अनुगामिनी // कहानी // धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

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“मैडम कोर्ट आने लगी हैं ”……। एक लाइन की इस बात ने मेरे मन-जेहन में एक नई तरंग पैदा कर दी थी....। हालांकि टाईपिंग और कोर्ट छोड़े हुए एक अरसा हो गया, और मैंने तो अपना टाईपराईटर भी औने-पौने दाम में बेच दिया था .....। फिर भी उन दिनों की याद आज भी ताजा है, जब मैं वकील साहब का स्टेनो-टाईपिस्ट हुआ करता था.......। वकील साहब के पुराने मुंशी ने ही यह खुशखबर दी थी......।

वकील साहब एक सड़क दुर्घटना में चल बसे थे, और उनके न रहने पर मैंने भी स्टेनो-टाईपिंग छोड़ दी थी.......। वैसे भी अब कंप्यूटर टाईपिंग वकीलों और मुवक्किलों की पहली पसंद बन गयी है......।

मुझे आज भी याद है जब मैंने आई.टी.आई. स्टेनो हिन्दी से पास करने के बाद अपनी पहली नौकरी वकील साहब के साथ शुरू की थी.....। इस शहर के जाने माने वकील के स्टेनो-टाईपिस्ट की मामूली-सी कम आय की नौकरी पाकर मैंने अपने कैरियर की शुरूआत की थी......। वकील साहब अपने गॉंव से रोज कोर्ट आया-जाया करते थे.....। मेरी टाईपिंग मषीन वकील साहब की कार में शाम से लेकर सुबह तब रखी रहती थी.......। टाईपिंग मशीन मेरी अपनी थी......। वह मशीन मॉं ने अपना मंगलसूत्र गिरवी रखकर मेरी प्रेक्टिस के लिए खरीदी थी.......।

वकील साहब का गॉंव इस शहर से बमुश्किल दस-बारह किलोमीटर दूर उपनगरीय क्षेत्र में स्थित था......। गॉंव के ब्रिटिशकालीन मालगुजार घराने से ताल्लुक रखने वाले वकील साहब एम.एस-सी., एल.एल.एम. की शिक्षा प्राप्त तो थे ही, साथ ही गॉंव के सरपंच भी रह चुके थे.....। पुश्तैनी जमीन और घर की देखभाल की जिम्मेदारी छोटे भाई को सौंप वे कोर्ट-कचहरी के मुकदमे सुलझाने में व्यस्त रहते थे.....। सेशन कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक एवं कलेक्टोरेट से लेकर कमिश्नर ऑफिस तक ढेरों मुकदमे वह सुलझाया करते थे.....। मुझे छूट थी कि मैं अन्य वकीलों का काम कर सकूं, लेकिन मेरी ट्यूनिंग वकील साहब से कुछ ऐसी बन गयी थी कि अन्य वकीलों के साथ काम में संतुष्टि नहीं मिलती थी.....। अन्य नामी गिरामी वकीलों की तरह उनका कोई ऑफिस नहीं था....। मुवक्किलों से मुलाकात कोर्ट में ही होती थी या फिर में घर में.....। वकील साहब ने स्वयं के प्रयास से कोर्ट में पक्के शैड का निर्माण कराया था, जहां वकील एवं मुवक्किल धूप एवं बारिश से बचकर बैठ सकें.....। हालांकि वे स्वयं शैड के बाहर मेज-कुर्सी डालकर बैठा करते थे......।

वकील साहब के लिए वकालत एक पेशा भर नहीं था, न ही उनकी रोजी-रोटी का जरिया था, बल्कि वकालत उनके लिए दमित, शोषित, उत्पीड़ित, न्याय अभिलाषी ग्रामीण आमजन को न्याय दिलाने का एक जरिया था.....। उनके मुवक्किलों में मुकदमेबाजों की बजाय न्याय अभिलाषी ग्रामीणों की संख्या अधिक थी........। वकील साहब अकसर डीजल खर्च पर ही जरूरतमंद मुवक्किलों के केस निपटाने चल दिया करते थे......। यही सब बातें उन्हें अन्य वकीलों से अलग एवं विशिष्ट बनाती थीं.....।

