गुजराती कहानी // ये घर, वो घर लेखक – जयन्ति दलाल // अनुवाद – डॉ. रानु मुखर्जी

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छौंक लगाने वाली कटोरी संडसी से ऐसे छिटकी, कि दाल में छन्न से पड़ने के बदले गरम तेल जमीन पर छितर गया। सविता जलते-जलते बची। थोडे बहुत छींटे तो उस पर उडे ही पर उसका ध्यान इस पर नहीं था। लुढ़कती हुई कटोरी की आवाज़ ने उसे यादों की एक ऐसी दुनिया में पहुँचा दिया जहाँ घटी ऐसी ही दूसरी एक घटना याद आ गई।

पर यह तो स्टेनलेस स्टील की कटोरी थी, थाली में परोसते समय चम्मच के कटोरी से टकराते ही कैसी सुंदर सुरीली ध्वनि गूंज उठती थी। कटोरी नई थी, बर्तन भी नए थे, हम भी तो नए ही थे न!

मन से सविता ने मना कर दिया। जो हो गया उसे याद करती रहोगी तो उसमें मिठास नहीं रहेगी बल्कि मन जलता रहेगा। आजकल मन को क्यों इतना जलाती हो?

पर… पर… याद अगर आ जाए तो क्या किया जा सकता है? भूलने को कहना कितना आसान है, दूसरे को सीख देना आसान है पर उस पर अमल करना बहुत मुश्किल होता है? भूल जाना ! क्या भूलें! कैसे भूलें? कितना भूलें?

खडे होकर सविता ने छौंक की कटोरी की धार को चिमटे से पकड़ लिया, पर मन को पकड़ना, घेर लेती हुई यादों से छुटकारा पाना, क्या करे? कैसे करे?

उस घर में …..

मन में शब्दों के उभरते ही उसके पूरे शरीर में कंपकंपी छूट गई। वह घर! कैसी विचित्र बात थी! कोलेज के दिनों में अध्यापकों द्वारा रटाए गए व्यंजनात्मक शब्द भी इतने कठिन और मार्मिक हो सकते थे भला! तब ‘ये’ घर, ‘वो’ घर था। आजः आज ‘वो’ घर ‘ये’ घर बन गया !

घटादार वृक्ष घटाओं को अपनी शोभा मानते हैं और शोभा से भी अधिक अपना रक्षक मानते हैं। पर वह बेशरम, निर्मम पवन घटाओं से मिलकर कैसे टहनियों को झकझोर कर, तोड़-मरोड़कर नीचे तक पहुँचा देता है। हलके गहरे स्पंदन जगा कर पवन तो फिर किसी दूसरे के साथ मौज मस्ती करने निकल पडता है, पर शोभा तटस्थता और सुरक्षाहीन उस वृक्ष का क्या होगा?

कविता को भी ऐसा ही लगा। चंचल मन कब किस तरफ मुडेगा इसे कोई जान सका है भला? उसे विक्रम याद आया।

इस कोख में ही उसने आकार लिया। जन्मा तो आधा-अधूरा ही था। माँ और बेटे किसी के भी बचने की आशा नहीं थी। पर दोनों बच गए। और आज? विक्रम ने स्वयं ही पुलिन के साथ रहने का निर्णय ले लिया। जन्म देने वाली सगी माँ से दूर। नई माँ के पास। कैसे बोल गया?

“उस घर में रहूँगा तो इस घर में नहीं आ पाऊँगा, पर इस घर में रहूँगा तो उस घर में तो जा सकता हूँ न?”

स्वार्थी और किसे कहते हैं? अभी तो वह केवल दस वर्ष का ही है। पुलिन के साथ घर बसाए उसे बारह वर्ष….. बीत गए…. ।

सुलगती हुई यादें उसे जला रही हों और वह जल रही है, उसका अंग अंग कांप उठता है। क्यों याद कर रही हूँ? क्या मेरी तडप कुछ कम है, जो मैं इस जहरीले नाग के डंख को याद कर रही हूँ?

पर अपने मन पर मेरा वश है क्या?

