संस्मरण // भारत में आम चुनाव // नौकरिया ना छूटे रामा चाहे जान जाए // बिनय कुमार शुक्ल

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कुछ दिनों पहले स्थानांतरित होकर गुजरात से कलकत्ता आया। आते ही यहाँ चुनावी माहौल का नजारा मिला। कार्यालय के अधिकांश कार्मिक किसी न किसी क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर चुनावी प्रक्रिया पूरी करने के लिए पोलिंग ऑफिसर या फिर प्रिसाइडिंग ऑफिसर की ड्यूटी बजाने के लिए डिटेल कर दिये गए थे। चूंकि मैं अभी नया ही आया था अतः इस बार इस ड्यूटी से वंचित था। पर मन में खुसर-पुसर अवश्य चल रही थी कि यह प्रक्रिया भी एक बार देखनी चाहिए। लोगों के मुंह से इस ड्यूटी के दौरान होने वाले दुःसाहसिक अनुभव को आँखों से देखने की उत्कंठा बढ़ती जा रही थी। विधानसभा चुनाव के दौरान तो यह अनुभव नहीं मिल पाया पर पिछले दिनों हुए पंचायत चुनाव के लिए मुझे भी नामित कर दिया गया। मन में गुदगुदी होने लगी साथ ही मुंगेरी लाल के हसीन सपनों जैसे मुझे भी दिवा स्वप्न आने लगे। अभी कुछ दिनों पहले एक फिल्म देखी थी, ‘न्यूटन’, यह फिल्म राजकुमार राव अभिनीत फिल्म थी जिसमें नक्सल प्रभावित इलाके में चुनाव करवाने की ज़िम्मेदारी नायक को दी जाती है जिसे वह बखूबी निभाता है। इस फिल्म ने मेरे मन पर चुनाव-ड्यूटी के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा कर दिया था। कार्यालय से मुझे नियुक्ति पत्र दी गई, बड़ा ही उत्साहित था। न जाने कितने ख्वाब हरे होने लगे। मन में लड्डू फूटना आम बात थी। डीसीआरसी(चुनावी क्षेत्र का नियंत्रण केंद्र) जाने के पूर्व की तैयारियां चलने लगी। विभिन्न प्रकार से रणनीतियाँ बनाई जाने लगी। पुराने कुछ अनुभवी मित्र भी साथ में थे, अपने पूर्वानुभव के आधार पर एक खास मित्र कुछ वस्तुओं की सूची बना कर रखे थे जिसमें चुनावी अभियान पर जाने के लिए साथ ले जाने जाने वाले सामानों की सूची थी। पिन से लेकर माँर्टिन, मच्छरदानी सहित तमाम आवश्यक चीजें इसमें शामिल थी। और भी चर्चाएँ चलती रहीं। लोगों ने अपने खट्टे-मीठे संस्मरण सुनाना प्रारंभ किया। इस श्रवण से यह तो लाभ मिला कि मन का अँधियारे लगभग छँटने लगे थे और यह भी समझ गया था कि आगे की यात्रा इतनी सहज नहीं जितनी कही जा रही है।

नियुक्ति पत्र का एक विशेष टैग-लाईन “अनुपस्थित रहने वाले व्यक्ति के खिलाफ people’s representation act 1951 के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई अवश्य ही की जाएगी” बड़े-बड़े लोगों के माथे पर पसीना ला देने के लिए काफी था। चूंकि चुनावी ड्यूटी पर नियुक्ति के पूर्व दो प्रशिक्षण दिया जाना अपेक्षित है अतः प्रथम प्रशिक्षण के लिए सबको के प्रशिक्षण केंद्र आबंटित किया गया और नियत तिथि पर नियत समय पर उपस्थित होने का हुक्म मिला। इस हुक्म की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अधिकांश लोगों को अपने गृह नगर से कम से कम 80 या इससे अधिक किलोमीटर की दूरी पर प्रशिक्षण के लिए नामित किया गया था। कुछ ऐसे भी मित्र थे जिन्हें उनके जिले के अतिरिक्त किसी और जिले में तैनात कर दिया गया था। मेरे एक घनिष्ठ मित्र को एक ऐसे स्थान पर जाने का हुक्म मिला था जहां पूरे दिन में केवल तीन बार ही ट्रेन जाती है,उस केंद्र के आसपास कोई भी होटल या विश्राम केंद्र नहीं था तथा उन्हें उस स्थान पर तड़के सुबह पहुँचने का आदेश दिया गया था। कैसे वहाँ पहुंचाना है यह तो राम ही जानें।

