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ग़ज़लें : कुमार अरविन्द

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1 है  चाह   मिलूं  उससे  जो  अक्सर  नहीं  मिलता । दीवार   घरों    में    है   मगर   घर   नहीं  मिलता । ये  आप भी  देखें  है  कि  बस  मुझ...

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1
है  चाह   मिलूं  उससे  जो  अक्सर  नहीं  मिलता ।
दीवार   घरों    में    है   मगर   घर   नहीं  मिलता ।

ये  आप भी  देखें  है  कि  बस  मुझको  भरम  है ।
हर   शख़्स   परेशान  है   खुलकर  नहीं  मिलता ।

इस   ज़िन्दगी  के   चिथड़े  सिलाने  है  मुझे  सब ।
इस  शहर  में   पर   कोई   रफूगर  नहीं   मिलता ।

जज्बाती   दिलों   ने   मेरे  जब  आग   लगा  ली ।
इस   से   कोई  गमगीन  तो  मंज़र  नहीं  मिलता ।

सन्नाटे   हैं    तनहाई    है   रुसवाई   है   दिल  में ।
धोखा  जो  जमाना दे  वो  पढ़  कर  नहीं मिलता ।

वो  प्यास   बुझा  देती   मेरी   आज   सभी ,  पर ।
अच्छा  है  कि   प्यासे  को  समंदर  नहीं  मिलता ।

हैं   दोस्त  भी  ' अरविन्द   बहुत  सारे   मेरे   पर ।
जब दिल को जरूरत हो तो दिलवर नहीं मिलता ।


2
जख्म  हूं   दर्द  हूं   ज़हर  भी  हूं ।
मैं  समन्दर  भी  हूं  लहर  भी  हूं ।

आ   तुझे  ' आईना   बना   दूं  मैं ।
आईने  का  ही   शीशगर  भी  हूं ।

तुम जरा अपनी ही नजर देखना ।
मैं  जमाने  की  हर  नजर  भी हूं ।

कौन  मुझको  ही ' माँ  रुलायेगा ।
मैं   दुआ  का  तेरी  असर  भी हूं ।

कतरनों  में  करो   नहीं  शामिल ।
जान लो  आप  सुख़नवर  भी हूं ।

जबसे   तूने    निगाह   फेरी   है ।
बन  गया   एक  खंडहर  भी  हूं ।

जिस्म 'अरविन्द  में बसाओ तब ।
रात  का तेरे  हम - सफ़र  भी हूं ।


3
नहीं तकदीर में  जो  मेरे  क्यों  फिर जुस्तजू  करते ।
मेरी किस्मत में क्या है वो पता  जाकर  के यूं करते ।

रखी इज्जत हमेशा है जिसने अपना समझकर तो ।
उसी  इंसान  को   ऐसे  नहीं   बे  -  आबरू   करते ।

हमें मिलने का मौका  तो  नहीं मिल पायेगा जानम ।
कभी ख्वाबों में आ जाओ तो जी भर गुफ़्तगू करते ।

ज़हर का  घूंट  पीकर भी  बचे  यदि  तो  बचा लेना ।
किसी भी हाल में  साहब  नहीं 'रिश्तों का खूं करते ।

ये दिल का 'आइना है  जो सदा सच ही दिखाता है ।
मुखौटे को अलग रखकर जो  इसको रूबरू करते ।

मुहब्बत    रास     आएगी     हँसेगी    मुस्कुराएगी ।
बशर्ते  सच में  शिद्दत  से  मुहब्बत  तो शुरू  करते ।

तमन्नाएँ  मचलती  हैं  ' ये  मचलेंगी   यही  सच  है ।
मगर काबू में रख  इनको  बहुत मत  सुर्खरू करते ।

नहीं  कोई   करेगा  तो ,  हमें  क्या  है  लेना - देना ।
भली  जो बात लगती हो  उसे  खुद ही शुरू करते ।

सभी आदत इरादा  आरजू ' अरविन्द तुम कर लो ।
जो तुम हो  सोचते  वो  सब गलत है   हूबहू करते ।


4
गैर के  जख्मों  को हर रोज सुखाते रहिये ।
अपने किरदार का किरदार निभाते रहिये ।

राब्ता ही न  रहा  मुझसे तो शिकवा कैसा ।
करके    बर्बाद   मुझे  ज़श्न  मनाते  रहिये ।

उनको फुर्सत ही कहां हाल सुनाने की पर ।
दिल  मिले  या न मिले हाथ मिलाते रहिए ।

कब कहा मैंने  ज़रूरत नहीं  मुझको  तेरी ।
ख़्वाब में आ के  मुझे  यूँ ही  सताते रहिए ।

