कविताएँ // कवि मनीष पटना सिटी, बिहार

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खलबली है मची चारों ओर,
कौन जीतेगा सत्ता की ये दौड़,
दो कदम से किसी की कुर्सी है छूटी जा रही,
कोई गठजोड़ के ताकत को अपनी शक्ति है बना रही,

कोई पैसे की ताकत है दिखा रहा,
कोई सियासत से पाँव है जमा रहा,
लगी है सब ओर राजनीति की होड़,
खलबली है मची चारों ओर,

कोई बगैर फल के पेड़ है गिन रहा,
कोई अमावस से पूनम को है जोड़ रहा,
तीर-कमान की गजब की है ये दौड़,
खलबली है मची चारों ओर,

जो करती है बेड़ापार,
उसने ही फँसा दिया है बीच मंझधार,
बगैर आवाज के मच रहा है शोर,
खलबली है मची चारों ओर,

खलबली है मची चारों ओर

अभी भी ऐसे गाँव हैं जहाँ बिजली नहीं पहुँची,
ऐसे गाँवों की मन:दशा को मैंने अपनी कविता का आधार दिया है
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अन्धेरे हैं गाँव,
अन्धेरी हैं गलियाँ,
अन्धेरे में दफन हो
रही हैं जिन्दगियाँ,

रात आई दिये जलें,
उस रोशनी में दस बैठें,
जिसे करना है रोशन जहाँ,
वही रोशनीं को तरसे,

जैसे गरीबी को दे रहा हो कोई गालियाँ,

अन्धेरे हैं गाँव,
अन्धेरी हैं गलियाँ,
अन्धेरे में दफन हो,
रही हैं जिन्दगियाँ,

सड़क पर गड़े हैं खम्भे,
पर बिजली से विरान,
अभी भी ऐसे गाँव हैं,
जो रोशनी से है अनजान,

बेबसी में सिसक रही हैं खुशियाँ,

अन्धेरे हैं गाँव,
अन्धेरी हैं गलियाँ,
अन्धेरे में दफन हो,
रही हैं जिन्दगियाँ,

सत्ता की लोलुपता में सब हैं पड़े,
अमीरी गरीबी से दिल्लगी करे,
अपनीं गलती कोई न गिनाए,
यही प्रशासन कहलाए,

झूठ के जाल में फँस रहीं जिन्दगियाँ,

अन्धेरे हैं गाँव,
अन्धेरी हैं गलियाँ,
अन्धेरे में दफन हो,
रही हैं जिन्दगियाँ,

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वर्तमान में जीता जा,
भूत में है क्या रखा,
शोक मनाने में है क्या रखा,
भविष्य को आधार देता जा,
वर्तमान में जीता जा,

मन तो है चंचल मृग,
इस मृग को तू पकड़ता जा,
अनिल की भाँति तू बहता जा,
अनल की भाँति तू दहकता जा,
वर्तमान में जीता जा,

मन को बनाके नीर सा निर्मल,
हर परिवेश में ढ़लता जा,
बरगद के पेड़ समान,
तू स्वयं को बढ़ाता जा,
वर्तमान में जीता जा,

वर्तमान में जीता जा,
भूत में है क्या रखा,
शोक मनाने में है क्या रखा,
भविष्य को आधार देता जा,
वर्तमान में जीता जा

वर्तमान में जीता जा

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गंगा सा निर्मल है मन,
गगन सा बड़ा है आँचल,
वो माँ है प्यारी -न्यारी माँ,
जिसकी ममता है निश्छल,

ममता की खुशबू में गूँथती है,
वो सार घर-बार,सारा संसार,
उसकी बाग ए वफ़ा में महकते हैं,
फूल और कलियाँ हरदिन हरपल,

गंगा सा निर्मल है मन,
गगन सा बड़ा है आँचल,
वो माँ है प्यारी-न्यारी माँ,
जिसकी ममता है निश्छल,

है वो किनारा जिसका कोई अंत नहीं,
है वो सहारा जिसका कोई अंत नहीं,
दु:ख-सुख में जो चलती है साथ पल-पल,
वो माँ है प्यारी माँ जिसकी ममता है निश्छल,

गंगा सा निर्मल है मन,
गगन सा बड़ा है आँचल,
वो माँ है प्यारी-न्यारी माँ,
जिसकी ममता है निश्छल

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रेशम हो या कपास,
कपड़ा चाहिए हर किसी को,
साधारण हो या खास,
खाना चाहिए हर किसी को,

जिन्दगी है सबको प्यारी,
साँस चाहिए हर किसी को,

नफरत से है सबको नफरत,
प्यार चाहिए हर किसी को,
बेरंग कौन रहना है चाहता,
रंग चाहिए हर किसी को,

जिन्दगी है सबको प्यारी,
साँस चाहिए हर किसी को,

निराशा है किसको प्यारी,
आस चाहिए हर किसी को,
तन्हा कौन है रहना चाहता,
साथ चाहिए हर किसी को,

जिन्दगी है सबको प्यारी,
साँस चाहिए हर किसी को,

जिन्दगी है सबको प्यारी,
साँस चाहिए हर किसी को,

जिन्दगी है सबको प्यारी,
साँस चाहिए हर किसी को

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मन की प्यास,
मन की प्यास,
मन की आस,

