बेल का वृक्ष ‘राष्ट्रीय धरोहर’ क्यों न हो // डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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बेल का वृक्ष ‘राष्ट्रीय धरोहर’ क्यों न हो

० आयुर्वेद से लेकर धार्मिक महत्व भी कम नहीं

बेल के वृक्ष को उसकी उपादेयता को ध्यान रखते हुए राष्ट्रीय धरोहर क्यों न बना दिया जाये? इस पर जनमत भी लिया जा सकता है। आयुर्वेद के दृष्टिकोण से भी इसे या इसके अनगिनत गुणों को नकारा नहीं का सकता है। भारतीय पृष्ठभूमि या यहां जन्में ऋषि मुनियों ने भी सैकड़ों वर्षों की खोज के बाद बेल के वृक्ष को उसमें लगे फल के कारण आयुर्वेद का खजाना बताया है। पेट के रोगों में चमत्कारिक प्रभाव दिखाते हुए बेल फूल के गूदे ने बड़े बड़े आयुर्वेद विशेषज्ञों को अपनी ओर आकर्षित किया। आगे चलकर इस फल का उपयोग औषधि निर्माण में किया जाने लगा। आज भी भीषण गर्मी में बेल के फल से तैयार किया गया शरबत जहां शरीर को ठंडक प्रदान कर रहा है। वहीं पेट के रोगों से राहत दिलाकर अपनी औषधीय गुणवत्ता को सिद्ध कर रहा है। चिंता का विषय यह है कि पुरातन समय में बड़ी मात्रा में खेती का विषय माना जाने वाला यह वृक्ष अब सहेजा नहीं जा रहा है। छोटे से लेकर बड़े शहरों में इसे ढूंढने निकल जाये तो दर्जनों की संख्या में इसे पाना बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा। दूसरी ओर धर्म और संस्कृति का पाठ पूरी दुनिया को पढ़ाने वाले हिंदुस्तान में बेल पेड़ की पत्तियां भगवान शंकर की पूजा में स्वर्ण अर्पण से कम महत्व नहीं रखती है। बेल के इन सारी गुणों को देखते हुए इस वृक्ष को राष्ट्रीय धरोहर की श्रेणी में शामिल किया जाना मैं जरूरी समझता हूं।

गर्मी के मौसम में जब कभी हवा का तीखा झोंका चलता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो बेल का वृक्ष अपनी शाखाओं और पत्तियों के साथ मदमस्त होकर नृत्य कर रहा हो। मार्च और अप्रैल के माह में लगने वाले बेल के फल मई और जून के माह में पकने शुरू हो जाते है और भरी गर्मी में पके बेल का शरबत पेट को ठंडक पहुंचाने अपनी महत्ता सिद्ध कर दिखाता है। इसके अलावा श्रावण मास अथवा जून-जुलाई में भगवान शिव की आराधना में इस वृक्ष की पत्तियां शिवजी की अर्पित करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। कृषकों और आयुर्वेद के विशेषज्ञों की माने तो इस वृक्ष को रोपने से लेकर बड़ा करने तक विशेष देखरेख की जरूरत भी नहीं होती है। जमीन और जड़ों को पकड़ लेने के बाद आवश्यक जल की आपूर्ति भी यह स्वयं जलस्त्रोत से प्राप्त कर लेता है। बेल के वृक्ष को सदाबहार भी कहा जा सकता है। कारण यह कि पहले से वृक्ष में लगे फल पूर्ण रूप से झड़ भी नहीं पाते है और नये फलों का सृजन शुरू हो जाता है। इस वृक्ष को हमारी अपनी संस्कृति का हिस्सा भी माना जा सकता है। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को इसकी पत्तियों की मांग बढ़ जाती है। वैसे तो पूरे श्रावण मास में बेल पत्तियां भगवान शंकर को अर्पित करने लोगों को व्यापारिक दृष्टि से लाभान्वित करती दिखाई पड़ती है।

