उत्तरी अमेरिका की लोककथाएँ // ईकटोमी का कम्बल // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी :

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चालाक ईकटोमी


संकलनकर्ता


सुषमा गुप्ता


11 ईकटोमी का कम्बल[1]

clip_image002_thumbएक बार ईकटोमी अपने टैपी[2] में अकेला बैठा था। सूरज तो काफी गरम था पर जमीन के पश्चिमी किनारे से जो हवा आ रही थी उससे वहाँ कुछ ठंडा हो रहा था।

वह बहुत नाराज था। अपना शरीर आगे पीछे हिलाते हुए वह कह रहा था — “वे बड़े बड़े भूरे भेड़िये। वे बहुत खराब हैं उन्होंने मेरी कितनी बढ़िया मोटी मोटी बतखें खा लीं। ”

उसको उन खराब भूखे भेड़ियों की याद आये ही जा रही थी जिन्होंने उसकी बतखें खा ली थीं। वह किसी तरह भी उनको भूल नहीं पा रहा था। आखिर उसने अपने शरीर को आगे पीछे हिलाना बन्द कर दिया और बिल्कुल सीधा हो कर बैठ गया जैसे कोई पत्थर की मूर्ति हो।

“ठीक है मैं इन्यान[3] के पास जाता हूं और उन्हीं से अपने खाने के लिये प्रार्थना करता हूं। ”

बस यह विचार आते ही उसने अपने कन्धों पर अपना कम्बल डाला और अपनी टैपी से बाहर निकल गया। पास के पहाड़ के पास ही एक बड़ी सी चट्टान पड़ी थी वह जा कर उस चट्टान पर चढ़ गया।

घुटनों के बल बैठ कर भागते हुए वह इन्यान के खुले हाथों में जा कर गिर गया और रो कर बोला — “बाबा मुझ पर दया करो। मैं बहुत भूखा हूं मुझे खाना दो। बाबा खाने के लिये मुझे कुछ मांस दो। मैं बहुत ही भूखा हूं। ”

जितनी देर में उसने यह सब कहा उतनी देर तक वह उस पत्थर के देवता का चेहरा सहलाता रहा।

वह देवता जो सब कुछ बनाता है घास भी और पेड़ भी, वह सबकी सुनता है चाहे वे उसकी किसी भी तरह से प्रार्थना क्यों न करें। इन्यान की पूजा वहाँ सबसे ज़्यादा की जाती थी क्योंकि वह तो सबके पर–बाबा[4] थे और उस पहाड़ के पास बरसों से बैठे थे।

उन्होंने ही तो वहाँ के घास के मैदानों को हजारों से ज़्यादा बार बरफ से और फिर चमकीली घास से ढका देखा था। पर उनके ऊपर इस सबका कोई असर नहीं था।

वह तो बस हमेशा से पड़ी उस चट्टान पर आराम करते रहते थे और इन्डियन लड़ने वालों की प्रार्थनाएँ सुनते रहते थे। जादू के तीर को पाने से पहले से ही वह वहाँ बैठे हुए हैं।

जब ईकटोमी वहाँ रो रहा था और इन्यान की प्रार्थना कर रहा था पश्चिमी आसमान कुछ लाल हो रहा था जैसे कोई चेहरा चमक रहा हो।

सूरज डूबने से उस भूरी चट्टान पर और उसके बराबर एक आदमी पर बहुत ही सुन्दर रोशनी पड़ रही थी। यह तो उस बड़े देवता[5] बाबा इन्यान की मुस्कुराहट थी उस भटके हुए बच्चे पर।

ईकटोमी को पता चल गया कि उसकी प्रार्थना सुन ली गयी थी सो वह बोला — “बाबा लो, अब यह मेरी भेंट स्वीकार करो। मेरे पास बस अब यही कुछ बचा है। ” कह कर उसने अपना फटा कम्बल इन्यान के कन्धों पर ओढ़ा दिया।

उसके बाद ईकटोमी सूरज के छिपने वाले आसमान की मुस्कुराहट के साथ एक पगडंडी पर घाटी की तरफ चल दिया। यह पगडंडी घनी झाड़ियों में से हो कर जाती थी। वह बहुत दूर नहीं गया था कि उसको एक घायल हिरन पड़ा हुआ मिल गया।

उसको देख कर ईकटोमी बहुत खुश हुआ। वह खुशी से हाथ उठा कर बोला — “आहा, तो यह है लाल पश्चिमी आसमान का जवाब। ”

उसने अपनी कमर की पेटी से एक लम्बे फल वाला चाकू निकाला और उससे हिरन के सबसे अच्छे मांस के कुछ टुकड़े काट लिये। फिर उसने विलो के पेड़ की कुछ डंडियों की नोकें बनायीं और एक लकड़ी का ढेर लगा कर उसके चारों तरफ गाड़ दीं।

लकड़ी के ढेर में वह आग लगाने ही वाला था ताकि वह उस आग में उस हिरन का मांस भून सके। तो आग जलाने के लिये जब वह लकड़ी की दो डंडियों को रगड़ रहा था तभी सूरज पश्चिम में आसमान से नीचे धरती के किनारे से भी नीचे चला गया।

शाम हो गयी थी। ईकटोमी को अपने नंगे गले और कन्धों पर ठंडी हवा महसूस होने लगी थी। वह ठंड से कांप गया “उफ़”। उसने अपना चाकू घास से रगड़ कर साफ किया और उसको मोती से बने एक थैले में रख लिया जो उसकी कमर से लटका हुआ था।

