माँ तुम ऐसी होती हो (लघु कहानी ) // सुशील शर्मा

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विमल बहुत परेशान था उस समझ में नहीं आ रहा था कि वो इस परिस्थिति से कैसे निबटे वो अपनी माँ को बहुत चाहता था किन्तु उसकी पत्नी और बच्चे उसकी माँ से बहुत दूर भागते थे क्योंकि उसकी माँ की एक आँख नहीं थी साथ ही उसकी कमर 90 अंश पर झुकी थी वैसे वह अपना काम सब खुद कर लेती है किन्तु फिर भी वो उसकी पत्नी और बच्चों के लिए हमेशा खटकती है।

दादी आप ऊपर के कमरे में जाओ मेरे दोस्त आ रहे हैं "विमल के बेटे अखिल ने बड़े बेरुखी से कहा।

पर बेटा मैं तो यहाँ बहुत दूर बैठी हूँ "विमल की माँ ने बहुत प्यार से कहा।

नहीं आप उनके सामने मत रहो वो मुझे चिढ़ाते हैं "अखिल ने जोर से डांटते हुए कहा।

क्या हुआ अखिल क्यों चिल्ला रहे हो "विमल की पत्नी कामनी ने किचिन से ही आवाज लगाई।

देखो न माँ ये दादी यहीं ड्राइंग रूम में बैठी हैं मेरे दोस्त आ रहें हैं "अखिल ने शिकायत भरे लहजे में कहा।

माँ जी आप ऊपर चली जाओ क्यों हम लोगों को लजवाती हो "कामनी ने बेटे का पक्ष लेते हुए कहा।

बेचारी सरस्वती चुपचाप उठकर जीने के सहारे ऊपर जाने लगी कमर झुकी होने के कारण उन्हें ऊपर चढ़ने में बहुत परेशानी हो रही थी किन्तु वो पूरी ताकत से ऊपर के एक अकेले कोने वाले कमरे में जाकर बैठ गईं।

विमल बाजू के कमरे से सब सुन रहा था उसे कष्ट हो रहा था कि उसकी माँ को अपमानित होना पड़ रहा है किंतु वो असहाय था अगर वो कुछ कहता है तो पत्नी और बच्चे उसके विरोध करने लगते है दूसरे उनके तर्क भी सही लगते है चूंकि वो एक प्रशासनिक अधिकारी था उसका सामाजिक स्तर बहुत ऊँचा था उसकी ससुराल भी एक उच्च घराने में थी। वह चुपचाप इस तरह हरदिन अपनी माँ को अपमानित होते देखता रहता था।

रात को विमल की पत्नी ने कहा देखो जी अब कुछ करो कल कलेक्टर साहब की पत्नी आईं थी माँ जी अपनी देशी धुन धारा में उनसे मिलीं मुझे बहुत शर्म आ रही थी बताते हुए की ये मेरी सास हैं मैंने कह दिया दूर की रिश्तेदार हैं इलाज कराने आईं हैं।

विमल को रोना आ गया किन्तु फिर भी वह चुप रहा उसे समझ में नहीं आ रहा था वो क्या करे।

अपने बेटे की मनःस्थिति को सरस्वती अच्छी तरह से जानती थीं और बेटे को कोई कष्ट न हो इसलिए वो हर बात को चुपचाप सह लेती थीं। विमल बहुत उदास रहने लगा एक तरफ परिवार और सामाजिक स्तर पर जीने की प्रतिबद्धता थी तो दूसरी ओर माँ।

आखिर माँ से अपने बेटे की यह हालत नहीं देखी गई एक दिन उन्होंने अपने बेटे से कहा "विमल बहुत दिन हो गए हैं मैं अपने गांव जाना चाहती हूँ मुझे वहां पहुँच दो मेरा यहाँ मन नहीं ला रहा।

किन्तु माँ वहां तो कोई नहीं हैं तुम्हारी देखभाल कौन करेगा "विमल ने आश्चर्य से पूछा।

अरे सब गांव वाले तो हैं और वो तुम्हारे मामाजी तो उसी गांव में रहते हैं और फिर हम सारी व्यवस्थाएं कर आएंगे न "कामनी को तो जैसे मन की मुराद मिल गई हो।

हाँ बेटा बहु सही कह रही हैं सरस्वती ने लम्बी साँस लेते हुए कहा।

विमल जानता था कि गाँव में माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं हैं लेकिन अपनी पत्नी की जिद के कारण वह अपनी माँ को गांव छोड़ने पर विवस हो गया।

माँ को गांव छोड़कर आते वक्त उसे रोना आ रहा था तथा अपनी बेबसी पर गुस्सा भी आ रहा था किन्तु परिवार पत्नी और समाज ने उसके इन मनोभावों को दबा दिया और वो सुकून सा महसूस करने लगा।

