कहानी - एक बार फिर // अर्चना अग्रवाल

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शाम गहराने लगी थी , साये लंबे होते जा रहे थे ,  ,हरसिंगार और बोगेनवेलिया के फूलों की सुगंध पूरे वातावरण को महका रही थी ।
मैं, डा० चारू अपने इस नर्सिंग होम की खिड़की पर खड़ी जाने कहाँ खोई हुई थी कि मोबाईल में मैसेज टोन सुनाई दी
Coming back to roots ,wanna meet - Naman
मेरी आँखें मैसेज को पढ़ उस पर यकीन करने की कोशिश करने लगी ।
मन अजीब सी कश्मकश से  भर उठा कि नमन अब मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है
मैं समझने की कोशिश कर रही थी कि नमन अब मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है ।
ये वही नमन है जो आज से सात साल पहले मेरे सारे सपनो को तोड़कर चला गया था ।
 
जो सिर्फ अपने करियर  और महत्वाकांक्षाओं को ही महत्त्व देना जानता था जिसके सामने  मेरा अस्तित्व  जैसे था ही नहीं
जिसने अपनी मानसिक टूटन से निकलने के लिए महज़ मुझे  स्टेपनी की तरह यूज़ किया
मैं इन्हीं ख्यालों में गुम थी और मेरी OPD का समय खत्म हो गया ।

पर तभी एक बुजुर्ग मेरे नर्सिंग होम में आए जिन्हें अस्थमा का दौरा पड़ा था और मैं सब कुछ भूलकर उन्हे इंजेक्शन देने लगी I
ठीक होने पर उन्होंने मुझे कांपते हाथो से ढेरो आशीर्वाद दिए और मेरा मन  खूबसूरत अहसास से भर गया । 
ये मेरा छोटा सा नर्सिंग होम है और इसी के फर्स्ट फ्लोर पर मेरा घर है , बस यही मेरी छोटी सी दुनिया है ।
   मेरे पति सुधीर और सासुमाँ के जाने के बाद मैं काम में इस कदर खोई रही कि ये सात साल जाने कहाँ उड़ गए पता ही नहीं चला ।

सात साल यानी सात सावन , सात बसंत , सात पतझड़ ।
ऋतुएँ आती रहीं जाती रहीं।
हर सिंगार महकता रहा , पर मैंने अपने दिल के दरवाज़े बंद कर दिए थे ।
फिर आज ये मैसेज मुझे अतीत में क्यूँ खींच रहा है ।
ऐसा लगा कोई गहरी नींद से झिंझोड़ कर जगा रहा हो ।
नमन के मैसेज ने मेरी बीती ज़िंदगी फिर से रील की तरह सामने ला दी थी ।
 

मैं और सुधीर एक साथ मेडिकल की पढ़ाई करते थे , पता ही नहीं चला  पढ़ाई के दौरान ही हमारा साथ कब गहरे लगाव में बदल गया  सुधीर बेहद नर्म दिल , अन्तर्मुखी स्वभाव के थे और मैं नटखट ,चैटर बॉक्स थी  I स्वभाव और आदतों में ये अंतर ने ही  हम दोनों को एक दूसरे का चहेता बना दिया ।
लैब में टंगे कंकाल से मैंने एक दिन सब स्टुडेंटस को इतना डराया कि वार्डन तक मेरे प्रैंक की कम्पलेंट पहुँच गई थी ।
एग्ज़ाम से कुछ दिन पहले सुधीर के नोट्स ही मेरी डूबती नैय्या को पार लगाते थे ।

वो हरदम डॉक्टरी पेशे से भलाई करने की बात करते तो मैं हर चीज़  में ह्यूमर ढूँढ लेती ।
 
सुनो , ये psychology की स्पैलिंग फसाए चलो जी है ना , मैंने सुधीर से कहा था
वो लायब्रेरी में मुझे चुप रहने के लिए इशारे कर रहा था पर मेरी बड़बड़ बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी ।
वो पढ़ाई के दौरान ही सोशल सर्विस करने निकल जाता थाऔर मैं क्लास बंक कर मूवी प्लान बनाती रहती थी ।
डिग्री मिलते ही सुधीर ने अपने स्वर्गीय पिता के बंगले में चैरिटेबल नर्सिंग होम की प्लानिंग कर ली थी
उसके इस खूबसूरत सपने में मैं भी खुद को जाने कब जोड़ चुकी थी ।
"सुचारू चैरिटेबल नर्सिंग होम “ के साथ ही हमने अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत कर ली थी ।
  तितली के परों की तरह वो बहुत खूबसूरत दिन थे ।
सुधीर के प्यार ने मुझे भी अपने प्रोफेशन के कर्तव्यों के लिए सजग कर दिया था ।
जाने ऐसा कैसे होता था कि वो मेरी बात बिन कहे समझ जाते थे और मैं उनकी आँखों में दुनिया - ज़हान देख लेती थी ।