बेल हमारे देश के प्राचीन फलों में से एक है। बेल के फल के लिए कहा जाता है- ‘रोगान बिलति भिन्नति इति बिल्व’ अर्थात जो रोगों का नाश करे वह बेल कहलाता है। बेल की जड़, पत्ते, छाल, शाखाएं और फल औषधि रूप में मानवीय जीवन को संरक्षण देने में सफल रहा है। वयोवृद्धों की माने तो प्राचीन काल में बेल फल का उपयोगिता को स्वीकार करते हुए श्रीफल की संज्ञा भी दी गयी थी। इस वृक्ष का सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे हर तरह की बंजर भूमि यथा-ऊसर, बिहड़, खादर, शुष्क एवं अर्द्धशुष्क में भी रोपा जा सकता है, जहां तक बात की जाये पोषण तत्वों की तो बेल में विटामिन ए, वी, सी से लेकर खनिज तत्व और कार्बोहाइट्रड की भरपूर मात्रा पायी जाती है। औषधि गुणों से भरपूर होने के कारण घरों में इसका शरबत और मुरब्बा बनाकर रखा जाता है। बेल के वृक्ष को उसके ऊंचाई के आधार पर किस्मों में बांटा गया है। कृषि विश्व विद्यालयों में प्रोफेसर के पदों पर आसन्न विशेषज्ञों ने उन्नत किस्म के बेल को नरेन्द्र बेल 5, कम ऊंचाई एवं साढ़े 3 फीट के घेराव वाले वृक्षों को नाम दिया है। इसी तरह नरेन्द्र बेल 7-9 औसत ऊंचाई और 5.7 मीटर तथा 4.6 मीटर फैलाव वाले वृक्षों को नाम दिया है। इनके अलावा पंत सिवानी, पंत अर्पणा, पंत उर्वशी, पंत सुजाता आदि नामकरण किये गये है।

बेल फल के औषधि गुणों का बखान इसके विशेषज्ञ करते नहीं थकते है। इसके गूदे में लबाब, पेक्टिन, शर्करा एवं उत्पत तेल पाये जाते है। इसके पत्तों का रस घाव को भरने में सक्षम होता है। दर्द को दूर करने वाले ज्वर में आराम पहुंचाने के लिए भी इसे उपयोगी माना गया है। श्वास रोग से मुक्ति दिलाने में भी बेल की पत्तियां लाभकारी बतायी गयी है। हमारे देश के आयुर्वेदाचार्यों द्वारा बिल्वानि चूर्ण, बिल्व तेल, बिल्वादिधृत, वृहद गंगाधर चूर्ण, बिल्व पंचक आदि जैसी औषधियों का निर्माण कर पीडि़तों को आराम पहुंचाया जा रहा है। एक सावधानी बेल पत्तों के रस का सेवन करने वालों को रखना चाहिए, वह यह कि यदि वे बवासीर के मरीज हो तो अधिक मात्रा में बेल पत्तों का रस न लेवे। आयुर्वेद विशेषज्ञों का मानना है कि बिल्व चूर्ण को तेल में उबालने के बाद ठंड कर पेस्ट बनाने के उपरांत जले हुए स्थान पर लगाने पर आराम मिलता है। पाचन तंत्र में खराबी से उत्पन्न आंव जैसे रोग में इसके चूर्ण या गुदे का सेवन लाभकारी होता है। दमा रोगियों का कफ यदि बाहर न निकल पा रहा हो तो बेल की पत्तियों का काढ़ा फायदेमंद होता है और कुछ मिश्रण के साथ प्रयोग करने पर कफ बाहर निकलने लगता है।

इतने सारे गुणों से भरपूर बेल अथवा बेल के वृक्ष की अनदेखी आने वाले समय में हमें बहुत से फायदों से दूर कर सकती है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह कि हमारे घर आंगन से विदा हो रहा बेल का वृक्ष हमारी इस पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को इसका महत्व प्रतिपादित नहीं कर पायेगा। हमारे देश सहित प्रदेश की सरकारों को यह जवाबदारी लेनी होगी कि वह इसे विलुप्ति के कगार पर जाने दे और इसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सहेजने योजना तैयार करें।

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डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)

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