मानवते // बख्त्यार अहमद खान

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

मानवते

image

यदि, बन कण ,हो असहाय, न तुम यूँ बिखरी होतीं
तो श्वासें अर्पित करता अपनी मैं तुझको
और पुष्प सजा वेदी पर जीवन की
पूजा करता मैं तुझको ...।
निकलता निडर हो ,प्रेरणा पा तेरी..
उघाड़ने निस्तब्ध तिमिर अंक में सोया सत्य
आश्रय पा तेरा नित नई क्रांति के मोर्चे लेता
रख लेता असीम क्षोभ भी हृदय में
क्योंकि तब..
तुम जीवित तो आशाएँ भी जीवित होतीं ...।
सजा वेदना शूल पांवों की फटी दरारों में
जाता लाने मैं जीवन तत्व....
हो लहू लुहान भी अनुभव करता गर्व
युद्ध में खो सर्वस्व,
सोचता i एक मैं ही तो गया
     आया तो वापस वह प्रेम और साहचर्य...,

समझाता ...
इस चिर निद्रा में तो सबको सोना होगा
यदि पाना है कुछ तो कुछ खोना होगा
   पाता  मैं, मर कर भी अमरत्व ..
यदि तुम ,ऐ मानवते ...!
बन कण ,हो असहाय, न यूँ बिखरी होतीं..
तो,तुम जीवित, तो आशाएँ भी जीवित होतीं....।
    

    ----बख्त्यार अहमद खान
      74- रानी बाग ,शम्साबाद रोड,आगरा -282001

        Mail-ba5363@gmail.com 

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "मानवते // बख्त्यार अहमद खान"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.