कोई तो  आपके नज़रों से ही घायल होगा ।
आप  नज़रों  से  यूँ  ही  तीर चलाते रहिए ।

वो नज़ारे  वो नजाकत वो अदाएं वो हँसी ।
अपने ज़ज़्बात सभी दिल के सुनाते रहिये ।

हाले ' अरविन्द  नहीं  पूछता  है कोई  गर ।
जब  मिले मौका  नये  दोस्त बनाते रहिये ।


5
सबको  रस्ता  दिखा  रहा  हूं मैं ।
साथ  '  मिट्टी   उड़ा  रहा  हूं  मैं ।

इन  दरख्तों में अब भी जिंदा हूं ।
अपना  साया  मिटा  रहा  हूं  मैं ।

मुझको लाकर लिटा गए जबसे ।
कब्रे  -  रौनक  बढा  रहा  हूं  मैं ।

आइने   में    नजर   न   आयेंगे ।
ऐसे    चेहरे   बना   रहा   हूं  मैं ।

इश्क करना ही सीख लो मुझसे ।
इश्क  करना सिखा  रहा  हूं  मैं ।

सब  मुझे  बदतमीज  कहते  हैं ।
खुद जो खुद का बता रहा हूं मैं ।

वो  रुलाती  रही   मुझे   हरदम ।
कह  जिसे ' बेवफा  रहा  हूं  मैं ।

चाहता हूं  लिपट के फिर रो लूं ।
माँ  तेरे  घर  से जा  रहा  हूं  मैं ।

आग   अरविन्द  मय्यसर  लेना ।
अपनी  बस्ती  जला  रहा  हूं मैं ।


6
बिना   किये  मेहनत  आसमान   चाहता  है ।
क़दम  कदम  पे नया बस  मकान चाहता है ।

ज़रूरतों की हरेक चीज़ जिसको हासिल हो ।
वो अपने  घर में  ही  सारा  जहान चाहता है ।

ख़ुदा  करे  कि  मुहब्बत  में  ये  मकां  आये ।
कि  छाती  चीर  दिखा दूं  निशान चाहता है ।

मिला नहीं  है    मुझे  दोस्त  एक  अरसे  से ।
वो  मुझसे  दोस्ती  का  इम्तिहान  चाहता है ।

किसी के इश्क में  पागल है  सरफिरा है जो ।
खिलाफ़े - इश्क  के  देना  बयान  चाहता है ।

रखोगे    क़ैद   तो  ' परवाज़  भूल  जाऊंगा ।
क़फस  खोलो  न  परिन्दा  उड़ान चाहता है ।

वो  बन  गये  है  खुदा  इश्क  के  मेरे जबसे ।
बस रख देना  मेरी हथेली पे जान चाहता है ।

उसे खुदा की ' मुहब्बत पे जाने है शक क्यों ।
तसल्ली  के  लिये  वो ' इम्तिहान  चाहता है ।

नुमाइँदा   नहीं    अरविन्द   हैं   कबूतर   ये ।
जो पर निकलने से  पहले  उड़ान चाहता है ।


7
एक दिन  आसमां  से  गुजर जायेंगे ।
कब्र  दर  कब्र  में  हम  उतर जायेंगे ।

आँधियों  से  ये  कह दो रहें होश में ।
गर  नहीं  तो  गुजर  रौंदकर जायेंगे ।

लाख   तूफ़ान  दरिया  उठाती  रही ।
बस तेरा  नाम  लेकर  गुजर जायेंगे ।

क्या करूँ मैं सभी लोग बिगड़े यहाँ ।
पर  घरों  में  रहें  तो  सुधर  जायेंगे ।

चाँद तारों  से  कह दो  घरों  में  रहें ।
सामने  से  नहीं  तो   गुजर  जायेंगे ।

मानता  हूँ , दिलों में ही  महफूज हैं ।
गर यहाँ से  गये  तो  बिखर जायेंगे ।

चाँद तारों रहो हद में सब , गर नहीं।
लफ्ज  तासीर तक भी उतर जायेंगे ।

ए  परिंदे  उड़ो  तुम  जमीं  देखकर ।
जो  मरेंगे  खुदा  के ही  घर जायेंगे ।

अब जरा देख 'अरविन्द गुब्बार को ।
पर हवा साथ खुद ही गुजर जायेंगे ।


8
रोग  जाता  ही  नहीं  कितनी  दवा  ली हमने ।
माँ के  क़दमों  में  झुके  और  दुआ  ली हमने ।