ईकटोमी सीधा खड़ा हो कर चारों तरफ देखने लगा। ठंडा था सो वह फिर कांप गया। लकड़ी के ढेर और उसके चारों तरफ लगी विलो की डंडियों के ऊपर झुकता हुआ वह बोला — “उफ़ यहाँ तो बहुत ठंडा है। काश मेरे पास मेरा कम्बल होता। ”

अचानक वह रुक गया और उसके हाथ नीचे हो गये। उसने सोचा बूढ़े परबाबा तो उस तरह से ठंड महसूस नहीं करते जैसे मैं करता हूं। वह उस तरीके से तो शायद कम्बल की जरूरत भी महसूस नहीं करते होंगे जैसे मैं करता हूं।

काश मैंने उनको अपना कम्बल न दिया होता। मुझे लगता है कि मैं वहाँ वापस जाऊँ और वहाँ से अपना कम्बल ले कर आऊँ।

ईकटोमी को गर्म धूप में तो उस कम्बल की जरूरत नहीं थी सो उसके लिये उस चीज़ को दे देना बहुत आसान था जिसको उसकी जरूरत नहीं थी पर इस ठंडी रात की ठंडी हवा में तो वह सिकुड़ा जा रहा था। उसको इस समय तो अपने उस कम्बल की बहुत जरूरत थी।

बस वह वहाँ से उस चट्टान की तरफ भाग लिया। रास्ते में ठंड की वजह से उसके दॉत बज रहे थे। भागते भागते वह अपने गुप्त निशान इन्यान के पास आया। वहाँ आ कर उसने अपने फटे कम्बल का एक कोना पकड़ कर उसे एक झटके से खींच लिया।

“ओ बूढ़े बाबा मेरा कम्बल वापस दो। तुम्हें इस कम्बल की जरूरत नहीं है, मुझे है। ”

हालाँकि यह सब बहुत गलत था जो ईकटोमी ने अपने परबाबा के साथ किया पर ईकटोमी ने यह किया क्योंकि उसको अक्ल कम थी। उसने अपना वह कम्बल वहाँ से उठाया, अपने कन्धों पर लपेटा और जल्दी जल्दी पहाड़ी से नीचे की तरफ चल दिया।

जल्दी ही वह वहाँ आ गया जहाँ वह अपना हिरन भूनने के लिये छोड़ कर आया था। कमान की शक्ल का चांद दक्षिण पश्चिमी आसमान में उग आया था।

उसकी धुंधली रोशनी में ईकटोमी उन झाड़ियों के बीच एक भूत की तरह खड़ा था। उसकी लकड़ियों का ढेर अब तक नहीं जला था। उसकी नुकीली लकड़ियाँ भी ऐसी ही खड़ी थीं।

पर वह हिरन कहाँ था जो वह वहाँ छोड़ कर गया था। जिसके मांस की गर्मी उसने कुछ देर पहले ही अपने हाथों में महसूस की थी।

वह तो जा चुका था। उसकी केवल सूखी पसलियाँ ही बहुत बड़ी बड़ी उँगलियों की तरह जमीन पर पड़ी हुई थीं जैसे वे किसी कब्र में से निकली हों।

यह देख कर तो ईकटोमी परेशान हो गया। आखिर उसने उन सफेद सूखी हड्डियों में से एक हड्डी उठायी और उसको हिला कर बजाया। हड्डियाँ जो अभी भी हिरन के शरीर में लगी थीं उसके हिलाने से वे झुनझुने की तरह बज उठीं।

ईकटोमी ने उनको तो वहीं छोड़ दिया और आश्चर्य से पीछे की तरफ कूद गया। हालाँकि वह अपना कम्बल ओढ़े था फिर भी ठंड की वजह से उसके दाँत बहुत ज़ोर ज़ोर से बज रहे थे। वह अपने माँस के गायब हो जाने पर बहुत दुखी था।

वह चिल्ला कर बोला “ओह यह मैंने क्या किया। मैंने अपना कम्बल लाने के लिये जाने से पहले वह माँस खा क्यों नहीं लिया?”

बच्चों, उसकी बेवकूफी तो देखो। बजाय इसके कि वह बाद में दुखी हो रहा था और चिल्ला रहा था तो उसने जाने से पहले ही हिरन का वह माँस क्यों नहीं खा लिया?

या फिर उसको अपना कम्बल इन्याना से वापस लाना ही नहीं था।

पर उसने अपनी बेवकूफी में ऐसा कुछ भी नहीं किया।

वह रो पड़ा पर उसके आंसुओं ने दयालु का दिल नहीं पिघलाया। उसके हाथ नहीं हिलाये क्योंकि वे तो एक मतलबी के आंसू थे। वह सबको देने वाला ऐसे मतलबी के आंसुओं की तरफ ध्यान नहीं देता।

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[1] Iktomi’s Blanket – a folktale from Native Americans, North America.

Adapted from the Web Site : http://www.manataka.org/page146.html

[2] Tepee is the traditional house of Native Americans living in North America. See its picture above.

[3] Inyan is the rock which is Iktomi’s great grandfather. It is the Primordial stone spirit of Sioux Tribe mythology.

[4] Great grand-father

[5] The Creator


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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,इथियोपिया व इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

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