहित्यकुंज, हिंदीकुंज, साहित्यशिल्पी, पुरवाई, रचनाकार, पूर्वाभास, वेबदुनिया, अद्भुत इंडिया, वर्तमान अंकुर, जखीरा, काव्य रंगोली आदि में रचनाऐं प्रकाशित।
सम्मान :इ- पत्रिका अनहदक्रति की ओर से विशेष मान्यता सम्मान 2014-15
नवांकुर वार्षिकोत्सव साहित्य सम्मान
काव्य रंगोली साहित्य भूषण सम्मान आदि
प्रकाशित पुस्तक :साझा पुस्तक नये पल्लव 3
अभिरुचि :साहित्य लेखन।
संपर्क :ग्राम कदमन का पुरा, तहसील अम्बाह, जिला मुरैना (मप्र) 476111


ईमेल ashokbabu.mahour@gmail.com

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कुलदीप पाण्डेय 'आजाद'


लालच  के आगे तुम अपने,
अधिकारों को मत भूलो |
लोकतन्त्र के प्रहरी हो तुम,
हाथ उठा नभ को छू लो |
बाहर से बाग दिख रहा पर,
अंदर से क्या सूरत है ?
जो माली कंटक छाँट सके,
उसकी आज जरूरत है |
वर्षों से दबी जो चिंगारी,
उसको आज जलाओ तो,
आँचल से बाहर निकलो,
भ्रष्टाचर मिटाओ तो |
मातृभूमि प्राणों से प्यारी,
प्यारा प्राणों से उपवन |
बाहर से तो उजियारा है,
पर है अंदर छाया तम |
भीतर छुपा जो अँधियारा,
उसको आज मिटाना है |
जलना पड़े स्वयं हमको तो,
दीप हमें बन जाना है |
                         कुलदीप पाण्डेय 'आजाद'
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कमलेश सवि ध्रुवे


#मजदूर# मानवता की नींव
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मानवता की नींव हो तुम
अद्भुत मृत सजीव है तुम
माना एक मजदूर हो तुम
पर कितना मजबूर हो तुम

जग सृष्टा ब्रह्मा तुम्ही है
पालनहार विष्णु अवतार हो
दुख तेरे दुनिया क्या जाने
क्योंकि तुम एक निराकार हो

चाहो अगर ,मिट जाये दुनिया
क्योंकि ताण्डवकारी शिव हो तुम
पाञ्जन्य सा नादकारी
अर्जुन का गाण्डीव है तुम

ढूंढ़ लेते हो झोपड़ी में
जीने की हर सुविधा
चुरा लेते हो अमीरों की नींद
भूल जाते हो हर दुविधा

अनंत बलशाली हो तुम
शक्ति का नहीं है पारावार
उठो संभालो वज्र सा औजार 
गंगा का होगा पुनर्अवतार

तुम कामधेनु हो थकते नहीं
कितना भी कोई करे दोहन
तुम कल्पतरू के छायें में
बनता है पारस हर पत्थर

जब आती है रोने की बारी
रूलाते हो पत्थर को हंसकर
पाता है हथौड़ा विश्राम जब
छुप जाता है सूरज थक हारकर

तुम क्यों इतने विलंब हुए
सुख-चैन बांटते घड़ी
ईश्वर घर सब शेष हुआ
या दुख की झोली थी बड़ी

निर्विरोध लेकर चला आया
क्यों न जरा क्लेश हुआ
दुख गठरी भी हंस हंस लिया
जब तक पहाड़ न शेष हुआ

[कमलेश सवि ध्रुवे,उमरावनगर/था.ख.,राजनांदगांव ३६गढ़

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डॉ नन्द लाल भारती


कविता : अपनों का साथ
यार याद है खेतिहर पिता के
पांव के तलवे का
हल जोतते थपुआ जैसी मोटी
परत की शक्ल में
पंजे का साथ छोड़ देना
लहुलहान दर्द भी..............
बिवाईयां तो उभरती रहती थी
सूखे फटी उपजाऊ जमीं की तरह
मां-बाप के पांवों में
होता रहता था बतीजार
याद है  यार
गरम कड़वे तेल का दर्द भी.........
बहुत मेहनत से उपजता था
अन्न
मां बाप भगवान थे अन्न जल देवता
और थी एक बड़ी पूंजी
सन्तोष की सांस
अब मशीनों का युग है
ना मां बाप को ना अन्न जल का
सम्मान है..........
भरपूर है सब कुछ है पर बिकाऊ
पानी नि:शुल्क प्याऊ़ं पर मिल जाता था
बाप का जीवन इज्ज़त से
नाती पोतों घर परिवार में कट जाता था
यार दुःख की है बात
बूढ़े मां बाप का दर्द में बीतता है
पानी बोतल में बिकता है.....
यार ये कैसी मदमस्त तरक्की है
बूढ़ी ड्योढ़ी पर जंग लगा ताला
बिखर रहे घर परिवार
जम़ीं पर सीमेंट पत्थर के जंगल
गमलों में ढूंढ रहे मंगल.........
मां बाप की जिन आंखों में
सपने पल रहे थे
चौखटों पर जिन दीया जल रहे थे
वहीं अंधेरा का शोर मच रहा है.....
यार ये कैसी तरक्की
सान्ध्य जीवन में मां बाप
आसरा खोज रहे
कांपते हाथ लटपटाती जुबां
वृध्दा आश्रम का पता पूछ रहे......
यार आओ चले पुराने दिनों मे
नहीं चाहिए ऐसी बेपरदा तरक्की
खूब करो तरक्की किसको एतराज
रहे याद ना छूटे जन्म भूमि
ना टूटे घर परिवार
मां बाप ना होवे बेसहारा अनाथ
ना छूटे अपनी मांटी
ना अपनो का साथ..........
डां नन्द लाल भारती
0000000000