और वो मेरी पहली मैरिज़ एनीवर्सरी थी । मैंने ढेर सारे प्लान बना रखे थे , लॉगड्राइव , मूवी , रेस्टोरेंट में डिनर वगैरह वगैरह ।
पर सुधीर को फ्लड रिलीफ कैंप से बुलावा आ गया I
मेरे और सासुमाँ के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माने और कभी वापिस ना आने के लिए चले गए  ।
मैं सी ग्रीन कलर की खूबसूरत साड़ी पहने , मोगरे का गज़रा लगाए उनका इंतज़ार करती रही पर वो इंतज़ार जीवन भर का इंतज़ार बन गया ।

नियति कहूँ या भाग्य कभी-कभी ऐसे क्रूर निर्णय ले लेता है कि हम अवाक खड़े उसे सहने के अलावा कुछ नहीं कर पाते ।
मेरे सामने परिस्थिति एक भयानक रूप में थी और मैं इस जीवन के सफ़र में एकदम अकेली हो गई थी , एकदम तन्हा I
सुधीर के बिना ये पहाड़ जैसी उम्र कैसे गुजारुँगी ये ,सोचकर ही घबराहट होती थी
पर मेरी सासुमाँ बेहद सुलझी हुई ,आशावादी थीं।
बेटे के गम ने उन्हें तोड़ा तो था फिर भी वो बुढ़ापे में भी मेरा सहारा बन गई थी ।

समय धीरे धीरे गुज़रने लगा ।
मैं फिर सेअपने नर्सिंग होम के काम में अपना मन लगाने लगी थी ।
तभी नमन मेरी ज़िंदगी में दाखिल हुआ ।


दिसंबर की ठंड थी Iचारों तरफ गहरा कोहरा छाया हुआ था।
रात के तकरीबन दो बजे मेरी डोरबेल बजी ।
सारे दिन की थकी हुई मैं कॉफी पीकर बस हल्की नींद में ही थी।
बालकनी से देखा दो लोग एक बेहोश आदमी को उठाए हुए हैं ।
मैंने सासुमाँ को भी जगाया अपनी शॉल लपेटकर नीचे आई ।
उनके अंदर आने पर देखा उसका काफी खून बह चुका था  ।उन लोगों ने उसका नाम नमन बताया ।
उसने ब्लेड से अपनी कलाई की नस काट ली थी ।
अब इतनी रात ब्लड का इंतज़ाम और उसके स्टीचिज , ये सब  मैंने कैसे किया मेरा दिल ही जानता है ।
सासुमाँ भी मेरे  साथ सारी रात जागती रही  ।
सुबह तकरीबन छह बजे उसेहोश आया था ।
नमन लगभग पच्चीस वर्ष का सुदर्शन युवक था ।
उसके घुँघराले बाल माथे तक आए हुए थे । पता चला कि उसने ये कदम कैरियर में परेशानी के कारण उठाया था ।
ये सब बताते हुए उसके होंठ काँप रहे थे और आँखों की कोरों सेआँसू लगातार बहते रहे थे
   वो राँची से आकर यहाँ पी० जी में रह रहा था  ।
मध्यमवर्गीय परिवार था और बड़े- बड़े सपने थे ।
बड़े शहर बड़ा कैनवस तो देते हैं पर कईं बार हमारे रंग और ब्रश ही कम और छोटे पड़ जाते हैं ।
उसके रूममेट वापिस जा चुके थे ।
सासु माँ ने  उसे हॉट कॉफी और मुझे कोल्ड कॉफी दी  । उसकी आँखें नम हो गयी
अब तक मैं ज़िंदगी के इतने फीके रंग देख चुकी थी कि किसी भी दुखदसिचुएशन पर एकदम  बोल नहीं पाती थी ।
आवाज़ कहीं अटक सी जाती थी ।
नमन को ठीक होने में चार पांच दिन लगे I
इस बीच उसकी सासुमाँ से अच्छी पटने लगी थी ।
खाली समय में मैं उन दोनों को एक दूसरे को जोकसुनाते देखती
ठीक होने के बाद भी नमन अक्सर सासुमाँ के पास चला आता था , शाम की चाय के वक्त पर दोनों खूब बातें करते थे ।
बातें करते हुए कभी -कभी नमन मेरी ओर भी एकटक देखने लगता जाने उसकी नज़र मे क्या था कि मैं  अचकचा सी जाती थी ।
सुधीर के जाने के बाद मेरा मन एक रेगिस्तान की तरह था जिस पर मैं किसी के प्यार की नमी चाहती ही नहीं थी ।
शायद अब अहसासों का सोता सूख गया था ।
वो मुझसे उम्र में छोटा था और मैं किसी भी नए रिश्ते को पनपने नहीं देना चाहती थी I
लेकिन होनी को शायद कुछ और ही मंज़ूर था ।
एक रात सासुमाँ को हार्ट प्रॉब्लम के कारण मुझे उन्हें शहर के बड़े हॉसिपटल में दाखिल करना पड़ा ।
दिन रात की दौड़ धूप और अपने नर्सिंग होम की चिन्ता ने मुझे तोड़कर रख दिया।
उस-मुश्किल समय में नमन का सहयोग नरम दूब सा था जिसका स्पर्श मन को छू जाता है ।
माँ जी ठीक होकर घर आईं तो उनके मुँह पर बस नमन की ही प्रशंसा थी।
एक दोपहर जब उन्होंने नमन से हाँ लेकर मुझसे इस रिश्ते के बारे में राय पूछी तो मैं कुछ बोल नहीं पाई थी I
ऐसा क्यूँ होता है कि हम चाहते कुछ और है और ज़िंदगी हमें कुछ और ही मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देती है ।
क्यूँ हम ऐसे फैसलों को मानने के लिए मज़बूर हो जाते हैं जो हम नहीं करना चाहते  थे।
   नियति कुछ ऐसा ही खेल मेरे साथ खेल रही थी  |