घर-संसार! नहीं, नहीं, नहीं; मुझे वह सब याद नहीं करना है। खतम हो गया। समाप्त हो गया। जिसे सुख समझा था, वह बीत गया। राग और द्वेश, आनंद और वेदना, तृप्ति और चाहत सब समाप्त हो गया। आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक छाए, कूदते फांदते काले जलभरे मेघ जी भर कर बरसते हैं और फिर साफ स्वच्छ कालिमाहीन चमचमाता आसमान निखर आता है। जीवन में मेघ जैसी जिंदादिली कहाँ होती है? हाँ, पूरी चेतना को बादल जैसे कालिमा से भर देता है, पर जी भर कर बरसना उसे कब आया? कुछ एक बूंदें बादल बरसा जाता है। मूसलाधर बरसात तपती धरती पर दयावर्शन करे या न करे बादल तो वैसे ही घनघोर बरसने को तत्पर। काले धुंधले, साहस और हिम्मत को तोडते, चेतनहीन बनाते, होश को गुम करते, सुध-बुध को नष्ट करते बादल…..

बादल तो तब नहीं थे ऐसा नहीं थे ऐसा नहीं था। मुसीबतें तो तब भी थीं, पर दिल जवान था। जवानी के साथ टक्कर ले सकें ऐसी प्रेम की गरमाहट थी। कुलिन भी उसे चाहता था, सब कुछ अच्छा लगता था। पुलिन ने एक बार कहा था – “उस बकुल के झाड़ को देखा? हर डाल पर फूलों के गुच्छे लटक रहे हैं, उसे पवन के केवल एक हलके झोंके का इंतज़ार है……….। पवन का हलका सा झोंका, पत्थर में भी जान डाल दे, ऐसी जिन्दगी की चेतनता का हलका सा झोंका।“

मन को तड़पाने वाली बातों को लेकर वह क्यों बैठी है? बीते हुए दिनों की यादें सुखकर ही होती हैं यह बात गले नहीं उतरती। इसे कहने वाला या तो इन बातों को न समझने वाला, अनुभवहीन या तुक्का लगाने वाला ही होगा। इन सुखभरे पलों की स्मृतियों में हजार नागों के दंश का दर्द छुपा हुआ रहता है। इस कडवे सत्य से अनजान एक गपोडी ही ऐसा कह सकता है।

वह जमाना गया। बदनाम व्यक्ति क्या अपने बीते दिनों की छवि को घर में लटकाए रखता है? उसके मन से उतर गई तुम। बदनाम होकर घर बैठ गई तुम। पुलिन ने तुम्हें छोड दिया। उसका प्यार खतम हो गया। लाखों फूलों से लदी टहनी ऐसी की ऐसी ही रही, हवा के झोंके के इंतज़ार में। पर वह तो दूसरे वृक्ष की टहनी को झुलाने चला गया। फूलों से झोली भरने चला गया। न चाहने पर भी सविता की स्मृति में वह प्रसंग बार-बार उभर कर आ रहा है, जैसे काले बादलों में से बिजली की रेखा उभर कर आती है, ठीक वैसे ही।

एकांत के क्षणों में ही उसे ये सब क्यों याद आता है? विक्रम के जन्म के पहले की बात है। जन्म के पहले की बात है कहकर बात को क्यों टाल रही है, पगली? यही, यही तो वह समय था न, वही, वही घडी न, उसी समय तो विक्रम पेट में आया न? कुछ भी पहनने जैसी नहीं रह गई थी, बॉडिस, साडी। भूल जा, सब कुछ भूल जा।

हाँ, तब तो पुलिन मुझे बिजली कहकर पुकारता था। फिर बिजली से बिजी बन गई।

बिजी! न, न….. बिजी, बिजी!!

पर उस दिन तो पुलिन घर पर ही नहीं था घर से बाहर गया था। जमकर बादल बरसे थे। मूसलाधार, नदी नाले तक उभर कर बहने लगे थे, पुल टूटे, मकान टूटे। गाडियाँ बंद हो गई थीं, पर जैसे-तैसे वह सही सलामत घर लौटा था। उसी रात। उसने मुझे बिजली कहा। मेरा अंदेशा सही निकला। ना, ना, मैं मना करती रही। पर पुलिन कहाँ मानने वाला था। वह तो पूरे जोश में था। “जो होगा देखा जाएगा”। उसे कहाँ किसी बात की पडी थी? “अगर रह भी जाए तो क्या हुआ?”