इसी बीच याद आया कि मेरे साले साहब के छोटे बेटे की शादी का कार्यक्रम है और मुझे उस शादी में शरीक होने के लिए भी जाना है। आठ मई का रेल का टिकट भी बन चुका था। अबतक प्राप्त जानकारियों के अनुसार यह चुनाव दिनांक 01 मई तक समाप्त हो जानी थी। मैं भी खुश था कि चलो चुनाव निपटने के बाद इसी बहाने कुछ दिनों के लिए आराम की यात्रा भी हो जाएगी। दोनों तैयारियां साथ-साथ चल रहीं थीं। शादी में जाने के पूर्व विभिन्न प्रकार की खरीददारियाँ और दूसरी ओर चुनाव में शामिल होने के लिए ले जाने वाले वस्तुओं का इंतजाम। इस बात से भी प्रसन्न था कि चुनाव आयोग और धरम-पत्नी दोनों को खुश रखते हुए दोनों की खिदमत आराम से कर पाऊँगा। अचानक चुनावी प्रक्रिया कानूनी अड़चनों के कारण स्थगित हो गई और अगली तिथि 14 मई निर्धारित हुई। थोड़ी परेशानी की स्थिति में हो गया कि 12 को शादी है,13 को ड्यूटी पर रिपोर्ट करना है। फिर मैंने दिनांक 11 मई का वापस आने के लिए जहाज का टिकट बनवाया। सोचा, चलो सबको पहुंचाकर, दिनांक 10 का तिलक का कार्यक्रम देखकर 11 को वापस आ जाऊंगा। पर शायद नियति को यह बात मंजूर न थी। अगले दिन अचानक समाचार आया कि दूसरे फेज के प्रशिक्षण की तिथि दिनांक 08 मई को तय हुई है, यह 08 मई वह दिन था जिस दिन हमें ट्रेन पकड़नी थी। घर आकर भारी मन से पत्नी को यह बात बताई। अब आप समझ ही सकते हैं कि एक पत्नी-भक्त पति पर क्या सितम गिर सकती है !!!

खैर, सरकारी नौकरी में होने के कारण यह शपथ कि प्राण जाए पर नौकरी न जाए तथा, चुनाव आयोग द्वारा जारी नियुक्ति पत्र में दर्ज वह धमकी भरा वाक्यांश, दोनों के बोझ तले दबकर भारी मन से पत्नी को किसी प्रकार से शांत किया और उनके साथ शादी में शामिल होने के लिए छोटे भाई को तैयार किया। दिनांक 08 मई को बुझे मन से हम दोनों अपनी-अपनी दिशा में चल पड़े।

दिनांक 08 को प्रशिक्षण के पश्चात यह खबर मिली कि दिनांक 13 को हर हाल में नौ बजे सुबह डीसीआरसी(क्षेत्र विशेष का चुनाव नियंत्रण कक्ष) पहुँच जाए। चुनाव के दौरान चुनावी क्षेत्र का अपना एक अलग ही माहौल होता है। बसें एवं अन्य सवारियाँ सड़कों से गायब रहती हैं। अपना कोई साधना न हो तो गंतव्य तक पहुँचने में नानी याद आ जाए। खैर, किसी प्रकार से लटक-पटक पर डीसीआरसी पहुँच गए। वहाँ पहुँचने पर हाजिरी ली गई। मेरा नाम रिजर्व लिस्ट में था अतः कहा गया कि शाम को चार बजे हमारी अलग से हाजिर होगी, तबतक के लिए फ्री हैं। शामियाने से सजा बड़ा सा पंडाल जिसके नीचे समस्त कार्मिक बैठे हुए थे। जिन्हें बूथों पर जाना था उन्होंने अपना समान लेकर सूची के अनुसार मिलाना शुरू किया तथा जो रिजर्विस्ट थे वे इधर-उधर बैठकर अपना समय काट रहे थे। अचानक मौसम भी बड़ा मेहरबान हो गया। मूसलाधार बारिश ने टेंट के बीच के जोड़ पर झरने सा माहौल बना दिया। शाम तक सारी पार्टियां अपने गंतव्य पर चली गईं।