मेरे लिए सुधीर की जगह किसी और को दे पाना इतना आसान नहीं था ।
पर बीमारी के बाद सासु माँ मेरे प्रति कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील हो गईं थी ।
नमन ने उनके दिल में एक आस जगा दी थी और वो उसमें मेरे भविष्य का सहारा ढूँढने लगी थीं ।
बहुत कश्मकश के बाद मैंने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी ।
एक महीने के बाद हमारी शादी तय हो गई ।
नमन के परिवार को भी इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं थी ।
तय यही हुआ कि नमन पी जी छोड़कर हमारे साथ ही आकर रहेगा l
थोड़ी बहुत ही सही पर शादी की तैयारियां तो करनी ही थीं
एक सादे समारोह की प्लानिंग की गई कुछ करीबी मित्रों और रिश्तेदारों को सूचना दी गई
मुझे आज भी याद है वो सात मार्च थी दो दिन बाद यानी नौ मार्च को हमारी शादी थी ।
  मैं सुबह से नमन को फोन मिला रही थी पर उसका फोन स्विच ऑफ आ रहा था ।
उसे वेडिंग सूट लाना था , और भी कुछ काम थे ।
उसका इस तरह नॉन रिस्पांस मुझे परेशान किए जा रहा था  ।
शाम तक जब उसका कोई रिस्पांस नहीं मिला तो मैंने उसके पीजी के रूम मेट को फोन मिलाया ।
हैलो , क्या मैं नमन से बात कर सकती हूँ , मैं डा॰ चारू बोल रही हूँ ।
जी , नमन तो आज दोपहर ही जर्मनी चला गया है , उसने कहा था ।
जर्मनी ? क्यूँ ? किस काम से ?
जी , वो स्कॉलर शिप  पर गया है , कई महीनों से ट्राई कर रहा था , वो वहाँ पी एचडी करने गया है  ।
मेरा गला खुश्क हो गया था , सिर घूमने लगा था , मैं  अपने केबिन में बैठी थी पर ऐसा लगा कि मैं किसी वीरान  जगह पर हूँ और मेरे आसपास घुप्प अँधेरा है  ।