“जिंदगी के अंतिम क्षण में तेरी क्या इच्छा है?” कितना झूठा, गलत, लबाड़ जवाब दिया था उसने, दोनों होंठों को जोड़कर “यह” कहा था। तब तो कितना अच्छा लगा था।

बदमाश था पुलिन।

हाथ का कौर हाथ में ही रह गया। सविता को तभी खयाल आया। छौंक की कटोरी छिटकी और वह विचारों में बह गई। उसी की बातें। उसी के शब्द। न जाने कब उसने खाना बनाया? कब थाली परोसी? कब खाने बैठी?

सब कुछ ऐसा ही है न? जिन्दगी भी ऐसी ही है। कब पकाया? क्या पकाया? जाने दें उन बातों को….. ।

पुलिन झूठा था। ढोंगी, फरेबी, धूर्त, ठग, भँवरे की जात। उसका धंधा ही सताना था……. ।

मैंने पूछा था। “ये क्या चल रहा है तुम्हारा?”

“क्यों क्या हुआ?”

“मनीषा कौन है?”

“सही सही बताना।“

“सही सही पूछो तो सही”

“सीधी बात पूछ रही हूँ। कौन है यह मनीषा? और फिर उसका और तुम्हारा क्या संबंध है?”

“तुम्हें क्या लगता है?”

उसने एक शब्द भी नहीं कहा, क्या कहता?”

“तुम्ही कहो न! तुम क्या समझती हो? पगली ! मेरी मनीषा तो यह बैठी है सामने। गाँव की मनीषा से मेरा क्या लेना-देना”।

आज अगर पूछता तो तुरंत जवाब देतीः “घर में रखना है”। पर तब ? तब तो उसने ठुड्डी पकड़कर, आंखों में आंखें डालकर कहा – कि तुरंत विक्रम दौडता हुआ अंदर आया और बडी बडी आंखें फैलाकर देखने लगा। फिर पूछा, “भई आपने भी वह फिल्म देखी? फिल्म में तो ऐसा ही दिखाते हैं! वो दीन दयाल है न, वह मालती देवी की दाढी को ऐसे ही पकड़ता है”।

दीनदयाल और मालतीदेवी! हंह……..

“सविता, मुझे तुमसे कुछ कहना है”।

एक वर्ष तक , एक दूसरे से अबोले रहने के बाद वह पहली बार बोला था।

मैंने कहा, “बोलो”

“तुम्हें नहीं लगता, ऐसे जीने से बेहतर है कि हम अलग हो जाएं?”

“अगर तुम्हें ऐसा लगता है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है”। मैंने ऐसा कह तो दिया पर लगा अपने आप से मैंने ढोंग किया। ढोंग किस लिये?

और पुलिन ने कहा, “तुम्हें जो घर अच्छा लगे वह घर रख लो, ये घर या तो वो घर”

मुझे जो अच्छा लगे वो घर। घर! कैसा! सर्दी, गरमी और बरसात से बचाए, वैसा घर!

“पर ऐसा क्यों?”

मैंने बिसूरते हुए पूछा। मुझसे कुछ भूल हुई? मेरा कोई दोष था? मेरा मन कभी भटका क्या? नजर बिगडी कभी मेरी? हीरा –माणिक माँगा था मैंने? हठ की थी क्या मैंने कभी? मुझे जवाब तो दो!

बडी बेहयाई से उसने जवाब दियाः

“सविता, मेरे मन से उतर गई हो तुम”

मन से उतर गई हूँ का क्या मतलब? दूसरी जगह कहीं लग गया है क्या तुम्हारा मन? ऐसा ही है क्या? क्या कारण है? क्या कमी है मुझमें?

“बोलो. कौन सा घर लेना है?”

हवेली देखकर आई थी मैं? ईंट, मिट्टी, छज्जे, झरोखे देखे थे मैंने!

