यक्ष-प्रश्न // कहानी // धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

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सुबह पांच बजे घर में हुई अचानक हलचल से मेरी नींद टूट गयी......। मस्तिष्क तो जाग गया किन्तु शरीर अभी भी गहरी नींद में था..........। जब तक मैं उस हलचल का कोई कारण समझ पाता वह हलचल शांत हो गयी....। थोड़ी देर बाद जब किरण ने झकझोरा और रोते-रोते बताया कि छोटे मामा का एक्सीडेंट हो गया है, तब मेरी चेतना लौटी.........। मम्मी-पापा जा चुके थे.....। मैं बिस्तर पर सन्न बैठा अब ये सोच रहा था कि मुझे क्या करना चाहिये, तभी मोबाइल पर छोटे मौसाजी का फोन आ गया ......। उन्होंने भी बस इतना ही बताया कि खेत पर जुताई करके लौटते समय ट्रैक्टर पलट गया है, जिससे खेत मालिक और छोटे मामा दब गये हैं.....। मम्मी पापा चले गये कि नहीं पूछकर उन्होंने फोन कट कर दिया......। स्थिति की गंभीरता को समझकर मैंने और किरण ने भी ननिहाल जाने का निश्चय कर लिया......। सुबह का उजाला फैल चुका था....। मेरा ननिहाल नेशनल हाईवे नं. सात पर सत्तर किलोमीटर की दूरी पर ही है अतएव हमने मोटर साइकिल से ही जाने का निश्चय कर लिया था.....। मैनेजर साहब को छुट्टी पर रहने की सूचना देकर हम निकल पड़े थे.........।

रास्ते में मेरे और किरण के बीच कोई बात नहीं हुयी.........। दिल अनहोनी की आशंका करने लगा था........। दो घंटे के सफर के बाद हम साढ़े आठ बजे ननिहाल पहुंच गये थे.........। ननिहाल पहुंचकर आशंका सही निकली थी......। गॉंववालों का हुजूम लगा हुआ था और घर के सामने वाली परछी पर महिलाओं से घिरी हुयी छोटे मामा की मृत देह पड़ी हुयी थी..........। मम्मी-पापा पहुंच गये थे.....। पोस्टमॉर्टम वैन आ गयी थी........। मामी का रो-रोकर बुरा हाल था.......। मृत देह से वह कभी लिपटकर तो कभी छाती पीट पीटकर रो रही थीं..........। बमुश्किल उन्हें हटाकर मृत देह को पोस्टमॉर्टम के लिये ले जा पाये थे मझले मामा, पापाजी और अन्य रिश्तेदार....।

इस वज्राघात के लिये किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था.....। अभी उम्र ही क्या थी छोटे मामा की.....? महल तीस साल....। शादी हुये चार साल ही तो गुजरे थे......। हालांकि दो बच्चे हो गये थे.....। अभी दो माह पहले ही तो आयशा का पहला जन्मदिन उन्होंने धूमधाम से मनाया था....। अभी माह भर पहले ही तो हम आये थे बड़े मामा की बेटी प्रियंका की शादी में......। हॅंसते-मुस्कुराते कितनी आसानी से सारी जिम्मेदारियॉं अपने कॉंधों में डाल ली थी छोटे मामा और मझले मामा ने.....। बड़े मामा पीने की लत के कारण अपना जीवन पहले ही बर्बाद कर चुके हैं, बच्चों का जीवन बर्बाद न हो इसलिये बड़ी मामी गॉंव में ही रहने लगी थीं....। बड़े मामा नजदीकी शहर में एक प्राईवेट नौकरी करते हुये जो पाते हैं, अपनी लत के लिये होम कर रहे हैं..........। कितने जतन नहीं किये सबने उनकी लत छुड़ाने के लिये, लेकिन सारे जतन निष्फल साबित हुये.....। पिता होते हुये भी प्रियंका ने यहाँ-वहाँ के रिश्तेदारों के पास रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की थी....।

प्रियंका की शादी में हॅंसोड़, मिलनसार और जिंदादिल छोटे मामा को देखकर सोचा न था कि अगले महीने ठीक इसी तारीख को हम वापिस आकर उन्हें हमेशा के लिये अलविदा कहेंगे....।

पोस्टमॉर्टम वैन गये आधा घंटा हो चुका था....। रिश्तेदार आते जा रहे थे.....। उस गमगीन माहौल के बीच उस दुर्घटना का विवरण सामने आया जिससे छोटे मामा की जान गयी और साथ में बैठे खेत मालिक को गंभीर चोटें आयीं....।.....मानसून आ चुका था...। जुताई के लिये ठेका दिया जाने लगा था....। जुताई के लिये ड्राइवर ट्रैक्टर लेकर गया हुआ था...। दोपहर में ड्राइवर को खाना खाने की छुट्टी देने के लिये छोटे मामा गये हुये थे....। ड्राइवर खाना खाकर जैसे ही जाने लगा वैसे ही मूसलाधार पानी गिरने लगा.....। वहां खेत से छोटे मामा पानी गिरने के कारण घर आने के लिये आ रहे थे कि समीप के नाले में उनका ट्रैक्टर पलट गया....। चारों चाक उपर हो गये.....। छोटे मामा और ट्रैक्टर में सवार खेत मालिक दोनों बुरी तरह फॅंस गये.....। वहां दबे-दबे उनने मोबाइल से संपर्क करना चाहा तो नेटवर्क नहीं मिला....। हॉर्न बजाना और मदद के लिये पुकारना सब व्यर्थ हो रहा था....। जब पानी बंद नहीं हुआ और अंधेरा घिरने पर भी छोटे मामा नहीं आये तो मझले मामा उन्हें देखने खेत तक गये थे.....। दो घंटे हो चुके थे, उस वक्त तक भी अगर मदद मिल जाती तो शायद छोटे मामा की जान बचाई जा सकती थी.....। किन्तु हाय री नियति मझले मामा मेड वाले दूसरे रास्ते से गये और दूर से ही खेत देखकर चले आये और मोटर साइकिल से यहां - वहां तलाश करने लगे....।