बुझती नहीं,
होती पूरी नहीं,
जब तक न मिल,
जाए मंजिल हसीं,

मन की प्यास,
मन की प्यास,
मन की आस,

राह चुन वही,
दिखाए मंजिल सही,
जो तू है चाहता,
दिखाए वो मंजिल वही,

मन की प्यास,
मन की प्यास,
मन की आस,

देखूँ मैं जिधर,
आ जाए बहार उधर,
झुक जाए गगन जो मैं,
रख दूँ कदम जिधर,

तभी पूरी होगी;
तभी पूरी होगी,
जो है मन की प्यास,
जो है मन की प्यास,
जो है मन की आस,

मन की प्यास,
मन की प्यास,
मन की आस

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सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,
दिल में जैसे पाजेब बज रही है,
जैसे चाँद बादलों से है गुजरता,
वैसे हीं वो मुझसे खेल रही है,

सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,

मृग-नैनी, चपल-चंचला मुझे बिस्मा रही है,
गगन के सरोवर में वो अटखेलियाँ कर रही है,
मेरी निगाहों को इक परी नजर आ रही है,
जो धीरे-धीरे धरती पे आ रही है,

सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,

मैं विस्मित उसे देख रहा हूँ,
वो पकड़ हाथ मेरा कहीं ले जा रही है,
वो सितारों की सैर मुझे करा रही है,
वो अपनी नगरी मुझे लिये जा रही है,

सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,

मैं बादलों की नगरी में आ गया हूँ,
मैं स्वप्न आसन पर विराज गया हूँ,
वो उसे हकीकत का वसन पहना रही है,
वो मुझे अपने नूर से नहला रही है,

सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,
सन,सन,सन,सन हवा चल रही है,
सन,सन,सन,सन हवा चल रही है

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ख़ामोशी दर्द बन जाती है,
आह जब दिल में रह जाती है,
घुटन कोई पैदा हो जाती है,
पत्ती-पत्ती सूख जाती है,

रहनुमा दिल तलाशता रहता है,
धड़कन ख़ाली हो जाती है,
पत्ती-पत्ती सूख जाती है,
आह जब दिल में रह जाती है,

जमीं खुशी की बंजर हो जाती है,
पल भर में सागर रेत बन जाती है,
ख़ामोशी दर्द बन जाती है,
जब आह दिल में रह जाती है,

दिल की बातों को लाओ जुबाँ पर,
जज़्बातों को लाओ जुबाँ पर,
नहीं तो जज़्बातें घुटन बन जाती है,
ख़ामोशी दर्द बन जाती है,

ख़ामोशी दर्द बन जाती है,
आह जब दिल में रह जाती है,
घुटन कोई पैदा हो जाती है,
पत्ती-पत्ती सूख जाती है

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गगन के ये तारे,
लगते बड़े हैं प्यारे,
टिमटिमाते रहते हैं,
झिलमिलाते रहते हैं,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

रोशनी इनकी कभी
आती है, कभी है
नहीं आती, सो ये
झिलमिलाते नजर हैं
आते, गगन के ये तारे,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

सुख-दु:ख को जो,
तोले बराबर प्यारे,
वही जीवन में,
चमके बनके सितारे,

सीख देते हैं यही,
अनमोल ये तारे,
रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे

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बंदर और इंसान की आत्मकथा
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मैं बंदर हूँ,
इंसानों का पूर्वज हूँ,
कूदता हूँ डाल से डाल,
मचाता हूँ धमा-चौकड़ी धमाल,

मुझे देखते के साथ,
इन्सानों में है मच जाता हाहाकार,
इन्सानों के लिए मैं कयामत हूँ,
पर मैं मनोरंजित आफत हूँ,

मैं बन्दर हूँ,
इन्सानों का पूर्वज हूँ,

अब है आती मेरी बारी,
यानी इन्सानों की बारी,
मैं इन्सान हूँ,
इन्सानियत को झुककर,
करता सलाम हूँ,
ये जानवर क्या समझेंगे हमको,
मुहब्बतों का मैं पयाम हूँ,
मैं इन्सान हूँ,

पर मैं आज सबसे बदनाम हूँ,
क्योंकि जानवर तो हैं जानवर,
पर मैं वहशी इन्सान हूँ,
मैं बन बैठा आज शैतान हूँ,

इक जानवर है हमारा पूर्वज,
पर वो रहा मासूम का मासूम,
और मैं करता कत्लेआम हूँ,
और कहता मैं खुद को इन्सान हूँ,

कितना अच्छा होता इन्सान,
जानवर ही होता,
धरती रहती हरी-भरी,
बेवजह कहीं खून का सैलाब नहीं होता,

इन्सान मुझे कहता है जानवर,
पर मैं इन्सानों से बेहतर हूँ,
इन्सानों ने रखा है नाम मेरा बन्दर,
पर मैं इन्सानों से सुंदर हूँ

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मनीष कुमार,
पिता-श्री सतीश शर्मा,
पूर्वी नंदगोला नागा बाबा का बंगला मालसलामी पटना सिटी, पटना, बिहार,
पो.-माधवमिल्स,
थाना-मालसलामी
पिन-८००००८

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