व्यंग्य // लिखने का धंधा // हरीश कुमार ‘अमित’

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लिखने का धंधा

लिखने का धंधा भी क्या चीज़ है साहब! वो कहावत है न ‘हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा-ही-चोखा’, वह लिखने के धंधे पर पूरी तरह लागू होती है.

और कोई धंधा जमाने के लिए दसियों पापड़ बेलने पड़ते हैं. सबसे पहले तो कोई दुकान चाहिए, जिसे खरीदना चाहें तो लाखों-करोड़ों रुपए खर्चने पड़ेंगे और अगर किराए पर लेना चाहें तो हज़ारों (या लाखों) रुपए किराए के तौर पर स्वाहा करने पड़ेंगे. फिर खाली दुकान से ही तो काम नहीं चलता न! दुकान में रखने के लिए सामान चाहिए, फर्नीचर चाहिए, फोन चाहिए. सामान बेचने के लिए या तो खुद खटते रहो या फिर सेल्ज़मैन रखो. ऊपर से इन्कम टैक्स, सेल्ज़ टैक्स, वैट, सर्विस टैक्स का हिसाब रखने का झंझट अलग से. और फिर इन महकमों के इंस्पेक्टरों और अफसरों की परेशानियाँ बोनस के तौर पर.

लेकिन लिखने के धंधे में ऐसी कोई परेशानी है ही नहीं. दुकान वगैरह की ज़रूरत तो ख़ैर होनी ही क्या है, घर के किसी मनपसन्द कोने में बैठकर लिखा जा सकता है. अगर ऐसा कोई कोना न मिल पाए, तो किसी पुस्तकालय में जाकर, पार्क में बैंच या घास पर बैठकर या और नहीं तो सड़क के किनारे किसी पेड़ के नीचे बैठकर भी लिखने का काम बख़ूबी चलाया जा सकता है.

लिखने के धंधे में कोई बहुत बड़ा निवेश करने की भी ज़रूरत नहीं होती. बस थोड़े से कागज़ और एक अदद पैन से ही काम चल सकता है. हाँ, रचनाएँ भेजने के लिए लिफाफों और डाक टिकटों की भी ज़रूरत पड़ेगी. वैसे कोई जाँबाज़ लेखक जूतियाँ चटखाते हुए अगर ख़ुद ही पत्र-पत्रिकाओं के दफ़्तर में जा-जाकर अपनी रचनाएँ देने लगे, तो डाकखर्च भी बड़े आराम से बच सकता है.

इस धंधे में वक़्त की भी कोई बंदिश नहीं है. जब जी में आए, जब सुविधा हो, कोई लिख सकता है. जी चाहे तो रात के दो बजे भी लिखा जा सकता है और अगर जी न चाहे तो कई-कई दिनों, हफ़्तों तक लिखने के काम से तौबा की जा सकती है.

यह बात अलग है कि लिखने के धंधे में कोई ख़ास कमाई होने की गुंजाइश नहीं होती, बल्कि कागज-पैन-टाइपिंग-डाक वगैरह के खर्चों के साथ-साथ अगर अपने समय की कीमत को भी जोड़ा जाए तो इस धंधे में कुल मिलाकर घाटा-ही-घाटा है. अब देखिए न, जितने समय में एक लेखक कोई रचना लिखेगा, उतने समय में तो आप कम्प्यूटर पर बस माउस क्लिक कर-करके ही शेयरों की ख़रीद-फरोख़्त करके हज़ारों-लाखों कमा सकते हैं. लेखक ने तो जो लिखा है, उसके छप पाने की गारंटी ही कहाँ होती है. और छप जाने पर पारिश्रमिक मिल पाने की गारंटी तो और भी कम होती है. वैसे पारिश्रमिकनुमा जो मिलता है वह ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ नामक मुहावरे को ही तो चरितार्थ करता है.

अलबत्ता लिखने के धंधे को अपनाकर आप समाज में अपना कद ज़रूर ऊँचा कर सकते हैं. रचनाएँ आपकी बेशक बहुत ऊँची श्रेणी की न भी हों, समाज कवि और लेखक की इज़्ज़त की नज़र से देखता है - इसमें दो राय हो ही नहीं सकती. वैसे सच पूछा जाए, तो यह कद ऊँचा होना भी एक मुग़ालता ही है, पर कुछ भी हो, यह मुग़ालता भी कोई कम खूबसूरत नहीं होता.

अब इसी मुग़ालते के चक्कर में हम कहीं के न रहे. अच्छी-भली नौकरी में थे. हर महीने बंधी-बंधाई तनख़्वाह मिल जाती थी, पर लेखक बनकर अपना ‘कद’ समाज में ऊँचा करने की ललक में हमने अपनी सरकारी नौकरी को लात मार दी और पूरे दिन के लिए लेखन के धंधे को अपना लिया. अब हाल यह है कि लेखन से मिलने वाली आमदनी से हमें कभी-कभी फाके करने की नौबत तक आ जाती है. हालत यहाँ तक आ गई कि लिखने के लिए काग़ज खरीदना भी हमें मुश्किल लगने लगा है. सोचते हैं कि लिखने का धंधा चलाए रखने के लिए भोज-पत्रों का जुगाड़ कैसे किया जाए? इस बारे में आप हमारी कुछ मदद कर पाएंगे, श्रीमान्?

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नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी);

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994ए 2001ए 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त


पता  - 304ए एम.एस.4ए केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56ए गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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