इस  ज़माने ने  सताया  भी  बहुत  है  मुझको ।
आग ये  सीने की  अश्कों  से  बुझा  ली हमने ।

जब नजर आई नहीं ख्वाब में ' माँ  की  सूरत ।
अपनी आंखों से हर इक  नींद  हटा ली हमने ।

देखने   तो  आज   सभी  आये  तमाशा  मेरा ।
जब  से  दीवार  घरों  में   ही  उठा  ली  हमने ।

तेरी   चाहत   में   हुआ  हाल ' दीवानों  जैसा ।
अपनी  पगड़ी  ही  सरे  आम  उछाली  हमने ।

हर तरफ ही यूं  नजर आने लगी उल्फ़त जब ।
दिल में नफरत थी मुहब्बत ही सजा ली हमने ।

खत्म   हो   जाये  न  ये  दौर  मुलाकातों  का ।
ज़िंदगी   बस   तेरे   वादे  पे  बिता  दी  हमने ।

माँ  के क़दमों  में ये सारा ही  जहां दिखता है ।
बस  तेरी  याद में  हस्ती  भी  मिटा  ली हमने ।

खौफ था मुझको चरागों से ही घर जलने का ।
आग ' अरविन्द ' घरों   में ही  लगा ली  हमने ।


9
मुफलिसी जहां की बस मैं जबान रखता हूं ।
आज  हाथ  में  अपने  आसमान  रखता हूं ।

गौर  कर  जरा  बस्ती  पे  कभी  खुदा  मेरे ।
हैं  गरीब  सब  तो  घर में  दुकान रखता हूं ।

है  खबर  जमीं तो  तुमने  खरीद ली  सारी ।
आसमान पे , लो  अपना  मकान रखता हूं ।

तुम्हें गर लगाना है  आग तो लगा  दो , पर ।
आँख  में  जहाँ  वालों  मैं तूफ़ान रखता हूं ।

जानते    रहे    बेईमान  है  खुदा  हम  भी ।
इसलिए   बेईमां  के  घर पे जान रखता हूं ।

काश  इश्क का वो आगाज तो करें गर 'मैं ।
इक तरफ  मुहब्बत  ए  कद्रदान  रखता हूं ।

जब यहाँ वहाँ का अरविन्द ने जमीं छोड़ा ।
हाथ  में  तेरे  लो ' सारा  जहान  रखता हूं ।


10
हुआ  हूँ  ख़ाक  यहां  रह  गया ' धुआं मेरा ।
किसी  में  दम  है  तो रोको ये कारवां  मेरा ।

सभी  ये  कहते  है अक्सर  ज़मीन  मेरी है ।
कोई  ये क्यों नहीं  कहता  है  आसमां मेरा ।

बदन से रूह तलक  मैं ही बस  गया तुझमें ।
मिटायेगा   तू  कहाँ  तक बता  निशां  मेरा ।

मेरे   लबों   से   हँसी  तू   मिटा  न  पायेगी ।
ए  ज़िन्दगानी  ले कितना भी  इम्तिहां मेरा ।

नहीं है खौफ  कि दुश्मन  जहां  हुआ  कैसे ।
कि अब जहां का खुदा खुद है मेहरबां मेरा ।

कई   हज़ार   फफोले  हैं  पावँ  में  लेकिन ।
खुदा  गवाह ' अभी   अज़्म  है  जवां  मेरा ।

ये और  बात  कि  मेरी  ज़बान  कट  जाये ।
मगर  बदल नहीं  सकता  कभी  बयां मेरा ।

फकत यही न  कि तुमसे ये दिल लगा बैठे ।
रोशन  तुम्ही से  है  सारा  ये आशियां मेरा ।

वो दिल्लगी हुई  अरविन्द  खत्म सारी पर ।
ये दिल भी तो नहीं भटका कहाँ कहाँ मेरा ।

--

१.पूर्ण नाम: - अरविन्द शुक्ला

२.साहित्यिक उपनाम: - कुमार अरविन्द

३.जन्मतिथि: - 31/07/1994

४.वर्तमान पता: - बंजरिया , पोस्ट - विशुनपुर संगम , इंटियाथोक

५.शहर - गोंडा

६.जिला - गोंडा  ( 271202 )

७.राज्य - उत्तर प्रदेश

८.विधा: - गजल

१०.अणुडाक (ईमेल): - arvindshukla91700@gmail.com

११.अंतरताना (वेबसाइट या ब्लॉग) : - कोई नहीं

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रचनाकार: ग़ज़लें : कुमार अरविन्द
ग़ज़लें : कुमार अरविन्द
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