सासु माँ को ये सब बताकर उन्हें कैसे संभाला ये सब  याद भी है और भूल भी जाना चाहती हूँ ।
  कुछ यादें कैक्टस की तरह चुभती हैं  I
हमें दंश देती हैं   और उन्हें मिटा पाना हमारे बस का नहीं होता ।
एक औरत के लिए ये ज़ख्म सहना इतना आसान नहीं होता ,
     ये  नासूर बनकर साथ-साथ चलते हैं ।
कुछ भी हो , जीना तो पड़ता है , अपने लिए ना सही , अपने परिवार के लिए ही सही।
  उस दिन से सासुमाँ की तो जैसे बोली ही चली गई  थी ।
वो  इस सब के लिए स्वयं को दोषी मान रही थी मैंने उन्हें लाख समझाया कि उनका कोई दोष नहीं है I
शायद मेरी किस्मत में ही  किसी का प्यार नहीं है ।
मैं नहीं जानती थी कि इस बार मुझे इन बिखरे टुकड़ों को सहेजने में कितना वक्त लगेगा , प्यार तो  छोड़ो क्या मैं अब कभी किसी पर विश्वास भी कर पाऊँगी ?


जीवन में मुश्किलें   इसलिए   ही आती हैं कि हम अपनी छुपी शक्ति को पहचानें और अब मैं  भी अब दिन रात अपने मरीजों की सेवा में जुट गई ।
सच है कि मैं नमन से तहेदिल से नफरत करती थी पर ना जाने क्यों उसे फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट से निकाल नहीं पाई I
उसकी जर्मनी की पिक्स , वहाँ की बातें अक्सर उसके प्रोफाईल में चैक कर लेती थी ।
उस रात जब उसका मिशेला के साथ लिव इन रिलेशनशिप स्टेटस देखा  तो आंखें सुर्ख हो आईं थीं ।
फिर खुद को तसल्ली दी थी  कि ये शख्स मेरे लायक ही नहीं था  ।
वो अगर मूव ऑन कर सकता है तो मैं उसे क्यूँ नहीं भूल सकती I
आजकल के ज़माने में कोरा इमोशनल होना अपने साथ छलना ही तो है ।
पर उस शॉक के बाद जैसे  प्रेम , प्यार से विश्वास ही उठ गया  I
अब फिर से एक नया घोंसला बनाने की हिम्मत ही नहीं बची  जिसे वक्त की आँधी आकर तिनका - तिनका बिखेर दे ।
सासुमाँ के गुज़र जाने के बाद तो मैंने  जैसे  रिश्तों की तरफ से दिल ही पक्का कर लिया था  ।
  किसी से कुछ उम्मीद नहीं  तो दुख महसूस होना भी बंद हो गया  था ।
अब मैं डा० चारू थी और मेरे पेशिएंट , बस ..।
अपने प्रोफेशन और सुधीर की तरह सोशल सर्विस में खुद को इतना बिज़ी कर लिया था  कि दिन रात का पता ही नहीं चलता था ।
अभी पिछले साल ही नमन और मिशेला के ब्रेकअप के बारे में पता चला था ।
    दोनों ने दोस्तो को ब्रेकअप पार्टी दी थी और हँसते हुए सबसे पिक्स भी शेयर की थी ।
आजकल के इन थोथे रिश्तों में जैसे  कोई संवेदना , अनुभूति  अब बची ही नहीं है ।
 
सच कहूँ तो  मुझे  खुशी हुई थी , दिल को  एक सुकून सा मिला था   I
  मैंने जिस आँच की तपिश को झेला था उसकी चिंगारी जितना भी ये आदमी महसूस करे तो मज़ा आ जाए ।
कहीं न कहीं ऐसा लगा था कि मेरी बददुआ देर से सही रंग तो लाई I
और आज इतने समय बाद उसका ये मैसेज कि वो मुझसे  मिलना चाहता है  I
आखिर उसका   क्या मकसद  है ये सोच मेरे सिर में दर्द होने लगा  ।
ये वही नमन है जो मुझे धोखा दे चुका था , जिसने मेरा साथ ऐसी जगह छोड़ा था जिसके आगे सिर्फ खाई थी ।
यदि सासुमाँ का साथ और मेरे प्रोफेशन की डिमांड ना होती तो मैं शायद कभी इस हादसे से उबर ना पाती