“रुपए, पैसे, गहने, जो भी चाहिये ले लो”

मेरी जुबान से निकल गया, “विक्रम!”

“उससे ही पूछो, जैसी उसकी इच्छा”

“तुम्हारी क्या इच्छा है?”

“किस बारे में बात कर रही हो?”

“मुझसे अलग…. “

“हाँ, तुम्हें बता दूं। मैं मनीषा के साथ….”

बस, बस, बस। आगे कुछ मत कहना। पाजी, दुष्ट, बेशरम। विक्रम को बुलाकर हमने पूछा। हम दोनों के बीच अगर कोई तीसरा आता है तो वह है विक्रम। पर वह तो बडा अजीब निकला। मुझसे ही पूछने लगा, “तुम कहाँ रहोगी?”

“देखो वह इस घर में रहेगी तो मैं वो घर में रहूँगी।“

“पर तुम इस घर में रहो और मैं भी इस घर में रहूँ तो उस घर में तो मैं नहीं जा सकता न?”

“न, नहीं जा सकते, नहीं जाने दूँगी और नकटे होकर तुम जाओगे भी क्यों? लाज लज्जा नहीं है, तो कोई बात नहीं, पर मुझे धोखा देने वाले के साथ…… ।“

“पर माँ, मैं उस घर में रहूँ तो, तुम्हारे पास इस घर में तो आ सकता हूं न?”

नहीं, इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। हवा के झोंके के साथ धूल ऊपर की ओर चढ जाती है। फिर इधर उधर घुमा कर हवा उसे नीचे ही फेंक देती है। पर अंदर से तो वह खोखलीही होती है न?

ये घर या वो घर, गहने, घर, पैसे……

जहाँ कहा, वहीं हस्ताक्षर कर दिया। मन में गुस्सा इतना भरा था कि पूरा शरीर तप रहा था। दुष्ट, नालायक, धोखेबाज, बेशरम। अब कैसे मुंह मोड रहा है। विक्रम कहता था……

पर तुम क्यों इन सब बातों को याद करती हो? तुम्हें वह पसंद नहीं करता है। अब कोई अड़चन नहीं। खेल खतम । जलने दो उनको। और तुम्हारे साथ तो ऐसा होना ही था। सामर्थ्य तो है नहीं, चली है प्रेम जताने। सभी के मना करने पर भी, तुम उस कलमुंहे पर मरमिटीं। माँ-बाप सभी को छोड़छाड़कर घर से भाग कर, तुमने उससे ब्याह रचाया और आज वह कलमुंहा तुम्हें बीच रास्ते पर असहाय छोड़कर दूसरे ठिकाने पर चला गया। यही है उसका प्यार! क्या वह मनीषा तुमसे सुंदर है? गोरी है? उसके चेहरे ओहरे का तो कोई ठिकाना ही नहीं है। बस, केवल लाग लपेट वाली बातें करना और घायल करना ही आता है उसे। एकदम गई-गुजरी नौटंकी करने वाली है।

बाहर से आवाज आई, “माँ”

यह तो विक्रम की आवाज है।

“खेलने जा रहा था, प्यास लगी, लगा इसी घर से ही पानी पी लूँ।“

न सामने देखा। जो परोसा उसे खाया। अपने हाथों से पानी पिया और चलता बना।

इस विक्रम से कभी ‘ये’ घर तो कभी ‘वो’ घर करने से मना नहीं किया जा सकता है।

उस बच्चे के मन का क्या ठिकाना? अगर उसका दिमाग होता तो माँ के बारे में ऐसा सोचता क्या?