यूं तो वकील साहब के पास हर तरह के मुकदमे थे, किन्तु उनकी विशेषज्ञता और रूचि पंचायती मुकदमों में अधिक थी....। त्रिस्तरीय पंचायत के ढेरों मुकदमें वे निपटाया करते थे......। ग्रामीण पृष्ठभूमि एवं भूतपूर्व सरपंच होने के कारण वे आसानी से मुवक्किलों की समस्यायें समझ लेते थे......।

मुझे याद है पहली बार मैडम से मेरी मुलाकात वकील साहब के घर पर ही हुयी थी.....। एक महत्वपूर्ण मुकदमे का टाईपिंग वर्क करने के लिए मैं वकील साहब के साथ उनके गॉंव गया था, तभी मैडम से मुलाकात हुयी थी.......। सुंदर, शालीन एवं शिक्षित गृहणी.....। दो प्यारे बच्चे थे दोनों के....।

छः महीने के अल्प समय की नौकरी में मैंने वकील साहब से बहुत कुछ सीखा था....। उनसे जीवन को सोद्देश्य दूसरों की भलाई में समर्पित करना ही नहीं अपितु मुश्किलों से जूझना भी सीखा था.....। हर मुकदमे की नजीरें पूरी तन्मयता से वे तैयार करवाते थे.....। हर शब्द, हर वाक्य में उनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप अंकित होती थी......।

वकील साहब की सड़क दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु ने उनके मुवक्किलों एवं साथी वकील, रिश्तेदारों को गहरा आघात पहुंचाया था.....। मैडम की दशा का अंदाजा ही लगाया जा सकता था....। सुहाग के उजड़ने की पीड़ा और पिता के स्नेह से वंचित होने का दुख मैडम और बच्चे ही जानते थे.....।

वकील साहब की आकस्मिक मृत्यु के बाद मैंने कोर्ट और शहर दोनों छोड़ दिया था....। एक प्राईवेट मल्टीनेशनल कम्पनी में सेल्स रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी मुझे मिल गयी थी......। नये बने राज्य की राजधानी मेरा कार्यक्षेत्र बन गयी थी....। अपने शहर होली-दीवाली की छुट्टियों में ही आना होता था.....।

कहते हैं वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है....। गहरे से गहरा घाव वक्त के मरहम से भर जाता है....। काश मैडम के लिए भी यह बात सत्य होती......। आज इतने सालों बाद अचानक वकील साहब के पुराने मुंशी से मुलाकात न होती तो मैं मैडम के संघर्ष से अनभिज्ञ ही रहता......। मुंशी ने बताया कि वकील साहब के न रहने पर उन्होंने प्राईवेट स्कूल में नौकरी कर ली थी और नौकरी करते-करते बच्चों की जिम्मेदारी के साथ उन्होंने एल.एल.बी. की पढ़ाई की थी.....। पुराने मुवक्किलों और साथी वकीलों का प्रोत्साहन पाकर उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उसी जगह अपनी प्रेक्टिस जमा ली है, जहां वकील साहब बैठा करते थे.....। उनकी प्रेक्टिस धीरे-धीरे जमने लगी है और न्याय अभिलाषी ग्रामीण आमजन को न्याय दिलाने की वकील साहब की मुहिम को उन्होंने वकील साहब के जाने के बाद भी जारी रखा है......।

.नं. 501, रोशन नगर,

रफी अहमद किदवई वार्ड नं.18,

साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी म.प्र.

483501

-मेल-tripathidharmendra.1978@gmail.com

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2 टिप्पणियाँ "अनुगामिनी // कहानी // धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी"

  1. शीर्षक को सार्थक करती नवोदित कहानीकार की कहानी एक आदर्श के प्रति समर्पित पत्नी के संघर्ष को उजागर करती है

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