समीक्षा // अकाब उपन्यास // मधु

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प्रबोध कुमार गोविल के उपन्यास अकाब [ई-बुक लिंक] पढ़ा पढकर मन में जो प्रतिक्रिया हुई उसे लिखा है :---------

अकाब के आखिरी पन्ने से पहले और अंतिम पंक्तियों से कुछ पहले, को पढ़ कर, ताली बजाने का मन हो आया ‘ इसे कहते है मास्टर स्ट्रोक , प्रबोध जी ने सीधा बड़ा सिक्सर मारते हुए अपनी कहानी को अंजाम दिया और क्या अंत किया ! कि पुस्तक पढ़ना सार्थक हो गया।

“ ---अनन्या चलती- चलती किसी दुकान में घुस गयी --------------------------वह किसी किताबों की दूकान में घुसकर रास्ते में पढ़ने के लिए नॉवल ढूँढ रही थी। तभी चहकती हुई अनन्या शीशे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली। उसके हाथ में एक किताब थी। शायद कोई उपन्यास था।------------ नॉवल का नाम था ‘अकाब ‘।”

यहाँ ही प्रबोध जी के एक महान उपन्यास कार होने का सबूत मिला , इस पाठक के दिल पर तीर गहरा गढ़ गया। “अकाब” ने सम्मोहित किया एक अनोखा आयडिया , पुस्तक का टाइटल जिज्ञासाओं को जन्म देता हुआ , प्रबोध जी का “जल तू जलाल तू “ कनाड़ा के नियाग्रा फ़ाल्स के तट पर था तो यह न्यूयोर्क में सैट किया गया है “ दुनिया के तमाम वाद अपनी बिसात बिछाने यहाँ जरूर आते है “ महादेश अमेरिका के लिए लेखक ने शत प्रतिशत सही कहा और गुजराती तो जैसे न तैसे तिकडम भिड़ा कर अमेरिका जाने का सपना देखता है उसका अंतिम लक्ष्य बस और बस अमेरिका है , गुजरात में हर चौथे घर का कुंडा खटखटाओ तो भीतर से एन. आर .आई . झांकेगा !

लेखक पूरे ब्रह्माण्ड , पूरे संसार के नभ पर विचरण करता है चूकीं ,वह अकाब है। लेखक की कलम चली और चलती गयी अकाब के पंखों पर बैठ कर पूरे भूतल पर ही नहीं महीन मानवी रिश्तों ,  भाव- भावावेश ,भावनाओं ,संवेदनाओं , रिश्तों के दर्द, कड़े संघर्ष ,भांति-भांति के दर्द ,वेदना ,संताप ,सुख - संतोष- के लम्हों पर गिद्ध दृष्टि ड़ाल कर पाठक को ले गया , अपने विशाल पंखों पर बिठाकर बेलगाम उड़ान भरता हुया , कोई भी रस अछूता नहीं रह गया।

अकाब को धरती पर लज़ीज़ गोश्त नज़र आया तो वो मंडराता हुया अपनी पैनी दृष्टि लक्ष्य की ओर साधे झपट्टा मारता है , और लोहे के विशाल विमान रुपी आकाबों ने विश्व की सबसे लज़ीज़ वर्ल्ड- ट्रेड- टॉवर पर झपट्टा मार न मालूम कितने हज़ारों गोश्त से अपनी भूख मिटाई ।

मनु के पुत्र पुत्री , आदम हौवा का सत्य जिसे हमेशा परदा ड़ाल कर लिखा जाता रहा है उसे उसके मूल रूप में दिखाना सबके बस की बात नहीं है। प्रायः लेखक की कलम ठिठक जाती है वो उसे भद्रता और शालीनता की झीनी ओढ़नी ओढा कर इस तरह पेश करता है जैसे दुल्हिन का चेहरा घूँघट में। किन्तु अकाब ने बेबाकी से तन से जुड़े अहसास बखूबी मुखरित किये है ; शिशु के बदन पर ममता के तेल मालिश माँ की अँगुलियों का उसके अंग- अंग पर नर्तन , अकाब के नायक तनिष्क को कभी नहीं भूला ;