कितनी कठोर हो गई हो तुम। अपने बेटे के लिये भी तुम्हारे खयाल बदल गए हैं। कहती हो कि बेटा पराया हो गया है।

शांत सरल बहती नदी के पानी पर बांध बांधने की बात सभी करते हैं, पर तेज धार वाली उफनती नदी पर बांध बांधने की बात कभी कोई सोचता भी नहीं।

ये तुम्हारा लड़का है, तुम्हारी अस्थि, चमडी से उसकी अस्थि चमडी बनी है। तुम्हारा ही खून है उसकी धमनियों में।

देख रे मन, अभी और, और पीछे तुझे लौटना है।

कितना अच्छा होता अगर यादों की लहरें मन में हलचल न मचाती तो। शब्दों मेहरबानी करके अपने को अभिव्यक्त करना छोड़ दो, छोड़ दो ……

पर उम दूसरों की मनुहार क्यों कर रही हो? अपने अधिकार की बात तो सोचती नहीं और दूसरों की मिन्नतें करती हो।

अधिकार!

नहीं, नहीं मैं तो अधिकार की बात ही नहीं कर रही हूँ। हक या दावे की बात भी नहीं। मेरे जीवन को बाजार में खरीद बेच के लिये रखना ही नहीं है।

पुलिन के लिये तुम्हारे मन में रोश भरा है। तुम्हारी भावनाओं को तितर-बितर कर दिया. इसीलिये वह दगा बाज हो गया?

कितना गलत सोचती हो तुम, सविता? तुम्हारी जीवन को उसने धूल में मिला दिया। ऐसे में तुम उसे बदमाश- झूठा न कहकर और क्या कहोगी? ऐसे भी जीवन में कोई किसी को क्या दे सकता है, और क्या ले सकता है? ऐसे लोगों को क्या छोड देना चाहिये? आज तुम उसे लेनेवाला और तुम देनेवाली हो ऐसा समझती हो?

क्यों मेरी जवानी, मेरा स्त्रीत्व, मेरा मन, मेरी देह, मेरा सर्वस्व, समस्त जीवन ……..

दिया, तुमने सब कुछ दिया। समझ बूझ कर दिया। मन से दिया। कुछ भी छुपाए बिना दिया। जो दिया उसके लिये कोई खेद है तुम्हें आज? ठीक है जीः मन के एकांत क्षण में तुम स्वीकार कर लो, जो सही लगे। सब कुछ एक साथ, वो पहले वाला भी याद कर लो। वह पहली नजरवाली। कैसे अचानक तुम्हें, धमनियों में गरम खून तेजी से बहने लगा हो ऐसा लगने लगा। कैसा रोमांस था। देह और चित्त दोनों में, जैसे धनुष पर कसी हुई प्रत्यंचा हो, ऐसी हालत हो गई थी तुम्हारी। तुम्हें कहने आया था क्या? कहने से पहले ही तो तुम …..

नहीं कहूंगी उसे झूठा। बेशरम, धोखेबाज भी नहीं कहूंगी। मेरे बच्चे का पिता है वह। नहीं कहूंगी उसे चोट्टा, दुष्ट भी नहीं कहूंगी।

अब पकड में आई तुम। अब तो कबूल कर लो, बच नहीं सकती। पूरी दुनिया से तुम बच सकती हो, सभी को छल सकती हो। पर अपने आप का क्या करोगी? क्या बहाना बनाओगी? अपने आप से कैसे छुपाओगी? उसे बीच रास्ते में छोडकर जा पाओगी क्या?

तुम उसे चाहती हो। तुम्हारे मन के हर कोने में वह तुम्हारा प्रियतम बन कर बैठा है। तुम उसे नहीं भूली सविता। उसके नाखून, दाँत …….. इतना ही नहीं. उसकी हर छोटी छोटी बातें तुम्हें अच्छी लगती हैं। कंजूस की दौलत की तरह तुमने उसे मन में संजो कर रखा है। वह तुम्हारा प्रियतम है। तुम्हारे मन और देह का स्वामी है वह। आज अभी इस वक्त भी वह तुम्हारा हृदयनाथ है।

वह स्वामी है और तुम? केवल पत्नी? व्यर्थ गुडिया, जिसे फेंक दिया जाय? चुसी हुई गुठली? गन्ने का छिलका?

तुम्हारा स्वाभिमान है कि नहीं? पर स्वाभिमानी बनी रही। अपने खानदानी संस्कार को बडी सच्चाई के साथ निभाया। उसे बेआबरु करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं था। अपने बीच किसी तीसरे को लाई ही नहीं तुम। अगर अच्छा नहीं लगा तो ठीक है। तुम्हारा बॉल गया, तुम्हारा खेल गया। किस्सा खतम।

और उसे ……..