दुर्घटना घटे पांच घंटे से भी अधिक समय हो चुका था.....। जब काफी देर तक यहां - वहां तलाश करने पर मझले मामा को छोटे मामा नहीं मिले, तब किसी अनहोनी की आशंका से वशीभूत वे वापिस नाले वाले रास्ते पर गये थे.....। अंततः वह उस स्थान तक पहुंच गये, जहॉं छोटे मामा जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे....। मझले मामा को देखकर छोटे मामा ने कहा था- मझले भैया पांच घंटे से ट्रैक्टर के नीचे दबो है विकास.....। जल्दी से मझले मामा ने आसपास की बस्ती से लोगों को इकट्ठा किया और किसी तरह दोनों को निकाला.....। छोटे मामा को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में चोट लगी थी.....। खेत मालिक का तो पैर बस दबा हुआ था, लेकिन छोटे मामा कमर से लेकर निचले हिस्से तक ट्रैक्टर में दबे हुए थे....। पांच घंटे तक ट्रैक्टर से निकलने की कोशिश में चोट गंभीर हो गयी थी......। जब दोनों जीवित बाहर निकल आये तो सबने राहत की सांस ली थी.....। छोटे मामा ने पानी मांगा तो उन्हें दूध पिलाया गया.....। अंततः पांच घंटे तक जीवटता से जीवन और मौत से संघर्ष करने वाले छोटे मामा ने डॉक्टर के पास ले जाते हुए रास्ते में ही दम तोड़ दिया था....।

दो घंटे में मृत देह पोस्टमॉर्टम होकर आ गयी.....। इस बीच दूर के रिश्तेदार भी अंतिम दर्शन के लिये आ गये थे....। उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी होने लगी थी.....। विलाप तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था, और मैं एक किनारे में खड़ा अपने हम उम्र बालसखा की यादों को सहेज रहा था....।

मैं छोटे मामा से महज साल भर ही छोटा था....। गर्मी और दशहरे दीवाली की छुट्टियों में हम दोनों का साथ चौबीसों घंटे का होता था.....। साथ खाना-पीना....। साथ सोना...। साथ अमराई तले मड़ैया बनाकर आम बीनना....। साथ नदी नहाने जाना....। हम दोनों जब भी जहां होते, साथ ही होते थे.....। एक ही सत्र में हमने बारहवीं की परीक्षा भी उत्तीर्ण की थी.....। बारहवीं के बाद छोटे मामा खेती-बाड़ी में हाथ बंटाने लगे थे....। मेरी शादी हालांकि छोटे मामा से एक साल पहले हो गयी थी, किन्तु मामी सुंदरता के मामले में किरण से उन्नीस नहीं थी.....। रिश्ते से बढ़कर हम दोनों के बीच मित्रभाव अधिक था....। मेरी शादी में उनने सजावट से लेकर पत्तल तक उठाने का काम किया था और उनकी शादी में मैंने......।

अंतिम संस्कार के बाद मैं और किरण उसी कमरे में बैठे थे, जिसमें मामी पहली बार विदा होकर आयी थी.....। मेरी शादी के बाद किरण पहली बार छोटे मामा की शादी में ही ननिहाल गयी थी....। दोनों का समान भाव से नयी बहू होने के नाते स्वागत किया गया था.....। दोनों बहुओं का साथ भी हमारी तरह का हो गया था....। मझले मामा दोनों बहुओं को प्यार से चुरकी और मुरकी कहने लगे थे.....। शादी के बाद छोटे मामा ने तीन पक्के कमरे बनवा लिये थे और किश्तों में ट्रैक्टर भी खरीद लिया था.....। ट्रैक्टर आने से आय बढ़ गयी थी और उन दोनों का वैवाहिक जीवन सुखमय हो चला था....। किन्तु क्या मालूम था कि यह सुख केवल चंद दिनों का है....। छोटी मामी की अभी उम्र ही क्या है....? कैसे वह पहाड़ सा जीवन बिता पायेंगी.....। आखिर नानाजी और मझले मामा कब तक उनकी जिम्मेदारी निभा पायेंगे.......। मामीजी ज्यादा पढ़ी-लिखी भी तो नहीं हैं.....। वैसे भी गांव मे लड़कियॉं अपवादस्वरूप ही पढ़ी-लिखी मिलेंगी.....। किरण के दिमाग में भी शायद यही सब चल रहा था....। माहौल गमगीन और बोझिल था....। हम पांच बजे वापिसी के लिये चल पड़े थे.....।

रास्ते भर मेरे और किरण के बीच मामीजी को लेकर ही बातें चलती रहीं और बार-बार मामीजी और बच्चों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगता था.....।

हम दोनों के पास इस यक्ष-प्रश्न को कोई जवाब नहीं था कि क्यों आखिर बड़ी और कुलीन कही जाने वाली जातियों में विधवा विवाह की प्रथा नहीं है़......?

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संपर्क:

म.नं. 501, रोशन नगर,

रफी अहमद किदवई वार्ड नं.18,

साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी म.प्र.

483501

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(ऊपर का चित्र - डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति)

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