“माँ असानिका उसके सिर,पीठ ,पेट और पैरों के साथ-साथ उसके जांघों पर भी अपनी जादुई अँगुलिया फिराती और अपनी तेल भरी हथेलियों पर नन्हें तनिष्क कि नन्हीं सूसू को मसल -मसल कर मज़बूत बनाती ------------सिर पर हरे पत्तों की चादर बिछाये तनिष्क खिलखिलाता रहता –”

किस माँ ने अपने नन्हें बालक की ऐसी मालिश नहीं की होगी ? और कौन अबोध बालक खिलखिलाकर नहीं हँसा होगा?, परन्तु किस लेखक ने ऐसा दुर्लभ शब्दचित्र बनाने का साहस किया होगा ? यही नहीं जन्म देने कि प्रक्रिया के पीछे मादा व् नर शरीर का जुड़ना लेखक ने सहज भाव से वर्णित किया है। गृहस्थी बसाना और ब्याह करने के मूल कारण का शारीरिक आकर्षण ,उसे नकारा नहीं जा सकता। प्रकृति का नियम है तब झिझक कैसी ? सच पूछिए तो एक नया आविष्कारक शब्द संचालन किया जब ‘गोमांग’ उर्फ ‘लामा’ ने उसे गृहस्थी जमाने का गुरु मन्त्र दिया और ब्याह के लिए उपयुक्त पात्र कौन ? उसे परिभाषित किया।

“इंद्री पकड़कर गृहस्थी बसाना और स्त्री की छाती को अपने बच्चे के लिए दूध का बर्तन ” बनाना जैसी सर्जनात्मक शब्द चित्र को लेखक ने जन्म दिया है।

याद आता है एक आई. ए .एस. अधिकारी बैनर्जी साहब का दिया नुस्खा ,विवाह के लिए उपयुक्त कन्या कौन?

उनका विवाह के लिए प्रस्तुत लड़के से सिर्फ एक बिना लाग लपेट के सीधा प्रश्न पूछना ,“ क्या तुम इसके साथ सोना पसंद करोगे?”

कभी- कभी नोवल में सिडनी शेल्टन की बू आती है और उसे पोर्नो के हाशिए पर ला खडा करती है , परन्तु चूकीं अकाब का नायक एक मसाज़ करने वाला है , अतः उसके व्यवसाय में नग्न शरीरों का होना लाज़मी है ,लेखक ने उसके अनुभव उसी की तरह पेश किये है।

जैसे हम रामचरित्र मानस का विवादस्पद दोहा ,“ दोल ,गंवार , शुद्र अरु नारी ,ये सब ताड़न के अधिकारी ” का अर्थ, ( कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार), उपरोक्त दोहा तुलसीदास जी ने सागर के मुख से कहलवाया है अतः जड़ बुद्धि जलधि के अपने विचार है। लेखक प्रत्येक पात्र के चरित्र में घुस कर उसके ही अनुरूप उसके ही अनुभवों को लिखता है , अतः तनिष्क का कार्य क्षेत्र उसे जहाँ ले जाता है , लेखक की कलम उसे उसी के अनुभवों के आधार पर कलम बद्ध करता हैं। हो सकता है कुछ पाठकों यह अरुचिकर लगे।

अकाब के पंखों पर बैठ कर संसार घूम लिया , अनेकों भौगोलिक भू -तलों , परिवेशों ,सभ्यताओं , असभ्यताओं के ऊपर मंडराता है ,ऊपर से नीचे की ओर ,कभी बहुत नजदीकी से ,कभी सरसरी नज़र भर डालता हुआ, कभी आकाश में ऊँची उड़ान भर किसी और मंजिल पर पहुँच जाता है।

लेखक प्रबोध गोविल जी का यह नया अवतार निश्चय ही उन्हें पूरे विश्व में ख्याति प्रदत्त सिद्ध होगा।

उन्हें अनेकों शुभकामनाएं।

मधु

sosimadhu@gmail.com

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