न्याय करने बैठी हो तो भई जरा दूसरी ओर भी तो देखो!

यह घर उसने ही दिया। पैसा दिया, गहने दिए, जीवनभर का सुख दिया।

इसमें अहसान कैसा? मैंने अपने को समाप्त कर दिया। उसे सुख दिया। उसके न जाने कितने, न जाने कैसे कैसे नखरे झेले मैंने। और फिर उसे विक्रम दिया …..।

अपने साथ ही मुठभेड करती सविता स्तब्ध रह गई। उसके मन में बैठ कर चोटदार शब्दों से दलील करने वाला भी स्तब्ध रह गया। मैंने उसे विक्रम दिया और उसने मुझे घर दिया। पैसे दिये, गहने दिये! उसने मुझे दिया और मैंने लिया!

मैं कौन हूँ?

उसके बच्चे की माँ!

उसके बच्चे की माँ के बदले …… यह घर! वह घर! चाँदी सोने के गोल सिक्के, हीरे मोती के जडाऊ गहने! पानी पीकर अभी के अभी दौड़ता हुआ विक्रम निकल गया! मेरा बाल विक्रम!

इन सबसे मैं अपने आप को क्या समझूं? पुलिन को मैंने पति माना था। उनकी पत्नी बनकर खुद को धन्य समझती रही। उनके बच्चे की माँ बनकर मैं खुशी से फूली नहीं समाती थी। जो मेरा था, जिसे मैं अपना कह सकूँ, उन सभी को प्रेमपूर्वक समर्पण करके मैं कृतार्थ हो गई थी। और एकांत के क्षणों में इतना तो कबूल करले मूर्ख, यह सब तुमने खुशी खुशी दिया। आज भी तुम उसे चाहती हो। इतना सब कुछ होने पर भी तेरा मन उसे ही तेरा पति मानता है। आज अभी अगर वह तुमसे ….. विक्रम, एक दूसरा विक्रम मांगे तो।

अचानक सविता की गरदन तन गई। एक अनजान खुमारी से वह भर उठी। मन के अंदर छुपी बैठी उस सविता के कठोर, विषैले, चुभने वाले शब्दों के दंश से मन को कचोटने वाली, शब्दों की चुनौती को स्वीकार कर रही थी। होंठ बुदबुदा उठेः पर मुझे धुतकारना ……

शब्द जड हो गए। वह सविता एकदम से बोल उठी, “दया की भीख मांग रही है? गरीब, बेचारी, अशांत, निराधार, असहाय बनकर जीना चाहती है? डूब मर, चुल्लू भर पानी में डूब मर। स्वाभिमान की बात करती है?”

सविता चौंक उठी। दोनों हाथों से चेहरे को ढक लिया। जैसे अपने आप से छुपना चाह रही हो। गले को रूंधती सिसकी को दबाने की लाख कोशिश की, पर उसे न रुकना था न रुकी। इस ओर उसका ध्यान ही नहीं था, हथेली पर गीले पन का अहसास होते ही उसे इस बात का पता चला कि आँखें रो रही हैं। मन व्याकुल हो रहा था। बुद्धि तो जैसे जमकर हिमालय पर्वत बन गई थी। कुछ सूझ ही नहीं रहा था, समझ में भी नहीं आ रहा था।

यन्त्रवत उसने छोटी उंगली से आँखों से बहते आंसुओं को झाड़ दिया। अपने को स्थिर रखने के लिये अंगूठे की सहायता से आंसुओं की कुछ बूंदों को दूर उछाल दिया। बहते हुए आंसुओं को वह एकटक देखती रही। एक के बाद एक आंसू जैसे आंसुओं की अविरल धारा …..