महेन्द्र देवांगन माटी


आजकाल के लोग

पढ़ना लिखना छोड़ के, खेलत हे दिन रात ।
मोबाइल ला खोल के, करथे दिन भर बात ।।

आजकाल के लोग मन , खोलय रहिथे नेट ।
एके झन मुसकात हे , करत हवय जी चेट ।।

छेदावत हे कान ला , बाला ला लटकात  ।
मटकत हावय खोर मा , नाक अपन कटवात ।।

मानय नइ जी बात ला , सबझन ला रोवात ।
नाटक करथे रोज के, आँसू ला बोहात ।।

महेन्द्र देवांगन माटी
      पंडरिया (कवर्धा )
छत्तीसगढ़
00000000000000000

प्रिया देवांगन "प्रियू"


तितली रानी
*******
तितली रानी तितली रानी ,
लगती बहुत  प्यारी हो ।
दिन भर बागों में घूमती,
तुम कितनी न्यारी हो ।
बच्चों के संग खेला करती,
हाथ कभी न आती हो ।
फूलों का रस चूस चूस कर ,
दिन भर मौज उड़ाती हो ।
रंग बिरंगे पंख तुम्हारे,
तुम सबसे न्यारी हो ।
तितली रानी तितली रानी
तुम कितनी प्यारी हो ।

रचना
प्रिया देवांगन "प्रियू"
पंडरिया  (कवर्धा )
छत्तीसगढ़
priyadewangan1997@gmail.com
000000000000

    

  पंकज कुमार जांगिड़


चलता जा तू खुद को मत रोक


चलता जा तू खुद को मत रोक।
हालात की दरिद्रता में खुद को मत झोंक।।
आएगी परेशानियां हजार सब से लड़ तू सबको पछाड़।
  खुद को जान ले खुद को पहचान ले,

विवशता की बेड़ियों को तोड़ खुद का नाम ले।
तू ही तेरा विश्वास,विश्वास ही तेरा साहस,

साहस ही तेरा जुनून, जुनून ही तेरा एहसास।।
   चलता जा तू खुद को मत रोक।
हालात की दरिद्रता में खुद को मत झोंक।।
  मत हो तू हताश कर खुद की तलाश।
बदल दे किस्मत की लकीरों को,

पटक दे जुनून के अखाड़े में जीवन के काले अंधकारों को

चीर दे आंधी तूफान और पहाड़ों को,

क्योंकि तू ही तेरा खुदा कोई ताकत नहीं कर सकती तेरे लक्ष्य से तुझे जुदा।
चलता जा तू खुद को मत रोक।
  हालात की दरिद्रता में खुद को मत झोंक।।
  जगा दे अपने अंदर की उन सब अपार

  शक्तियों को जिनसे तू है अनजान,

क्योंकि तू भी है वही इंसान...

तू भी है वह इंसान जिसने जीत लिया है सारा जहान।
पछाड़ दे उन बाधाओं को जो तेरा रास्ता रोकती है

तुझे नाकारात्मकता के अग्निकुंड में झोंकती है

। बना दी जिंदगी को अपनी जिद से इतनी आसान,

कांप उठे डर का वो शैतान....

क्योंकि डर ही बनाता दुनिया को बेईमान।
     चलता जा तू खुद को मत रोक।
  हालात की दरिद्रता में खुद को मत झोंक।।
   तोड़ दे जाति-धर्म कुरीतियों की उन खोखली दीवारों को

जिसने कैद कर रखे हैं तेरे सपने हजारों को।
  तू ही अम्बर तू ही रवि तू ही अपने अस्तित्व का कवि।
   चलता जा तू खुद को मत रोक

हालात की दरिद्रता मैं खुद को मत झोंक।।


 

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2 टिप्पणियाँ "पखवाड़े की कविताएँ"

  1. रमेशजी ने दोहे बड़े ज़ोरदार लिखे हैं, पाखंडी बाबाओं के बारे में सत्य लिखा है । उनको अपने दोहों में नेता और पाखंडी बाबा के गठजोड़ को भी कहीं दर्शाना चाहिए था, मगर वे इस गठबंधन को भूल गए । आज इसी गठजोड़ के कारण कई बाबा बचे हुए हैं । - दिनेश चंद्र पुरोहित

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  2. जसराजजी जोशी की ग़ज़लें बहुत अच्छी है । जो भाव प्रधान है । - दिनेश चंद्र पुरोहित

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