पुस्तक समीक्षा // व्यंग्य का ताजा झोंका- तुहंर जउंहर होवय // वीरेन्द्र ‘सरल‘

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व्यंग्य के आदि कवि कबीरदास जी कहते हैं कि सुखिया सब संसार है खाये और सोय, दुखिया दास कबीर है जागै और रोय। स्पष्ट है कि आत्मकेन्द्रित स्वार्थी मनुष्य को संसार में अपने और अपनों के सिवा कुछ दिखाई ही नहीं देता तो उसे किसी की पीड़ा कैसे महसूस हो सकती है वह तो दिन-दुनिया से बेखबर अपने आप में मस्त होकर आत्ममुग्ध रहता है। पर जो जागृत है, संवेदनशील है, उसे ही युग की पीड़ा सालती है और वह अपनी अनभूतियों को व्यक्त करने के लिए मजबूर हो जाता है। अभिव्यक्ति हेतु माध्यम कुछ भी हो सकता है पर सब से उचित माध्यम है साहित्य।

गद्य को साहित्य की कसौटी कहा गया है और गद्य़ में व्यंग्य को सुशिक्षित मस्तिष्क की विधा माना जाता है। जब साहित्य की अन्य विधाएं दर्पण की तरह समाज को उसका चित्र दिखलाता है तब व्यंग्य एक्स-रे की मशीन की तरह समाज के सामने खड़े होकर न केवल उसका चित्र बल्कि उसका चरित्र दिखलाता है। व्यंग्य और व्यंग्यकार का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर निशाना साधकर उसकी भवनाओं को आहत करना नहीं अपितु उसकी कलुषित और समाज के लिए घातक प्रवृत्तियों पर वार करके उसे निर्मल करना होता है। समाज की निर्मलता का उद्देश्य लेकर लिखने वाले ऐसे ही एक सलोना व्यंग्कार का नाम है धर्मेन्द्र निर्मल।

छत्तीसगढी व्यंग्य लेखन में धर्मेन्द्र निर्मल का नाम बहुत पुराना नहीं तो एकदम नया भी नहीं हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से धर्मेन्द्र निर्मल की छत्तीसगढ़ी व्यंग्य रचनाएं पाठको तक पहुँचती रहती है। तुहंर जउंहर होवय धर्मेन्द्र निर्मल का प्रथम व्यंग्य संग्रह है। जिनमें उनकी इक्कीस व्यंग्य रचनाएं समाहित हैं। आशु प्रकाशन रायपुर से प्रकाशित इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजनैतिक विषयों के बजाय ज्यादातर सामाजिक मुद्दो पर व्यंग्य बाण चलाया गया है।

संग्रह के सभी व्यंग्य कथात्मक शैली में है जिसमें कथा रस के साथ व्यंग्य का सहज प्रवाह और हास्य की अविरल धारा है। जहां घोण्डुल अउ गणेश व्यंग्य बेरोजगारी के कारण नशे के गिरफ्त में फँसे युवक की मनोदशा का व्यंग्यात्मक चित्र है तो अफिसली बाबू में बाबू महिमा का वर्णन है। नकाब वाले मनखे में आदमी के दोहरे -तिहरे चरित्र की पड़ताल की गई है ता विदेशी नहीं बासी खा नामक व्यंग्य में विज्ञापन के मायाजाल से बचने की सलाह है। किरायेदार के पीरा में आवासहीन मनुष्य की पीड़ा है तो खजुवाये के कला में अवसरवादी और चमचागिरी करने वाली प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य है। दसवा गिरहा दामांद में दामांद के मनोवृत्ति पर कटाक्ष है तो छुछमुँही रस सुन्दरी पर शराबखोरी और शराबियो पर व्यंग्य। पेंट जेकर बोचकत हे नामक व्यंग्य में सांस्कृतिक क्षरण पर निशाना साधा गया है तो तुंहर जउंहर होवय में साहित्यिक गिरावट को व्यंग्य का लक्ष्य बनाया गया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संग्रह के सभी व्यंग्य सोद्ददेश्य है।

संग्रहित व्यंग्यों में व्यंग्य भाषा प्रंसगानुकूल है। छत्तीसगढी के विलुप्त होते शब्दों का चयन और लोकोक्तियों एवं मुहावरों का सटीक प्रयोग व्यंग्यों को और ज्यादा प्रभावशाली बनाने में सर्वथा समर्थ सिद्ध हुआ है। धर्मेन्द्र निर्मल बहुत ही संभावना शील रचनाकार है। उनकी व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए लगता है कि छत्तीसगढी के समर्थ व्यंग्य लेखकों के बीच स्थान बनाने में वे बहुत जल्दी समर्थ होगे। मैं आश्वस्त हूँ कि वे अनुभव और परिपक्वता के साथ व्यंग्य के नये तेवर और धारदार रचनाओं को लेकर पाठकों के बीच पुनः उपस्थित होंगे। तुहंर जउंहर होवय जैसे संग्रह हेतु धर्मेन्द्र निर्मल को हार्दिक बधाई।

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

पोष्ट-भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड़

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

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