आंसुओं को भी स्वाभिमान नहीं है क्या? सविता को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अंतर्मन में चल रहे इस घमासान युद्ध की एकमात्र द्रष्टा बन गई थी। कुछ भी उसके हाथ में नहीं था। वह सचमुच असहाय बन गई थी। होश-हवास, सूझ-बूझ सब अशक्त, अशम बन किसी और के बस में हो गए थे। स्वयं तो टूट रही थी, उजड़ रही थी, टुकडे-टुकडे हो बिखर रही थी तार-तार हो रही थी। अपनी मूर्खता समझ में आते ही आंखें फिर रिसने लगीं।

स्वयं विक्रम की माँ बनीः यह घर भी स्वयं ही लिया, मांगकर लिया, पैसे लिये, गहने लिये। सौदा किया। अरे, तुमने तो अपनी कीमत अदा कर ली। कोई बाजार में बैठता है, तुम घर में बैठीं। गृहस्थ बनी। वाह क्या ढोंग और दंभ है! पापी पेट न भरता हो तो फोड़ दे। दया की भीख इस तरह मत मांग। निर्लज्ज, बेशरम, नौटंकी, पुलिन को बदनाम करके ……….

नहीं, नहीं, मैंने उसे बदनाम करने की कोई कोशिश नहीं की। किसी की दया पर मुझे नहीं जीना है। मेरे हाथ-पाँव सलामत हैं और अगर नहीं होंगे तो जीवन को अंत करने से रोकने वाला कोई है क्या।

तुम्हें कोई रोकने वाला चाहिये क्या? नहीं, नहीं। आत्मघात करते समय कोई तुम्हारी तसवीर ले ऐसा व्यक्ति चाहिये?

सविता ….

सविता को होश जब आया तब उसने देखा कि वह एक छोटे से बक्से में सब कुछ भर रही थी। अपने सारे गहने। बॅंक की नई चेकबुक के पहले पन्ने पर सही करके रख दी थी। पहने हुए कपडों में ही, इस घर को ताला लगाकर, मकान की चाभी बक्से में डालकर, बक्सा उठाकर चल दी उस घर की ओर …….ये घर और स्वयं को स्वयं ही मारकर बाजारू बनाती सौदे की रकम को लौटाने के लिये वह तेजी से सीढी उतरकर चलने लगी।

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लेखक परिचय -

जयंती घेला भाई दलाल

जयंती घेलाभाई दलाल एक विख्यात साहित्यकार, कथाकार, प्रकाशक थे जो स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान राजनीति से भी जुडे हुए थे। नाट्क के क्षेत्र से जुडे एक परिवार में जन्म लेने के कारण नाटक के प्रति उनकी गहरी रुचि रही जिससे उन्होंने अनेक सफल नाटकों की रचना की, जिनमें ‘सोयनुं नाकुं’, ‘द्रौपदीनुं सहकार’ (१९५०), ‘जीवनदीप’ (१९४०), ‘जोइए छे, जोइए छे’ आदि विख्यात हैं. उनके नाटक जीवन से संबंधित व्यंगात्मक संवाद के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके नाटक देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हैं।

‘जननिका’ (१९४१), ‘प्रवेश बीजो’ (१९५०), ‘प्रवेश त्रीजो’ (१९५३) ‘चौथो प्रवेश’ (१९५७) ‘रंगतोरण’ (बाल एकांकी) अवतर्ण आदि प्रसिद्ध हैं। उन्होंने नाटक से संबंधित पत्रिका ‘रेखा’ (१९३९ – १९४०) , ‘एकांकी’ (१९५१) का संपादन भी किया। १९३५ में ‘बिखरे मोती’ नामक सिनेमा का निर्माण किया।

उनके द्वारा रचित कथा ‘धिमु अने मिता’ ने बहुत ख्याति अर्जित की। ‘जुनुं छापुं’, अग्यार ने पांच’, ‘पर्दा ना तीरथ’ आदि विशिष्ट रचनाएँ हैं। लिओ टालस्टाय रचित ‘वार एन्ड पीस’ का उन्होंने गुजराती में अनुवाद किया।

साहित्यिक कार्य के लिये १९५९ में उनको ‘रंजीतराम स्वर्णचन्द्रक’ और ‘नर्मद स्वर्णचन्द्रक सम्मान से अलंकृत किया गया।

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अनुवादक परिचय –

डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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