महत्वाकांक्षा // लघुकथा // छगन लाल गर्ग "विज्ञ"

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- महत्वाकांक्षा ।

- लघुकथा

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"

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इस कथा का कथानक धुंधला है, यह केवल भीतर से गुजरा और निकल गया,पर महत्वाकांक्षा को टीस दे गया। आज भी उस अनुभूति का एक कतरा भीतर तक चुभ जाता है।

लघु कथा साहित्य अधिवेशन के मध्य श्रेष्ठता के मद का नशा कथाकार की अकड़ और प्रतिष्ठा के राजसी ठाठ का कोप भाजन मुझे और पहचान पाने की मेरी महत्वाकांक्षा को बनना पड़ा. यह नहीं कि किसी कारण मुझे निशाना बनाया गया, अपितु मैं स्वयं निशाना बनने को उनके शरणों में प्रस्तुत हुआ था।

ठाठ बाट के साथ मध्य के आसन पर फूलों से लदी काया को देखकर कौन ऐसा निष्ठुर नव-साहित्यकार होगा जो उनसे आशीर्वाद प्राप्त नहीं करना चाहेगा। यह अवसर प्रभु का प्रसाद समझकर मैं उनके चरणों के स्पर्श की इच्छा त्याग नहीं सका, और भीड़ को चीरता हुआ उनके चरणों तक पहुंचने का असीम आनंद पाया। नमन के उपरांत मैंने अपने काव्य संग्रह की एक प्रति उनके कर कमलों में समर्पित करना चाहा तो वे तन गये, उनके भीतर का तानाशाह मेरे बौनेपन को धिक्कारता हुआ बोला " तुम नौसिखिए लोग हर बार अपनी औकात को भूल जाते हो, पुस्तकें कब कहाँ और किस विधि विधान से प्रसिद्धि प्राप्त सज्जनों को समर्पित की जाती है तुम लोग कब सीखोगे, कुछ भी संस्कार नहीं आते?

वे और उनके समकक्ष पदासीन साहित्यकार मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरने लगे. मैं अवाक सा लज्जित महसूस कर रहा था, फिर भी थोड़ी सी ऊर्जा का कतरा भीतर महसूस किया और प्रार्थना के स्वर उभरे- "सर आप विशाल हृदय हैं, आपकी श्रेष्ठता का बखान कार्यक्रम के उद्घोषक से सुन कर प्रेरणा मिली, और मेरे मन का विश्वास भी आप के वक्तव्य में हिंदी के प्रति समर्पण से पक्का हुआ।"

उनके बड़े आत्मलीन हुए चेहरे का ताप उपहासात्मक तेजस्विता में परिवर्तित होने लगा, उनके अहमन्यता की रश्मियाँ आसपास के पीठासीन साहित्यकारों को प्रहसन की उज्जवलता दे रही थीं, फिर भी, मैंने अपने भीतर दबी अभिलाषा और लज्जा की क्षतिपूर्ति की नीयत से आग्रह किया  " सर मेरा लिखा यह काव्य संग्रह है, आप साहित्य के महान प्रर्वतक हैं, एक प्रति आपको भेंट देना चाहता था, ऐसे में यह हरकत कर बैठा, कृपया क्षमा करें"
असंभव की याचना सुनकर विख्यात कथाकार अचंभित थे, साफ और कड़े लहजे में बोले - " मैं इस किताब को कैसे संभालूंगा?
माफ करें, बुरा न मानें, मैंने सिद्धान्त बना लिया है, मैं मंच पर विधि-विधान से ही पुस्तकें स्वीकार करता हूँ  ....। वरिष्ठ का सपाट उत्तर था.

मैं मौन और चिंतन शील हूँ। हमारा वरिष्ठ साहित्यकार बहुत प्रबुद्ध, कुलीन,  समृद्ध और संस्कारित हो चुका है। वह बिना विधि-विधान और तामझाम के समर्पण स्वीकार नहीं करता .. मैं साहित्य जगत के इस सत्य से अनुप्राणित कथा की एक निढाल लहर की वेदना का निर्लज्ज अंश हूँ ..।।

छगन लाल गर्ग "विज्ञ"
निवासी-जीरावल, सिरोही
राजस्थान

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