अब मेन लिस्ट में से अनुपस्थित लोगों के स्थान पर रिजर्विश्ट में लोगों को भेजने की प्रक्रिया चली। अधिकांश लोग इधर उधर हो लिए। बार-बार माइक पर पुकार आने के बाद भी कोई जाने को तैरा नहीं हो रहा था। फिर मेरा नाम पुकारा गया। अब पुराने अनुशासित सैनिक जो ठहरे, नाम पुकारने के साथ ही काउंटर पर जा पहुंचे। मुझे एक बूथ अलाट कर दिया गया और इसके बदले मजदूरी का कुछ पैसे भी दे दिया गया। कहा गया कि पार्टी को ढूंढकर निकाल लूँ। दो तीन बार एनाउंस करवाया पर हमारे बूथ के किसी भी सदस्य ने हमारे पास आने या हमसे संपर्क करने की कोशिश नहीं की। अचानक चुनाव आयोग की ओर से संदेश आया कि मैं देवगंगा के रिपोर्टिंग ऑफिसर के पास दस मिनट के भीतर पहुँच जाऊँ अन्यथा कानूनी कार्रवाई का कोप भाजन बनूँगा। जिस स्थान पर मैं खड़ा था वहाँ से देवगंगा की न्यूनतम दूरी 60 किलोमीटर थी। इतनी दूरी दस मिनट में किस गरी और किस साधन से तय करूँ समझ नहीं पाया, ऊपर से सजा दिये जाने की धमकी। परेशानी की हालत में मैंने अपने डीसीआरसी के रिपोर्टिंग ऑफिसर को यह एसएमएस दिखाकर देवगंगा जाने के बारे में पूछा। उन्होंने साफ कर दिया कि यह एसएमएस उन्होंने नहीं भेजा है। मेरी तो हालत साँप छछूंदर सी हो गई। यदि देवगंगा नहीं पहुंचा तो सजा, और फिर पहुंचूं तो भी कैसे ......

अचानक दूसरा संदेश आया। लिखा था अविलंब आमडांगा के रिटर्निंग ऑफिसर को रिपोर्ट करूँ। रिटर्निंग ऑफिसर के सामने ही खड़ा था। अब तो धीरज का दरिया सूखने लगा। मैं रिटर्निंग ऑफिसर से उलझ पड़ा कि इन धम्की भरे संदेशों की मंशा स्पष्ट करे। पर कोई कुछ बताने वाला ही नहीं, मैं बकता रहा और वो लोग दूसरी ओर मुंह करके चुपचाप बैठ गए। लगभग एक घंटा अपनी टीम की प्रतीक्षा करता रहा। अंत तक कोई बात न बनते देख दुबारा कंट्रोल में रिपोर्ट किया। पता लगा कि टीम अपने पूरे सदस्यों के साथ जा चुकी है। फिर मुझे दिये गए पैसे वसूल लिया गया और पोलिंग ड्यूटी से मेरा नाम काट दिया गया। फिलहाल रात होने तक पोलिंग ड्यूटी से मैं वंचित था तथा अनपेक्षित खतरे से भी दूर।