कुछ दिनों के बाद उसके चाचा जो अमेरिका में रहते थे आने वाले थे जब विमल बहुत छोटा था उसके पिता जीवित थे अब वो भारत आये थे उसके बाद वो अब भारत आने वाले थे।

पूरा परिवार और आसपड़ोस बहुत उत्साहित था अमेरिका से विमल के डॉ चाचा आ रहे थे। डॉ रमेश ने जैसे ही घर में कदम रखा सब ने मिलकर बहुत उत्साह से उनका स्वागत किया।

क्यों विमल भाभी नहीं दिख रहीं कहाँ हैं "डॉ रमेश ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।

जी वो गांव में रहती हैं यहाँ उनका मन नहीं लगा "कामनी ने सपाट लहजे में उत्तर दिया।

डॉ रमेश ने विमल की और देखा विमल ने अपनी आँखे झुकाली।

डॉ रमेश सब समझ गए बोले कल हम भाभी से मिलने गांव चलेंगे सब लोग।

दूसरे दिन सभी लोग गांव के घर में पहुंचे देखा सरस्वती को बहुत तेज बुखार है और वो पलंग पर असहाय पड़ी है डॉ रमेश दौड़ कर सरस्वती के पास गए उनके पैर छू कर रोने लगे। सरस्वती की ये हालत उनकी कल्पना से परे थी।

वाह बेटा विमल तूने तो नाम उजागर कर दिया अपनी माँ की ये हालत देख कर तुझे तो शर्म भी नहीं आ रही होगी "डॉ रमेश ने विमल को लगभग डांटते हुए कहा।

नहीं देवर जी विमल का कोई दोष नहीं हैं मैं खुद गांव आई थी "सरस्वती ने अपने बेटे का बचाव किया।

मुझे सब पता चल गया भाभी "आप चुप रहो।

क्यों बहु तुम्हें अपनी सास की कुरूपता पसंद नहीं हैं समाज में तुम्हें नीचे देखना पड़ता हैं है ना ?"डॉ रमेश ने कामनी की ओर व्यंग से देखा।

कामनी निरुत्तर होकर विमल को देखने लगी।

आज तुम जिस सामाजिक स्तर पर हो वो इन्हीं के संघर्षों की देन है और बेटा विमल तुम्हें शायद मालूम न कि बचपन में जब तुम एक साल के थे तब छत से नीचे गिरने के कारण तुम्हारी एक आंख फूट गई थी और तुम्हारी रीड़ की हड्डी में भी समस्या थी तब तुम्हारी इस कुरूप माँ ने अपनी एक आंख और अपना बोन मेरो तुम्हें देकर इतना सुन्दर स्वरुप दिया था कामनी बेटा इतने सालों तक संघर्ष करके बेटे को प्रशासनिक अधिकारी बनाने वाली इस संघर्षशील औरत की तुम लोगों ने यह दशा कर दी तुम्हें ईश्वर कभी माफ़ नहीं करेगा "डॉ रमेश की आँखों से अश्रुजलधारा बह रही थी।

अब भाभी आप मेरे सह अमेरिका जाएँगी यहाँ इन स्वार्थी लोगों के बीच नहीं रहेंगी "डॉ रमेश ने सरस्वती से कहा।

विमल को तो काटो खून नहीं था डॉ रमेश जो उसके चाचा थे उन्होंने जो राज बताया उसके बाद तो विमल को लग रहा था कि उससे ज्यादा पापी इंसान इस दुनिया में कोई नहीं हैं। वह दौड़ता गया और सरस्वती की क़दमों से लिपट गया " माँ मेरा अपराध अक्षम्य हैं मैंने जानबूझ कर चुप्पी साधे रहा आपका अपमान करवाता रहा अब सिर्फ आप ही उस घर में मेरे साथ रहेंगी और कोई नहीं "विमल ने आग्नेय दृष्टि से अपनी पत्नी और बच्चों को देखा।

कामनी को भी बहुत पश्चाताप हो रहा था किन्तु उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो सरस्वती से आँख मिलाए। सरस्वती उसकी मनःस्थिति को समझ ै उसने कामनी को पुचकारते हुए अपने पास बुलाया विमल को डांटते हुए कहा "खबरदार जो मेरी बहु को मुझसे अलग करने की कोशिश की तो तुझे ही घर से बाहर निकाल दूंगी"

कामनी और बच्चों ने सरस्वती के पैर पड़ते हुए अपने व्यवहार पर माफ़ी मांगी और माँ के ह्रदय ने सबको माफ़ कर दिया।

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