इन सात सालों में कभी इसे जानने की इच्छा  नहीं हुई कि मैं कैसी हूँ फिर आज अचानक इसे मेरी याद कैसे आ गई I
 


will wait at Caffe 11 AM - नमन

मैसेज टोन एक बार फिर आई ।
जी चाहा चीख कर कह दूँ , मुझे तुमसे नहीं मिलना ।
मैं अपने पेंशिएट की ओ पी डी ले रही थी। ना चाहते हुए भी बार-बार आँखें घड़ी की ओर चली जाती थी । साढे दस बज चुके थे
मैं चाह रही थी किसी तरह ये समय बीत जाए और मैं नमन से ना मिलूँ ।
अगले पेशिएंट के आने से पहले मैं जाने क्यूँ अचानक उठी और नर्सिंग होम से बाहर निकल गई ।
ड्राइव कर कैफे पहुंची तो 11 बज चुके थे ।
कार्नर वाईट टेबल पर नमन मेरा इंतजार कर रहा था ।
डार्क ब्राऊन चेयर पर बैठते हुए मैंने उसे गहरी नज़र से देखा ।
वो मुस्कुराकर स्थिति को चीयरफुल बनाने की कोशिश करने लगा ।
मैं जवाब में मुस्कुरा नहीं पाई I
उसका रंग कुछ साँवला हो गया था और चश्मा थोड़ा मोटा लग रहा था ।


मुझे देख वो कुछ चौंक सा गया  जैसे पहले की चारू और आज की चारू में तुलना कर रहा हो ।
पर आज की चारू का चेहरा ज़्यादा आत्मविश्वास से दमकता देख कुछ हैरान सा हुआ था।
  लोग क्यूँ हमारे सुख में दरारें ढूँढ कर सुखी होना चाहते हैं ।
  वो हमें तड़पता छोड़ अपनी नई दुनिया आसानी से  बना लेते हैं ।
फिर भी ये उम्मीद करते हैं कि हम हमेशा उन्हें ही चाहें , उन्हें ही सोचें I
  अपने लिए हॉट कॉफी  और मेरे लिए कोल्ड कॉफी का आर्डर दे नमन बातों का सिरा ढूँढने की कोशिश करने लगा I
मेरी पसंद अब तक इसे याद है शायद अपनी कायरता भी याद होगी , मैंने अपने मन में सोचा ।

देखो चारू , मैं मानता हूँ मुझे तुम्हें इस तरह नाज़ुक मोड़ पर नहीं छोड़ना चाहिए था बटयू कैन अंडर स्टैंड मेरा जर्मनी जाना कितना ज़रूरी था ।
और फिर तुम अपना नर्सिंग होम छोड़कर मेरे साथ भी नहीं जाती , सो मेरे पास ऑप्शन नहीं था ।
मिशेला का साथ  मेंटल सपोर्ट के लिए वहां ज़रूरी था ।
मैं समझता हूँ तुम आज भी मुझे भुला नहीं पाई हो ।
अगर तुम चाहो तो वो अधूरा सपना आज भी पूरा हो सकता है।
यहाँ की यूनिवर्सिटी मुझे प्रोफेसर शिप दे रही है ।
वो बोले जा रहा था और मैं चुपचाप  बिना टोका टाकी किए सुन रही थी ।
शायद मेरे मौन को वो स्वीकृति समझ बैठा ।
मेरा हाथ वाईट टेबल पर रखा था , उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया ।
कुछ क्षण तो मैं संवेदनहीन सी हो गई फिर खुद को संभाल कर कह दिया ।

मि० नमन , आप गलतफहमी में है , मैं बहुत दूर जा चुकी हूँ ।
मैंने अपना हाथ उसके हाथ के नीचे से निकाल लिया ।
उसे शायद इसकी उम्मीद नहीं थी ।
उसका मुँह खुला रह गया , वो बोल नहीं पाया ।
मैं उठ खड़ी हुई , मेरा आवेश से पूर्ण चेहरा वो लगातार देख रहा था ।
सात साल बाद ही सही आज मैंने उसे छोड़ दिया ।

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अर्चना अग्रवाल

जन्म स्थान - चाँदनी चौक दिल्ली

दिल्ली विश्वविद्यालय में दो बार सर्वश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार विजेता

कहानी - 'एक वो लड़की ' ' साँवली भाभी '

प्रकाशित पुस्तकें -

ई बुक प्रकाशित - आँसू और दिल  (काव्य संग्रह )

प्रकाशक - राजमंगल पब्लिशर्स

ई बुक प्रकाशित - मन के धागे @juggernaut.in

ई बुक प्रकाशित - मोरपंख pothi.com

ई बुक प्रकाशित - भीगा मन @juggernaut.in

कुछ रचनाएँ 'रचनाकार 'में प्रकाशित

1 - गंगा की गोद में
२ - यादों के साये
३ - घुँघरू
4- साँसों का सफ़र

जर्मनी में विश्व हिन्दी दिवस पर कविता को तृतीय पुरस्कार

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1 टिप्पणी "कहानी - एक बार फिर // अर्चना अग्रवाल"

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