अगली भोर भी बड़ी ही खुशनुमा थी। सुबह के छः बजते ही 20-25 बमों के धमाके के साथ ही चुनावी दिन की शुरुआत हुई। पता लगा कि आसपास के किसी बूथ पर बमों की यह सलामी ठोंकी गई है। अनहोनी की आशंकाओं के साथ ही दिन की अन्य खबरों के लिए कई लोगों ने अपने मोबाइल पर समाचार सुनना शुरू किया। तभी अचानक एक पोलिंग पार्टी अपना झोला उठाए वापस आ गई। इस पार्टी के समस्त सदस्य ऐसे काँप रहे थे जैसे मलेरिया से ग्रसित हो गए हों। पूछने पर पता लगा कि उनके बूथ पर कब्जा करने के प्रयास में उनके साथ मार-पीट की गई है तथा हमलावरों ने बैलट बॉक्स को कूचकर तालाब में फेंक दिया। वहाँ दो एक को मतदाता को इतना पीट दिया गया था कि अब वो शायद ही कभी वोट डालने की बात करें। ये बेचारे किसी प्रकार से अपनी जान बचाकर वापस आ गए थे। उन्होंने रिपोर्ट किया। पर ऐसा लग रहा था कि उन्होंने अपनी जान बचाकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। जो भी उच्चाधिकारी था वह उन्हीं पर भड़क रहा था। वापस जाकर चुनावी प्रक्रिया पूरी करने के लिए उन्हें विवश किया जाने लगा। उस ग्रुप के प्रिसाईडिंग आफिसर ने हाथ खड़ा कर दिया, कहा कि मुझे नौकरी से निकाल दिया जाए वह मंजूर है पर हम दुबारा वापस नहीं जाएंगे। हार मानकर दूसरी पार्टी भेजी गई। थोड़ी देर बाद वह भी वापस आ गई।

मैं बैठे-बैठे ईश्वर को धन्यवाद दे रहा था कि मेरा नाम कटवाकर मेरे ऊपर उन्होंने बड़ी कृपा की। आसपास के बूथों से भी एसी ही डरावनी कहानियाँ आ रही थी। मेरे कार्यालय के दो मित्र अबतक बुरी तरह कुटा चुके थे। बारह बजे मुझे दुबारा बुलाया गया और डीसीआरसी के भीतर के एक बूथ में फ़स्ट पोलिंग ऑफिसर की ड्यूटी दी गई। चूंकि यह कंट्रोल केंद्र के अंदर ही था अतः विशेष डर की बात नहीं थी, फिर भी डरते-डरते, हनुमान जी का नाम लेते हुई बूथ में प्रवेश किया और टूटी बेंच पर कोने में अपनी पोजीशन संभाल ली। अंदर हमारी टीम के अतिरिक्त पार्टियों के प्रतिनिधियों का एक मण्डल भी मौजूद था। मतदान की प्रक्रिया के दौरान कई बार हाथा-पाई हुई। एक आध बार तो प्रतिनिधि पोलिंग पार्टी पर भी आक्रामक होने का प्रयास कर गए पर प्रभुकृपा से कुटाई होने से बच गया। रात के साढ़े नौ बजे मतदान खत्म होने के बाद फटाफट झोला-डिब्बा उठाया गया और जमा करवाने के लिए कंट्रोल सेंटर पहुँच कर ही सांस ली।

दो दिनों के बाद मतगणना की भी ड्यूटी बजानी थी। मतगणना स्थल मेरे निवास से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह साढ़े छः बजे रिपोर्ट करनी थी। किसी प्रकार से गणना स्थल पर पहुंचा। वहाँ पहुँचकर जब लोगों से बाते की तो पता चला कि पधारे हुए कार्मिकों में ढेरों ऐसे भी मित्र है जो चुनाव के दिन गुंडों से पिट चुके हैं, कुक थप्पड़ से तो कुछ डंडे और अन्य हथियारों से। सबके अनुभव बड़े ही डरावने थे। बस मैं सुनता रहा और सोचता रहा कि इस बार तो बच गया यार बकरे की माँ कबतक खैर मनाएगी .......................

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