राजीव कुमार की लघुकथाएँ

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इकलौता

जेठ की दोपहरी में पसीने से तरबतर चूल्हे पर चाय बनाते हुए मनेश्वर मंडल बहुत उदास नजर आ रहे हैं।

कोई खुशमिजाज ग्राहक जब हंसा जाता है तो हंस देते हैं फिर भाग्य में मिले उपहार उदासी को गले लगा लेते हैं।

एक ग्राहक ने चाय की सिप लेकर कहा, ‘‘भगवान ने इकलौती संतान दी है, लेकिन जरा सा भी अफसोस नहीं है।’’

दूसरे ग्राहक ने कहा, ‘‘मैंने तो अपने इकलौते बेटे पर सारी जमापूंजी खर्च कर दी और अब वो सूद समेत लौटा रहा है, पूरा खयाल रखता है।’’

मनेश्वर मंडल ने चाय छन्नी को डस्टबिन पर पटकते हुए कहा, ‘‘इकलौता क्या होता है जी? भगवान ने इकलौते बेटे के बदले बेऔलाद रखा होता तो नारियल फोड़ता।’’

अपने इकलौते बेटे को आज तक एक बाल्टी पानी नहीं उठाने दिया और साला अपने मां-बाप को छोड़कर इकलौते मां-बाप (सास-ससुर) का हो गया।

दिल्ली से ससुराल और ससुराल से दिल्ली। पूरा जीवन नरक बना दिया। कभी झलकी मारने भी नहीं आता है।’’ मनेश्वर मंडल के नथुने फैल गए और आंखें नम हो गईं। कपड़े से आंख पोंछकर फिर अपने काम में जुट गए।


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रक्तदान

‘रक्तदान महादान’ का नारा लगाकर लोगों को इस मुहिम में जोड़कर शिविर लगाते हुए धनसुख राय को चार वर्ष हो गए थे।

रक्तदान शिविर लगाकर वो समाजसेवक के रूप में प्रख्यात हो गए थे।

एक दिन धनसुख राय के सामने हादसा हुआ और मरीज को बचाने के लिए रक्त की आवश्यकता हुई तो उन्होंने कहा, ‘‘मेरे फैमिली डाक्टर ने रक्तदान न करने की हिदायत दी है।’’ धनसुख राय ने अपना पल्ला झाड़कर निकल गया और घायल को अस्पताल पहुंचाने में मदद करने वाला पतला-दुबला आदमी यह कहकर रक्त परीक्षण के लिए आगे बढ़ा, ‘‘उस काजू-किशमिश, गरी-छुआरा, अखरोट-पिस्ता खाए शरीर में खून की कमी होगी लेकिन मैं दाल-चावल खाने वाला जरूर रक्तदान करूंगा।’’ उसने मरीज की जान बचा ली।

एक ने रक्तदान के लिए उकसाया और एक ने रक्तदान करके समाज सेवा की।

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परिचय


नाम ः राजीव कुमार

जन्म ः 22 जून, 1980, बिहार, बाँका

शिक्षा ः स्नातक (अंग्रेजी)

विधा ः बचपन से लेखन आरंभ

लघुकथा, ग़ज़ल, उपन्यास

संप्रति ः स्वतंत्र लेखन

साहित्यकुंज, यशोभूमि, साहित्य सुधा, कथादेश में स्वीकृत

संपर्क ः राजीव कुमार

कृष्णा एन्क्लेव, मुकुंदपुर, पार्ट-2

गली: 2/5, दिल्ली-110042 (भारत)


ईमेल: rajeevkumarpoet@gmail.com

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